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कांग्रेस में कलह, संजय कर पाएंगे सुलह?

हरियाणा कांग्रेस को लम्बे समय से जिस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है वह भाजपा से मुकाबले से अधिक अपनी आंतरिक गुटबाजी है। विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर रहने और लगातार चुनावी झटकों के बावजूद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद कम होने के बजाय और खुलकर सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में कांग्रेस हाईकमान ने संजय दत्त को हरियाणा का नया प्रभारी बनाकर संगठन को एकजुट करने की जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने प्रभार सम्भालते ही पांच दिनों तक नेताओं, विधायकों और संगठन के विभिन्न प्रकोष्ठों के साथ मैराथन बैठकें कीं लेकिन इन बैठकों ने संगठनात्मक एकता से ज्यादा अंदरूनी खींचतान को उजागर कर दिया। बैठक के पहले ही दिन मंच पर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने साफ संकेत दिया कि हरियाणा कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच दूरियां अभी भी बरकरार हैं। सत्ता से करीब डेढ़ दशक दूर रहने के बावजूद पार्टी नेतृत्व आपसी मतभेद खत्म नहीं कर पाया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल प्रभारी बदलने से संगठन की स्थिति बदल जाएगी?

बैठक के दौरान वरिष्ठ नेता कुमारी शैलजा ने संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी को खुलकर सामने रखा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सत्ता में इसलिए नहीं लौट पा रही क्योंकि पार्टी के भीतर गुटबाजी कार्यकर्ताओं तक पहुंच चुकी है। उनका कहना था कि हालात ऐसे हो गए हैं कि एक कार्यकर्ता दूसरे कार्यकर्ता और एक नेता दूसरे नेता से सहज संवाद तक नहीं कर पाता। शैलजा ने स्वीकार किया कि कांग्रेस एक राजनीतिक दल है और उसका लक्ष्य सत्ता में आना होना चाहिए लेकिन ‘पावर पाॅलिटिक्स’ की आंतरिक लड़ाई ने संगठन को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी में योग्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने के बजाय अचानक कुछ लोगों को ऊपर लाने से असंतोष पैदा होता है। उनके इस बयान को संगठनात्मक व्यवस्था और नेतृत्व शैली पर सीधा सवाल माना गया।

बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला के बीच लम्बे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी सार्वजनिक रूप से दिखाई दी। हुड्डा ने हल्के अंदाज में कहा, ‘रणदीप सुरजेवाला मेरा साथ दे दे, फिर देख धमाका।’ इसके जवाब में सुरजेवाला ने कहा, ‘मैं बीस साल से आपका साथ दे रहा हूं, अब आपकी बारी है मेरा साथ देने की।’ राजनीतिक हलकों में इसे नई पीढ़ी को नेतृत्व में अधिक भूमिका देने के संकेत के रूप में देखा गया। सुरजेवाला ने आंकड़ों के जरिए भी पार्टी की चुनावी स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हरियाणा बनने के बाद कांग्रेस केवल तीन बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर सकी है। उनका संदेश साफ था कि केवल वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी ही असली कसौटी है। बैठक खत्म होने के बाद सिरसा से कांग्रेस विधायक गोकुल सेतिया ने भी संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने बिना नाम लिए कुछ नेताओं पर भाजपा के साथ रहने और बाद में कांग्रेस में आकर नसीहत देने का आरोप लगाया। सेतिया ने बैठक की व्यवस्था पर भी नाराजगी जताई। उनका कहना था कि उन्हें और विधायक देवेंद्र हंस को पीछे बैठाने की कोशिश की गई, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि जब बैठक की शुरुआत ही विवादों से हो रही हो तो उससे सकारात्मक परिणाम की उम्मीद करना मुश्किल है। उन्होंने हाईकमान को भी संदेश देते हुए कहा कि पहले मौजूदा विधायकों का मनोबल मजबूत किया जाए, तभी संगठन को मजबूती मिल सकेगी।

इन तमाम मतभेदों के बीच नए प्रभारी संजय दत्त ने स्पष्ट किया कि पार्टी के सभी फैसले आम सहमति से लिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का लक्ष्य संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना है और इसके लिए वह जिला स्तर तक जाकर कार्यकर्ताओं और नेताओं से संवाद करेंगे। संजय दत्त ने भरोसा दिलाया कि सभी नेताओं की भावनाओं और सुझावों को महत्व दिया जाएगा तथा पार्टी हाईकमान के संदेश को कार्यकर्ताओं तक पहुंचाया जाएगा। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक बैठकों से ज्यादा चुनौती वरिष्ठ नेताओं के बीच भरोसा कायम करने की होगी।

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कांग्रेस की अंदरूनी कलह पर तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस के नेता मंच पर ही आपस में लड़ते नजर आते हैं। इससे कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है और पार्टी के पास जनता को देने के लिए कोई सकारात्मक एजेंडा नहीं बचा है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस केवल हरियाणा ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी नेतृत्व संकट और आंतरिक संघर्ष से जूझ रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं बल्कि संगठन के भीतर मौजूद गुटबाजी है। लम्बे समय से भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला जैसे बड़े नेताओं के अलग-अलग शक्ति केंद्र बने हुए हैं। चुनाव के समय भले ही ये नेता एक मंच पर दिखाई देते हों लेकिन संगठनात्मक स्तर पर मतभेद लगातार बने रहते हैं। यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते इन मतभेदों को दूर नहीं करता तो आगामी चुनावों में इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। केवल बैठकों और संवाद से समाधान निकलना आसान नहीं होगा, जब तक शीर्ष नेतृत्व साझा रणनीति और स्पष्ट संगठनात्मक अनुशासन लागू नहीं करता।
संजय दत्त के सामने चुनौती केवल संगठन को मजबूत करने की नहीं बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक खाई को पाटने की भी है। यदि वे सभी गुटों को साथ लेकर चलने में सफल होते हैं तो हरियाणा कांग्रेस नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ सकती है। यदि वरिष्ठ नेताओं के बीच अविश्वास और सार्वजनिक बयानबाजी जारी रही तो संगठनात्मक बदलाव की कोशिशें सीमित प्रभाव ही छोड़ पाएंगी। बहरहाल इतना तय है कि हरियाणा कांग्रेस की असली परीक्षा भाजपा के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने से पहले अपने ही घर को व्यवस्थित करने की है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि संजय दत्त संगठन में नई एकजुटता ला पाते हैं या नहीं।

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