‘हीरा मंडी’ वेबसीरीज आजादी से पहले वाले गुलाम भारत की एक नयाब कहानी को सामने रखती है। यह वह समय था जब भारत का बंटवारा नहीं हुआ था और अंग्रेजों की सत्ता बनी हुई थी। ऐसे समय में भी हर कोई अंग्रेजों का गुलाम बना हुआ था। लाहौर की एक गली पूरी तरह आजाद थी जिसको हीरा मंडी के नाम से जाना जाता है। इस हीरा मंडी का नाम हीरा सिंह के बेटे ट्टयान सिंह डोगरा के नाम पर रखा गया था। इस मंडी में कभी हीरे, जेवरात बिकते थे, बाद में इसे अनाज मंडी में तब्दील कर दिया गया और कुछ हिस्से में तवायफों का बसेरा बनाया गया। मुगलों के दौर में हीरा मंडी का नाम शाही मोहल्ला था और कुछ लोग इसे अदब का मोहल्ला भी कहते थे। इस मोहल्ले में तवायफ राज हुआ करता था। यहां पर नवाब अपने मनोरंजन के लिए आया करते थे। इसके अलावा शाही घरानों के शहजादों को अदब और अंदाज की शिक्षा लेने यहां पर भेजा जाता था। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के बाद ये जगह वेश्यावृत्ति का केंद्र बन गई थी। पाकिस्तान में आज भी ये जगह मौजूद है, जिसे अब रेड लाइट एरिया के नाम से जाना जाता है। संजय लीला भंसाली की वेबसीरीज ‘हीरा मंडी’ इसी मंडी की कहानी है जहां मल्लिकाजान का हुक्म चलता है। इस शाही इलाके में बड़े-बड़े राजा-महाराजा लाइन में खड़ा हुआ करते हैं लेकिन अंग्रेजों की एंट्री पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
‘हीरा मंडी’ दरअसल, संजय लीला भंसाली का ड्रीम प्रोजेक्ट थी जिसको बनाने का सपना बीते 18 वर्षों से वे देख रहे थे। वे इस पर एक फिल्म अभिनेत्री रेखा, करीना कपूर, रानी मुखर्जी और पाकिस्तानी सितारे माहिरा खान, फवाद खान और इमरान अब्बास के साथ बनाना चाहते थे लेकिन इन सब सितारों को एक साथ लाने में सफल नहीं हो पाए। बाद में उन्होंने इसे वेबसीरीज में बदल मनीषा कोइराला, सोनाक्षी सिन्हा, ऋचा चड्ढा, अदिति राव हैदरी, शर्मिन सहगल, संजीदा शेख, फरदीन खान, अट्टययन सुमन, शेखर सुमन, फरीदा जलाल आदि के साथ पूरा करने का निर्णय लिया। यह वेब सीरीज 8 एपिसोड में है और एक एपिसोड 40-45 मिनट का है। दर्शकों में इस वेबसीरीज को देखने का जितना खुमार था उतनी जल्दी उतर भी गया। सीरीज के रिव्यू बता रहे हैं कि इसके एपीसोड लंबे होने के साथ-साथ बोरिंग भी हैं। दर्शक इस को 2 रेटिंग से ज्यादा नहीं दे रहे हैं। वेबसीरीज में मनीषा कोइराला का किरदार हीरा मंडी की जान है। जब तक मनीषा फ्रेम में होती हैं, तब तक आप स्क्रीन देखते हैं और फिर नजरें भटकने लगती हैं।
सोनाक्षी सिन्हा की भी एक्टिंग इतनी खास नहीं है। वो रेहाना और फरीदन के मां-बेटी वाले डबल रोल के किरदार में उतना दम नहीं दिखा पाईं हैं। बिब्बो जान का किरदार निभा रही अदिति राव हैदरी ने लेकिन खूब चर्चा को बटोरी है। इस पूरी सीरीज में जो कहानी सबसे ज्यादा असर करती है, वो है। मुल्क के लिए बिब्बो की बगावत वाला ट्रैक दिलचस्प है। वहीं ऋचा चड्ढा के पास छोटे से किरदार में कुछ कर दिखाने के लिए ज्यादा मौका नहीं था। आलम बेग बनी शरमिन सहगल को मौका तो खूब मिला लेकिन अपनी एक्टिंग से लोगों का दिल न जीत सकीं। मेल अभिनेता तो पूरी वेबसीरीज में नाममात्र के लिए ही हैं। शेखर सुमन के पास 8 एपिसोड की सीरीज में 4 सीन हैं, जिसमें एक सीन है जहां उन्हें ओरल सेक्स करते दिखाया गया हैं जिसको लेकर दर्शक उनका खूब मजाक बना रहे हैं। फरदीन खान ने 14 वर्षों बाद फिल्मों में वापसी की लेकिन इस सीरीज में ऐसा कोई दमदार रोल ही नहीं था जिससे उनकी छवि बन सके।
‘हीरा मंडी’ की कहानी ‘हीरा मंडी’ आजादी के पहले के भारत में तवायफों के जीवन में प्रेम और ट्टाोखे की कहानी पर आट्टाारित है। इसकी कहानी दो तवायफ बहनंे रेहाना और मल्लिका से शुरू होती है, जहां बड़ी बहन रेहाना शाही महल की सरपरस्त बनकर मल्लिका से उसकी औलाद छीन लेती है। बाद में मल्लिका रेहाना से उसका शाही महल और जिंदगी छीन लेती है। बहनों के बीच हुजूर बनने की ये अदावत अगली पीढ़ी की फरीदन (सोनाक्षी सिन्हा) और आलम बेग (शर्मिन सहगल) तक पहुंचती और झुलसाती है।
इस कहानी में रेहना की बेटी फरीदन का अपनी विरासत को फिर से पाने की साजिश को दिखाया गया है। लज्जो की रुस्वा मोहब्बत और बिब्बो की वतन परस्ती प्रभावित करती है। मल्लिका की बेटी आलम की इश्क के लिए बगावत और क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते नवाबों की बेवफाई और अंग्रेजों की बदसलूकी से होते हुए आजादी के तराने पर सब कुछ कुर्बान कर देने वाले जज्बे को पिरोने की कोशिश की गई है। लेकिन इस सीरीज की कहानी के अंदर सारा रायता फैला रखा है लज्जो और जोरावर की बेवफाई वाले ट्रैक में जिस सरप्राइज एलिमेंट को भंसाली परोसना चाहते थे उस जुल्फिकार को पहले बाप-बेटे यानी अट्टययन सुमन को उम्रदराज होकर शेखर सुमन के तौर पर दिखाकर भंसाली ने पहले एपिसोड में ही खोल दिया। ये तो अच्छा हुआ कि ट्रैक सेकेंड एपिसोड में ही खत्म हो गया, वरना और फजीहत होती। रेहाना और फरीदन… यानी मां के कत्ल के लिए बेटी के बदले वाली कहानी, जिसे हीरा मंडी के सबसे बड़े हाईलाइट के तौर पर पेश किया गया, भंसाली ने उसे भी दो-चार सीन्स से ज्यादा जगह नहीं दी। जिसके चलते यह सीरीज और भी कमजोर हुई। आलमबेग और ताजदार की मोहब्बत का ट्रैक में शायरी भले ही कितनी जोड़ दी गई हो, लेकिन रुमानियत सिरे से गायब रही है। सातवें और आठवें एपिसोड में जाकर, लगता है कि भंसाली ने कहानी को दिलचस्प बनाने के लिए उसे अंग्रेजों के खिलाफत की ओर मोड़ा। तब जाकर कहानी संभलने की कोशिश करती है, लेकिन पहले 6 एपिसोड तक बात इतनी बिगड़ चुकी है कि मामला संभल ही नहीं पाता।
18 वर्ष लगे सेट्स का कॉन्सेप्ट्स तैयार करने में
भंसाली ऐसे फिल्म मेकर हैं जो ग्रैंडमूवी सेट्स के लिए जाने जाते हैं। वो अपने सेट्स के जरिए दर्शकों को पूरी तरह से एक अलग दुनिया से रूबरू करवाते हैं। अब चाहे उनकी फिल्म ‘पद्मावत’ हो या देवदास या फिर ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ ही क्यो न हों। इन फिल्मों के सेट्स ने लोगों को काफी आकर्षित किया। ऐसे में वह अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘हीरा मंडी’ में कैसे कसर छोड़ सकते थे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिखा कि ‘हीरा मंडी’ का सेट्स उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सेट्स है इन सेट्स का कॉन्सेप्ट्स तैयार करने में 18 वर्ष लगे हैं और इन सेट्स को लगभग 1 लाख 60 हजार स्क्वायर फुट के एरिया में तैयार किया गया है इस सेट्स को 700 कारीगरों ने तैयार किया है जिसमें दुकान कोठे और हमाम भी शामिल हैं। मल्लिकाजान का शाही पैलेस हो या फरदीन का ग्रैंड क्वार्टर सब को अपने सुपरविजन में तैयार करवाया है। अपने ही सामने इस सेट्स के वूडन वर्क, झूमर, लकड़ी के दरवाजे आदि का वर्क करवाया है। उन्होंने आगे लिखा ‘जब किरदार ऐसे हैं जिन्हें मैं बहुत प्यार करता हूं। तो मैं उनके लिए खास जगहें तैयार करता हूं मेरे आर्ट डायरेक्टर घबराए हुए होते हैं जब मैं उन्हें कॉल करता हूं। मैं उनका दिमाग खा जाता हूं। जब तक चीजें एकदम सही नहीं हो जाती हैं अच्छा सेट बनाने के लिए बहुत प्यार और जिम्मेदारी की जरूरत पड़ती हैं। एक पिलर का डिजाईन भी किसी इमिजिनेशन से निकलता हैं।’
खूबसूरत संवाद
‘हीरा मंडी’ के संवाद बड़े ही साफ हैं। भाषा पर पकड़ सभी कलाकारों ने बनाई रखी है। डायलॉग अच्छे हैं, स्क्रीनिंग जबरदस्त है। भव्य झूमर, नाचते फव्वारे, हीरे जवाहरात का प्रदर्शन, नोटों की बौछार, जैसे दृश्य आपका मन मोह लेंगे। अमीर खुसरो का गाना और पीले कपड़े पहने बसंत का स्वागत करती तवायफ दिल जीत लेती हैं। वहीं जो चीज खटक सकती है, वह है बनावटीपन की हद! हर फ्रेम को इतना सजा दिया गया है कि लगता ही नहीं, गुलामी के दौर की कोई कहानी देख रहे हैं। सभी पात्र पूरे मेकअप में कोई भी गरीब नजर नहीं आता क्या ऐसा गुलामी के दौर में संभव था?

