Editorial

राजीव-लोंगोवाल समझौता

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-108

राजीव सरकार के समक्ष पहला बड़ा संकट मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से आया। तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे। 2 दिसम्बर, 1984 की रात भोपाल शहर की हवा अचानक ही जहरीली हो उठी। हवा का यकायक जहरीली होने का कारण यहां स्थित एक कीटनाशक बनाने वाली अमेरिकी कम्पनी यूनियन कार्बाइड के सयंत्र से बेहद जहरीली गैस-मिथाइल आईसोसाइनेट (Methyl Isocyanate) का रिसाव होना था। इस गैस-रिसाव के चलते भोपाल शहर का एक बड़ा हिस्सा ‘मुर्दों के शहर’ में तब्दील हो गया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस दुर्घटना में 3,787 लोगों की मौत हुई और 5,74,366 गम्भीर अथवा आंशिक रूप से अपंग हुए थे। भोपाल गैस त्रासदी का सबसे बड़ा कारण समय रहते राज्य सरकार द्वारा इस सयंत्र की जांच न करना रहा। भोपाल के एक साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘रपट’ के मालिक और सम्पादक राजकुमार केसरवानी काफी अर्से से अपने समाचारों के जरिए राज्य सरकार को अगाह कर रहे थे कि इस सयंत्र के कारण बड़ी तबाही आ सकती है। 17 अक्टूबर, 1982 को उन्होंने यूनियन कार्बाइड सयंत्र की बाबत अपनी पहली रपट ‘बचाइए हुजूर! इस शहर को बचाइए’ शीर्षक से प्रकाशित की थी। उन्होंने अपनी इस खोजी रपट में गैस रिसाव की आशंका को प्रमाण के साथ सामने रखा था।

केसरवानी के अनुसार, स्थानीय मुख्य धारा का मीडिया यूनियन कार्बाइड के शिकंजे में था, जिस कारण सब कुछ जानते हुए भी खामोश रहता था ‘वह (स्थानीय मीडिया) कार्बाइड की मेहरबानियों के बोझ तले दबा था और उसकी तरफदारी करता था। इस रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए यूनियन कार्बाइड इलेवन और खासतौर पर गठित जर्नलिस्ट्स इलेवन के बीच दोस्ताना मैच आयोजित किए जाते थे। जीत या हार का जश्न जमकर मनाया जाता था। बियर और शराब खुलकर बहाई जाती थी। मैंनेजमेंट की कामगार-विरोधी नीतियों या सुरक्षा के प्रति घोर लापरवाही के खिलाफ यूनियन के हर बयान को मालिक के खिलाफ कर्मचारियों की आम नारेबाजी मानकर खारिज कर दिया जाता था।’

इस सयंत्र से लगातार गैस लीक होने की घटनाओं को राज्य सरकार अनदेखा करती रही, जिसका भयावह नतीजा 2-3 दिसम्बर को सामने आया। मध्य प्रदेश सरकार ने यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष वारन एंडरसन को इस घटना के बाद गिरफ्तार किया था, लेकिन कुछ ही घंटों में उसे छोड़ दिया गया। तब राजीव गांधी सरकार पर आरोप लगा था कि अमेरिकी दबाव में आकर तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री नरसिम्हा राव ने मध्य प्रदेश सरकार को एंडरसन को तत्काल रिहा करने के आदेश दिए थे। अपनी आत्मकथा ‘ए ग्रेन ऑफ सेंड’ (A Gain of Sand) में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने इस बात की पुष्टि की है। इस गैस त्रासदी के बाद छाया चित्रकार पाब्सो बार्थाेलोम्यू और रघुराय द्वारा खींची गई दो हृदय विदारक तस्वीरों ने समूचे विश्व को दहलाने का काम किया था। पाब्लो और रघुराय की तस्वीरों में एक आधी दफन बच्ची को दिखाया गया था, जिसकी शिनाख्त नहीं की जा सकी थी। तस्वीर के लिए पाब्लो को 1984 का वर्ल्ड प्रेस फोटो अवार्ड मिला था।

दिसम्बर के अंत में देश में आम चुनाव हुए, जिसमें इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुई सहानुभूति लहर का भरपूर लाभ कांग्रेस को मिला और राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लोकसभा की 404 सीटों पर चुनाव जीत गई (पंजाब और असम में चुनाव नहीं कराए गए थे। दोनों ही प्रदेश तब तक ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किए जा चुके थे, जहां का माहौल चुनाव कराए जाने योग्य नहीं था। बहुत सम्भव है कि यदि तब इन दो प्रदेशों में भी चुनाव कराए जाते तो कांग्रेस को 404 से भी ज्यादा सीटें प्राप्त होतीं।) यह जनादेश आजाद भारत में किसी भी दल को मिला सबसे बड़ा जनादेश था, जो आज तक भी एक रिकॉर्ड बना हुआ है। जवाहरलाल नेहरू तक के नेतृत्व में कांग्रेस अधिकतम 317 सीटें जीत पाई थी। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 में कांग्रेस को जरूर 353 सीटों पर विजय मिली थी। सहानुभूति लहर के साथ-साथ इस जीत का श्रेय कांग्रेस द्वारा एक विज्ञापन कम्पनी रेडीफ्यूजन की मदद से चलाए गए चुनावी कैम्पेन को जाता है।

राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सोच पुरानी कांग्रेस से ठीक उलट थी। राजीव के दो सबसे करीबी सलाहकारों अरुण सिंह और अरुण नेहरू ने कांग्रेस के चुनावी कैम्पेन को कॉरपोरेट तरीके से संचालित करने के लिए रेडीफ्यूजन कम्पनी को चुना। इस कम्पनी ने भारतीय चुनावों की दिशा बदलने का काम कर दिखाया। कांग्रेस द्वारा जारी विज्ञापनों और नारों में अलगाववाद को मुख्य मुद्दा बनाया गया था, जिसने पंजाब और पूर्वाेत्तर के राज्यों में तेजी से फैल रहे अलगाववाद से चिंतित वोटर को अपनी तरफ आकर्षित करने में सफलता पाई। ‘राजीव गांधी का ऐलान, नहीं बनेगा खालिस्तान’ सरीखे लोकलुभावन नारे और मध्यम वर्ग की दुश्चिंताओं को रेखांकित करने वाले विज्ञापनों में विपक्षी दलों को सत्तालोलुप नेताओं का गठजोड़ साबित करने में रेडीफ्यूजन सफल रहा था। कांग्रेस ने इस कैम्पेन के लिए आठ करोड़ रुपए बतौर फीस रेडीफ्यूजन को दिए थे। आने वाले समय में सभी राजनीतिक दलों ने इस कॉरपोरेट स्टाइल चुनावी कैम्पेन को अपने ‘धारणा पैदा करने वाले’ (Perception creation) खेल की ऐसी रेस शुरू कर डाली, जिसने वर्तमान में सच और झूठ के अंतर को समाप्त कर चुनावों की धारणाओं के मकड़जाल में फंसा डाला है।

प्रचंड बहुमत पाने के बाद राजीव गांधी ने असीम आत्म विश्वास और ऊर्जा के साथ सबसे पहले पंजाब की समस्या को सुलझाने के लिए अकाली नेताओं के साथ समझौता वार्ता शुरू की। इस समझौते से ठीक पहले खालिस्तानी समर्थकों ने एक बड़ी आतंकी घटना को अंजाम दे डाला था। 23 जून, 1985 के दिन कनाडा के शहर मॉनिट्रयल से लंदन (ग्रेट ब्रिटेन) के लिए उड़ान भरने वाला एयर इंडिया का बोइंग कनिष्क (फ्लाइट संख्या 182) जब अटलांटिक महासागर के ऊपर था, तब एक बम विस्फोट के चलते हवा में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में सवार सभी 329 यात्री मारे गए थे। कनाड़ा में रह रहे बब्बर खालसा और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन से जुड़े कुछ सिखों ने जनरैल सिंह भिंडरावाले के ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भारतीय सेना के हाथों मारे जाने का प्रतिशोध लेने के लिए इस आतंकी घटना को अंजाम दिया था।

राजीव गांधी हर कीमत पर पंजाब में शांति बहाल करने के प्रबल पक्षधर थे। इस नीयत से 24 जुलाई, 1985 को केंद्र सरकार और शिरोमणी अकाली दल के मध्य एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते को ‘राजीव-लोंगोवाल समझौता’ कहा जाता है। समझौते में सैद्धांतिक तौर पर चंडीगढ़ पंजाब को दिए जाने और इसकी एवज में पंजाब के हिंदीभाषी इलाकों को चिन्हित कर हरियाणा में शामिल किया जाना, इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् हुए दंगों की जांच के लिए बने रंगनाथ मिश्रा आयोग की जांच का दायरा बढ़ाते हुए दिल्ली के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के कानपुर और बिहार के बोकारो (अब झारखण्ड का हिस्सा) में हुए दंगों की जांच करना, इन दंगों के बाद सेना में हुए विद्रोह में शामिल सिख सैनिकों का पुनर्वास, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के मध्य जल के बंटवारे का पंजाब की जरूरतों अनुसार समाधान निकाला जाना और सेना में सिखों को उनकी योग्यतानुसार बगैर किसी भेदभाव के शामिल करना जैसे मुद्दे शामिल थे। अकाली नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल, सुरजीत सिंह बरनाला और बलवंत सिंह ने इसे ऐतिहासिक समझौता और पंजाब की जीत के तौर पर पेश किया, लेकिन गुरचरण सिंह तोहड़ा और प्रकाश सिंह बादल ने इसे सिरे से खारिज कर डाला। यह समझौता कभी भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। हरचरण सिंह लोंगोवाल समझौते के पक्ष में माहौल बनाने के उद्देश्य से पंजाब का बड़े पैमाने पर दौरा करने लगे थे।

20 अगस्त, 1985 को संगकर शहर में एक सभा को सम्बोधित कर रहे लोंगोवाल की भिंडरावाले समर्थक आतंकियों ने हत्या कर दी थी। सितम्बर में इस समझौते के अनुसार, पंजाब में विधानसभा चुनाव कराए गए। इन चुनावों में लोंगोवाल को अकाली दल ने बतौर शहीद घोषित कर अपने पक्ष में सहानुभूति पाने की रणनीति अपनाई, जिसका उसे भारी लाभ मिला। पहली बार अपने दम पर पंजाब में अकालियों की सरकार स्थापित हुई, लेकिन आतंकवाद थमा नहीं। इस समझौते के अनुसार, चंडीगढ़ शहर पंजाब के हवाले किया जाना था। केंद्र सरकार ने पंजाब के हिन्दीभाषी इलाकों को चिन्हित करने के लिए 1986 में उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश इ.एस. वेंकटरमैय्या की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया, जिसने चंडीगढ़ की एवज में 70 हजार एकड़ जमीन हरियाणा को दिए जाने की सिफारिश केंद्र सरकार से की थी। यह आज तक सम्भव नहीं हो पाया है और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बना हुआ है। अन्य मसलों पर भी गतिरोध बने रहने के चलते ‘राजीव-लोंगोवाल’ समझौता मात्र कागजों तक ही सिमटकर रह गया।

15 अगस्त, 1985 के दिन राजीव गांधी की उपस्थिति में केंद्र सरकार और असम के आंदोलरत छात्रों के मध्य ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसने लम्बे समय से ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किए जा चुके राज्य में शांति बहाल करने और 1979 से चले आ रहे छात्र- आंदोलन की समाप्ति और इस दौरान पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया। असमी छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) राज्य में आ बसे गैर- असमियों को चिन्हित करने, उनके मताधिकार को समाप्त करने और उन्हें राज्य से बाहर करने की मांगों को लेकर 1979 से ही आंदोलनरत था। ‘आसू’ और एक अन्य संगठन ‘ऑल असमगण संग्राम परिषद्’ के नेताओं के साथ किए गए इस समझौते में केंद्र सरकार ने बांग्लादेश के गठन के दौरान 1971 में भारी संख्या में असम में आ बसे बंगाली हिंदू और मुसलमानों को चिन्हित कर उन्हें असम से बाहर किए जाने पर सहमति दे दी। ‘आसू’ ने सरकार की बात मानते हुए जनवरी, 1966 तक असम में आ बसे गैर असमियों को भी चिन्हित कर राज्य से बाहर निकाले जाने की अपनी मांग त्याग दी। इस समझौते में जनवरी, 1966 से मार्च, 1971 के मध्य असम में शरण लिए लोगों की बाबत सहमति बनी थी कि इन्हें चिन्हित किया जाएगा और इनको मताधिकार से दस बरस के लिए वंचित किया जाएगा। दस बरस बाद इन्हें भारत की नागरिकता दिए जाने और मत डालने का अधिकार होगा। यह भी तय हुआ कि मार्च, 1971 के बाद आए शरणार्थियों को चिन्हित कर उन्हें असम से बाहर निकाल दिया जाएगा।

क्रमशः

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