Uttarakhand

उलझ सकता है पत्रकार पर हमले का मामला

पत्रकार मनोज बोरा पर गोली चलाने का मामला अब सीबीसीआईडी को सौंपे जाने की तैयारी है। इस पर संदेह उठ रहा है कि कहीं ऐसा मामले को सुलझाने के बजाए लटकाने के लिए तो नहीं किया जा रहा

भय, भूख और भ्रष्टाचार का खात्मा करने के नारे के साथ सत्ता में आई भाजपा सरकार अब अपने इस महत्वपूर्ण नारे को ही भुला बैठी है। पिछले ढाई साल के आंकड़ों को देखें तो उत्तराखण्ड में भय, भूख और भ्रष्टाचार  कम होने के बजाय बढ़ा है। इसका उदाहरण है हल्द्वानी निवासी ‘दि संडे पोस्ट’ के पत्रकार मनोज बोरा को सरेआम गोली मार दिए जाने के बाद भी मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी न होना। नैनीताल पुलिस ने पत्रकारों की एकजुटता और धरना-प्रदर्शन के बाद बोरा पर गोली चलाने वाले सितारगंज निवासी दो हमलावारों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। हमलावरों ने मजिस्ट्रेट के सामने कलमबंद बयानों में स्पष्ट कहा कि उनको सुपारी देने वाला मास्टरमाइंड सतीश नैनवाल है। तीन माह पूर्व ही मुख्य आरोपी के नाम का खुलासा होने के बाद पुलिस नैनवाल को गिरफ्तार करना तो दूर उसको ढूंढ़ तक पाने में असमर्थ रही है। जबकि बताया यह जाता है कि नैनवाल हल्द्वानी में ही चोरी छुपे रह रहा है।
पीड़ित पत्रकार मनोज बोरा ने अपनी जान को खतरा बताते हुए गत दिनों नैनीताल हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। जिसमें पुलिस द्वारा मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करने में लापरवाही बरतने की बात कही गई थी।  इसके बाद हाईकोर्ट नैनीताल ने इसे गंभीरता से लिया और 25 जून को नैनीताल की मुखानी पुलिस को निर्देश दिए कि वह एक सप्ताह के अंदर मामले की प्रगति रिपोट पेश करे। उच्च न्यायालय नैनीताल के न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की एकल पीठ ने इस मामले पर पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वह कोर्ट के समक्ष बताए कि उन्होंने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए अब तक क्या किया है। बहरहाल इस मामले में प्रदेश सरकार का मुख्य आरोपी सतीश नैनवाल के प्रति नरम रवैया सामने आ रहा है। कारण सतीश नैनवाल भाजपा नेता प्रमोद नैनवाल का भाई है। सुनने में आ रहा है कि नैनवाल सत्ता के रसूख पर अपने भाई के बचाव में साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रहे हैं। चर्चा यह भी है कि मामले को लटकाने के लिए सीबीसीआईडी के हवाले किए जाने की तैयारी है। सीबीसीआईडी की हीलावाली सभी जानते हैं। कहा यह भी जाता है कि जिस मामले को लंबा खींचना होता है उसे सीबीसीआईडी के हवाले कर दिया जाता है। फिलहाल मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी में देरी पर पुलिस को कोर्ट के निर्देशों के चलते यह नया पैतरा कहा जा रहा है। सब जानते हैं कि यह मामला इतना उलझा हुआ भी नहीं है जितना पुलिस इसे प्रदर्शित कर रही है। ऐसा तब होता जब पत्रकार के हमलवार गिरफ्तार नहीं होते।
याद रहे कि ‘दि संडे पोस्ट’ के पत्रकार  मनोज बोरा को 25 मार्च 2019 को हल्द्वानी में गोली मारी गई थी। इसके तीन दिन बाद ही पुलिस ने सितारगंज के दो बदमाशों को गिरफ्तार भी कर लिया था। दोनों ने ही न्यायालय के समक्ष बयान भी दे दिया था। जिसमें हमलावारों ने बताया कि सतीश नैनवाल ने उनसे दिव्य रावत को गोली मारने के लिए भेजा था। लेकिन उस दिन दिव्य रावत की किस्मत अच्छी थी कि वह बच गया। हमलावरों ने दिव्य रावत की जिस स्कार्पियो गाड़ी को टारगेट करते हुए निशाना बनाया उसमें दिव्य की जगह मनोज बोरा मौजूद था। हमलवारों ने मनोज बोरा को गाड़ी से उतरते ही पहले बातों में उलझाया और उसके बाद उसे गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल मनोज बोरों को तत्काल अस्पताल ले जाया गया। कई दिनों के उपचार के बाद वह बच तो गया। लेकिन उस दिन के बाद से ही मनोज की जान को खतरा बना हुआ है।
मनोज और दिव्य रावत ने अपनी जान की सलामती के लिए पुलिस सुरक्षा की भी गुहार लगाई। पुलिस पहले तो यह कहती रही कि वह आचार संहिता हटने के बाद सुरक्षा मुहैया करा देगी। लेकिन अब जबकि आचार संहिता भी हट गई है, मनोज बोरा और दिव्य रावत को अभी तक भी सुरक्षा नहीं दी गई है। याद रहे जनवरी 2019 से पीड़ित पत्रकार मनोज बोरा और ‘दि संडे पोस्ट’ के राज्य प्रभारी दिव्य रावत अपनी जान को खतरा बताते हुए अपनी सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन पुलिस ने उनको सुरक्षा प्रदान नहीं की है। जनवरी 2019 में ही अगर पुलिस दिव्य रावत और मनोज वोरा को सुरक्षा प्रदान कर देती तो शायद 25 मार्च 2019 को वोरा के साथ यह घटना न ही घटती।

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