Uttarakhand

नाक का सवाल बने निकाय चुनाव

निकाय चुनावों में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। देहरादून में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तो हल्द्वानी में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के लिए ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति है। देहरादून की मेयर सीट पर भाजपा प्रत्याशी सुनील उनियाल गामा की हार सीधे-सीधे मुख्यमंत्री की हार मानी जाएगी। दूसरी ओर हल्द्वानी में यदि इंदिरा हृदयेश के बेटे सुमित हृदयेश मेयर चुनाव हार गए तो फिर नेता प्रतिपक्ष के लिए आगामी लोकसभा चुनाव लड़ने का सपना काफी मुश्किल हो जाएगा
उत्तराखण्ड में नगर निकाय चुनाव सत्तासीन भाजपा के लिए खासतौर पर प्रतिष्ठा का प्रश्न  बन चुके हैं। राज्य सरकार की पूरी कैबिनेट अपनी पार्टी के प्रत्याशियों को जिताने के लिए जुटी हुई है। खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत चुनाव में सक्रिय हैं। निकाय चुनाव भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि इन्हें आगामी लोकसभा चुनाव का सेमिफाइनल माना जा रहा है। ये चुनाव मिशन 2019 के लिए भाजपा की दिशा और दशा भी तय करेंगे।
राज्य के ऋषिकेश और काशीपुर को छोड़ दें तो बाकी चार अन्य नगर निगमों में घ्भाजपा कड़े मुकाबले में फंसती हुई नजर आ रही है। देहरादून और हरिद्वार में भाजपा एवं कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। रुद्रपुर में कांग्रेस उम्मीदवार मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए सभी छह निगमों में से हल्द्वानी का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है। यहां से राज्य की पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। उनके बेटे सुमित हृदयेश और भाजपा के निवर्तमान मेयर जोगेंद्र रौतेला के बीच यहां सीधा मुकाबला है।
उत्तराखण्ड में नगर निकाय चुनाव इस बार इस लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं कि महज सात माह बाद ही देश में लोकसभा चुनाव होना है। 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। पिछले पांच साल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आधा दर्जन से अधिक बार उत्तराखण्ड के दौरे कर चुके हैं। हाल में दीपावली पर्व भी उन्होंने केदारनाथ में ही मनाया। कहा जा रहा है कि केदारनाथ के बहाने वह पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश फूंक गए। नरेंद्र मोदी का कार्यकर्ताओं को उत्साहित करना नगर निकाय चुनावों में कितना कामयाब होगा। यह तो आगामी 20 नवंबर को ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल उत्तराखण्ड के मतदाताओं में भाजपा के प्रति नाराजगी के भाव नजर आ रहे हैं। मोदी फैक्टर भी अब पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा।
दूसरी तरफ कांग्रेस में निकाय चुनावों को लेकर एकजुटता नहीं दिखाई दे रही है। पार्टी की गुटबाजी नया गुल खिला सकती है। टिकट आवंटन में जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समर्थकों पर आरियां चलाई गई वह किसी से छुपा नहीं है। रावत समर्थकों को दरकिनार कर अधिकतर उन लोगों को टिकट मिले जो प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के करीबी हैं। इसका पार्टी में गलत संदेश गया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इससे खासे खफा भी नजर आ थे। पिछले दिनों उन्होंने हल्द्वानी नगर निगम में पार्टी के टिकट पर सुमित हृदयेश की घोषणा को पूर्व नियोजित बताकर विवाद पैदा कर दिया था। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समर्थक इस चुनाव में उत्साह के साथ काम करने के बजाए औपचारिकता निभाते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव प्रचार में जा रहे हैं और प्रत्याशियों के समर्थन में जनसभाएं भी कर रहे हैं।
काशीपुर में भाजपा की मेयर प्रत्याशी ऊषा चौधरी की कांग्रेस प्रत्याशी मुक्ता सिंह से सीधी टक्कर है।  बसपा प्रत्याशी अब्बास भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। काशीपुर के पूर्व नगर पालिका चेयरमैन रहे समसुद्दीन को अगर बसपा अपना उमीदवार बनाती तो वह मजबूत प्रत्याशी हो सकते थे। फिलहाल काशीपुर के मुस्लिम मतदाता तय नहीं कर पा रहे हैं कि वह किस ओर जाएं। बताया जा रहा है कि काशीपुर शहर में भाजपा प्रत्याशी ऊषा चौधरी मजबूत स्थिति में हैं। ग्रामीण आंचल में कांग्रेस की मुक्ता सिंह मतदाताओं के बीच अच्छी पैठ बनाए हुई हैं। गौरतलब है कि काशीपुर नगर निगम में पहले सिर्फ 20 वार्ड थे जो बढ़कर 40 हो गए हैं। यहां भाजपा में अंदरखाने पार्टी के कई नेता नाराज चल रहे हैं। जिनमें पहले नंबर पर राजीव अग्रवाल हैं। राजीव अग्रवाल गत वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में भी बगावत कर भाजपा प्रत्याशी हरभजन सिंह चीमा के सामने निर्दलीय चुनाव लड़े थे। इस बार भी वह अपनी पार्टी के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। भाजपा का एक धड़ा निवर्तमान मेयर ऊषा चौधरी को मेयर नहीं देखना चाहता। यह वही धड़ा है जिसके सामने पूर्व में ऊषा चौधरी निर्दलीय चुनाव लड़ी थीं। इनमें खिलेंद्र चौधरी प्रमुख हैं। खिलेंद्र चौधरी की पत्नी शिक्षा चौधरी पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ी थीं। ऊषा चौधरी भी भाजपा से टिकट मांग रही थी। लेकिन टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने बगावत कर दी और निर्दलीय चुनाव लड़ीं। नतीजा यह रहा कि भाजपा प्रत्याशी शिक्षा चौधरी तीसरे नंबर पर रहीं थीं। ऊषा चौधरी का प्लस प्वाइंट यह है कि वह साफ छवि की निर्विवाद नेता के रूप में जानी जाती हैं।
रुद्रपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रामपाल के बजाय कांग्रेस के नंदलाल मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। भाजपा को रुद्रपुर में नजूल का नुकसान उठाना पड़ सकता है। चार माह पूर्व नैनीताल हाईकोर्ट के एक आदेश पर रुद्रपुर में नजूल की जमीन पर रह रहे लोगों पर तलवार लटकी हुई है। भाजपा ने रुद्रपुर के लोगों को नजूल की जमीन पर मालिकाना हक दिलाने का वादा किया था। जिसमें वह सफल नहीं हो सकी। यहां भाजपा के खिलाफ सबसे ज्यादा माहौल बनाने में बंगाली और पूर्वांचाल समाज के लोग हैं। दोनों समाज के करीब 32 नेताओं को भाजपा ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। जिसके चलते नेता अपनी पार्टी के खिलाफ बगावत पर उतर आए हैं। रमपुरा के चार वार्डों के मतदाता भाजपा के कट्टर समथकों में गिने जाते थे। लेकिन अब वह भाजपा से नाराज चल रहे हैं। यहां तक कि भाजपा के नेता ही नगर निकाय चुनावों का बहिष्कार करने में जुटे हैं। आपसी गुटबाजी में भाजपा यहां बुरी तरह घिरती नजर आ रही है। गुटबाजी का आलम यह है कि पार्टी के महानगर अध्यक्ष हरीश सुखीजा ने पद से इस्तीफा दे दिया है। उधर निवर्तमान मेयर सोनी कोली और उनके पति सुरेश कोली ने भाजपा में घर वापसी तो कर ली है लेकिन वह अपने घर में ही सिमट कर रह गए हैं। मेयर पति और पत्नी दोनों बिल्कुल भी सक्रिय नहीं हैं। भाजपा प्रत्याशी रामपाल एक एलआईसी के कर्मचारी हैं जो कुछ दिन पूर्व ही भाजपा में आए हैं। रामपाल आरएसएस की पसंद बताए जाते हैं।
सभी छह नगर निगम चुनावों में इस बार सबसे ज्यादा रोचक मुकाबला हल्द्वानी में हो रहा है। यहां भाजपा के निवर्तमान मेयर जोगेंद्र रौतेला का कांग्रेस के सुमित हृदयेश में कड़ा मुकाबला है। सुमित नेता प्रतिपक्ष और हल्द्वानी की विधायक इंदिरा हृदयेश के पुत्र हैं। इस कारण इंदिरा हृदयेश के लिए यह चुनाव राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। अगर सुमित हृदयेश चुनाव हार गए तो जाहिर है कि इंदिरा हृदयेश की आगामी 2019 में लोकसभा टिकट की मंशा पर भी पानी फिर जाएगा। यही नहीं, बल्कि इंदिरा हृदयेश यह भी सपना पाले हुए हैं कि अगर उन्हें लोकसभा टिकट मिलता है और वह चुनाव जीत जाती हैं तो सुमित हृदयेश को हल्द्वानी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया जाएगा। लेकिन पार्टी का ही एक धड़ा इंदिरा हृयेश के सपनों को पूरा नहीं होने देगा। यह धड़ा अभी से ऐसा प्रचार कर रहा है जिससे प्रतीत हो रहा है कि पार्टी दो गुटों में बंटी हुई है। सूत्रों की मानें तो प्रदेश कांग्रेस के महासचिव खजान पांडे ने सोशल मीडिया पर खुलकर लिखा है कि ‘मंडी खुल रही है और साढ़े चार करोड़ रुपए मेयर का खर्चा है।’ खजान पांडे द्वारा सोशल मीडिया पर की गई इस टिप्पणी को पार्टी प्रत्याशी के प्रति कटाक्ष के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी प्रत्याशी सुमित हृदयेश मंडी समिति के अध्यक्ष हैं। ध्यान रहे कि खजान पांडे को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत गुट का माना जाता है। बताया जा रहा है कि हरीश रावत भी पार्टी प्रत्याशी सुमित हृदयेश का मन से साथ नहीं दे रहे हैं। उधर कांग्रेस के युवा नेता ललित जोशी भी अपनी टीम के साथ चुनाव से नदारद दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि ललित जोशी मेयर पद के प्रबल प्रत्याशी थे। जब सुमित हृदयेश के टिकट की घोषणा हुई तो ललित जोशी सबसे ज्यादा मुखर हुए थे। हालांकि बाद में कहा जाने लगा कि इंदिरा हृदयेश ने उन्हें मना लिया है। पिछले दिनों महेश शर्मा को इंदिरा हृदयेश के प्रयासों से कांग्रेस में वापस ले लिया गया था। तब से शर्मा चुनाव में सबसे ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं। कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में महेश शर्मा का खासा प्रभाव है। जिसका फायदा सुमित हृदयेश को मिलता दिख रहा है।
लालकुआं से पार्टी के खिलाफ बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़े हरेंद्र बोरा की भी इंदिरा हृदयेश ने घर वापसी करा ली है। ये भी सुमित का साथ दे रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ प्रकाश जोशी पार्टी प्रत्याशी के लिए मुश्किलें खड़ी करते नजर आ रहे हैं। जोशी का चुनाव में दिलचस्पी न लेना इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
भाजपा प्रत्याशी जोगेंद्र रौतेला के लिए कालाढूंगी के विधायक बंशीधर भगत और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य खेवनहार की भूमिका में हैं। हल्द्वानी से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी मोहम्मद सुहेब वोट कटवा के रूप में चर्चित हो रहे हैं। अगर वह अल्पसंख्यक वोटों में ज्यादा घुसपैठ करते हैं तो इसमें सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस प्रत्याशी का ही होगा। कांग्रेस के लिए एक परेशानी यह भी है कि अल्पसंख्यक वोटों खासकर काठगोदाम इलाके में भाजपा प्रत्याशी जोगेंद्र रौतेला का खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। रौतेला की पत्नी की चुनाव में अपनी जमीन बिक जाने वाली भावुक अपील भी सहानुभूति की ओर बढ़ती नजर आ रही है।
हरिद्वार में मेयर चुनाव  कांग्रेस बनाम मदन कौशिक हो रहा है। यहां कैबिनेट मंत्री और सरकार के प्रवक्ता मदन कौशिक की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। भाजपा ने मदन कौशिक के कहने पर अन्नू कक्कड़ को टिकट दिया है। आज से 18 साल पहले लक्सर में ब्यूटी पार्लर चलाने वाली अंजू उर्फ अन्नू कक्कड़ कब मदन कौशिक के करीब आ गई लोगों को पता ही नहीं चला। लेकिन जैसे ही कौशिक अपनी पार्टी के निवर्तमान मेयर मनोज गर्ग के बजाय अन्नू कक्कड के लिए अड़ गए और टिकट पक्की करा दी तब लोगों को इसका अहसास हुआ। निवर्तमान मेयर मनोज गर्ग पर मदन कौशिक ने खुद अपने विधानसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए थे। तब से लेकर अब तक यानी पूरे डेढ़ साल में मनोज गर्ग मदन कौशिक पर अपना विश्वास नहीं बना पाए। जिसके चलते मदन कौशिक ने यह टिकट अन्नू कक्कड़ को दिलाकर भाजपा की झोली में फिर से हरिद्वार की मेयर सीट देने का वादा किया। अब देखना यह है कि वह अपने वादे पर  कितना खरा उतरते हैं। अगर मदन कौशिक पार्टी प्रत्याशी को जिताने में नाकाम रहे तो उनका 2019 में पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने का उनका सपना अधूरा रह सकता है। मेयर के इस चुनाव में जहां मदन कौशिक दिन-रात एक किए हुए हैं वहीं हरिद्वार के सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का चुनाव प्रचार में न आना चर्चा का विषय बना हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस की प्रत्याशी अनिता शर्मा भी मुकाबले में बनी हुई हैं­­­। हालांकि कांग्रेस में अदंरखाने शर्मा का विरोध ज्यादा है। पहले कहा जा रहा था कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के न आने से पार्टी प्रत्याशी कमजोर पड़ रही हैं। लेकिन इस बीच हरीश रावत ने चुनाव कमान थामकर इस चर्चा को विराम दे दिया। देहरादून में उमेश अग्रवाल भाजपा से मेयर पद के प्रबल प्रत्याशी थे। लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने खण्डूड़ी के खास रहे उमेश अग्रवाल का टिकट काट कर अपने खासमखास सुनील उनियाल गामा को टिकट दे दिया। फिलहाल देहरादून में मुकाबला गामा और कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल में न होकर कांग्रेस और त्रिवेंद्र सिंह रावत में है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत देहरादून में सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। ऋषिकेश में भाजपा प्रत्याशी अनिता ममगांई और कांग्रेस की बीना दीप शर्मा के बीच कांटे की टक्कर है। बीना दीप शर्मा ऋषिकेश के निर्वतान चेयरमैन दीप शर्मा की पत्नी हैं।

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