जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की सुगबुगाहट के चलते सियासी जंग तेज हो गई है।
  सूत्रों के हवाले से खबरें चली कि केंद्र सरकार राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले वहां परिसीमन करने के पक्ष में है। इस बारे में केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्यपाल के बीच बात हो चुकी है। परिसीमन की संभावना भांपते हुए नेशनल कांफ्रेंस के उपाध्यक्ष उभर अब्दुला ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यदि ऐसा हुआ तो उनकी पार्टी इसका विरोध करेगी।
जानकारों के मुताबिक राज्य की क्षेत्रीय पार्टियों को इस बात का डर सता रहा है कि यदि जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन किया गया तो राज्य की सत्ता में बने रहने के उनके सपने धराशायी हो जाएंगे। दरअसल घाटी में 20-25 हजार वोटों पर भी विधानसभा सीटें हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर में एक लाख से ज्यादा वोटों पर विधानसभा सीटें हैं। यानी घाटी में जितने वोटों पर चार विधायक हैं। जम्मू में उतने वोटों पर एक विधायक हैं। केंद्र सरकार इसी असमानता को खत्म करने के मूड में दिखाई देती है। अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो फिर जम्मू-लद्दाख दोनों क्षेत्रों सरकार बना सकते हैं, जबकि अभी सत्ता की चाबी कश्मीर घाटी के पास है।
सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कार्यभार संभालने के बाद ही ‘मिशन कश्मीर’ मोड़ में नजर आ रहे हैं। इस बीच जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की तैयारियों से लेकर और अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा पर उनकी अधिकारियों से लंबी चर्चाएं हुई। अधिकारियों से बैठक के बाद उन्होंने प्रदेश  के राज्यपाल सतपाल मलिक से फोन पर बात की। बताया जा रहा है कि बैठक में शाह ने गृह सचिव राजीव गौबा और कश्मीर मामलांे के अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार के साथ परिसीमन आयोग के गठन संबंधी फैसले लिए।  हालांकि अधिकारियों ने कहा कि हालांकि बैठक में परिसीमन आयोग गठित करने पर कोई चर्चा नहीं हुई। फिर भी प्रदेश भाजपा द्वारा परिसीमन की मांग के बीच, अधिकारियों ने कहा कि केंद्र की नई सरकार विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन और अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या तय करने के लिए परिसीमन आयोग का गठन कर सकती हैं।
उल्लेखपनीय है कि राज्य में आखिरी बार 1995 में परिसीमन किया गया था, जब राज्यपाल जगमोहन के आदेश पर 87 सीटों का गठन किया गया। विधानसभा में कुल 11 सीटें हैं, लेकिन 24 सीटों को रिक्त रखा गया है। संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक इन 24 सीटों को पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली छोड़ा गया है। शेष 87 सीटों पर चुनाव होता है। राज्य के संविधान के मुताबिक हर 10 साल के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया जाना चाहिए। यानी यहां सीटों का परिसीमन 2005 में किया जाना था, लेकिन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने 2002 में इस पर 2026 तक के लिए रोक लगा दी थी। अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू-कश्मीर जनप्रतिनिधित्व कानून 1957 और जम्मू-कश्मीर के संविधान में बदलाव करते हुए यह फैसला लिया था।
2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू-संभाग की आबादी 5378538 है, जो राज्य की 42 ़89 फीसदी आबादी है। जम्मू संभाग 26200 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है यानी राज्य का 25 ़93 फीसदी क्षेत्रफल जम्मू संभाग के अंतर्गत आता है। यहां विधानसभा कुल 37 सीटें हैं। कश्मीर की आबादी 6888475 है, जो राज्य की आबादी का 54 ़93 फीसदी हिस्सा है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल 15900 वर्ग किलोमीटर है, जो 15 ़73 प्रतिशत है। यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं। राज्य के 58 ़33 फीसदी क्षेत्रफल वाले लद्दाख संभाग मंे चार विधानसभा सीटें हैं।
सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार इसलिए परिसीमन के पक्ष में है कि एससी और एसटी समुदाय के लिए सीटों के आरक्षण की नई व्यवस्था लागू की जा सके। घाटी की किसी भी सीट पर आरक्षण नहीं है, लेकिन यहां 11 फीसदी गुर्जर-बक्करवाल और गद्दी जनजाति समुदाय के लोगों की आबादी है। जम्मू संभाग में सात सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं, जिनका रोटेशन नहीं हुआ है। ऐसे में नए सिरे से परिसीमन से सामाजिक समीकरणों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है। यदि केंद्र सरकार ने परिसीमन आयोग का गठन किया तो इसके लिए संसद में बिल लाना होगा। चूंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन है। इस वजह से इसे राज्य के संविधान के अनुसार यहां से मंजूरी मिल जाएगी। इसलिए लोगों को संसद सत्र का इंतजार है।
परिसीमन का समर्थन कर रही राजनीतिक ताकतों का मानना है कि नए सिरे से परिसीमन होने से राज्य में राजनीतिक असंतुलन खत्म होगा। कश्मीर का सत्ता में वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। कश्मीर में 349 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधानसभा सीट है, जबकि जम्मू में 710 वर्ग किलोमीटर पर।
परिसीमन के लिए पांच चीजों को आधार बनाया जाता है जिसमें क्षेत्रफल, जनसंख्या, क्षेत्र की प्रकृति, कम्युनिकेशन सुविधा तथा इससे मिलता-जुलता अन्य कारण। परिसीमन चाहने वालों का मानना है कि क्षेत्रफल अधिक होने के साथ ही क्षेत्र की भौगोलिक स्थति भी विषय है। कम्युनिकेशन सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में सभी परिस्थितियां जम्मू संभाग के हक में है।

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