Uttarakhand

तपते पहाड़, जलते जंगल

उत्तराखण्ड के जंगल ट्टाू-ट्टाूकर जल रहे हैं। पहाड़ तप रहे हैं। चारों ओर धुआं ही धुआं है। दावाग्नि ने 10 लोगों को अपनी आगोश में ले लिया है। अल्मोड़ा के बिनसर में हुए अग्निकांड के बाद उत्तराखण्ड के जंगलों में लगने वाली आग एक बार फिर सुर्खियों में है। उत्तराखण्ड में इस तरह की घटनाएं साल-दर-साल होती है। हर साल सरकार और सिस्टम जंगलों को बचाने के लाख दावे करते हैं। उसके बाद भी जंगलांे में लगने वाली आग पर काबू नहीं पाया जाता है। हर बार आग लगने की घटना पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़कर सरकारी सिस्टम को मुंह चिढ़ाती नजर आती है

मौसम की तपिश के साथ उत्तराखण्ड के जंगलों की आग ने जो भयावह रूप ट्टाारण किया है उसने उत्तराखण्ड में सरकारी तंत्र की काहिली की पोल खोल दी है। जंगलों की आग से 10 मौतें, 1242 आग लगने की घटनाएं और 1696.32 हेक्टेयर जंगलों का जल जाना उत्तराखण्ड के उस वन विभाग का असली चेहरा सामने लाता है जिसकी जिम्मेदारी वनों और वन संपदा को बचाने की है। वनों की आग सिर्फ पेड़ों के जल जाने की सामान्य घटना नहीं होती इससे पूरा परिस्थिति (इको सिस्टम) प्रभावित होता है। मानव से लेकर जंगली जानवरों तक को वनों की आग प्रभावित करती है। लेकिन पिछले ढ़ाई महीने से जिस प्रकार जंगल जल रहे हैं उससे अगर कोई प्रभावित नहीं है तो वो है वन महकमें का पूरा तंत्र, जिस पर वनों को बचाने की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह ट्टाामी का वनों की आग पर सख्ती का जुबानी खर्च, वन मंत्री सुबोध उनियाल का पूरे परिदृश्य से गायब रहना और वन महकमे के शीर्ष अफसरों का नकारापन उत्तराखण्ड के उस वन विभाग की कहानी बयां कहता है जिसे इन वनों की सुरक्षा के एवज में भारत सरकार से ग्रीन बोनस चाहिए। बिनसर अभयारण्य में वनाग्नि से चार कर्मचारियों की मौत उस तंत्र की भी मौत है जिसने ऐसी परिस्थितियों को पैदा किया। अट्टिाकारियों का निलंबन, मृतकों को मुआवजा ये सब अफसलताओं को ढ़कने का तरीका मात्र है, सवाल जवाबदेही और उस तंत्र के पेंच कसने का है जो हर साल ऐसे हालातों को जन्म देता है और फिर माहौल सामान्य होने के बाद निद्रा में चला जाता है। न ही सरकार की और न ही उस नौकरशाही की जवाबदेही जिसने राजनीतिक नेतृत्व को अप्रासंगिक बना दिया है। राजनीतिक नेतृत्व को समझना होगा कि चुनाव जीत कर आप अपने केंद्रीय नेतृत्व के प्रति अपने राजनीतिक दायित्व की पूर्ति कर रहे होते हैं लेकिन आपकी असली जवाबदेही उस जनता के प्रति भी है जिसने उत्तराखण्ड की सत्ता आपको सौंपी है।

उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के विनसर अभयारण्य, जो कि रिजर्व फॉरेस्ट की श्रेणी में आता है, के जंगल में आग बुझाने गये 4 कर्मचारी जिंदा जल गये और 4 गंभीर रूप से घायल हो गये। आग बुझाने गये कर्मचारी और उनका वाहन सड़क के दोनों ओर लगी बेकाबू आग की चपेट में आ गये। गर्मी शुरू होने के साथ ही फायर सीजन घोषित होता है और फायर वाउचर रखे जाते हैं। लेकिन फायर वाउचर को आग बुझाने की सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकार नाकाम रही हैं। एक डंडे व कुछ गैन पानी लेकर वन की आग बुझाने निकले वनकर्मी शायद हालात की गंभीरता को समझ नहीं पाए। संसाट्टानों के अभाव में वनकर्मियों की जान को जोखिम में डालना वन विभाग के अधिकारियों की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाता है। आग बुझाने के लिए आट्टाुनिक उपकरण और फायरप्रूफ कपड़े वन विभाग की प्राथमिकताओं में शायद कभी नहीं रहे। कहने को तो वनाग्नि से जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग ने फॉयरक्रू स्टेशन स्थापित किए है लेकिन उसके बावजूद जंगल जल रहे हैं। ऐसे में ये क्रू महज शो पीस से ज्यादा कुछ नहीं है। तीन वर्षों में उत्तराखण्ड के जंगलो में आग लगने की घटनाओं पर नजर डालें तो पिछले 2022 में 2171 आग लगने की घटनाएं हुईं जिसमें 3416.2 हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ। 2023 में 718 आग लगने की घटनाएं हुईं जिसमें 862.41 हेक्टयर क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ। 2024 में अब तक 1242 से अधिक आग लगने की घटनाएं सामने आईं हैं जिसमें 1696.32 हेक्टयर वन आग से प्रभावित हुए हैं। इस दौरान 10 लोग अपनी जान गंवा बैठे है। गढ़वाल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ जनपद वनों में आग की घटना से प्रभावित होने वाले जिले हैं।

उत्तराखण्ड में वनाग्नि से जंगलों के जलने का इतिहास काफी पुराना है। जंगल की आग शायद उतनी ही पुरानी है जितने पुराने जंगल हैं। लेकिन मानव का जंगल के साथ सहअस्तित्व की भावना ने जंगल और इंसान के बीच उस परंपरा को कायम रखा जिसमें जंगल ने इंसान का और इंसान ने जंगल का ख्याल रखा। लेकिन बदलते समय के साथ सरकार जंगलों की मालिक हो गई और इंसान का रिश्ता जंगल से टूटता चला गया। वन महकमे के अधिकारियों के रूप में जंगल के मालिकों का एक नए वर्ग का उदय हुआ जो जंगल से सब कुछ ले लेना चाहता था लेकिन वो जंगल को वापस कुछ नहीं देना चाहता था। इसी जंगल से सब बुछ पा लेने की चाह ने कई भ्रष्ट नेताओं और अट्टिाकारियों की एक नई जमात खड़ी कर दी जिसकी रूचि सिर्फ जंगल के संसाधनों की लूट में थी। वन विभाग के अट्टिाकारियों का ये कुलीन तबका अपने वातानुकूलित दफ्तरों और घरों से बाहर निकलने की जहमत नहीं उठाता और संसाधन विहिन कर्मचारियों की जान जोखिम में डालकर फील्ड में जाने पर मजबूर करता है। उत्तराखण्ड राज्य बने 23 साल बीत चुके है लेकिन यहां कर्मचारियों की कमी अभी भी बनी हुई है। अल्मोड़ा जिले में ही रेंजर के 8 पद स्वीकृत हैं लेकिन 5 पद खाली हैं। डिप्टी रेंजर के 13 पदों के सापेक्ष 10 पद खाली हैं। वन दरोगा के 37 पदों के सापेक्ष 16 पद खाली है। वहीं वन रक्षक के 52 पदों के सापेक्ष 12 पद खाली हैं। पहले कर्मचारियों की कमी ऊपर से संसाधनों का अभाव कर्मचारियों की जान जोखिम में डालने के लिए है।

उत्तराखण्ड में नीतियां बनाने में काफी तेजी से काम होता है लेकिन ये नीतियां सिर्फ कागजों पर सीमित रह ट्टारातल पर उतरने को तरस जाती हैं। पीरूल जो कि जंगल की आग में सबसे ज्यादा भूमिका निभाता है के निस्तारण की कई योजनाएं आई लेकिन ट्टारातल पर आने के बाद वो दम तोड़ गई। पीरूल से बिजली बनाना, कोयला बनाना तेल निकालना जैसी योजनाओ का जमकर प्रचार हुआ लेकिन वहीं ढाक के तीन पात। इसी प्रकार फायर वाउचर व श्रमिकों का जीवन बीमा करने के लिए 41 में से 20 वन प्रभाग ही गंभीर नजर आए। 21 वन प्रभाग ने तो इसकी कोई जरूरत ही महसूस नहीं की। इसी प्रकार फायर सीजन शुरू होते ही फॉयर लाइन की सफाई जैसे काम हुए या नहीं देखने के लिए अट्टिाकारी फील्ड पर कभी गए ही नहीं।

फायर वाउचरों की समय से नियुक्ति नहीं कर पाने की वजह बजट आवंटन में देरी बताया जा रहा है। समय से फायर वाउचरों का भुगतान न होने के चलते भर्ती में देरी होती है जबकि वनाग्नि जैसी गंभीर समस्या के लिए पर्याप्त बजट की व्यवस्था फायर सीजन शुरू होने से पहले ही हो जानी चाहिए। बदलते समय के साथ वन विभाग को इससे निपटने के लिए आधुनिक तकनीक, फायर वाउचरांे को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित किया जाना चाहिए लेकिन वन विभाग की इसमें कोई रुचि नहीं है। उत्तराखण्ड में वनाग्नि को लेकर प्रमुख वन संरक्षक डॉ. ट्टानंजय मोहन का ये कथन एक बानगी है कि ‘मुख्यमंत्री के दिशा-निर्देश के क्रम में जंगल की आग से निपटने के लिए त्वरित और दीर्घकालिक कार्यों को लेकर कसरत की जा रही है।’ पीक फायर सीजन पर वन महकमे के मुखिया का ये बयान दर्शाता है कि वनाग्नि उनकी प्राथमिकताओं में कहां पर है।

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