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आरक्षण की आग में झुलसता मणिपुर

 

  •     प्रियंका यादव

 

मणिपुर में हुई हिंसा में अब तक दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि सैकड़ों से ज्यादा लोग जख्मी हैं। कई घर मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं तो वहीं आगजनी के बाद कई घर खंडहर बन चुके हैं। हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं। इतनी बड़ी हिंसा राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भाजपा नेतृत्व की नीयत और नीति दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य के नाजुक जातीय संतुलन की अनदेखी कर अपना राजनीतिक एजेंडा लादने की कोशिश इस सीमावर्ती राज्य के लिए ही नहीं, देश के लिए भी महंगी पड़ सकती है

मणिपुर में हुई हिंसा दो बड़े समुदायों मितेई और कुकी के बीच हुई जातीय हिंसा है। मणिपुर की घाटी में बसा मितेई समुदाय राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है। वैष्णव हिंदू आस्था वाले मितेई समाज का राज्य की आबादी में 54 प्रतिशत हिस्सा है और राजनीति में दबदबा है। पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में यही एक बड़ा हिंदू समुदाय है। जाहिर है राज्य में भाजपा का अधिकतर समर्थन मितेई समाज से है। सरकारी तौर पर इन्हें ओबीसी का दर्जा प्राप्त है। उधर मिजोरम और म्यांमार से जुड़े इलाकों में बसे कुकी आदिवासी समुदाय की संख्या केवल 15 प्रतिशत के करीब है लेकिन इम्फाल के नजदीक के कुछ पहाड़ी जिलों में इनका दबदबा है। मणिपुर के कुकी, पड़ोसी मिजोरम के लुशाई और सीमापार म्यांमार में बसे चिन सभी एक ही समाज के लोग हैं, आपसी रिश्तेदारी है। हालांकि पिछले साल चुनाव में भाजपा को कुकी बहुल क्षेत्र में भी कुछ सफलता मिली थी, लेकिन भाजपा सरकार के कई कदमों के कारण कुकी समाज से उसका और खासतौर पर मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह का छत्तीस का आंकड़ा बन गया है। यह राजनीतिक अलगाव पिछले सप्ताह हुई हिंसा की जड़ में है।

पिछले साल मणिपुर चुनाव में दोबारा सत्ता हासिल करने के बाद मुख्यमंत्री बिरेन सिंह ने दो मुद्दों पर कुकी इलाकों में सख्ती करनी शुरू की। पहला मुद्दा उस इलाके में बढ़ती हुई अफीम की खेती और ड्रग्स की समस्या से जुड़ा है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की चिंता वाजिब है और राज्य सरकार द्वारा कार्रवाई जरूरी थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने अफीम के जमींदारों और ड्रग माफिया के खिलाफ मुहिम को कुकी समुदाय के खिलाफ जंग का रूप दे दिया। उन्होंने कई बार कुकी आदिवासियों को बाहरी और अप्रवासी करार देने वाले बयान दिए जिससे खुद भाजपा के कुकी विधायक भी उनसे बगावत करने पर मजबूर हो गए। दूसरा मामला उन जंगलों से जुड़ा था जिनमें कुकी समुदाय के लोग बसे हुए हैं। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने मणिपुर में यह दावा किया कि राज्य के जंगल केंद्रीय कानून के हिसाब से चलेंगे और आरक्षित वन क्षेत्र (रिजर्व फॉरेस्ट) को खाली करवाया जाएगा। इस पर भी राज्य सरकार ने समझदारी से काम लेने के बजाय जोर-जबरदस्ती से कई गांव खाली करवाए। इससे कुकी समुदाय में यह संदेश गया कि राज्य सरकार उन्हें पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर रही है। जब इसका विरोध शुरू हुआ तो मुख्यमंत्री ने जाकर जनता को धमकाया और स्थानीय कुकी भूमिगत उग्रवादियों के साथ कई वर्षों से चले आ रहे समझौते को निरस्त करने और हथियार वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। उधर पिछले कुछ सालों से मणिपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का असर बढ़ने लगा है।

वहां मितेई समाज को स्थानीय परंपरागत जनजाति की विरासत से काटकर उनकी हिंदू अस्मिता को जगाने का काम चल रहा है, क्योंकि अधिकांश मितेई हिंदू हैं। हालांकि उनमें पंगाल समुदाय मुस्लिम और एक बहुत छोटा अंश ईसाई भी है और अधिकांश कुकी और नागा लोग ईसाई हैं, इसलिए प्रदेश की जातीय विविधता और तनाव को धार्मिक संघर्ष का रूप देने की कोशिश चल रही है। यानी काफी समय से बारूद तैयार हो रहा था और अब बस एक चिंगारी की जरूरत थी। यह चिंगारी हाईकोर्ट के एक आदेश से निकली जिसमें राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह मितेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की कार्यवाही शुरू करे। मामला 10 साल पुराना था, आदेश हाईकोर्ट का था सरकार का नहीं और वैसे भी राज्य सरकार के करने भर से किसी समुदाय को जनजाति का दर्जा नहीं मिल सकता। लेकिन जातीय तनाव की इस पृष्ठभूमि में कोर्ट के आदेश से लोग भड़क उठे। उन्हें लगा कि अगर बहुसंख्यक मितेई समुदाय को जनजाति का दर्जा भी मिल जाता है तो उनका राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता पर कब्जा पूरा हो जाएगा। इसका सीधा संबंध जमीन की मालिकाना से भी है। मणिपुर की 90 प्रतिशत जमीन पहाड़ी है जहां केवल अनुसूचित जनजाति के लोग ही जमीन खरीद सकते हैं। अगर मितेई लोग जनजाति बन जाते हैं तो कुकी और नागा जनजातियों को अपने हाथ से जमीन छिन जाने का खतरा दिखने लगेगा। राज्य के कुकी और उनसे भी बड़े नागा जनजाति समुदाय ने इस आदेश के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन और बंद आयोजित किए। नागा इलाकों में तो यह विरोध शांतिपूर्ण रहा लेकिन तनाव की पृष्ठभूमि में कुकी इलाकों में इस प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। उसके बदले में मितेई लोगों ने इंफाल घाटी में बसे कुकी लोगों पर हमला किया। सरकार देखती रही और कुछ ही घंटों में यह आग फैल गई।

आदेश में उच्च न्यायालय ने मितेई समुदाय को जनजाति माना है। न्यायालय के इस निर्देश के खिलाफ मणिपुर विधानसभा की पहाड़ी क्षेत्र समिति (एचएसी) के अध्यक्ष डिंगांगलुंग गंगमेई द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि मैती समुदाय एक जनजाति नहीं है और इसे कभी भी इस तरह से मान्यता नहीं दी जा सकती है। दायर अपील में कहा गया है कि उच्च न्यायालय का आदेश पूरी तरह से अवैध है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय को यह महसूस करना चाहिए था कि यह एक राजनीतिक समस्या थी, जिसमें उच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं है और राजनीतिक विवादों को राजनीतिक रूप से हल किया जाना था। अपील में उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने की भी मांग की गई है। गौरतलब है कि मितेई ट्राइब यूनियन ने आरक्षण के मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट की तरफ रुख किया था। मितेई समुदाय द्वारा कोर्ट से मांग की गई कि न्यायालय राज्य सरकार को उनकी मांग पर विचार करने का निर्देश दे। इसके अलावा राज्य केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय को एक सिफारिश भी भेजे। जिसके बाद हाईकोर्ट द्वारा मितेई समुदाय के पक्ष में फैसला सुनाया गया। जिसमें उच्च न्यायालय ने 19 अप्रैल को सरकार को निर्देश दिया कि राज्य सरकार इनकी मांग पर विचार करे और चार महीने के भीतर केंद्र सरकार को सिफारिश भेजे। कोर्ट के इस फैसले के बाद ऑल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन ऑफ मणिपुर आदिवासी ने बीते 3 मई को मितेई समुदाय और कोर्ट के आदेश के खिलाफ एकता मार्च निकाला। जिसमें हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी शामिल थे। वहीं दूसरी ओर एटीएसयूएम की रैलियों के खिलाफ घाटी के मेइती लोगों ने भी रैली की। इसी दौरान चुराचांदपुर जिले के तोरबंग क्षेत्र में हिंसा भड़क उठी।

रैलियों के बीच हुई झड़प के बाद चुराचंदपुर और बिष्णुपुर में आजगनी और पथराव भी हुआ। पुलिस के मुताबिक तोरबंग में मार्च के दौरान हथियार थामे लोगों की भीड़ ने कथित तौर पर मितेई समुदाय के लोगों पर हमला किया। मितेई समुदाय के लोगों ने भी जवाबी हमले किए। जिससे पूरे राज्य में हिंसा फैल गई। 4 मई को जब हालात बेकाबू हो गए तब राज्य सरकार ने बेहद गंभीर स्थिति होने पर उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किया। राज्यपाल की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि समझाने और चेतावनी के बावजूद स्थिति काबू में नहीं आने पर ‘देखते ही गोली मारने’ की कार्रवाई की जा सकती है। ये अधिसूचना दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रावधानों के तहत राज्य सरकार के गृह आयुक्त के हस्ताक्षर से जारी की गई। हिंसाग्रस्त इलाकों में धारा 144 लागू कर दी गई साथ ही पूरे राज्य में 5 दिनों के लिए इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई।

हिंसा में सरकार की गतिविधि
राज्य के मितेई और आदिवासी समुदाय के बीच तनाव तो लंबे समय से ही चल रहा था। लेकिन उच्च न्यायालय ने जब मितेई समुदाय के पक्ष में फैसला दिया तो राज्य में यह तनाव और बढ़ गया। राज्य में बढ़ती हिंसा न सिर्फ राज्य सरकार के लिए बल्कि केंद्र सरकार के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है। हालांकि अब स्थिति संभलते हुए नजर आ रही है। राज्य में हिंसा के बाद कई जिलों में जारी कर्फ्यू के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि राज्य में स्थिति नियंत्रण में है। उससे पहले मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह द्वारा भी 6 मई को सभी पार्टियों के साथ बैठक कर कहा गया कि कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार आया है। सरकार के मुताबिक हिंसा से अब तक करीब 30 हजार से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं, जो वर्तमान में सेना के शिविरों में शरण लिए हुए हैं। इसके अलावा करीब 60 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं 1700 से ज्यादा घर आग की चपेट में आ चुकें हैं। हिंसात्मक चपेट में आए कई लोग त्रिपुरा, मेघालय जैसे पड़ोसी राज्यों में जा रहे हैं। राज्य में हिंसा भड़कने के बाद करीब आठ जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया। रक्षा विभाग के मुताबिक सेना और अर्धसैनिक बलों के करीब दस हजार जवानों को मणिपुर में तैनात किया गया। इसके साथ ही मुख्यमंत्री द्वारा कहा गया कि शांति संबंधी पहल को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए हर विधानसभा क्षेत्र में शांति समितियों का गठन किया गया।

आरक्षण बना हिंसा की वजह
गैर आदिवासी और आदिवासी समुदाय के बीच हुई भीषण हिंसा ने संवेदनशील राज्य मणिपुर को हिला कर रख दिया है। इसकी प्रमुख वजह मितेई और आदिवासी समुदाय के हितों का टकराव है। दरअसल राज्य में तीन प्रमुख समुदाय हैं नागा, कुकी, और मितेई। इनमें से कुकी और नागा आदिवासी समुदाय से आते है और मितेई गैर आदिवासी समुदाय से हैं। इन दोनों समूहों के बीच वर्षों से आपसी हितों को लेकर टकराव होता आया है। मितेई समुदाय जनजाति का आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। जिसका पूरजोर विरोध मणिपुर का आदिवासी समुदाय कर रहा है।

क्या कहता है मितेई समुदाय
मणिपुर में नागा और कुकी जनजातियों की 34 उपजनजातियां सरकार की अनुसूचित जनजातियों में शामिल हैं। लेकिन इसमें मितेई शामिल नहीं है। हालांकि यह समुदाय लंबे समय से एसटी दर्जे की मांग कर रहा है। इस समुदाय के अनुसार वर्ष 1949 में भारत के साथ मणिपुर विलय से पहले मितेई समुदाय को आदिवासी समुदाय के रूप में मान्यता दी गई थी। लेकिन विलय के बाद उसने अपनी यह पहचान खो दी। इस समुदाय का कहना है कि यह सिर्फ नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि यह पैतृक जमीन, संस्कृति और पहचान का मसला है। हालांकि उनकी मांग का राज्य के मौजूदा एसटी समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले आदिवासी छात्र संघों ने कड़ा विरोध किया है, जिन्होंने तर्क दिया है कि मितेई समुदाय को यदि एसटी का दर्जा दिया जाता है तो आरक्षण के माध्यम से आदिवासी समुदायों की रक्षा करने की कोशिशें नाकाम साबित होंगी। मितेई समुदाय का मानना है कि एसटी दर्जे की मांग उनके अस्तित्व और बाहरी लोगों से उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। एसटी आरक्षण से उन्हें आदिवासी लोगों की तरह पहाड़ियों में जमीन हासिल करने में मदद मिलेगी। मणिपुर आदिवासी के लिए सरकार द्वारा प्रावधान किए गए हैं जिसके तहत आदिवासी समुदाय बेरोक-टोक घाटी और परवर्ती इलाकों में जा सकते हैं जबकि मितेई समुदाय केवल घाटी तक ही सीमित है। राज्य में 90 प्रतिशत पर्वतीय इलाका है बाकी 10 प्रतिशत घाटी इलाका है।

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