दिनेश तिवारी
राज्य आंदोलनकारी
जन आंदोलनों के प्रमुख नेता डॉ. शमशेर बिष्ट की पहली पुण्य तिथि पर वैचारिक एवं संघर्ष के धरातल पर खड़ी ताकतों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इसी कड़ी में स्वर्गीय बिष्ट को याद कर रहे हैं संघर्षपथ के उनके साथी अग्रिम पंक्ति के आंदोलनकारी दिनेश तिवारी
शमशेर दा को याद करते हुए यह सवाल उठता है कि क्या लिखूं? यादों का दायरा इतना विस्तृत है कि बहुत कुछ छूट जाने का भय बना रहता है। शब्द कम पड़ जाते हैं। वह हमारे समय की एक ऐसी शख्सियत रहे हैं जो जिंदादिल है, ऊर्जा से भरपूर, भविष्य के प्रति आशान्वित, जिसके पंखों में आकाश में उड़ने का दमखम है। समाज के प्रति गहरी संवेदना, मुद्दों की सही परख, देश-दुनिया में हो रहे बदलावों की गहरी समझ, घटनाओं के विकास पर पैनी नजर है। संघर्षों के थपेड़ों से गढ़ा हुआ, भीड़ में अपनी ही चाल से चलता हुआ लगता है। एक व्यक्ति में कई-कई व्यक्ति समाए हैं। कई धाराएं-उपधाराएं, पहाड़-मैदान, देश-दुनिया, सभी का समावेश उनके व्यक्तित्व में है।
कई अन्य व्यक्तियों की तरह मुझे भी शमशेर दा के साथ काम करने का मौका मिला। आंदोलन में भी और गोष्ठियों-सेमिनारों में भी, कई जगह कई मौकों पर हम साथ-साथ रहे, कई चीजें थी जो हमको जोड़ती थी। एक जैसा सोचना, काम करना ऐसे कई चीजें थी जो हमारी साझा थी। मैं कोई भी बात उनसे खुलकर कहता, वह भी खुलकर अपनी बेबाक राय देते। मुझे ही क्यों किसी को भी कभी भी वह सहज सुलभ थे। ऐसा नहीं है कि साथ काम करते हुए हम हमेशा एक जैसे बने रहे, कई बार कई मुद्दों पर टकराव भी हुआ। हम लड़े भी, भिड़े भी। असहमत भी हुए। लेकिन सामाजिक बदलाव या संघर्ष से जुड़ी कई ऐसी बातें थी, जिन पर सहमति ही थी कि हम शाम होते-होते फिर दाज्यू के पास पहुंच जाते। वह सही मायनों में ईश्वर थे। मुस्कुराते कहते कि देखो मतभेद स्वाभाविक बात है। वैचारिक संघर्ष भी मनुष्य मन की विशेषता है। यह हमें जीवंत रखती है। आगे बढ़ने- सीखने-समझने की प्रेरणा देती है और हमें पता चलता है कि हमारा विकास गतिमान है।

शमशेर दा से मेरी असल भेंट ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन के दौरान हुई थी, असल भेंट इसलिए कि शमशेर दा के व्यक्तित्व के संपूर्ण खण्ड मैंने इसी दौर में देखें, पढ़े, सुने और महसूस किये। उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व से यहीं से मेरा वास्ता भी पड़ा। मेरी ही नहीं उस दौर के युवाओं की सामाजिक-राजनीतिक समझ भी बनी और विकसित हुई। समकालीन राजनीतिक दलों से इतर भी कोई धारा हो हो सकती है, विचार हो सकता है, प्रचलित लोक से भी अलग कोई दूसरा लोक है और इसे इसी जनम में बनाया जा सकता है, यह मैंने उसी आंदोलन के दौरान जाना-समझा। ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन उत्तराखण्ड में चले अनेक आंदोलनों में से एक बड़ा आंदोलन रहा है। सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ इस आंदोलन ने युवाओं को प्रभावित कर उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी के साथ जुड़ने के लिये प्रेरित किया। इस आंदोलन के दौरान एक अनुभवी एवं व्यवहारिक नेता के रूप में हमें शमशेर दा देखने को मिलते हैं। व्यक्तिगत रूप से बहुत सक्रिय नहीं होने के बावजूद दाज्यू ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन के सहज व स्वभाविक लीडर थे। पहाड़ में चले सभी छोटे-बड़े आंदोलनों के वह नायक रहे हैं। मसला कोई भी हो हर जुल्म, अन्याय के खिलाफ शमशेर दा की सांसें आग उगलती थी।
दाज्यू किसी भी आंदोलन में व्यक्तिगत टकराव से बचना चाहते थे, ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन में भी वह इसी कोशिश में लगे रहते कि आंदोलन के निशाने पर व्यक्ति नहीं सरकार की जनविरोधी नीतियां हों। इस बात पर उनका उन मित्रों से विरोध बना रहता जो इस आंदोलन को व्यक्तिगत विरोध की दिशा में ले जाना चाहते थे। मेरी इस मुद्दे पर अक्सर उनसे बातचीत होती थी और वह इस बात से सहमत थे कि व्यक्तिगत विरोध की राजनीति से शहरी मध्यमवर्गीर्य युवा आंदोलन से दूर हो जाएगा और ग्रामीण निम्न मध्यवर्गीय युवा भी बाहर निकल जाएगा। शायद यह ठीक आकलन था क्योंकि इससे शहरी व ग्रामीण मध्यवर्ग, निम्न मध्यमवर्ग आंदोलन से विमुख हो गया और कहीं-कहीं तो मध्यवर्गीय युवा छात्र विरोध में भी उतर गए। शराब कारोबारियों, उनके समर्थकों, रिश्तेदारां व उनके संरक्षक राजनीतिक दलों ने आंदोलन के विरोध का ऐसा चक्रव्यूह रचाया कि उसे भेद पाना आज भी कठिन हो रहा है।
गठबंधन की जिस राजनीति व विचार को हम आज के दौर में देख रहे हैं वह 1980 के दशक के शमशेर दा के नेतृत्व में देखा जा सकता है। उनका पूरा व्यक्त्वि ही एक गठबंधन है, उनके नेतृत्व में कामयाब रही ‘उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी’ गठबंधन के प्रयोग की, शानदार मिसाल है। वहां सब धाराएं प्रवाहित थीं। क्रांतिकारी, समाजवादी, सुधारवादी, आंचलिकतावादी लगभग सभी धाराओं का गठबंधन हमें वहां दिखाई पड़ता है। खुद शमशेर दा एक साथ जनवादी भी हैं, समतावादी भी हैं, सर्वोदयी भी हैं, संसदीय प्रणाली में सुधारवादी भी हैं। वह स्थानीय संघर्षों को राष्ट्रीय स्तर पर ले जा सकने वाले शिल्पी भी हैं। वह आंचलिक चेतना के वाहक होते हुए भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चेतना के साथ खुद को संबद्ध कर सकने वाले राजनेता भी हैं। वह अकेले ऐसे नाम भले ही न हों, पर एक बड़ा नाम जरूर हैं जो मार्क्स-लेनिन, गांधी, जयप्रकाश नारायण, विनोवा भावे, भगत सिंह, लगभग हर प्रगतिशील विचार के साथ खड़े दिखते हैं और इस सारी कवायद का उपयोग एक ऐसा काढ़ा तैयार करने में दिखते हैं, जिसमें वर्तमान समय व समाज का कुष्ठ निवारण हो सके। इसी समन्यकारी चेतना का गठबंधन का कौशल ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन में दिखता है जहां शमशेर दा के नेतृत्व में आंदोलन के भीतर मौजूद अनेक विचारधाराएं, संगठन एकजुट रह सके।
शमशेर दा पहाड़ में विस्तृत हो रही आंचलिक चेतना के राजनीतिक निहितार्थ को सही तरीके से देख व समझ रहे थे। यह भी देख रहे थे कि यह चेतना अलग पर्वतीय राज्य की मांग के साथ अभिव्यक्त हो रही है। इस नाते वह अलग पर्वतीय राज्य की अवधारणा से सहमत थे। यह भी कि उनके मन में चेतन अथवा अचेतन दोनें ही स्तर पर था कि उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी राज्य आंदोलन का हिस्सा बने। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन अपने समय का एक बड़ा आंदोलन रहा है। अलग-अलग समय पर अलग -अलग चरणों में इस आंदोलन ने पहाड़ की जनता के दिलो-दिमाग को बड़े पैमाने पर झकझोरा है। अतीत के तमाम बड़े-छोटे आंदोलनों से बनी चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति राज्य आंदोलन में स्पष्ट रूप से झलकती है। यहां भी इस बिन्दु पर डॉ बिष्ट की समझ बड़ी साफ व दूरदर्शी है। आंदोलन के दौरान वह इसके लोकप्रियतावाद से अलग ‘कैसा होगा उत्तराखण्ड’ वाले सवाल पर सक्रिय सैद्धांतिक हस्तक्षेप कर रहे थे। एक एक्टिविस्ट के रूप में वह चाहते थे कि उत्तराखण्ड जनता के बुनियादी सवालों को हल करने वाला राज्य बने। अपना यह सूत्र वाक्य वह हर समय हर जगह दोहराने से भी नहीं चूकते। वह कहते भी थे कि बिना जनपक्षीय राजनीतिक समाजिक समझ के और क्षेत्रीय विकास का बिना कोई माहौल खड़ा किये अगर राज्य मिल भी गया तो वह जनता की भलाई के लिहाज से कोई सुखद परिणाम नहीं दे पायेगा। यहां वह इस आंदोलन की विशेषताओं व कमजोरियों दोनों को लेकर सजग थे। इसलिए उस समय राज्य आंदोलन का नेतृत्व कर रही यूकेडी के थिंक टैंक कहे जाने वाले विपिन दा से उन्होंने कहा भी कि देखो विपिन, राज्य की मांग तो ठीक है। आंदोलन भी ठीक है, पर इसकी दशा-दिशा पर बहस जरूर होनी चाहिए। मैं व्यक्तिगत रूप से भी और विपिन दा के साथ भी कई बार आंदोलन के दौरान दाज्यू से मिलने उनके घर पर गया हूं। तब भी वह बहुत बेबाकी से कह देते कि आंदोलन के वर्तमान स्वरूप और यूकेडी के घोषणा पत्र के आधार पर जो राज्य बनेगा वह जनता का राज्य तो हरगिज नहीं होगा। इसलिये वह जल, जमीन-जंगल पर जनता के अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय उद्योग-व्यापार, रोजगार पर्यावरण पर जनपक्षीय नीति व मॉडल बनाने पर जोर देते दिखाई पड़ते हैं।
अविभाजित उत्तर प्रदेश में यूकेडी के विधायक व शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी व जसवंत सिंह बिष्ट से भी वह निरंतर विमर्श करते रहे कि अगर यूपी का ही दूसरा संस्करण ‘उत्तराखण्ड राज्य’ के रूप में सामने आना है तो इससे कोई लाभ पहाड़ी आवाम को मिलने वाला नहीं है। शमशेर दा इस बात को लेकर भी चिंतित थे कि उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन अपने प्रगतिशील मूल्य खो रहा है और अराजक व अवसरवादियों के हाथ में जा रहा है। यहां भी वह यूकडी के नेतृत्व को चेताते रहे कि इस तरह तो उत्तराखण्ड की जनता के हिस्से कुछ आने वाला है नहीं, पर यूकेडी के हाथ भी कुछ लगने वाला नहीं है। मुझे याद है उनकी इस चेतावनी पर विपिन दा व जसवंत सिंह जी ने दाज्यू से कहा था कि यदि आप ऐसा समझते हैं तो फिर इस आंदोलन का नेतृत्व क्यों नहीं संभालते। खैर, जो भी हो यहां भी उनकी चिंता सच साबित हुई।
यहां यह जिक्र भी शायद प्रासंगिक है कि शमशेर दा चुनाव में जाने के पक्ष में थे। वह चुनाव में भागीदारी की शक्ति से वाकिफ थे। सैद्धांतिक रूप से वह इस बात से सहमत हो जाते थे कि चुनाव का मंच जनता तक अपनी बात पहुंचाने व अपनी पहचान को विस्तार देने का एक सशक्त माध्यम है। मैंने 1989 के लोकसभा चुनाव के समय चुनाव को लेकर उनसे काफी लंबी बातचीत की थी। राज्य आंदोलन के दौरान यूकेडी ने चुनाव बहिष्कार किया तो इसका उसे नुकसान भी हुआ। चुनाव के मामले में भी वह राज्य में सभी आंचलिक व प्रगतिशील राजनीतिक संगठनों का गठबंधन बनाये जाने के हिमायती थे। वह ऐसा क्यों नहीं कर सके, यह जांच -पड़ताल का विषय है, पर यहां उनका यह आकलन सही था कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
मैं जीवन के अंतिम समय में जब उनसे एक दिन मिला तो उन्होंने बहुत सी बातें साझा की। इस पड़ाव पर वह इस अनुभव पर आ गये थे कि ‘माले’ का रास्ता ही अंतिम रास्ता है और जांच का कोई मार्ग बचा है नहीं। संयोग देखिये कि माले के राज्य प्रभारी कॉमरेड राज्य बहुगुणा ने इस बातचीत से बहुत पहले यह स्वीकार किया था उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी का विभाजन एक दुखद घटना रही है। यह हमारी एक बड़ी गलती थी। उत्तराखण्ड की राजनीति में संघर्षविहिनी की मौजूदगी हर लिहाज से जरूरी थी। दूसरी तरफ यूकेडी के विधायक विपिन दा ने भी उत्तराखण्ड विधानसभा का चुनाव जीतने के कई दिनों बाद देहरादून के होटल द्रोण स्थित अपने अस्थाई आवास में हुई एक चर्चा के दौरान स्वीकार किया था कि यदि शमेशर दा ने यूकेडी के साथ तालमेल बना लिया होता तो हम अल्मोड़ा जिले में ही नहीं उत्तराखण्ड के कई अन्य स्थानों पर भी चुनाव जीतने में कामयाब हो जाते और राज्य में वर्तमान स्थिति को भी बदल देते। अब यह सब बातें इतिहास की हैं और केवल कयास ही लगाये जा सकते हैं।
शमेशर दा का नहीं होना आज इसलिए भी खल रहा है कि उत्तराखण्ड राज्य में पहाड़ पिछड़ गया है, जिस तरह यूपी में पहाड़ खुद को पराया पाता था उससे भी अधिक उत्तराखण्ड राज्य में पहाड़ खुद को अकेला, असहाय व निहत्था पा रहा है, पहाड़ किंकर्तव्यविमूढ़ है। इस राज्य में दिखते सब अपने हैं, पर ये अपने ही अपनों को लूटने में मस्त हैं। यह जरूर हुआ है कि लखनऊ के सचिवालय या जनपथ में हर समय दिख जाने वाली ‘पहाड़ियत’ उत्तराखण्ड सचिवालय के पहाड़ियों में अब देखने को नहीं मिलती। वहां बैठे ‘पहाड़ी’ भी अब ‘पहाड़ी’ नहीं हैं। न उनका मिजाज न उनके संस्कार न सरोकार कुछ भी पहाड़ से मेल नहीं खाता। ‘पहाड़’ पहाड़ में रह गए या बाहर बस गए लोगों की जरूरत से गायब हो गया है। यह अद्भुत विकास पहाड़ की पीड़ा को पहले से अधिक जटिल बनाता है। बावजूद इसके पहाड़ व समाज को फिर से बनाने की जद्दोजहद हमें पहाड़ में ही दिखाई पड़ती है। भले ही राज्य में तीसरा विकल्प भी कभी आकार नहीं ले सका, और यह मसला पहले की तरह ही अनसुलझा पड़ा है फिर भी जनता की उम्मीद कायम है कि ‘एक दिन तो आलौ उ दिन यू दूनी मैं-’ इसी उम्मीद से शमशेर दा की जरूरत समझ में आती है और उनका होना पहले से अधिक जरूरी लगता है। पर उन सब विशेषताओं के बावजूद दाज्यू को इस बात का मलाल बना रहा कि ‘उत्तराखण्ड संघर्षवाहिनी’ राज्य आंदोलन का नेतृत्व करने से चूक गई। यह सब जिक्र इसलिये कि इतिहास की इन गलतियों से आने वाली संघर्षशील पीढ़ियां शायद समझ लें।