उत्तराखण्ड सरकार प्रदेश को ‘ग्रीन एनर्जी’ का पावर हाउस बनाने के लिए प्रयासरत है। कैबिनट ने राज्य में हरित उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन नीति लागू कर दी है। इसका उद्देश्य प्रदेश में स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन के लिए काम करना है। माना जा रहा है कि इसके उत्पादन में कोयला व गैस की तरह किसी भी प्रकार के जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल नहीं होगा। केवल नवीकरणीय ऊर्जा जैसे- सौर, पवन या अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त बिजली का ही इस्तेमाल होगा। प्रदेश सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक हर साल 100 किलो टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता हासिल की जाएगी। इससे स्टील, सीमेंट, उर्वरक व रिफाइनरी जैसे बड़े उद्योगों में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल करने का रास्ता खुलेगा। प्रदेश में पहले से एक हरित हाइड्रोजन का पायलट प्रोजेक्ट भी चल रहा है
उत्तराखण्ड में ग्रीन हाइड्रोजन की अपार सम्भावनाएं हैं और राज्य सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध भी दिख रही है। सरकार ने तय किया है कि वह ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं को उद्योग का दर्जा देगी व इसके लिए कर, सरचार्ज व ट्रांसमिशन शुल्क में भी छूट प्रदान करेगी। राज्य की जल विद्युत उत्पादन क्षमता जिसे ग्रीन हाइड्रोजन यानी जल का इलेक्ट्रोलिसिस के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे प्रदेश में निवेश को बढ़ावा मिलेगा जो रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि करेगा। दूसरी तरफ इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। ऊर्जा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने में इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस नीति के बाबत राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि ‘‘इसका उद्देश्य उत्तराखण्ड को स्वच्छ ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के क्षेत्र में एक अग्रणी राज्य बनाना है। राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का उपयोग कर हरित हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देना है। इससे प्रदेश में निवेश होगा व रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसके अलावा प्रदेश में कार्बन उत्सर्जन कम कर नेट जीरो के लक्ष्यों में योगदान देना भी है। इस नीति के लागू होने से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी।’’
ग्रीन हाइड्रोजन पर विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौर या पवन ऊर्जा से प्राप्त बिजली के माध्यम से पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करता है। साथ ही यह कार्बन उत्सर्जन को कम करता है और उर्वरक, रिफाइनरी, स्टील व परिवहन जैसे क्षेत्रों को डेकार्बोनाइज करता है। वर्तमान समय में हरित हाइड्रोजन को ऐसा विकल्प माना जा रहा है जो कार्बन उत्सर्जन को कम कर पृथ्वी ग्रह को ‘हरित’ बना सकता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भी बचा सकता है। दुनिया भर के देश प्रयास कर रहे हैं कि पूरी पृथ्वी को 2050 तक ऐसी दुनिया में रूपांतरित किया जाए जो अधिक सुलभ, कुशल व टिकाऊ हो तथा हरित हाइड्रोजन जैसी स्वच्छ ऊर्जा से संचालित हो।
उल्लेखनीय है कि हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला रासायनिक तत्व है। यह स्वच्छ ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत भी हैै। यह कोयले व तेल के विपरीत केवल जल वाष्प उत्सर्जित करता है, हवा में कोई अवषेश नहीं छोड़ता है। हाइड्रोजन गैस का उपयोग कारों, हवाई जहाज व अंतरिक्ष यानों में ईंधन के रूप में पहले से किया जाता रहा है। हरित हाडड्रोजन को सौ प्रतिशत टिकाऊ व वहनीय माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन के दौरान इससे किसी भी प्रकार की प्रदूषणकारी गैस का उत्सर्जन नहीं होता है। इसके अलावा इसे आसानी से संग्रहित कर बिजली व सिंथेटिक गैस में परिवर्तित कर औद्योगिक उपयोग में लाया जा सकता है।
ग्रीन हाइड्रोजन पर विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौर या पवन ऊर्जा से प्राप्त बिजली के माध्यम से पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करता है। साथ ही यह कार्बन उत्सर्जन को कम करता है और उर्वरक, रिफाइनरी, स्टील व परिवहन जैसे क्षेत्रों को डेकार्बोनाइज करता है। वर्तमान समय में हरित हाइड्रोजन को ऐसा विकल्प माना जा रहा है जो कार्बन उत्सर्जन को कम कर पृथ्वी ग्रह को ‘हरित’ बना सकता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भी बचा सकता है। दुनिया भर के देश प्रयास कर रहे हैं कि पूरी पृथ्वी को 2050 तक ऐसी दुनिया में रूपांतरित किया जाए जो अधिक सुलभ, कुशल व टिकाऊ हो तथा हरित हाइड्रोजन जैसी स्वच्छ ऊर्जा से संचालित हो।
उल्लेखनीय है कि हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला रासायनिक तत्व है। यह स्वच्छ ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत भी हैै। यह कोयले व तेल के विपरीत केवल जल वाष्प उत्सर्जित करता है, हवा में कोई अवषेश नहीं छोड़ता है। हाइड्रोजन गैस का उपयोग कारों, हवाई जहाज व अंतरिक्ष यानों में ईंधन के रूप में पहले से किया जाता रहा है। हरित हाडड्रोजन को सौ प्रतिशत टिकाऊ व वहनीय माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन के दौरान इससे किसी भी प्रकार की प्रदूषणकारी गैस का उत्सर्जन नहीं होता है। इसके अलावा इसे आसानी से संग्रहित कर बिजली व सिंथेटिक गैस में परिवर्तित कर औद्योगिक उपयोग में लाया जा सकता है।
अगर कोई जोखिम हाइड्रोजन को लेकर है तो वह इसका अत्यधिक वाष्पशील व ज्वलनशील होना है जो रिसाव व विस्फोट जैसे जोखिम पैदा कर सकता है। इसके अलावा यह अन्य ईंधनों की तुलना में अधिक ऊर्जा लेता है और इसकी उत्पादन लागत अधिक होती है। इन कारणों के इतर देखा जाए तो यह ऊर्जा सुरक्षा व शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। यह जीवाश्म ईंधन का एक स्वच्छ व टिकाऊ विकल्प है। इसके उत्पादन में सौर, पवन या जल विद्युत जैसे हरित स्रोतों का उपयोग होता है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भी भारत को कार्बन मुक्त बनाना, भंडारण क्षमता को विकसित करना और परिवहन के क्षेत्र में शून्य उत्सर्जन क्षमता का समाधान निकालना है। यानी इसे भविष्य का एक प्रमुख ऊर्जा स्रोत बनाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी यह मानना रहा है कि सतत् विकास का लक्ष्य स्थायी ऊर्जा संसाधनों से ही सम्भव है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के अनुसार ‘‘मौजूदा पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए अत्याधुनिक तकनीक व नवीनतम विज्ञान का इस्तेमाल करना आवश्यक है। इसके लिए बिना किसी बाधा के तकनीक के आदान-प्रदान और वैश्विक ज्ञान को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने हेतु इस तरह के कदम जरूरी हैं।’’
विशेषज्ञ कहते हैं कि हाइड्रोजन एक वैकल्पिक ऊर्जा प्रणाली के सभी मानकों पर खरा उतरता है जो प्रकृति में टिकाऊ किफायती, सुलभ और सुरक्षित है। हाइड्रोजन अपने हरित और कार्बन तटस्थ स्वभाव के कारण अपार विकास क्षमता रखता है। यही वजह है कि पर्यावरण विशेषज्ञ व हाइड्रोजन विषय पर काम करने वाले शोधकर्ता इसे जीवाश्म ईंधन से शून्य उत्सर्जन की ओर जाने के लिए एक क्रांतिकारी स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प मानते हैं। माना जा रहा है कि अगर हरित हाइड्रोजन को लेकर काम किया जाए तो पूरे देश में 8 हजार करोड़ रुपए से अधिक का निवेश हो सकता है लेकिन उच्च उत्पादन लागत व पानी का कुशल उपयोग इस क्षेत्र की मुख्य चुनौतियां हैं। दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करने के लिए बड़ी मात्रा में भूमि और जल संसाधनों की आवश्यकता होती है जो लोगों के विस्थापन का कारण भी बन सकती है। जहां तक भारत की बात है तो यहां अभी भी 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा जरूरतें तेल, बायोमास व कोयले से पूरी होती हैं। हालांकि इस पर काम शुरू हो चुका है। अभी देश का पहला हाइड्रोजन ईंधन केंद्र लद्दाख के लेह में बना है। एनटीपीसी लिमिटेड व अमारा राजा इंफ्रा द्वारा इसे विकसित किया गया है। देश में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया गया है। इसके तहत 400 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। उत्तराखण्ड के ऋषिकेश में पायलट प्रोजेक्ट के तहत फ्यूल सेल आधारित ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का काम हो रहा है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के अनुसार ‘‘मौजूदा पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए अत्याधुनिक तकनीक व नवीनतम विज्ञान का इस्तेमाल करना आवश्यक है। इसके लिए बिना किसी बाधा के तकनीक के आदान-प्रदान और वैश्विक ज्ञान को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने हेतु इस तरह के कदम जरूरी हैं।’’
विशेषज्ञ कहते हैं कि हाइड्रोजन एक वैकल्पिक ऊर्जा प्रणाली के सभी मानकों पर खरा उतरता है जो प्रकृति में टिकाऊ किफायती, सुलभ और सुरक्षित है। हाइड्रोजन अपने हरित और कार्बन तटस्थ स्वभाव के कारण अपार विकास क्षमता रखता है। यही वजह है कि पर्यावरण विशेषज्ञ व हाइड्रोजन विषय पर काम करने वाले शोधकर्ता इसे जीवाश्म ईंधन से शून्य उत्सर्जन की ओर जाने के लिए एक क्रांतिकारी स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प मानते हैं। माना जा रहा है कि अगर हरित हाइड्रोजन को लेकर काम किया जाए तो पूरे देश में 8 हजार करोड़ रुपए से अधिक का निवेश हो सकता है लेकिन उच्च उत्पादन लागत व पानी का कुशल उपयोग इस क्षेत्र की मुख्य चुनौतियां हैं। दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करने के लिए बड़ी मात्रा में भूमि और जल संसाधनों की आवश्यकता होती है जो लोगों के विस्थापन का कारण भी बन सकती है। जहां तक भारत की बात है तो यहां अभी भी 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा जरूरतें तेल, बायोमास व कोयले से पूरी होती हैं। हालांकि इस पर काम शुरू हो चुका है। अभी देश का पहला हाइड्रोजन ईंधन केंद्र लद्दाख के लेह में बना है। एनटीपीसी लिमिटेड व अमारा राजा इंफ्रा द्वारा इसे विकसित किया गया है। देश में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया गया है। इसके तहत 400 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। उत्तराखण्ड के ऋषिकेश में पायलट प्रोजेक्ट के तहत फ्यूल सेल आधारित ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का काम हो रहा है।