Uttarakhand

बिनसर अग्निकांड में नाबालिग की भेंट, जिम्मेदार कौन?

  •       भारती पाण्डे

 

बिनसर वन्य जीव अभ्यारण्य में लगी आग में जलकर 4 कर्मचारी मौत का शिकार हो गए। ये चारों मौतें राज्य की व्यवस्था, जनता के लिए एक गंभीर सवाल हैं। पिछले कई वर्षों से राज्य में ज ंगल की आग की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। ग्रामीण, कर्मचारी और वन्य जीव इसका शिकार हो रहे हैं लेकिन प्रशासन की कोई ठोस नीति वनाग्नि से निपटने के लिए अभी तक नहीं बन पाई है। इतना ही नहीं वनाग्नि को लेकर शासन-प्रशासन इतना लापरवाह हो चुका है कि आग बुझाने के लिए वह संसाधन भी नहीं लगाना चाहता। बिनसर में हुए दर्दनाक हादसे के बाद प्रशासन पर कई प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। बिना फायर ब्रिगेड और बिना किसी पर्याप्त सुरक्षा उपकरण आग बुझाने के लिए वनकर्मियों व पीआरडी जवानों को भेजना और आग बुझाने गए इन कर्मियों के पास उपयुक्त जूते भी नहीं होना प्रशासन की संवेदनहीनता को सामने लाता है।

इन सब आरोपों के साथ ही एक चौंकाने वाला सवाल फिर प्रशासन पर उठ खड़ा हुआ है कि इस वनाग्नि में प्रशासन ने एक नाबालिग को भी मौत के मुंह में झोंक दिया है। दरअसल, मृतक करण कुमार ग्राम भेटुली अयारपानी को वन विभाग ने इस आग को बुझाने के लिए गठित टीम के साथ भेजा था जो कि अस्थाई फायर वॉचर के पद पर नियुक्त था। करण की उम्र पहले प्रशासन ने जानकारी देते हुए 21 वर्ष बताई थी लेकिन आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि के अनुसार वह मात्र 17 वर्ष का ही है। आधार कार्ड में उसकी जन्मतिथि 20 सितम्बर 2007 दर्ज है। ग्रामीणों के अनुसार करण ने इसी वर्ष अपनी इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की थी जिसके बाद से वह वन विभाग में फायर वॉचर के रूप में कार्य कर रहा था।

करण के नाबालिग होने के सवाल पर वन विभाग ने पर्दा डालने की पूरी कोशिश की। अब पूरा प्रशासन करण को अपना स्टाफ मानने से ही इंकार करने लगा है। वन विभाग ने पहले करण की उम्र 21 वर्ष बताई थी और जब उसकी उम्र 17 वर्ष होने की पुष्टि हुई तो प्रशासन ने कहना शुरू कर दिया कि वह फायर वॉचर के पद पर नियुक्त ही नहीं किया गया था। सवाल है कि वन विभाग की टीम के साथ वह अल्मोड़ा से लगभग 40 किलोमीटर दूर कैसे पहुंचा? इस पूरी घटना को लेकर स्थानीय जनता के रोष को प्रशासन के इस रवैये ने और बढ़ा दिया है। अल्मोड़ा के विभिन्न सामाजिक संगठनों ने परिवर्तन चौक, शिखर तिराहे से कैण्डल मार्च निकाला है।

गौरतलब है कि यूएनसीआरसी की गाइडलाइन के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र को बच्चे की श्रेणी में रखा गया है और इस उम्र में काम करवाना बालश्रम के अंर्तगत आता है जो कि एक दण्डनीय अपराधों में से एक है। साथ ही भारत के बालश्रम संशोधन विधेयक 2012 के अनुसार जहां 6 से 14 वर्ष के बच्चे को किसी भी प्रकार के श्रम में रखना वर्जित है, वहीं 14 से 18 साल के बच्चे को किसी भी खतरनाक काम में नहीं रखा जा सकता। अतः स्पष्ट तौर पर वन विभाग ने भारतीय दण्ड संहिता और यूएनसीआरसी की गाइडलाइन का उल्लंघन किया है।

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