मेरी बात
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कहा जा सकता है कि एक अकेला समूचे विपक्ष पर भारी पड़ गया है। चौतरफा ब्रांड मोदी की धूम और उसका प्रभाव स्पष्ट नजर आ रहा है और इस ब्रांड की चमक आगे विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस की हर रणनीति हाल-फिलहाल तक कारगर होती दिखाई नहीं दे रही है। भाजपा को कर्नाटक में इस वर्ष के मध्य में मिली हार के बाद ऐसा लगने लगा था कि अब मोदी का जादू उतरने लगा है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की जीत ने लेकिन एक बार फिर से इस जादू का असर आमजन के मध्य मजबूती से बने रहने की पुष्टि कर दी है। स्मरण रहे कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सरकारें अलोकप्रिय कतई नहीं थी और दोनों  ही राज्यों में एक से बढ़कर एक जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू किया गया था। इसके बावजूद जनादेश का भाजपा के पक्ष में आना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि की चमक बरकरार रहने और ‘मोदी की गारंटी’ पर आमजन के विश्वास को सामने लाता है। इन चुनावी नतीजों की बाबत राजनीतिक विश्लेषकों की राय अलग-अलग हो सकती है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सांगठनिक क्षमता, भाजपा की सफल चुनावी रणनीति और केंद्र सरकार द्वारा लागू जनकल्याणकारी योजनाओं, विशेषकर मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा लागू ‘लाडली बहन’ सरीखी योजनाओं को भी इस जीत का श्रेय बहुत सारे विश्लेषक देना चाहेंगे, असल मुद्दा लेकिन मोदी ब्रांड ही है जो बीते नौ बरसों से लगातार विस्तार पा रहा है। 2018 में कांग्रेस को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मिली सफलता ने इस ब्रांड की विश्वसनियता पर अवश्य प्रश्न चिन्ह् लगाने का काम किया था। 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों बाद भी ब्रांड मोदी के कमजोर होने की बात उठने लगी थी जिसे इस वर्ष कर्नाटक और हिमाचल में भाजपा की कांग्रेस हाथों पराजय ने हवा देने का काम किया। ऐसा माने जाना लगा था कि अब भाजपा अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करते हुए छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्षेत्रीय नेतृत्व को आगे रख चुनाव लड़ सकती है। भाजपा नेतृत्व ने किया ठीक उलट। इन तीनों ही राज्यों में राज्य स्तरीय नेताओं को दरकिनार कर चुनाव मोदी ब्रांड को आगे कर लड़ा गया। यह भाजपा द्वारा लिया गया एक ऐसा फैसला था जो यदि कारगर नहीं होता तो 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके सामने चेहरे का संकट पैदा हो सकता था। यह बड़ी जोखिम भरी रणनीति थी जो कारगर रही और जिसकी सफलता ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2013 में जब भाजपा ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय फलक में लाने का और उन्हें 2014 के आम चुनाव में भाजपा का प्रधानमंत्री चेहरा घोषित करने का काम किया था, तभी से भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी की सामूहिक नेतृत्व वाली पार्टी से हटकर व्यक्ति केंद्रीत संगठन में तेजी से बदलने लगी थी। मोदी- शाह के युग में जब कभी भी, किसी भी राज्य में भाजपा चुनाव हारी तो उसका दोष इसी व्यक्ति केंद्रीय राजनीति को राजनीतिक विश्लेषकों ने दिया इसलिए अब जबकि इन तीन राज्यों में स्थानीय नेतृत्व को दरकिनार कर, मोदी के चेहरे को आगे रख चुनाव लड़ा और जीता गया है, तो इस जीत का श्रेय भी ब्रांड मोदी को ही जाता है। बीते नौ वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक ऐसी छवि गढ़ने में भाजपा विशेषकर मोदी के विश्वस्त सलाहकारों ने सफलता पाई जो प्रधानमंत्री को मात्र एक राजनेता नहीं, बल्कि एक ऐसे संत के रूप में, महापुरुष के रूप में सामने रखती है जो केवल और केवल राष्ट्रहित के लिए, हिंदुत्व के लिए और दलितों-पिछड़ों के उद्धार के लिए दिन-रात काम करता है। यह छवि अद्भुत है। किसी एक छवि के भीतर मोदी कैद नहीं हैं। वह कई छवियों को एक साथ धारण किए ऐसे राजनेता हैं जिनको देश के गरीब-गुरबा से लेकर अडानी- अंबानी सरीखे उद्योगपति अपने मनोकूल पाते हैं। इसे कुछ ऐसे समझा जा सकता है कि हिंदुत्व के महानायक मोदी केदारनाथ धाम से लेकर पूरब-पश्चिम और दक्षिण के हर मंदिर में पूजा-अर्चना कर उस मनुवादी सोच को विस्तार देते नजर आते हैं जिसके प्रति दलितों और पिछड़ों में भारी वैमन्स्य का स्थाई भाव है लेकिन मोदी इस ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देते हुए हिंदुत्व के साथ दलितों को जोड़ने का काम सफलतापूर्वक कर उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के तल पर आगे ला अपनी करिश्माई छवि भीतर कैद भी कर लेते हैं। यह 1980 में गठित भाजपा या फिर उससे पहले संघ की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए बने भारतीय जनसंघ की ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि को ध्वस्त कर पाने में सफल रही रणनीति है जिसका श्रेय मोदी को जाता है। मोदी ने उग्र राष्ट्रवाद को भी सफलतापूर्वक आम जनता के भीतर कुछ इस तरीके से पैदा करने काम किया है कि गंगा-जमुनी संस्कृति पर गर्व करने वाले भारत में अब धर्म आधारित हिंसा को राष्ट्रवाद के नाम पर आसानी से सही ठहराने की मनोवृति स्थाई हो चली है। संविधान की उद्घोषिका में भारत को समाजवादी राह में चलने की बात कही गई है। अपने गठनकाल (1980) से ही लगातार स्वदेशी की नीति पर जोर देने वाली भाजपा अब पूरी तरह से पूंजीवादी नीतियों की पैरोकार बन चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पूंजीवादी नीति को भी गरीब-गुरबा के उत्थान और उसे सशक्त राष्ट्र की परिकल्पना से जोड़ने का काम कर दिखाया है। एक तरफ विश्व बैंक और बाजारवादी ताकतों के हितों की रक्षा है तो दूसरी तरफ मुफ्त की रेवड़ी बांटने का काम। दोनों विपरीत ध्रुवों को साधने का असंभव मोदी ब्रांड की ऐसी सफलता है जिसके परिणाम चौतरफा भाजपा-सर्वत्र मोदी के रूप में सामने हैं। लोकसभा चुनाव अब मात्र 6 माह दूर है। ऐसे में उत्तर भारत के तीन राज्यों में मिली सफलता विपक्ष के लिए बड़े संकट की तरफ इशारा कर रही है। छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में कुल 82 लोकसभा सीटें हैं जिनमें से 65 पर अभी भाजपा का कब्जा है। हालांकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों की गणित अलग-अलग होती है और कई बार विधानसभा में प्रचंड जीत हासिल करने वाला दल लोकसभा चुनाव में अपनी परफारमेंस नहीं दोहरा पाता है लेकिन भाजपा की छत्तीसगढ़ में विजय और मध्य प्रदेश में प्रचंड बहुमत पाना यह इशारा करता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का पलड़ा इन राज्यों में भारी रहना तय है।
अब बात करते हैं विपक्षी दलों की। इन चुनावों के नतीजे ‘इंडिया गठबंधन’ की रणनीति में बड़े बदलाव की संभावना को तो जन्म दे ही चुके हैं। इस गठबंधन भीतर कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति की तरफ भी इशारा कर रहे हैं। साथ ही कांग्रेस में भी घमासान मचने के पूरे संकेत हैं। अभी से यह कहा जाने लगा है कि कांग्रेस नेतृत्व ने युवा नेतृत्व को यदि मध्य प्रदेश और राजस्थान में तरजीह दी होती तो नतीजे मनोकूल होते। राजस्थान में सचिन पायलट समर्थक हार के लिए गहलोत को निशाने पर रखना शुरू कर चुके हैं। इस बात की संभावना-आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसढ़ में कांग्रेस भीतर विद्रोह तेज होगा और कई असंतुष्ट नेता भाजपा का दामन थाम लेंगे। यह प्रश्न भी अभी से हवा में तैरने लगे हैं कि कांग्रेस संगठन भाजपा की वनिस्पत जमीनी स्तर पर बेहद कमजोर है और उसको मजबूत बनाने के प्रयास इस उद्योगति तक पहुंच जाने बाद भी पार्टी नेतृत्व द्वारा नहीं किए जा रहे हैं। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा की सफलता को वोट की राजनीति से जोड़ यह कहा जाना शुरू हो चला है कि इस यात्रा का चुनावी लाभ कमजोर संगठन होने के चलते पार्टी उठा नहीं पाई। कांग्रेसियों में भारी हताशा इस बात को लेकर भी तेज होने लगी है कि भाजपा के हिंदुत्व की काट कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व कर पाने में सर्वथा विफल रहा है। दक्षिण भारत में मिली सफलता के बावजूद अब ‘इंडिया गठबंधन’ का नेतृत्व आसानी से कांग्रेस को मिलने से रहा। उत्तर भारत में कांग्रेस का सूपड़ा लगभग साफ होने चलते अब मूलतः कांग्रेस विरोधी रही राजनीतिक पार्टियों का कांग्रेस संग नैसर्गिक अलगाव एक बार फिर से सतह पर आना तय है जो इन दलों के महागठबंधन ‘इंडिया’ के स्थायित्व को संकट में डालने का काम करेगा। मध्य प्रदेश में जिस तरीके से कांग्रेस ने सपा की अनदेखी की, उपेक्षा की, अब खराब प्रदर्शन चलते सपा व अन्य क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा का दंश उसे सहना पड़ेगा। वैसे भी यह गठबंधन न तो राष्ट्रीय मुद्दों को  लेकर अभी तक अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर पाया है और न ही इसके नेतृत्व का मसला तय हो सकता है। बिहार में नीतीश कुमार ने जाति आधारित जनगणना की चाल चली। इस चाल के जंजाल में भाजपा फंसती जरूर नजर आ रही है लेकिन छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस जनगणना का लाभ कांग्रेस को मिला नहीं और जाति पर धर्म स्पष्ट तौर पर हावी रहा। ठीक इसी प्रकार भूपेश बघेल और अशोक गहलोत द्वारा वृहद् स्तर पर लागू की गई जनकल्याणकारी योजनाएं भी ब्रांड मोदी के आगे घुटने टेक गईं। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव को दमदारी से लड़ने के लिए विपक्ष को अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करने की जरूरत है ताकि ब्रांड मोदी का विकल्प जनता के समक्ष रखा जा सके। अन्यथा उसके हाथ निराशा लगनी तय है।

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