Editorial

विवेकानंद शिला का चमत्कार!

मेरी बात

Communalism bigotry and its terrible descendant, fanaticism, have long taken over this  beautiful earth. Thay have filled the earth with violence, drenched it again and again with human blood, destroyed civilization and sent entire nations in to despair. If these terrible monsters did not exist, human society would be much more advanced than it is now. But their time has come; And I sincerly hope that the bell with has been rung this morning in honour of this conference may put an end to all fanaticism, all persecution with sword or pen and all irreconciable feelings between persons moving in the same direction

-Swami Vivekanand, Chicago, 11/9/1893

आम चुनाव 2024 के नतीजे आ चुके हैं। कहीं पर खुशी तो कहीं पर गम का माहौल है। राजनीतिक टिप्पणीकार हरेक चुनाव नतीजों बाद अब इन नतीजों का पोस्टमार्टम अपनी-अपनी समझ और वैचारिक प्रतिबद्धता अनुसार करने में जुट गए हैं। मैं लेकिन बीते एक सप्ताह से एक ही सोच को पकड़े बैठा हूं और लाख प्रयास करने पर भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहा हूं। मेरी सोच के केंद्र हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्वामी विवेकानंद। प्रधानमंत्री मोदी और स्वामी विवेकानंद के मध्य कोई समानता, कोई तुलना संभव नहीं है। दोनों की सोच और समझ में जमीन-आसमान का अंतर है। फिर भी जब मोदी चुनाव प्रचार बाद तमिलनाडु के कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला पर पैतालीस घंटे ध्यान में जा बैठे तो स्वामी विवेकानंद के दर्शन पर, उनकी जीवन यात्रा पर विचार करना और प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली, सोच और बतौर राजनेता उनकी जीवन यात्रा की तुलना विवेकानंद से करनी स्वभाविक हो जाती है।

स्वामी विवेकानंद के जीवन में ध्यान का बड़ा महत्व देखने को मिलता है। बाल्यकाल से ही उनकी रुचि ध्यान में रही थी। उनके आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें इस विधा में सिद्ध करने का काम किया था। 24 दिसंबर, 1892 में विवेकानंद तीन दिनों तक कन्याकुमारी स्थित एक विशाल समुद्री शिला में ध्यानरत रहे थे। कहा जाता है इसी शिला पर ध्यान के बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन मानवता की सेवा में समर्पित करने का संकल्प लिया था। विवेकानंद का मानना था कि ध्यान ईश्वर से सीधे जुड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। उन्होंने पश्चिमी  सभ्यता को इस ध्यान सूत्र में जोड़ा था। 24, दिसंबर 1892 में कन्याकुमारी पहुंचे विवेकानंद समुद्र में तैर कर इस शिला तक पहुंचे थे जिसे अब विवेकानंद शिला कह पुकारा जाता है। यहीं 25 से 27 दिसंबर पर ध्यान में बैठे विवेकानंद ने मानव कल्याण के लिए कुछ सार्थक करने का निर्णय लिया जिसे हम ‘कन्याकुमारी संकल्प’ कह पुकारते हैं। 1886 में रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु पश्चात नरेंद्रनाथ दत्त (विवेकानंद) ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के निकट बारानगर में अपना पहला मठ स्थापित किया था, लेकिन उनका मन एक स्थान पर टिक कर बैठने में लगा नहीं। 1888 में उन्होंने मठ त्याग छोड़ ‘परिव्राजक बनने का निर्णय लिया। परिव्राजक अर्थात भटकता हुआ साधु। इसके बाद विवेकानंद ने भारत भ्रमण शुरू किया और तमाम राज्यों की यात्रा कर आमजन की समस्याओं, उनके दुख-दर्द, उनकी पीड़ा को महसूसा। यह यात्रा कन्याकुमारी में जाकर अखण्ड भारत के उनके स्वपन का आधार बनी। इस शिला पर तीन दिवस तक ध्यान करने उपरांत विवेकानंद ने साधु-संन्यासियों को समाज सेवा के लिए संगठित करने का निश्चय किया था। मार्च, 1894 में उन्होंने अपने एक साथी स्वामी रामकृष्णनंद को लंबा पत्र लिखा जो गवाही देता है कि विवेकानंद आम भारतीय की पीड़ा से किस कदर आहत थे। उन्होंने लिखा-‘मेरे भाई, गरीबी और अज्ञानता को देखते हुए मुझे नींद नहीं आती थी। मां कन्याकुमारी के मंदिर में ध्यान के दौरान मुझे एक योजना सूझी- हम संन्यासी इधर-उधर भटकते रहते हैं और लोगों को तत्वमीमांसा सिखाते हैं, यह सब पागलपन है। क्या हमारे गुरुदेव (रामकृष्ण परमहंस)ने नहीं कहा  था कि ‘‘खाली पेट धर्म के लिए उचित नहीं है?’’। अज्ञानता चलते बेचारे आमजन जानवरों सरीखा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हम सभी युगों से उनका खून चूसते रहे हैं और उन्हें अपने पैरों तले रौंदते रहे हैं। ‘इस पत्र से एक बरस पहले विवेकानंद 1893 में अमेरिका के शहर शिकागो में पहली विश्व धर्म संसद में भाग लेने गए थे। उन्होंने इस सभा को अपने ओजस्वी और तर्कपूर्ण भाषण से चमकृत कर दिया था। धार्मिक असहिष्णुता और कट्टरता को समाप्त किए जाने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा था-‘सांप्रदायिक कट्टरता और इसके भयानक वंशज धर्मांधता ने लंबे समय से इस सुंदर धरती पर कब्जा कर रखा है। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, इसे मानव रक्त से अनेकों बार नहलाया है, सभ्यताओं को नष्ट किया है और सारे देशों में गहरी निराशा भर दी है। यदि ये भयानक राक्षस न होते तो मानव समाज आज की तुलना में कहीं अधिक उन्नत होता। लेकिन अब इन राक्षसों के अंत का समय आ गया है और मैं उम्मीद करता हूं कि इस सम्मेलन के सम्मान में आज प्रातः जो घंटी बजी है, वह सभी प्रकार की धर्मांधता, तलवार अथवा कलम से होने वाले सभी प्रकार के उत्पीड़न और एक लक्ष्य के प्रति समर्पित व्यक्तियों के मध्य सभी अमानवीय भावनाओं के लिए मृत्यु की घंटी होगी।’

स्वामी विवेकानंद के दर्शन को इतने भर से नहीं समझा जा सकता है। यह सिर्फ उनके विचारों को उनकी सोच को और उनके उद्देश्यों को समझने का दर्पण मात्र है। इसके बरअक्स यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दर्शन, उनकी सोच और उनके अभी तक के आचरण को समझने का ईमानदार प्रयास कोई करता है तो मेरी समझ से निश्चित ही ऐसा कोई उसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा जैसा मैं पहुंचा हूं। विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद को संबोधित वाले वक्तव्य में हर प्रकार की कट्टरता को समाप्त किए जाने का आह्वान किया था। इस आह्वान से नौ माह पूर्व विवेकानंद कन्याकुमारी स्थित जिस समुद्री शिला पर ध्यानस्थ हुए थे, उसी शिला पर पैतालीस घंटे तक ‘ध्यान’ मैं बैठे प्रधानमंत्री मोदी अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे। उनके सत्ताशीन होने के मात्र चार माह बाद गुजरात भारी सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया था। इन दंगों के दौरान मोदी सरकार की भूमिका को लेकर तमाम प्रकार की आशंकाएं-आरोप आज भी जिंदा हैं। 2014 में भारत का प्रधानमंत्री बनने से कुछ महीनों पहले गुजरात दंगों की बाबत दिया गया उनका एक बयान भी उन्हें मानवीय करुणा से सरोबार विवेकानंद से दूर ले जाता है। यह पूछे जाने पर कि क्या दंगों के दौरान जो कुछ हुआ उसका उन्हें दुख है, मोदी ने कहा था ‘दुख तो होता ही है। अगर कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाए तो भी दुख होता है।’ तब यह प्रश्न उठा था कि क्या मोदी दंगों में मारे गए लोगों की तुलना कुत्तों के पिल्ले से करते हैं? उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद हम सभी ने (हम से तात्पर्य अंध भक्तों को छोड़ अन्य से है) देश में साम्प्रदायिक कट्टरता को उभरते महसूसा है। हमने नाना प्रकार से लोकतांत्रिक मुल्यों का क्षरण होते और एक प्रकार की अघोषित तानाशाही को उभरते इन दस वर्षों के दौरान देखा-महसूसा है। ऐसे में, मैं इस सोच में डूबा हूं कि उस पवित्र शिला में बैठे प्रधानमंत्री मोदी स्वामी विवेकानंद की सोच से खुद को जोड़ पाएं होंगे’ और क्या उन्हें विवेकानंद की सोच का सार समझ आया होगा? क्या उन पैतालीस घंटों के दौरान उनके भीतर कुछ ऐसा घटा होगा जो उन्हें उनकी कट्टरता से दूर ले जाने और समावेशी भारत निर्माण की तरफ अग्रसर करेगा? या फिर जैसा बहुतों का मानना है, प्रधानमंत्री का विवेकानंद शिला में जा ध्यानस्थ होना एक पब्लिसिटी स्टंट मात्र था?

प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात तो वे ही जाने, जनता ने लेकिन कुछ हद तक विवेकानंद के कहे को समझा है और सांप्रदायिक कट्टरता, धर्मांधता को आईना दिखाने का काम इस आम चुनाव में कर दिखाया है। केंद्र में सरकार का नेतृत्व भले ही नरेंद्र मोदी करें, इतना तय है कि अब कुछ हद तक लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण रूकेगा, संविधान में बड़े बदलाव की आशंका भी अब थम जाएगी, मंत्री मंडलीय व्यवस्था पुनः स्थापित होगी और संसदीय प्रणाली यथावत रहेगी। यह इन चुनावों की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह सद्इच्छा भी व्यक्त की जा सकती है कि अब केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कम होगा और विपक्ष की आवाज को सत्ता गठबंधन द्वारा सम्मान दिया जाएगा। संभवतः विवेकानंद शिला का ही यह प्रताप और चमत्कार हो। संभवतः

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