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भाजपा भीतर बदल रहे सत्ता समीकरण

केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी में सत्ता समीकरणों के बदलाव की बात इन दिनों दिल्ली दरबार में सबसे ज्यादा सुनी- सुनाई जा रही है। भाजपा भीतर नरेंद्र मोदी को 2014 में प्रस्तावित आम चुनावोें में पार्टी का पीएम चेहरा बनाए जाने को लेकर भारी खींचतान चली थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मदद से अंततः भाजपा में आडवाणी युग समाप्त हुआ और मोदी युग की शुरूआत हुई। जुलाई, 2014 में राजनाथ सिंह के स्थान पर अमित शाह की ताजपोशी के साथ ही भाजपा पर पूरी तरह गुजरात लाॅबी का कब्जा हो गया। तब से 2020 तक यह कब्जा बरकरार है। मोदी-शाह में कभी भी किसी प्रकार के मतभेद की बात सुनने को नहीं मिलती है। इस सबके बावजूद पार्टी भीतर बदलाव की बातें सामने आ रही हैं। बिहार चुनावों से गृहमंत्री अमित शाह  की दूरी को लेकर, प्रचार सामग्री में उनकी नदारत तस्वीर को लेकर सवाल उठने लगे हैं। यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि पार्टी के चुनाव प्रभारी देवेन्द्र फडनवीस और राज्य में भाजपा के शीर्ष नेता सुशील मोदी क्यों सक्रिय नहीं है। हालांकि आधिकारिक तौर पर दोेनों ही नेता इस समय कोरोना से संक्रमित हैं लेकिन सवाल फिर भी उठाए जा रहे हैं। कोरोना काल के शुरूआती चरण से ही ऐसे प्रश्न पूछे जाने लगे थे। कहा जा रहा है कि नितिन गडकरी का प्रभाव पार्टी में तेजी से बढ़ने लगा है। कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र और झारखण्ड में हार और हरियाणा के चुनाव नतीजों का अपेक्षा अनुसार न होने के बाद से ही पार्टी में शाह का रूतबा कम होने लगा था। फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भी शाह के बजाए एनएसए अजीत डोभाल की सक्रियता राजनीतिक पंडितों को खटकी थी। पार्टी सूत्रों का दावा है कि बिहार चुनाव नतीजों के बाद सरकार और संगठन में मोदी बड़ा बदलाव कर सकते थे। यह बदलाव तय करेगा कि नए सत्ता समीकरण क्या रहेंगे।

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