‘आसू’ नेताओं ने इस समझौते के बाद अपनी राजनीतिक पार्टी ‘असम गण परिषद्’ का गठन कर अक्टूबर, 1985 में हुए विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास रचने का काम कर दिखाया। 126 विधानसभा सीटों में से असम गण परिषद को 92 सीटों पर विजय हासिल हुई। कांग्रेस मात्र 26 सीटें ही जीत पाई थी। ‘आसू’ के प्रफुल्ल कुमार महंता मात्र 32 बरस की उम्र में विश्वविद्यालय से सीधे मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने वाले पहले नेता बन गए। इस समझौते और उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में असम गण परिषद की जीत के बाद राज्य में शांति अवश्य बहाल हुई, लेकिन आज तक असम समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन कर एक बार फिर से असम में जनाक्रोश को उभार दिया। असम समझौते में स्पष्ट कहा गया था-Foreigners who came to after 1.1.1966 (inclusive and up to 24th March, 1971) shall be detected in accordance with the provisions of the foreigners Act, 1946 and the Foreigners (Tribunals) order 1964. 1 जनवरी, 1966 के बाद और 24 मार्च, 1971 तक जो भी विदेशी असम में आए होंगे, उन्हें विदेशी नागरिक कानून 1946 तथा विदेशी (प्राधिकरण) आदेश, 1964 के अंतर्गत चिन्हित किया जाएगा।
स्पष्ट है कि इस समझौते के अनुसार असम में 1966 से मार्च 1971 तक आ बसे घुसपैठियों को चिन्हित किया जाना और उनके मताधिकार को समाप्त करना शामिल है। 2019 में नागरिकता कानून में संशोधन किया गया और यह व्यवस्था की गई कि 24 मार्च, 1971 के बजाए 31 दिसम्बर, 2014 तक भारत में आए शरणार्थियों (मुसलमानों को छोड़कर) को भारत की नागरिकता दे दी जाएगी। असम में इस संशोधित कानून का जमकर विरोध हुआ है। असम आंदोलन के दौरान घुसपैठियों को उनके धर्म के आधार पर चिन्हित नहीं किया गया था। अपनी संस्कृति और भाषायी पहचान को बचाए रखने के लिए मूल असमियों की मांग बाहर से आए घुसपैठियों को राज्य से बाहर किए जाने की थी। इस संशोधन के चलते बांग्लादेशी हिंदुओं और अन्य धर्म के लोगों को असम में बने रहने का अधिकार मिल जाता है। यही कारण है कि 2019 में इस नागरिकता संशोधन कानून का असम में जबरदस्त विरोध देखने को मिला।
राजीव गांधी की लोकप्रियता इन दो समझौतों के बाद तेजी से बढ़ने लगी और उनकी कार्यशैली और पारदर्शी शासन-व्यवस्था को लागू करने के उनके प्रयास जनता द्वारा सराहे जाने लगे थे। जून, 1985 में राजीव उड़ीसा के अकालग्रस्त क्षेत्र कालाहांडी का दौरा करने गए। वहां के हालात देखकर वे अचम्भित रह गए। तब व्यथित राजीव ने भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हुए कह डाला था कि सरकार जब भी 1 रुपया खर्च करती है, तो लोगों तक 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। देश में बहुत भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार ग्रासरूट लेवल पर है, जिसे दिल्ली में बैठकर दूर नहीं किया जा सकता। कालाहांडी के हालात राजीव के लिए आंख खोलने वाले थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम 27 दिसम्बर, 1985 को बम्बई (अब मुम्बई) में आयोजित किया गया था। राजीव ने अपने अध्यक्षीय भाषण में सर्वत्र पसर चुके भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, सामाजिक तनाव, धार्मिक अलगाव आदि मसलों पर खुलकर अपनी बात कही। उनका यह भाषण आश्चर्यजनक रूप से बेहद ईमानदारी पूर्वक दिया गया ऐसा वक्तव्य था, जिसने उनकी छवि बतौर मिस्टर क्लीन-स्थापित कर डाली। राजीव ने कहा-‘हम भारत की एकता का उत्सव मनाते हैं। यह बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या यह भी सच नहीं कि हमसे ज्यादातर दिन-प्रतिदिन के जीवन में खुद को भारतीय नहीं मानते हैं? हम खुद को हिंदू, मुसलमान, ईसाई या फिर मलयाली, मराठी अथवा बंगाली के रूप में देखते हैं। इससे भी बदतर यह कि हम खुद को ब्राह्मण, ठाकुर, जाट, यादव इत्यादि के तौर पर मानते हैं…हम धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रवाद की संर्कीणता के दायरों में कैद रहकर एक विकासशील राष्ट्र की राह को बाधित कर रहे हैं… हमारे सरकारी कर्मचारी सेवा भाव से कोसों दूर हैं। वे गरीबों और असहायों पर अत्याचार करते हैं। पुलिस है, जो कानून का अनुपालन करने के बजाय अपराधियों को संरक्षण देती है। राजस्व प्राप्त करने का काम ईमानदारी से नहीं किया जाता है, बल्कि ऐसों को संरक्षण दिया जाता है, जो देश के संग धोखाधड़ी करते हैं और जिनका एकमात्र उद्देश्य समाज की कीमत पर स्वयं का कल्याण करना है।’
अपने इस सम्बोधन में राजीव गांधी कांग्रेस की कमियों पर भी जमकर बोले थे। उन्होंने कहा-‘अभी तक हम बाहर वालों को देख रहे थे। चलिए, अब जरा आत्मनिरीक्षण करते हैं। हमारे महान संगठन की कैसी स्थिति हो गई है? देश के कोने-कोने में मौजूद, जनता की आशाओं और अपेक्षाओं को विस्तार देने वाला संगठन आज सिकुड़ गया है और लाखों-करोड़ों मेहनतकशों के साथ सम्पर्क खो बैठा है…देशभर में मौजूद कांग्रेस के लाखों कार्यकर्ता आज भी पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों के प्रति उत्साह से लबरेज हैं, लेकिन उन्हें सत्ता के दलालों ने पंगु बना डाला है। ये सत्ता के दलाल एक जनांदोलन से निकली पार्टी को कुलीन सामंती तंत्र बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोग केवल खुद को आगे बढ़ाने का काम करते हैं और इसके लिए जाति और धर्म का सहारा लेते हैं। इन लोगों के कारण ही कांग्रेस सरीखा जीवंत संगठन कमजोर हो रहा है। ऐसे लोगों के लिए आम जनता कोई मायने नहीं रखती है। उनकी जीवनशैली, उनकी सोच, उनका भ्रष्ट आचरण कांग्रेस की विचारधारा संग मेल नहीं खाते हैं। ऐसे लोग कांग्रेस को खोखला कर रहे हैं, जिसका नतीजा है कि आज कांग्रेस के भीतर सेवा और बलिदान की भावना समाप्त हो चुकी है।’
लोकप्रियता के शिखर पर बैठे राजीव की बाबत अमेरिकी पत्रकार जैक एंडरसन का मानना था-‘उनकी करिश्माई क्षमता अमेरिकी राष्ट्रपति रहे जाॅन.एफ. कैनेडी के समान है।’
इस लोकप्रियता को पहला झटका उच्चतम न्यायालय के एक ऐसे निर्णय से लगा, जिसका सीधे राजीव गांधी अथवा कांग्रेस से कोई वास्ता नहीं था। मामला एक मुस्लिम महिला शाहबानो बेगम और उसके पति मोहम्मद अहमद खान के मध्य तलाक के बाद दिए जाने वाले गुजारे भत्ते को लेकर शुरू हुआ था। इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी शाहबानो का निकाह 1932 में मोहम्मद अहमद खान के साथ हुआ था। इस निकाह से दोनों को पांच संतानें हुई थीं। 1946 में मोहम्मद अहमद खान ने दूसरा निकाह कर लिया। इस दूसरे निकाह के बाद कई बरसों तक अहमद खान दोनों पत्नियों के साथ रहते रहे। 1975 में घरेलु झगड़ों के चलते अहमद खान ने शाहबानो बेगम को घर से निकाल दिया था। 1978 में शाहबानो बेगम ने इंदौर की एक अदालत में गुजारा भत्ता दिलाए जाने की मांग करते हुए अहमद खान के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज कराया। इस मुकदमे के दर्ज होते ही अहमद खान ने 62 वर्षीय शाहबानो बेगम को तलाक दे डाला, साथ ही उन्होंने मुस्लिम पर्सनल कानून का हवाला देते हुए अदातल में 3000 रुपए बतौर मेहर की रकम भी जमा करा दी। मुस्लिम पर्सनल लाॅ के अनुसार, तलाक के समय मेहर की रकम अदा करने के बाद पति द्वारा अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा- भत्ता देने की कोई व्यवस्था नहीं है। मेहर निकाह के समय दोनों पक्षों के मध्य तय की गई वह धनराशि है जिसे पति अपनी पत्नी को देने का वचन देता है। हालांकि यह नकदी के अतिरिक्त चल- अचल सम्पत्ति के रूप में भी दी जा सकती है। मेहर का सीधा कोई वास्ता गुजारा भत्ता दिए जाने से नहीं है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता ;ब्वकम वि ब्तपउपदंस चतवबमकनतमद्ध की धारा 125 में पत्नी, संतान और माता-पिता के भरण-पोषण का प्रावधान किया गया है। शाहबानो बेगम ने इसी धारा 125 के अंतर्गत अहमद खान पर एक मुकदमा दायर किया था, जिसमें प्रतिमाह दो सौ रुपए बतौर गुजारा भत्ता दिए जाने की मांग की गई थी। निचली अदालत ने मोहम्मद अहमद खान के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि तलाकशुदा पत्नी को मुस्लिम पर्सनल लाॅ के अनुसार मेहर के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार का गुजारा भत्ता दिए जाने का प्रावधान नहीं है। न्यायालय ने अहमद खान को प्रतिमाह बतौर रुपए 25 गुजारा भत्ता दिए जाने का आदेश दिया था। कम गुजारा भत्ता पाने से असंतुष्ट शाहबानो बेगम ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में अपील दायर की। 1980 में उच्च न्यायालय ने इस गुजारे भत्ते को बढ़ाकर रुपए 179.20 प्रतिमाह करने का निर्णय सुनाया। मोहम्मद अहमद खान इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ कर रहे थे, ने 23 अप्रैल, 1985 को अपना फैसला सुनाते हुए निचली अदालत एवं उच्च न्यायालय के फैसले को जायज ठहराया था।
उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक ‘कुरआन’ के हवाले से यह स्थापित करने का प्रयास किया कि ‘कुरआन’ में तलाकशुदा स्त्री को उसके पति द्वारा मदद किए जाने की बात कही गई है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा- ‘अपीलकर्ता का तर्क है कि तलाकशुदा पत्नी यदि अपना भरण- पोषण करने में असमर्थ हो तब भी मुस्लिम पर्सनल लाॅ के अनुसार, अपनी तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व पति के लिए केवल इद्दत की अवधि तक सीमित है। यह तर्क असंगत है, अतः खारिज किया जाता है। सही स्थिति यह है कि यदि तलाकशुदा पत्नी अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है, तो पति का उसके प्रति दायित्व इद्दत की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है, लेकिन यदि वह (तलाकशुदा पत्नी) अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है तो वह धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लाॅ के मध्य कोई विरोधाभास नहीं है। ‘पवित्र कुरआन’ से बढ़कर इस प्रश्न पर कोई कुछ नहीं कह सकता है। ‘कुरआन’ में 114 सूरह (अध्याय) हैं, जिनमें वह सभी सत्य मौजूद हैं, जो अल्लाह ने पैगम्बर मुहम्मद को कहे थे। इस पुस्तक की आयतों में पैगम्बर ने स्पष्ट कहा है कि मुस्लिम पति अपनी तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण के लिए जिम्मेवार रहेगा…इन आयतों की बाबत मोहम्मद जफरउल्लाह खान की अनुदित पुस्तक ‘कुरआन’ में लिखा गया है कि-तलाकशुदा महिला के लिए भी जो जायज है, उसकी व्यवस्था करनी होगी। यह सभी सही और नेक बंदों पर बाध्यकारी है। इसलिए अल्लाह ने अपने बंदों के लिए फरमान सुनाया है।’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश में संविधान के अनुच्छेद 44 का जिक्र करते हुए खेद प्रकट किया है कि समान नागरिक संहिता बनाने को लेकर कोई भी प्रयास नहीं किए गए हैं। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मुस्लिम पर्सनल लाॅ में भी सुधार किए जाने की बात कह डाली। सुप्रीम कोर्ट का आदेश मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ी राहत लेकर आया, लेकिन जल्द ही इस पर भारी सियासत शुरू हो गई। मुस्लिम धार्मिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को मुस्लिम पर्सनल कानून और इस्लाम में दखलअंदाजी करार देते देर नहीं लगाई।