लॉकडाउन के दौरान 27 तारीख को उत्तराखण्ड सरकार के द्वारा गुजरात प्रदेश के निवासियों को गुजरात भेजने के लिये 9 बसों को पूरी तरह से सैनिटाईजर कर के अहमादाबाद के लिये रवाना की थी। जबकि पूरे प्रदेश में लॉकडाउन लागू था बावजूद इसके बकायदा सरकारी फरमान जारी कर के बसो को रवाना किया गया इस कार्य को प्रदेश सरकार ओैर मुख्यमंत्री के द्वारा किया गया जनहित के काम के तौर पर जम कर प्रचारित किया गया। जब सोशल मीडिया में सरकार के इस कदम को गैर जिम्मेदाराना बताकर सरकार की निंदा होने लगी तो मुख्यमंत्री के द्वारा यह कहा गया कि गुजरात भेजी गई इन बसों में उन उत्तराखण्ड के निवासियों को उत्तराखण्ड लाया जायेगा जो कि लॉकडाउन के चलते गुजरात मे फंसे हुये है।लेकिन सब दावो की पोल तब खुली जब महज 60 उत्तराखण्ड के निवासियों को इन बसे में लाया गया जबकि इन नौ बसों में आसानी से 500 यात्रियों को लाया जा सकता था।
इसमे भी सरकार और उत्तराखण्ड प्रशासन की लापरवाही साफ तौर पर दिखाई दी बताया जा रहा है कि जो 60 लोग इन बसो में आये थे वे भी किसी तरह से प्रशासन के लगाो की सिफारिशों पर बसो में आये अन्य लोगो की किसमत ऐसी नही थी। 60 यात्रियों के अलावा सभी बसे खाली ही उत्तराखण्ड लाई गई ।परंतु जैसे ही बसे दिल्ली हरियाणा सीमा मे पहुंची तो लॉक डाउन के चलते इन सभी यात्रियों को देर रात 1 बजे हरियाणा की सीमा में यह कह कर छोड़ दिया गया कि वे अपने अपने स्तर से जा सकते है या तो अपने वाहनो में जाये या पैदल जा सकते है।इस मामले को सोसल मीडिया और न्यूज पोर्टल में विडियो खूब वाईरल हो रहा है।
जिसमे एक युवक अपनी आपबीत बताते हुये सरकार और प्रशासन को कोस रहा है। युवक कह रहा हेै कि अधिकारियों को टेलीफेान करने पर जवाब मिल रहा हे कि कल सुबह नो बजे बात करना अभी सब सो रहे है।वीडयो मैं एक युवक यह भी कह रहा हैं की साथ में चल रहे एक युवक की दुर्घटना में टांग टूट गई है और वह किसी तरह से अपने आप को घसीट कर पैदल दिल्ली आ रहा है। हैरानी इस बात की है कि गुजरात के निवासियो को गुजरात पहुंचाने के लिये उत्तराखण्ड सरकार तत्काल 9 बसे उनके लिये मुहैया करवा देती है लेकिन अपने ही प्रदेश के निवासयो के लिये सरकार के पास कोई संशाधन नही हो पा रहे है जबकि उन्ही बसो में आसानी से उत्तराखण्ड के कई निवासियों को प्रदेश में लाया जा सकता था। लेकिन गुजरात के निवासियों के लिये लॉकडाउन तोड़ा जा सकता है और प्रदेश के निवासियों के लिये इस तरह की कोई सहयाता नही दी जा रही है।
सोशल मीडिया में इन खबर के चलने के बाद सरकार की जमकर निंदा होने लगी तो सरकार ने अब इस मामले में राज्य के परिवहन विभाग के अधिकारियों से जबाब तलब कर के सरकार की हो रही फजीहत को कम करने का प्रयास आरम्भ कर दिया है। चर्चा यहां तक हो रही है कि इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत और परिवहन मंत्री यशपाल आर्य के बीच फिर से नारजगी बढ़ गई है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार परिवहन मंत्री को इस तरह के अभियान की कोई जानकारी तक नही दी गई थी। लेकिन जब खाली बसो को उत्तराखण्ड मे लाया गया ओर 60 उत्तराखण्डियों को देर रात हरियाणा में उतारा गया तो अब सरकार इस पर कार्यवाही की बात कर रही है।यह पूरा मामला साफ करता है कि उत्तराखण्ड ओर गुजरात के प्रशासन के बीच समन्वय नही बनाया गया। गौर करने वाली बात यह है कि उत्तराखण्ड , गुजरात और हरियाणा में तीनो ही राज्यों में भाजपा की सरकारे है बावजूद इसके किसी तरह का राजनेतिक समन्वय तक नही बनाया जा सका जबकि यह मामला आसानी से हल हो सकता था। बहरहाल इस मामले से यह तो साफ हो यगा कि उत्तराखण्ड का प्रशासन और शासन तथा सरकार आपदा से निपटने में अभी भी पूरी तरह से सक्षम नही है।
कुछ ऐसी ही गम्भीर लापरवाही दिल्ली स्थित रेजिडैंस कमीश्नर मुख्यालय में भी देखने को मिल चुकी है। प्रदेश सरकार ने दिल्ली में उत्तराखण्ड निवासियों की सहायता के लिये अधिकारियों की फौज तैनात की हुई है और बकायदा इसकी सूचना विज्ञपनो के द्वारा आम जनता को दी जा रही है। हैरानी इस बात की है कि जिन अधिकारियों के नाम और टेलीफोन नम्बर दिये गये है उनके फोन बंद ही है। नेाडल अधिकारी आलोक पांडे का टेलीफोन नम्बर कभी लगा ही नही है। इस से यह साफ हो गया है कि प्रदेश की नौकरशाही आपदा के समय किस तरह से काम करती है। ऐसा नही हेै कि इस बात की सूचना सरकार को नही मिली हो। कई समाचार चैनलो और न्यूज पोर्टलों में इस की खूब चर्चा हुई| लेकिन न तो टेलीफोन नंबर उठाये गये | यहां तक कि सरकार को जिम्मेदार अधिकारियों से जबाब लेने की बजाये सचिव शैलेश बगोली को इसकी जिम्मदारी देकर मामले को टाल दिया गया ।

