आज के समय में संयुक्त परिवार का महत्व समाज में कम होता जा रहा है। ऐसे में उन्होंने ‘अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस’ का महत्व और बढ़ जाता है। यह हर साल 15 मई को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1993 में हुई थी और यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा परिवारों को दिए जाने वाले महत्व को दर्शाता है। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य है प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में परिवार के महत्व को समझे और उनका आभार प्रकट करने के लिए एक दिन निकाले। हमें ये बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि परिवार से ही हम और हमारा समाज है। माता-पिता के लिए उनके बच्चे ही उनकी सबसे बड़ी सम्पत्ति और खुशी होती है। उनकी एक ही इच्छा होती है कि पूरा परिवार एक ही घर में एक छत के नीचे एक साथ मिल-जुलकर रहे। मगर आज की भागदौड़ भी जिंदगी और सबकुछ पा लेने की चाहत ने हमें गांव से शहर तथा शहर से महानगर में ला खड़ा कर दिया है। भले ही कितना भी पैसा कमा रहे हों या धन-सम्पदा अर्जित कर ली हो लेकिन वो सुकून नहीं है जो गांव और संयुक्त परिवार में रहकर मिलता है। संयुक्त परिवार का सबसे बड़ा फायदा है कि परिवार के किसी भी सदस्य को कोई परेशानी हो तो एक-दूसरे से बातचीत कर उसका हल आसानी से निकल आता है। महानगर में एकल परिवार में रहकर सोचते हैं कि हम सुखी और सुकून से हैं तो ऐसा नहीं है। उधर गांव में बड़े-बुजुर्ग या माता-पिता इसी आशा में होते हैं कि कभी न कभी तो वो दिन आएगा जब हम सब एक साथ रहेंगे, लेकिन वो दिन कभी नहीं आता। कभी छुट्टी नहीं मिलती, कभी ऑफिस के काम का प्रेशर तो कभी बच्चों के स्कूल की छुट्टी नहीं, इसी में समय निकल जाता। तो आइए ऐसे ही कुछ बॉलीवुड फिल्मों के बारे में चर्चा करते हैं जिनमें संयुक्त परिवार के महत्व, जितना भी कमाया उसमें सब मिल-जुलकर एक साथ हंसी-खुशी रहना और उनसे अलग रहने के बाद की परेशानियों से जिंदगी रू-ब-रू कराती है।
भले ही अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस की शुरुआत नब्बे के दशक में हुई हो लेकिन पारिवारिक और परिवार के महत्व को दर्शाने वाली बॉलीवुड की फिल्म इससे दो दशक पूर्व यानी 1972 में आई ‘बावर्ची’
इसकी वास्तविकता के आईने को दिखाती है। उस दौर की फिल्मंे दिल में छाप छोड़ जाती हैं और बार-बार देखने का मन करता है। फिल्म में रसोइये की खोज में परेशान शर्मा परिवार को राहत तब मिलती है जब प्रतिभाशाली रघु यानी राजेश खन्ना नौकरी के लिए उनके घर आता है। परिवार की खुशियां तब बिखरती हैं जब घर से गहने गायब हो जाते हैं और नौकर रघु भी गायब हो जाता है। तब इस संकट की घड़ी में उसका परिवार ही साथ देता है। ‘बावर्ची’ फिल्म भी इस बात का उदाहरण है कि किस तरह से परिवार के लोग एक- दूसरे का सहयोग करके ही खुश रह सकते हैं। यह फिल्म भी एक संयुक्त परिवार के महत्व को दर्शाती है। ऐसे में आज के माहौल में इस फिल्म का महत्व और भी बढ़ जाता है। फिल्म के निर्देशक हैं ऋषिकेश मुखर्जी।
भारत में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस के बारे में कम लोग जानते हों, लेकिन बॉलीवुड की कई ऐसी फिल्में हैं जो परिवार के महत्व को दर्शाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म 2003 में भी आई थी ‘बागबान’। इसके निर्माता बीआर चोपड़ा और निर्देशक हैं रवि चोपड़ा। इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह माता-पिता को अपने बेटे शुरू में नकार देते हैं, पर गोद लिया हुआ बेटा (जिसे बचपन में उसने पढ़ाया-लिखाया) उनकी चिंता करता है और उन्हें मिलवाता है। बाद में पैसे के खातिर बेटे अपने माता- पिता के साथ आना चाहते हैं। पर पिता मना कर देते हैं। मना इसलिए भी करते हैं क्योंकि बच्चों के लिए यह जानना जरूरी है कि एक माता-पिता जिसने उनको पढ़ाया-लिखाया, शादी-ब्याह कराई, जिंदगी संवार दी, वह खुद के लिए क्या कुछ नहीं करते। लेकिन किसी पर कभी बोझ नहीं बनना चाहते। उनका महत्व खुद बच्चों को समझना होगा।
ऐसी एक और पारिवारिक फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ 1994 में आई थी जिसे निर्देशित किया था सूरज बड़जात्या ने। सलमान खान और माधुरी दीक्षित स्टारर यह फिल्म भी पूरी तरह से परिवार को महत्व देने वाली फिल्म है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे हर तरह के रिश्तों को महत्व दिया जाता है। ऐसे समय में जबकि ससुराल को लेकर अक्सर निगेटिव खबरें आती हैं, इस फिल्म में आप देख सकते हैं कि एक बहू को कितना प्यार-सम्मान मिलता है। वहीं, किसी कार्यक्रम के दौरान जब सब जुटते हैं तो वहां प्यार कैसे सबके लिए और बढ़ जाता है। सूरज बड़जात्या ने ऐसी कई पारिवारिक फिल्में बनाई निर्देशित की है जो एक परिवार को जोड़कर रखती हैं तथा उसके महत्व को दर्शाती हैं इनमें ‘विवाह’, ‘एक विवाह ऐसा भी’, ‘हम साथ साथ हैं’ और ‘प्रेम रत्न धन पायो’ जैसी फिल्में मुख्य हैं।
बड़जात्या की अगली फिल्म 1999 में आती जो परिवार के आपसी प्यार को दर्शाती है। वह है ‘हम साथ साथ हैं’। इस खास मौके पर यह फिल्म भी जरूर देखिए कि एक मां का प्यार क्या होता है। भाइयों को आपस में कितना प्यार होता है? जो एक भाई के घर से चले जाने के बाद जब दूसरा भाई पढ़ाई करके बाहर से आता तो वह भी अपनी मां के पास रहने के बजाय भाई के पास चला जाता है। किसी भी एक के नहीं होने से परिवार कैसे अधूरा और दुखी रहता है यह इस फिल्म में आप देख सकते हैं और एक खुशहाल परिवार किस तरह रहे इससे सीख सकते हैं।
वर्ष 2015 में आई फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ जिसके निर्देशक हैं सूरज बड़जात्या। सलमान खान और सोनम कपूर अभिनीत इस फिल्म में भी दिखाया गया है कि कैसे अंत में सबको अहसास होता है कि जमीन जायदाद नहीं, बल्कि प्यार परिवार और आपस में होना चाहिए। इस फिल्म में सलमान खान राजपरिवार के राजकुमार की भूमिका में हैं। उनकी ताजपोशी होनी होती है, पर उनका सौतेला भाई उन्हें मारकर खुद राजकुमार की गद्दी पर बैठना चाहता है। वहीं राजकुमार यानी सलमान की शादी पहले से ही राजकुमारी मैथिली (सोनम) से तय होती है लेकिन वह जिद्दी होती है और खामियाजा राजकुमार को उठाना पड़ता है। राजकुमार का सौतेला भाई अपने दोस्त के साथ मिलकर उसे मारने का प्लान बनाता है लेकिन वही दोस्त उसे बाद में धोखा दे देता है। फिल्म की इतनी ही कहानी बताना काफी है कि अगर अपनों को आप धोखा देंगे तो आपके साथ भी धोखा ही होगा।
2001 में आई करण जौहर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’। इस फिल्म की कहानी परिवार के उसूलों को लेकर है जिसे सबको साथ बैठकर जरूर देखना चाहिए। इससे किसी का अहम टूटेगा तो वहीं यह भी पता चलेगा कि समाज में छोटा-बड़ा कुछ नहीं होता। आपस में प्यार और एक-दूसरे के प्रति सम्मान होना चाहिए। इस परिवार ने अपने बड़े बेटे (शाहरूख खान) को गोद लिया होता है जिसका छोटेे भाई (ऋतिक रौशन) विदेश में पढ़ाई करने गया होता है। इस बीच बड़े भाई को किसी मध्यम परिवार की लड़की (काजोल) और उसकी एक छोटी बहन होती है को पिता की मृत्यु के बाद अपने घर ले आता है जो परिवार के मुखिया यानी अमिताभ बच्चन को रास नहीं आता है और दोनों को घर से बाहर निकाल दिया जाता है। अमिताभ बच्चन अपने बेटे शाहरुख खान को उसके प्यार काजोल से रिश्ता नहीं होने देते हैं। हालांकि किस तरह से उनका छोटा बेटा भाई बाद में अपने बड़े भाई और पिता को मिलाने में सफल रहता है। यह सुखद और सुकून देने वाली कहानी बताती है कि प्यार और परिवार से बड़ा कुछ नहीं।
शरद कटारिया द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सुई-धागा’ 2018 में आई थी। इसकी मुख्य भूमिका में वरुण धवन और अनुष्का शर्मा हैं। फिल्म की कहानी बताती है कि अगर परिवार साथ है तो आप किसी भी मुश्किल परिस्थिति को भी पार पा सकते हैं। अपने पति को नौकरी पर बार-बार अपमानित होते देख ममता यानी अनुष्का शर्मा निर्णय लेती हैं कि वह खुद का कुछ काम शुरू करेंगी। इसमें वे धोखा भी खाते हैं, पर अंत में उनकी जीत होती है। चूंकि पूरा परिवार एक साथ है, सबका संबल है इसलिए उनकी जीत तो निश्चित ही है। यह जीत परिवार की जीत है। जेठु जोसेफ द्वारा निर्देशित मलयालम फिल्म ‘दृश्यम’ 2013 में आई थी। इसी की तर्ज पर निशिकांत कामत के निर्देशन में बनी बॉलीवुड की ‘दृश्यम’ की सिक्वल 2015 में आई पहली सीरीज जिसकी कहानी में एक गोवा पुलिस की मुखिया (तब्बू) के बेटे के लापता होने पर पुलिस को एक स्थानीय व्यापारी, विजय (अजय देवगन) और उसके परिवार पर संदेह होता है। यह फिल्म यह बताती है कि परिवार पर जब आंच आए तो एक पिता किस हद तक जा सकता है। वह भी उस स्थिति में जब सिस्टम भी आपके खिलाफ हो। विजय की बड़ी बेटी के साथ गोवा पुलिस की मुखिया के बेटे ने छेड़छाड़ करता है। इस दौरान विजय के घर में उनकी पत्नी के हाथों उसकी हत्या हो जाती है। इसके बाद परिवार डर जाता है।
तब विजय हिम्मत नहीं हारता और वह जानता है कि अगर वह हिम्मत हार गया तो परिवार बिखर जाएगा। अंत तक वह पता नहीं लगने देता कि लाश को उन्होंने कहां ठिकाने लगाया। पुलिस अपने संदेह पर सबूत तलाशती है। विजय के घर और उसके आस-पास से लेकर उसकी पूरी कुंडली खंगाल लेती है लेकिन उसे कोई सुराग या सबूत नहीं मिलता। अंत तक वह पता नहीं लगने देता कि लाश को उसने कहां ठिकाने लगाया। जब पुलिस के मुखिया गोवा छोड़कर जा रहे होते हैं तो एक आखिरी बार विजय से मिलती है और सशर्त पूछती है कि विजय तुमने मेरे बेटे का क्या किया? तब वह सब सच बताता है। यह विजय के परिवार का आपसी प्यार और विश्वास ही है जो उसे पुलिस की सख्ती और मार दोनों ही नहीं तोड़ पाती। हालांकि एक टाइम ऐसा भी आता है जब विजय की छोटी बेटी की हिम्मत टूट जाती है और वह सच बोल देती है। लेकिन इससे पहले विजय ने इस सबूत को भी मिटा दिया होता है।
जनार्दन कुमार सिंह

