Uttarakhand

सरकार ने खोली जीरो टॉलरेंस की पोल

कितनी हास्यास्पद बात है कि एक ओर तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भ्रष्ट अधिकारियों की छुट्टी कर देने पर मोदी सरकार की सराहना करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ खुद उनकी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों पर मेहरबान है। जीरों टॉलरेंस का दंभ भरने वाली त्रिवेंद्र सरकार ने भ्रष्ट अधिकारियों का न सिर्फ निलंबन वापस लिया, बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर प्रमोशन देकर पुरस्कृत भी किया है। भ्रष्ट अधिकारियों पर मेहरबानी के चक्कर में मुख्यमंत्री यह तक भूल गए कि इनमें से कुछ जेल की हवा भी खा चुके हैं

त्रिवेंद्र रावत सरकार अपने शुरुआती दौर में जिस तेजी से भ्रष्टाचार मिटाने की बात कर रही थी उससे कुछ उम्मीदें जगी थी। सरकार बनने के कुछ दिन के बाद सीएम स्वच्छ और पारदर्शी शासन देने की दिशा में में सक्रिय भी दिखाई दिए। कई अधिकारियों और कर्मचारियों को बड़ी कार्रवाइयां होने से सरकार के प्रति जनता में एक विश्वास जगने लगा। शायद राज्य के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि एक दर्जन के करीब अधिकारियों और कर्मचारियों पर भ्रष्ट आचरण के लिए निलंबन झेलना पड़ा। लेकिन हैरानी तब होती है कि जब दो वर्ष के अंतराल में ही संबंधित अधिकारियों का न सिर्फ निलंबन वापस लिया गया, बल्कि महत्वपूर्ण बेहतर पदों पर तैनात भी किया जाने लगा। गंभीर बात यह भी सामने आई कि कई ऐसे अधिकारी हैं जिन पर विभागीय जांच में कार्रवाई करने की संस्तुतियां की गई थी उनको भी पदोन्नति देकर एक तरह से भ्रष्ट आचरण के लिए सरकार ने पारितोषिक देकर उपकøत करने का काम किया है। ऐसे एक नहीं, बल्कि कई उदाहरण सरकार ने स्वयं प्रदेश की जनता के सामने प्रस्तुत किए हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के धर्मयुद्ध की बात करें तो राज्य का सबसे चर्चित और हिला देने वाला एनएच 74 का भूमि मुआवजा घोटाला पहले स्थान पर है। करीब एक दर्जन अधिकारियों और कर्मचारियों को इस घोटाले के आरोपों में निलंबित होना पड़ा। कइयों को जेल तक भेजा गया। राज्य के दो बड़े आईएएस अधिकारियों को कई माह तक निलंबन झेलना पड़ा। लेकिन आज तकरीबन सभी अधिकारियों- कर्मचारियों के साथ- साथ आईएएस अधिकारियों को न सिर्फ बहाल किया गया बल्कि उनको और बड़े पदां पर तेनात कर दिया गया।

हास्यास्पद है कि एक ओर तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भ्रष्ट और अक्षम अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत किए जाने के प्रधानमंत्री मोदी के फैसले की सराहना करते हैं और दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को प्रमोशन तक दिए जा रहे हैं। उत्तराखण्ड परिवहन विभाग के रोडवेज में करीब दो वर्ष पूर्व दागी और भ्रष्टाचार में संलिप्त कार्मिकों को जबरन सेवानिवृत किए जाने का निर्णय लिया गया था। इस निर्णय के पीछे की पूरी कहानी भी बेहद दिलचस्प है। 2017 में रोडवेज ने घाटे के चलते अपने कर्मचारियों की छंटनी करने के लिए सभी 3500 कर्मचारियों को सेवा काल के रिकॉर्डों को खं्रगाला। प्रदेश के सभी रोडवेज डिपो को एक सर्कुलर जारी किया जिसमें सभी कर्मचारियों के बारे में जानकारियां मांगी गई कि उनका अब तक सर्विस रिकॉर्ड केसा रहा है। साथ ही कर्मचारियों के सेवाकाल में कितनी बार दंडित किया गया। भ्रष्टाचार के आरोपों का भी उल्लेख किए जाने का प्रावधान रखा गया।

दिलचस्प बात यह है कि रोडवेज प्रबंधन को जब अपने ही कर्मचारियों की जानकारी प्राप्त हुई तो उसमें कई ऐसे कर्मचारी पाए गए जिन पर कई आरोप लगे। कइयों को तो दस से बीस बार दंडित भी किया जा चुका है। 15 से 20 बार विभाय स्तर पर दंड मिलने वाले कर्मचारियों की सूची बहुत लंबी बताई जा रही है। हालांकि पूरी जानकारी रोडवेज ने सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन इससे रोडवेज प्रबंधन पूरी तरह से हिल गया। साथ ही कई ऐसे ड्राइवर और कंडक्टर भी हैं जो स्वयं को अक्षम बताकर स्वेच्छिक सेवानिवृति के लिए कह चुके हैं। पूरी जानकारी आने के बाद रोडवेज प्रबंध ने इन दागी कर्मचारियों को जबरन सेवानिवृत करने के लिए कवायद शुरू कर दी और दागियों के साथ-साथ अक्षम कर्मचारियों के सेवानिवृति के अधिकारों और सभी देयों के लिए शासन से 17 करोड़ के बजट की मांग की।

गौर करने वाली बात यह है कि किसी भी कर्मचारी को सेवानिवृति के बाद उसके सभी देयों का 30 दिन में भुगतान करना नियमानुसार जरूरी है, तो इसके लिए भारी-भरकम धनराशि रोडवेज प्रबंधन को चाहिए थी। एक वर्ष से भी ज्यादा का समय हो चुका है, लेकिन शासन ने न तो कोई बजट रोडवेज को स्वीकøत किया है और न ही सरकार ने इस पर कोई ठोस निर्णय लिया है, जबकि भ्रष्टाचार और अनियमिताओं के गंभीर आरोपी आज भी शासन ओैर सरकार की उदासीनता के चलते रोडवेज में कार्यरत हैं। यही नहीं जो ड्राइवर अपने आप को काम करने के लिए अक्षम बता चुके हैं उनमें से अधिकांश मंडलीय डिपो में ही डटे हुए हैं जिनसे जरूरत के समय प्रबंधन काम भी ले रहा है। यह अपने आप में ही बड़ा गंभीर मामला बनता है। खासतौर पर रोडवेज के ड्राइवरों के मामले में तो सवारियों के लिए जान का खतरा बना हुआ है।

जीरो टॉलरेंस की नीति को स्वयं सरकार ने ही पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदेश में विजिलेंस की स्थिति से इसे बेहतर समझा जा सकता है। पूर्व में प्रदेश सरकार ने बिहार राज्य की विजिलेंस की तरह प्रदेश की विजिलेंस को अधिकार दिए जाने की बात कही थी। इसके लिए बाकायदा एक टीम को बिहार विजिलेंस का अध्ययन करने के लिए भेजा था। बिहार राज्य की विजिलेंस को कई ऐसे अधिकार प्राप्त है ंजो किसी अन्य राज्य में नहीं हैं। बिहार विजिलेंस एक तरह से सीबीआई की तरह ही काम करती है जिसके चलते राज्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए जाने में बहुत बड़ी कामयाबी हासिल हो पाई है। इसी को देखते हुए उत्तराखण्ड में भी विजिलेंस को बिहार तर्ज पर अधिकार और साधन सम्पन्न बनाए जाने का सुझाव सरकार को दिया गया। अभी तक इस सुझाव पर अमल नहीं हो पाया है और इससे संबंधित फाइल सचिवालय में ही दबी हुई है, जबकि कई ऐसे मामले हैं जिन पर विजिलेंस को कार्यवाही करने के लिए शासन और सरकार से अनुमति लेना जरूरी है, क्योंकि राज्य की विजिलेंस को आरोपी के खिलाफ शासन से अनुमति लेनी जरूरी है। बगैर अनुमति के न तो विजिलेंस कोई कार्यवाही कर सकती है और न ही बड़ी जांच आरंभ हो पा रही है। गंभीर बात यह है कि इस अनुमति के नियम के फेर में आज भी विजलेंस के पास 30 ऐसे मामले हैं जिन पर पर कार्यवाही और जांच होनी बाकी है। माना जा रहा है कि इनमें से अधिकांश मामले शासन-प्रशासन के बड़े नामों से जुड़े हैं जिनको बचाए जाने के प्रयास हो रहें हैं। इसका बड़ा प्रमाण राज्य में करोड़ों के छात्रवृति घोटाले से जोड़कर देखा जा सकता है जिसमें जांच और कार्यवाही की अनुमति मिलने में ही महीनों लग गए हैं। जिनके खिलाफ अनुमति मिली भी है तो उन आरोपियों ने अपने बचाव के लिए कई रास्ते तैयार कर लिए हैं।

कई बाधाओं और नियमों के बावजूद राज्य की विजिलेंस ने अपना काम किसी तरह से निपटाया भी है। एक जानकारी के अनुसार अब तक राज्य में विजिलेंस ने 219 अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने फंदे में कसा है, लेकिन इनमें से महज 58 ख्ुली जांचें हुई हैं जिनमें अभी तक 33 मामलों में ही कार्यवाही की गई है। यह अपने आप में बताता है कि सरकार और शासन राज्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए हकीकत में कितना प्रयास कर रहा है।

यह तो विभागीय स्तर के भ्रष्टाचार के मामले हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से सरकार पर ही भ्रष्टाचार को संरक्षण दिए जाने के आरोप भी लग रहें हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप कांग्रेस के उपनेता सदन ने विधानसभा सत्र में लगाए हैं। जिनमें मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्यों और अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार किए जाने के प्रमाण बताए गए हैं।

पूर्व में कांग्रेस के उपनेता सदन करण महरा द्वारा मीडिया में कई स्टिंग ऑपरेशन को सार्वजनिक किया गया जिसमें मुख्यमंत्री के भाई और विशेष कार्य अधिकारी पर घूस लेने के आरोप लगाए गए। साथ ही मुख्यमंत्री के एक सबसे नजदीकी मित्र का भी स्टिंग ऑपरेशन मीडिया में दिखाया गया जिसमें सूर्यधार चेकडैम योजना में जमीनों की खरीद का मामला बताया गया। यही नहीं शासन में तैनाती के मामले में भी मुख्यमंत्री के मित्र की बड़ी भूमिका पर भी स्टिंग ऑपरेशन दिखाया गया।

महरा द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों के बाद भी सरकार से कोई बड़ी प्रतिक्रिया समाने नहीं आई। 24 जून को शुरू हुए विधानसभा के तीन दिवसीय सत्र के दौरान सदन में मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के गंभीर आरोप लगाते हुए करण महरा ने सदन में एक पेन ड्राइव को दिखाया। आरोप लगाए कि इसमें मुख्यमंत्री के परिवार और नजदीकी लोगों के स्टिंग ऑपरेशन हैं। हालांकि स्टिंग ऑपरेशन का मामला पहले ही उच्च न्यायालय में लंबित है जिसके चलते सरकार ने इस मामले को सदन में उठाए जाने पर कड़ी आपत्ति की और अपना बचाव किया। जिसको लेकर कांग्रेस ने खासा हंगामा किया और सदन से वाकआउट भी किया।

यह जरूर है कि स्टिंग ऑपरेशन का मामला हाईकोर्ट नेनीताल में सुनवाई पर चल रहा है। इसके चलते सदन में उस पर कोई बहस नहीं हो सकती, लेकिन जिस तरह से कांग्रेस ने इस बात को जानते हुए सरकार और सीधे मुख्यमंत्री को निशाने पर लिया है, वह यह साफ करता है कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह बात तब और मजबूत हो जाती है कि स्वयं सदन में ही सौ दिनों में राज्य को ताकतवर और ठोस लोकायुक्त देने का दावा करने वाली सरकार ढाई साल में भी राज्य को लोकायुक्त कानून नहीं दे पाई है, जबकि सरकार ने सदन में लोकायुक्त अधिनियम निर्विरोध पास किया और दूसरे दिन उसी लोकायुक्त बिल को प्रवर समिति को सौंप दिया। जहां अभी तक वह लोकायुक्त कानून दबा हुआ है। वह कब बाहर आएगा और उसकी कितनी ताकत होगी यह अभी भविष्य के गर्भ में है।

 

आरोपी अधिकारियों की बहाली

एनएच भूमि घोटाला प्रकरण में राज्य के पांच पीसीएस अधिकारी निलंबित हुए और उनको जेल भी जाना पड़ा था। जिनमें पीसीएस अधिकारी डीपी सिंह, भगत सिंह फोनिया, तीरथ पाल सिंह, नंदन सिंह नग्याल तथा अनिल श्ुक्ला को घोटाले में आरोपी मानते हुए इनको सरकार ने निलंबित किया और जेल में भेजा था। लेकिन कुछ ही माह के बाद सरकार ने इन सभी का निलंबन वापस लेकर इनको उत्तराखण्ड राजस्व परिषद में तैनात कर दिया। करोड़ां के मुआवजे घोटाले से जहां सरकार के राजस्व को चपत लगाई गई, वहीं भ्रष्टाचार के आरोपियों को बहाल करके पुनः तैनाती भी राजस्व से संबंधित विभाग में कर दी गई। इसी तरह से आईएएस चंद्रेश यादव को तीन माह तक निलंबित किया गया लेकिन उनको फिर से बहाल कर दिया गया। जबकि समान आरोपों से घिरे आईएएस पंकज पांडे को कई माह तक निलंबित रखा गया। अब उनको भी बहाल करके शासन में मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनाती दे दी गई है।

एनएच 74 प्रकरण जैसे कई ऐसे मामले भी सामने निकल के आ रहे हैं जिनमें विभागीय जांच में दोषी पाए जाने पर कार्रवाई किए जाने की संस्तुतियां तक हो चुकी हैं, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उल्टा उनका प्रमोशन किया जा रहा है। ऐसे ही दो मामले सामने आ चुके हैं। इनमें एक मामला राज्य के परिवहन विभाग से जुड़ा है। इस मामले में वर्ष 2011 से 2015 तक ऋषिकेश के एआरटीओ रहे आनंद कुमार जयसवाल पर फर्जी चालान रसीदों के जरिए परिवहन विभाग को लाखों का चूना लगाए जाने के आरोप लगे थे। विभागीय स्तर पर इस मामले की जांच की गई और 28 मार्च 2017 को तत्कालीन परिवहन सचिव सीएस नपलच्याल ने आनंद कुमार जयसवाल को निलंबित कर दिया। अब परिवहन विभाग में तकनीकी खामियों के नाम पर जयसवाल का न सिर्फ निलंबन वापस हो गया, बल्कि उन्हें परिवहन आयुक्त मुख्यालय में एटेच कर दिया गया है।

देहरादून के कालसी विकास खण्ड के प्रभारी खण्ड विकास अधिकारी पद पर तेनात वैजंती प्रसाद और कनिष्ठ सहायक कमलेश्वर तिवारी को विधायक निधि के करीब 8 लाख की धनराशि का घोटाला करने के आरोप में प्रशासन ने विभागीय जांच के बाद निलंबित करने की संस्तुति की। इसमें कनिष्ठ सहायक कमलेश्वर तिवारी को तो तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया, लेकिन प्रभारी खंड विकास अधिकारी वैजंती प्रसाद पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि दोनां को प्रशासन द्वारा की गई जांच में दोषी पाया गया था। निलंबन की संस्तुति के बावजूद वैजंती प्रसाद को प्रमोशन देकर टिहरी स्थानांतरण के आदेश शासन द्वारा जारी कर दिए गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि मुख्य विकास अधिकारी जीएस रावत ने ही वैजंती प्रसाद के खिलाफ विभागीय जांच करने और सस्पेंड करने की संस्तुति की थी। इस मामले में वैजंती प्रसाद के खिलाफ कालसी थाने में लिखित तहरीर दी गई थी। इसके बावजूद शासन में बैठे नौकरशाहों ने वैजंती प्रसाद के खिलाफ मुख्य विकास अधिकारी की संस्तुति और कालसी थाने में दी गई तहरीर को ताक पर रखकर न सिर्फ उनका प्रमोशन कर दिया, बल्कि टिहरी स्थानांतरण भी कर दिया गया। यह साफ तौर पर सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति की हकीकत है। जिसको स्वयं सरकार के ही शासन द्वारा पलीता लागया गया है।

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