यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से कुछ सीटों को अति विशिष्ट माना गया है। खासतौर से पीएम के संसदीय क्षेत्र बनारस, गृहमंत्री राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र लखनऊ और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पूर्व संसदीय क्षेत्र गोरखपुर। हालांकि उप चुनाव में गोरखपुर में मिली हार ने भाजपा की खूब किरकिरी की है लेकिन इस बार भाजपा इन क्षेत्रों को किसी कीमत पर अपने हाथ से नहीं जाने देगी। साफतौर कहा जाए तो यूपी के ये संसदीय क्षेत्र अन्य संसदीय क्षेत्रों से कहीं अधिक महत्व रखते हैं। इन संसदीय क्षेत्रों पर भाजपा की जीत उनकी प्रतिष्ठा से सीधी जुड़ी हुई है। वैसे तो भाजपा ने जिस तरह से तैयारियों को अमली जामा पहनाया है उसे देखकर नहीं लगता है कि ये वीआईपी सीटें उसके हाथ से जायेंगी लेकिन ओम प्रकाश राजभर द्वारा दी गयी चुनौती के मायने कुछ और ही हैं। ओम प्रकाश राजभर ने अपनी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के बैनर तले यूपी से 39 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। बनारस, लखनऊ और गोरखपुर से भी प्रत्याशियों को उतारे जाने से एक बात तो स्पष्ट है कि श्री राजभर भाजपा हाई कमान की नीतियों से खासे खफा हैं। ज्ञात हो ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी विगत लोकसभा चुनाव परिणाम के पश्चात भाजपा से जा मिली थी। गोलमोल जवाब देने में माहिर श्री राजभर ने एक प्रेस वार्ता में कहा है कि उन्होंने किसी को हराने के लिए प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे हैं बल्कि जीतने के लिए प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। श्री राजभर क्या कहना चाहते हैं और भाजपा को क्या समझाना चाहते हैं? शायद उनका मंतव्य भाजपाई अच्छी तरह से समझ गए होंगे। कहा तो यही जा रहा है कि यदि उन्हें पूर्व में ही इस बात का भान हो जाता कि भाजपा उनकी पार्टी को सीटें नहीं देगी तो वह गठबन्धन में शामिल हो जाते लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा की तरफ से मिले नाकारात्मक जवाब उन्हें इस कदर उत्तेजित कर दिया है उन्होंने अपनी उत्तेजना का जवाब यूपी की 39 सीटों पर प्रत्याशी उतार कर दिया है। यूपी सरकार में डिप्टी सीएम केशव मौर्या के संसदीय क्षेत्र फूलपुर से भी उन्होंने प्रत्याशी मैदान में उतारा है। स्पष्ट है कि उनके इरादे भाजपा को करारा जवाब देने से सम्बन्धित हैं।
राजभर की पार्टी भाजपा के खिलाफ अभियान में कितनी सफल होती है? इसका फैसला तो मतदाता ही करेंगे लेकिन इतना जरूर है कि श्री राजभर के विद्रोही तेवरों से भाजपा का समीकरण जरूर गड़बड़ायेगा। भले ही श्री राजभर की पार्टी का प्रत्याशी अपनी जमानत भी न बचा पाए लेकिन पार्टी का विरोध भाजपा की छवि को चोट अवश्य पहुंचायेगा जिसका फायदा अप्रत्यक्ष रूप से सपा-बसपा गठबन्धन को मिल सकता है। कहा जा रहा है कि बनारस और लखनऊ भले ही भाजपा से न छिटक पाए अलबत्ता फूलपुर और गोरखपुर पर संशय बना हुआ है। ज्ञात हो मौजूदा समय में यह संसदीय क्षेत्र सपा के कब्जे में है जिसे उसने उपचुनाव में जीता था।
कहा तो यही जा रहा है कि ऐन वक्त पर ओमप्रकार राजभर को मना लिया जायेगा और इस काम के लिए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पाण्डेय को भी लगाया गया है। साथ की कई अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी भी ओमप्रकाश राजभर को मनाने में जुटे हैं लेकिन ओमप्रकाश राजभर ने 39 सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा करके फिलहाल ऐसी किसी संभावना से इंकार कर दिया है।
वैसे भी भाजपा के सामने श्री राजभर की पार्टी भले ही अकेले चने के समान हो लेकिन पूर्वांचल में अपना दल के बाद श्री राजभर की पार्टी की हैसियत को कमतर नहीं आंका जा सकता।
फिलहाल असमंजस की स्थिति बरकार है। एक तरफ भाजपाई दावा कर रहे हैं कि ऐन वक्त पर श्री राजभर को मना लिया जायेगा लेकिन दूसरी ओर मान जाने वाली स्थिति नजर नहीं आती।

