मिसाल
देश में जब कोरोनाकाल चल रहा था तो लोग अपने-अपने घरों में महीनों तक कैद रहे। ऐसे में कई प्रतिभाएं निखरकर सामने आई थीं। पहाड़ पर निखरी ऐसी ही प्रतिभाआंे को धार देने का काम किया उत्तराखण्ड की चर्चित अध्यापिका द्वाराहाट निवासी मंजू आर शाह ने। मंजू प्रदेश में पीरूल के प्रयोग के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने अपनी कार्यकुशलता से प्रदेश की दर्जनों बेटियों को इस काबिल बना दिया है कि वे आज मिसाल बन रही हैं। कोरोनाकाल में मंजू द्वारा जो ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया गया उसके अब सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। जिनमें अल्मोड़ा और पौड़ी जनपदों की सीमा पर स्थित मानिला के चमखला गांव की गीता पंत का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। गीता ने मंजू आर शाह से ऑनलाइन ट्रेनिंग लेकर पीरूल को मानिला क्षेत्र में रोजगार का जरिया बना लिया है। गीता की पीरूल से बनाई गई चीजों की न केवल देश के कई राज्यों में मांग है, बल्कि अमेरिका से भी विशेष ऑर्डर आते हैं। गत रक्षाबंधन पर गीता की बनाई गई पीरूल की राखियांे को मुख्यमंत्री कार्यालय से भी मंगवाया गया। गीता मानिला क्षेत्र में कई लड़कियों को इसका प्रशिक्षण भी दे रही हैं। इस बाबत गीता को कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है
देवभूमि उत्तराखण्ड वन सम्पदा के क्षेत्र में बहुत ही समृद्ध है। यहां चीड़ के वन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। 500 से 2200 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत से पाए जाने वाले इस चीड़ के पेड़ों की पत्तियां यानी पीरूल अक्सर जमीन में बिखरी पड़ी रहती है। जिसे बेकार समझी जाने वाली चीजों में से एक माना जाता है। जो पीरूल हमारे जंगलों के लिए कभी अभिशाप बना रहता था, तो आज कुछ हुनरमंद लोगों ने उसे अपनी मेहनत से वरदान में बदल दिया है। फलस्वरूप पीरूल से अब फूलदान, टोकरी, कटोरिया और साजो-सज्जा का सामान बनाया जा रहा है जो लोगों को काफी पसंद भी आने लगा। इन उत्पादों की देश ही नहीं विदेशों में भी डिमांड हो रही है। उत्तराखण्ड में पिरूल के इस्तेमाल से महिलाएं प्लास्टिक और पर्यावरण प्रदूषण से तो छुटकारा पा ही रही हैं इसके साथ ही अब गांव में रहने वाली महिलाओं के लिए पीरूल आगे बढ़ने का और आर्थिक मजबूती का आधार भी बन रहा है। अल्मोड़ा के सल्ट ब्लॉक में मानिला के चमखला गांव की गीता पंत ने इस बाबत उल्लेखनीय कार्य किया है।
गीता पहाड़ों पर पिरूल को वरदान बनाने में जुटी हैं। वह पीरूल से कुल 14 उत्पाद तैयार कर रही हैं। गीता ने पीरूल से न केवल बालों के जूड़े के क्लिप, बल्कि तरह-तरह की टोकरियां, फ्लावर पॉट, पेन स्टैंड, कान के झुमके, टी कॉस्टर, वॉल हैंगिंग जैसे दर्जनों डेकोरेटिव आइटम बनाकर रोजगार की नई राह बना कर मिसाल पेश कर दी है। साथ ही गीता का आसपास की लड़कियों को पीरूल का प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने का अभियान भी जारी है। चमखला गांव में पंडिताई करने वाले मथुरा दत्त पंत के घर जन्मीं गीता पंत लाल बहादुर शास्त्री संस्थान हल्दूचौड़ से बीएड और स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर चुकी हैं। उनकी पैतृक खेती जंगली जानवरों के प्रकोप से बंजर हो चुकी है। चार-भाई बहनों में गीता सबसे छोटी है। गीता से बड़ा भाई बेरोजगार है और रोजगार की तलाश में अक्सर दिल्ली जाता रहता है। लेकिन गीता ने रोजगार की तलाश में शहरों का रुख करने के बजाय गांव में रहकर ही स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ाए। उनके इस प्रयास को खासा सराहा जा रहा है।
बकौल गीता पंत यह कोरोनाकाल की बात है। जब और लोगों की तरह मैं भी घर में खाली बैठी थी। कहते हैं कि खाली मन शैतान का घर होता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि खाली मन कला-कौशल की भी प्रयोगशाला होती है। मेरे भी मन में कुछ नया करने का विचार आया जिसमें मेरे सामने पीरूल की आग और उससे उत्पन्न होने वाली समस्या भी एक थी। पीरूल जैसे वेस्ट मटेरियल का सदुपयोग कैसे हो इसके कई वीडियो मैंने देखे जिससे उनका इंटरेस्ट इस तरफ बढ़ता गया। इसी दौरान मैं ताड़ीखेत में अध्यापिका मंजू आर शाह के सम्पर्क में आईं जो पीरूल के क्षेत्र में शानदार काम कर रही हैं। उनसे मैंने पीरूल के उत्पाद संबंधित ऑनलाइन ट्रेनिंग लेनी शुरू की। शुरुआती ट्रेनिंग लेने के बाद मैंने इस दिशा में आगे बढ़ने और अपनी कला को निखारने की योजना पर काम शुरू किया। मैंने पीरूल के उत्पाद बनाने शुरू किए। मेरे द्वारा पीरूल से तैयार किचन और ड्राइंग रूम के सजावटी आइटम की जबरदस्त डिमांड बढ़ने लगी। देखते ही देखते मुझे पीरूल के उत्पादों की डिमांड आने लगी। मैंने एक के बाद एक दर्जनों उत्पाद मार्किट में उतार दिए। पिछले 2 साल में रक्षाबंधन पर पीरूल की राखियों की बहुत डिमांड आ रही है। पीरूल की राखियों को उत्तराखण्ड और अन्य राज्यों के साथ- साथ विदेशों में रहने वाले भी पसंद कर रहे हैं।
गीता कहती हैं, ‘पिछले साल मुझे अमेरिका से पीरूल की राखियों की डिमांड आई। जिससे मुझे अच्छी खासी आमदनी हुई है।’ इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, गाजियाबाद, दिल्ली, देहरादून, नोएडा, फरीदाबाद से भी पीरूल की राखियों की डिमांड आती रहती है। गीता के लिए सबसे चौंकाने और उत्साहित करने वाला पल जब था तब देहरादून से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के यहां से फोन आया और ‘मुझसे पीरूल की सैकड़ों राखियां बनाने की मांग की गई। इसके बाद तो जैसे मेरे सपनांे को पंख लग गए।’
गीता कहती हैं कि ‘अब मैं हूप आर्ट भी तैयार कर रही हूं।’ इस आर्ट को लकड़ी पर धागों के साथ तैयार किया जाता है। फिलहाल गीता ने पीरूल से पहाड़ की महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने की मुहिम शुरू की है। जिसमंे वह कई लड़कियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करने की तरफ काम कर रही हैं। गीता का कहना है कि पीरूल जैसे वेस्ट मटेरियल को बेस्ट बनाने की इस मुहिम में और भी लड़कियों को साथ जोड़ना चाहती हूं जिससे कि गांव में रहने वाली लड़कियां आत्मनिर्भर हो सकें। गीता पंत ने ना केवल मानिला क्षेत्र में, बल्कि बासोट के सीन गांव में भी कई महिलाओं को पीरूल के उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग दी है। गीता को प्रोफेशनल तरीके से पीरूल ट्रेनर बनाने का बीड़ा अल्मोड़ा के कोसी स्थित पर्यावरण संस्थान ने उठाया है। जहां कई बार उसे और भी बेहतर परिणाम की बाबत प्रशिक्षित किया जा रहा है।
मेरी तपस्या को सफल बना रही है गीता
लॉकडाउन के वक्त जब सारे प्रवासी घर लौटने लगे थे, उनके पास रोजगार का कोई जरिया नहीं था, तब मन में विचार आया कि क्यों न अपने हुनर का प्रयोग करके लोगों को रोजगार से जोड़ने का प्रयास करूं। उस वक्त मुझे मेरे मित्र आदरणीय मोहन शर्मा जी ने सुझाव दिया कि आप पीरूल क्राफ्ट को ऑनलाइन भी सिखाएं क्योंकि कोरोना के कारण ऑफ लाइन ये कार्य संभव नहीं हो पा रहा। बस वहीं से मैंने ऑनलाइन क्राफ्ट की क्लास शुरू की जिसमें शिमला, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि के साथ ही अल्मोड़ा, चमोली, दिल्ली और नैनीताल के अनेक युवा और महिलाएं जुड़ी। मानिला की गीता पंत को भी मैंने ऑनलाइन कार्य सिखाया, उसके साथ ही उनको धागे और समान की भी जानकारियां सोशल मीडिया पर शेयर की। वह काफी अच्छा काम कर रहीं हैं। एक गुरु की तपस्या तब सफल होती है जब उसका शिष्य उससे आगे पहुंचे। मैं निरंतर इस कार्य को अन्य महिलाओं तक पहुंचा रही हूं, जिससे महिलाएं आत्मनिर्भर बन रहीं हैं। मेरी निरंतर कोशिश है कि मेरा यह कार्य राज्य शिल्प के रूप में अपनी पहचान बनाए।
-मंजू आर शाह, अध्यापिका और पहाड़ में पीरूल प्रयोग की विशेषज्ञ

