सार्वजनिक जीवन में शुचिता, नैतिकता और पारदर्शिता के प्रबल समर्थक विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने स्वघोषित आदर्शों पर टिके नहीं रह पाए। कश्मीर उनकी सरकार के लिए दिनों-दिन विकराल समस्या बनता जा रहा था और उनकी प्रशासनिक क्षमता को लेकर शंकाएं सिर उठाने लगीं थीं। इसी दौरान मात्र ढाई माह पुरानी सरकार के समक्ष एक नया संकट आ खड़ा हुआ, जिसके चलते सरकार का अस्तित्व ही संकट में आ गया। इस संकट की जड़ में हरियाणा में एक विधानसभा उपचुनाव रहा।
यह विधानसभा उपचुनाव हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल के मुख्यमंत्री पद और विधायकी से इस्तीफा देकर विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में उपप्रधानमंत्री बनने के चलते हुआ था। चौधरी देवीलाल ने अपने स्थान पर हरियाणा का मुख्यमंत्री अपने पुत्र ओेमप्रकाश चौटाला को बनाया था। चौटाला चूंकि विधायक नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने पिता द्वारा खाली की गई महम विधानसभा से उपचुनाव लड़ा। महम विधानसभा जाट बाहुल्य सीट रही है। हरियाणा राज्य के गठन के बाद से ही यहां से हमेशा जाट समुदाय के प्रत्याशी चुनाव जीतते रहे हैं। रोहतक जिले की नौ विधानसभा सीटों में से एक महम हालांकि चौधरी देवीलाल का गृहक्षेत्र नहीं था, लेकिन वे यहां से लगातार तीन बार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बना चुके थे। देवीलाल मूल रूप से सिरसा जिले के चौटाला गांव के थे। उन्होंने महम की जनता से वायदा किया था कि यदि कभी वे यहां से चुनाव नहीं लडे़ंगे तो वे किसी स्थानीय प्रत्याशी को अपना समर्थन देंगे, लेकिन अपना वादा वे भूल गए और फरवरी, 1990 में हुए उपचुनाव में उन्होंने अपने बेटे और राज्य के नए मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को बतौर जनता दल प्रत्याशी मैदान में उतार दिया। देवीलाल का यह फैसला महम के लोगों को खासा नागवार गुजरा।
हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष और देवीलाल के अति निकट जनता दल के नेता आनंद सिंह डांगी ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए आयोग से इस्तीफा देकर बतौर
निर्दलीय प्रत्याशी अपना नामांकन दाखिल कर इस चुनाव को भीतरी बनाम बाहरी में बदल डाला था। डांगी के पक्ष में इस विधानसभा क्षेत्र के 24 गांवों की पंचायत ‘महम चौबीसी’ ने अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इससे तिलमिलाए मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के समर्थकों ने चुनाव के दिन 27 फरवरी, 1990 को मतदान केंद्रों पर जबरन चौटाला के पक्ष में फर्जी मतदान करने का काम किया। चुनाव आयोग ने आठ मतदान केंद्रों पर बडे़ पैमाने पर हुई धांधली की शिकायतों के बाद अगले दिन 28 फरवरी को इन केंद्रों पर पुनर्मतदान कराए जाने का फैसला किया था। 28 फरवरी को चौटाला के समर्थकों ने इन मतदान केंद्रों पर भारी हिंसा को अंजाम दे डाला, जिसमें 10 लोगों की मौत हो गई। चुनाव आयोग ने इस हिंसा के बाद महम विधानसभा चुनाव को रद्द कर दिया। देशभर में इस घटना की भारी निंदा की गई और चौटाला के इस्तीफे की मांग उठने लगी थी, जिससे व्यथित और अपनी छवि के प्रति सतर्क रहने वाले वी.पी. सिंह ने ओमप्रकाश चौटाला को हटाने का निर्णय लिया।
16 मार्च, 1980 को जनता दल के राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक बुलाई गई, जिसमें महम कांड को लेकर हुई बहस के दौरान देवीलाल भड़क उठे और उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने की धमकी देते हुए बीच बहस के दौरान ही मीटिंग का बहिष्कार कर दिया। कुछ ही समय बाद उनका लिखित इस्तीफा प्रधानमंत्री के पास पहुंच गया, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक मूल्यों के पक्षधर वी.पी. सिंह कठोर निर्णय लेने में चूक गए और उन्होंने देवीलाल का इस्तीफा अस्वीकार कर दिया और ओमप्रकाश चौटाला को भी मुख्यमंत्री बनाए रखा गया। 27 मई, 1990 को महम में दोबारा चुनाव कराए गए थे। इस उपचुनाव से 10 दिन पूर्व एक निर्दलीय प्रत्याशी की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। ओमप्रकाश चौटाला के विरोधियों ने इस हत्या के लिए उन्हें जिम्मेवार करार देते हुए एक बार फिर से उनके इस्तीफे की मांग उठानी शुरू की तो दूसरी तरफ चौटाला ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी आनंद सिंह डांगी को इस हत्या का आरोपी करार देकर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस बल रवाना कर दिया। इस पुलिस बल संग डांगी समर्थकों के टकराव में पुलिस फायरिंग के चलते तीन डांगी समर्थक मारे गए और निर्दलीय प्रत्याशी की हत्या के चलते महम उपचुनाव एक बार फिर से रद्द कर दिया गया।
देशभर में महम के घटनाक्रम को लेकर जनता दल और वी.पी. सिंह की निंदा के स्वर उठने लगे, जिससे व्यथित वी.पी. सिंह ने चौटाला को हठाए जाने का फैसला अंततः ले ही लिया। 22 मई, 1990 के दिन देवीलाल के करीबी बनारसीदास गुप्ता ने हरियाणा के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी था। चौटाला ने महम विधानसभा सीट के अलावा एक अन्य सीट से भी उपचुनाव लड़ा था। 27 मई को इस सीट से चौटाला निर्वाचित घोषित कर दिए गए। देवीलाल अब फिर से अपने पुत्र को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग करने लगे थे। वी.पी. सिंह और देवीलाल के मध्य इस विषय को लेकर एक बैठक हुई। वी.पी. सिंह के करीबी नेता सोमपाल ने इस बैठक से पहले ही प्रधानमंत्री को आगाह कर दिया था कि देवीलाल चौटाला को मुख्यमंत्री बनाए जाने का मुद्दा उठाएंगे। सोमपाल को उम्मीद थी कि वी.पी. सिंह ऐसा करने से स्पष्ट इनकार कर देंगे, लेकिन हुआ ठीक उलट। बैठक के बाद देवीलाल ने सोमपाल शास्त्री को कहा-‘बहुत बढ़िया काम किया तुमने।’ यह बहुत भला आदमी है। मेरा दिमाग ऐसे ही खराब कर रखा था लोगों ने। जो मैंने कहा- उसने सारी बात मान ली।
12 जुलाई, 1990 को बनारसीदास गुप्ता ने हरियाणा के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और शाम के समय चौटाला ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले डाली। जनता दल के भीतर इस घटनाक्रम के चलते भारी असंतोष पैदा हो गया और केंद्र सरकार का अस्तित्व संकट में आ गया। सरकार में शामिल चार मंत्रियों आरिफ मोहम्मद खान, अजीत सिंह, सतपाल मलिक और अरुण नेहरू ने चौटाला को दोबारा मुख्यमंत्री बनाए जाने का विरोध करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने की घोषणा कर डाली। दबाव में आए वी.पी. सिंह ने पहले तो अपने सहयोगियों को ऐसा करने से रोकने का प्रयास किया। अजीत सिंह इसके लिए तैयार भी हो गए, लेकिन आरिफ मोहम्मद खान, अरुण नेहरू और सतपाल मलिक अपने इस्तीफों को वापस लेने के लिए राजी नहीं हुए। वी.पी. सिंह ने तब मास्टर स्ट्रोक चलकर खुद भी इस्तीफा देने का निर्णय ले लिया, लेकिन उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेजने के बजाए जनता दल के अध्यक्ष एस.आर. बोम्मई को सौंप एक बड़ी राजनीतिक चाल चली। पूर्व में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अथवा राजीव सरकार में रक्षामंत्री रहते उन्होंने अपना इस्तीफा राज्यपाल अथवा प्रधानमंत्री को भेजा था। इस बार भी यदि वे प्रधानमंत्री पद छोड़ने के प्रति गम्भीर होते, तो इस्तीफा सीधे तत्कालीन राष्ट्रपति को सौंपते, लेकिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को त्याग पत्र भेज राजनीतिक सौदेबाजी का मार्ग चुना।
देवीलाल अब खुले तौर पर अपनी ही सरकार और सरकार में शामिल मंत्रियों के खिलाफ उतर आए थे। उन्होंने अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाकर जनता दल की आंतरिक रार को गहरा डाला। तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने इस पूरे प्रकरण को अपनी आत्मकथा में बड़े रोचक तरीके से बयां किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि वी.पी. सिंह अपने इस्तीफे को लेकर गम्भीर नहीं थे और अपने सहयोगियों के मध्य चल रही लड़ाई को सरकार गिर जाने का भय दिखाकर शांत करना चाहते थे। बकौल वेंकटरमण ‘राष्ट्रीय मोर्चा और देशभर में तीखी प्रतिक्रियाओं के चलते विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 14 जुलाई को पार्टी अध्यक्ष एस.आर. बोम्मई को एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री पद से त्याग पत्र देने की इच्छा व्यक्त की और आग्रह किया कि पार्टी के संसदीय दल की बैठक नया नेता चुनने के लिए बुलाई गई। इसी शाम प्रधानमंत्री मुझसे मिले और पार्टी अध्यक्ष को त्याग पत्र भेजे जाने के कारणों से अवगत कराया। उन्होंने मुझसे कहा कि ‘यदि वे सीधे मुझे अपना त्याग पत्र भेज देते तो सरकार की जिम्मेदारी संभालने वाला कोई भी नहीं बचता, इसलिए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष से संसदीय दल का नेता चुनने का आग्रह किया, ताकि नए नेता के चयन के बाद वे मुझे अपना इस्तीफा भेज सकें… बातचीत के दौरान मैंने प्रधानमंत्री से उनकी प्रस्तावित सोवियत संघ की यात्र की बाबत जानना चाहा कि क्या सोवियत संघ जैसे महत्वपूर्ण देश के लिए चार दिन की यात्रा का समय कम नहीं है? विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने उत्तर में यह नहीं कहा कि अब चूंकि वे अपना त्याग पत्र दे चुके हैं, इसलिए यात्र करने का प्रश्न ही नहीं उठता। उन्होंने इसके विपरीत यह कहा कि चार दिन का समय काफी है। स्पष्ट था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जानते थे कि उनकी पार्टी में चल रहा संकट सुलझ जाएगा और वे अपने पद पर बने रहेंगे।’
पार्टी नेताओं ने अंततः ओमप्रकाश चौटाला को दोबारा इस्तीफा देने के लिए मना लिया। देवीलाल इसके बाद पूरी तरह से बागी हो गए। उन्होंने अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ-साथ विश्वनाथ प्रताप सिंह को सार्वजनिक रूप से अपमानित और आरोपित करना शुरू कर दिया था। उन्होंने अंग्रेजी पत्रिका ‘इलसटेªटेड विकली ऑफ इंडिया’ को जुलाई, 1990 के अंत में एक साक्षात्कार दिया, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री को ‘रीढ़विहीन’ और उनके मंत्रियों को ‘नालायक’ और ‘कायर’ करार दिया।’
वी.पी. इस दौरान सोवियत संघ की यात्रा पर थे। उनके भारत वापस पहुंचते ही 1 अगस्त, 1990 को देवीलाल केंद्र सरकार से बर्खास्त कर दिए गए जिसके चलते जनता दल के भीतर सत्ता-संघर्ष तेज होने लगा और सरकार की स्थिरता पर सवाल खडे़ होने लगे।

