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कृषि विधेयकों पर गरमाई सियासत ,सत्ताधारी एनडीए में फूट

  भारी विरोध -प्रदर्शनो के बावजूद आखिरकार सरकार ने दोनों कृषि विधेयक ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020’ और ‘कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020’ पारितकर दिए हैं। । विपक्षी दलों ने इन विधेयकों का विरोध करते हुए इन्हें किसानों के लिए बेहद नुकसानदायक करार दिया है।इसके  बाद सड़क पर किसान  और संसद में नेता तीन विधेयकों को लेकर हाय-तौबा कर रहे हैं।

दरअसल, सोमवार 14 सितंबर  को लोकसभा  में तीन बिल पेश किए गए थे।  मंगलवार 15 सितंबर को उनमें से एक बिल पास हो गया और बाकी दो विधेयक कल यानी 17 सितंबर  को पारित किए गए हैं। पहला बिल  कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल है। दूसरा बिल  मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण बिल)है। तो तीसरा  है  आवश्यक वस्तु संशोधन बिल।

किसान और विपक्षी पार्टियां  इन तीनों ही विधेयकों का विरोध कर रही हैं।  किसान और विपक्ष तो विरोध कर ही रहे थे, यहां तक की NDA सरकार के घटक अकाली दल शिरोमणि से मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तो मंत्री पद से इस्तीफा ही दे दिया। अब सवाल ये है कि क्या हरसिमरत कौर का इस्तीफा NDA में फूट का इशारा है?

कुछ किसानों को सरकार का कृषि विधेयक नापसंद है।  उनका कहना है  कि सरकार का कृषि विधेयक किसानों के हित में नहीं है।  विपक्षी दलों की राय भी यही है और वो सरकार का भारी  विरोध भी कर रहे हैं।

बावजूद इसके दो कृषि विधेयक कल  17 सितंबर लोकसभा में पारित हो गए और एक लोकसभा में 15 सितंबर  को पारित हुआ था। विधेयक के विरोध में चिंगारी सरकार के अंदर भी सुलग रही थी।  किसान बिल के विरोध की ये चिंगारी थी शिरोमणि अकाली दल से मंत्री हरसिमरत कौर बादल। अब सवाल ये उठता है कि क्या हरसिमरत कौर का इस्तीफा किसान बिल के मुद्दे पर NDA में फूट की नींव है? अभी तक इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है कि अकाली दल मोदी सरकार को समर्थन जारी रखेगी या फिर समर्थन वापस लेगी।  खैर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसान विधेयक पर ट्वीट किया और कहा, ‘लोकसभा में ऐतिहासिक कृषि सुधार विधेयकों का पारित होना देश के किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है।  ये विधेयक सही मायने में किसानों को बिचौलियों और तमाम अवरोधों से मुक्त करेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बिल किसानों को सशक्त बनाएगा। उन्होंने कहा, ‘इस कृषि सुधार से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नए-नए अवसर मिलेंगे, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा। इससे हमारे कृषि क्षेत्र को जहां आधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ मिलेगा, वहीं अन्नदाता सशक्त होंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने नाम लिए बिना  कहा कि किसानों को भ्रमित किया जा रहा है।  उन्होंने कहा, ‘किसानों को भ्रमित करने में बहुत सारी शक्तियां लगी हुई हैं। मैं अपने किसान भाइयों और बहनों को आश्वस्त करता हूं कि MSP और सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी।  ये विधेयक वास्तव में किसानों को कई और विकल्प प्रदान कर उन्हें सही मायने में सशक्त करने वाले हैं।

राहुल गांधी ने किसान बिल के विरोध में  कहा, ‘किसान ही हैं जो खरीद खुदरा में और अपने उत्पाद की बिक्री थोक के भाव करते हैं।  मोदी सरकार के तीन ‘काले’ अध्यादेश किसान-खेतिहर मज़दूर पर घातक प्रहार हैं ताकि न तो उन्हें MSP व हक़ मिलें और मजबूरी में किसान अपनी जमीन पूंजीपतियों को बेच दें।

किसान वैसे तो तीनों अध्यादेशों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं ,लेकिन सबसे ज्यादा आपत्ति उन्हें पहले अध्यादेश के प्रावधानों से है।  उनकी समस्या मुख्य रूप से व्यापार क्षेत्र, व्यापारी, विवादों का हल और बाजार शुल्क को लेकर है।  किसानों ने आशंका जताई है कि जैसे ही ये विधेयक पारित होंगे, इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को खत्म करने का रास्ता साफ हो जाएगा और किसानों को बड़े पूंजीपतियों की दया पर छोड़ दिया जाएगा।

नए विधेयकों में शामिल प्रावधान क्या हैं?
नए विधेयकों के मुताबिक अब व्यापारी मंडी से बाहर भी किसानों की फसल खरीद सकेंगे।  पहले फसल की ख़रीद केवल मंडी में ही होती थी।  केंद्र ने अब दाल, आलू, प्याज, अनाज और खाद्य तेल आदि को आवश्यक वस्तु नियम से बाहर कर इसकी स्टॉक सीमा समाप्त कर दी है।  इसके अलावा केंद्र ने कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग को बढ़ावा देने पर भी काम शुरू किया है।

विधेयकों पर विपक्षी दलों का तर्क है कि ये विधेयक न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को कमजोर कर देगा और बड़ी कंपनियां किसानों के शोषण के लिए स्वतंत्र हो जाएंगी, जबकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इन विधेयकों को परिवर्तनकारी और किसानों के हित में बताते हुए कहा कि किसानों के लिए एमएसपी प्रणाली जारी रहेगी।

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