वर्ष 2006 में वन अधिकार अधिनियम, चरवाहे परिवारों के लिए आशा की किरण बनकर आया था। फरवरी 2007 में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने इस कानून के तहत उनके अधिकारों को मान्यता देने का आदेश भी दिया था। लेकिन सूबे के वन विभाग की तानाशाही पूर्ण नीति ने गुर्जरों को दो दशक से उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया। यहां तक कि गुर्जरों द्वारा जीवन-यापन के लिए की जा रही खेती से भी उन्हें बेदखल कर दिया गया। बिना नोटिस दिए ही न केवल उनकी फसलें उजाड़ी गई, बल्कि खेतों में बड़े-बड़े गड्ढे कर दिए गए। गुर्जरों के परिवारों और उनके मवेशियों के भूखे मरने की नौबत आ गई। ऐसे में उनके लिए न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए हाईकोर्ट नैनीताल की युवा अधिवक्ता तन्नू प्रिया जोशी सामने आईं। जोशी की तथ्यात्मक दलीलों को सुनकर हाईकोर्ट ने वन गुर्जरों को अपनी जमीनों पर खेती करने के अधिकार दे दिए हैं। अधिवक्ता जोशी ने अब वन गुर्जरों को बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं दिलाने के लिए हुंकार भर दी है
आकाश नागर
बाईस मई 2025 का दिन था जब नैनीताल जनपद के रामनगर स्थित तुमडिया खत्ता में बसे वन गुर्जरों की जमीनों पर वन विभाग ने जेसीबी चला दी थी। उनकी फसलों को उजाड़ दिया गया। साथ ही उन्हें अतिक्रमणकारी घोषित कर दिया था। तब स्थानीय लोग सुप्रीम कोर्ट के वे आदेश दिखाते रहे जिनके अनुसार वे अपने खेतों में फसल उगा रहे थे लेकिन वन विभाग की तानाशाही नीति पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वन विभाग ने बिना नोटिस जारी किए ही गुर्जरों की खड़ी फसलों पर ट्रैक्टर चला दिए और जेसीबी से खेतों में गड्ढे कर दिए गए थे।
वन गुर्जरों की इस समस्या को लेकर युवा अधिवक्ता तन्नू प्रिया जोशी ने हाईकोर्ट में वन गुर्जरों का पक्ष रखा। इसके बाद उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने वन गुर्जरों के मामले में सुनवाई की। अपने महत्वपूर्ण निर्णय में हाईकोर्ट ने वन गुर्जरों को खेती करने की अनुमति दे दी है। उच्च न्यायालय के इस आदेश से तराई के लगभग 1000 वन गुर्जर परिवार लाभान्वित हो सकेंगे।
हाईकोर्ट नैनीताल के मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र एवं न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ में तराई पूर्वी, तराई पश्चिमी और तराई केंद्रीय वन प्रभाग में निवास कर रहे वन गुर्जर अली जान, गुलाम रसूल, मो. यूसुफ और गुलाम रसूल की ओर से दायर चार अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि वह कई वर्षों से रंगशाली और डोली रेंज में निवास कर रहे हैं। वन विभाग अतिक्रमण के नाम पर उन्हें खेती करने से रोक रहा है। उनकी खेती वाली भूमि पर वन पौधरोपण कर रहा है। यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
वन गुर्जरों ने आरोप लगाया कि वन विभाग के अधिकारियों ने बिना नोटिस जारी किए ही यह सब कार्रवाई की थी। इसके बाद उनके दावों की सुनवाई नहीं की गई। जबकि उन्होंने ग्राम सभा कमेटी को अपने दावों के सम्बंध में प्रत्यावेदन सौंप दिया था। इस पर वन विभाग की ओर से आरोप को गलत बताते हुए कहा गया कि वन गुर्जरों की ओर से अतिक्रमण किया जा रहा है।
सभी पक्षों की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने वन गुर्जरों को खेती करने की अनुमति दे दी। साथ ही निर्देश दिए कि वन गुर्जर खेती वाली भूमि का व्यावसायिक उपयोग नहीं कर सकेंगे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को निस्तारित कर दिया है।
हाईकोर्ट नैनीताल में वन गुर्जरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रही तन्नू प्रिया जोशी ने न्यायालय से मिली इस जीत को वनवासियों के अधिकारिक जीवन की एक शुरुआत बताया है। साथ ही उन्होंने कहा कि अभी वन गुर्जरों के मौलिक अधिकारों की लड़ाई बाकि है। जिसमें उन्हें बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं दिलाने के लिए न्यायिक लड़ाई जारी रहेगी।
जोशी ने बताया कि सन् 1830 के दशक से ही वन गुर्जरों के पास चराई कर की रसीदें सबूत के तौर पर हैं। इनको दिखाने के बावजूद, वन अधिकारियों ने बार-बार वन गुर्जरों के किसी भी दस्तावेज के होने के दावों को खारिज कर दिया है तथा उन पर भूमि पर कब्जा करने और जंगल में अवैध गतिविधि चलाने का आरोप लगाया है।
2015 की गर्मियों में, वन अधिकारियों ने तुमड़िया खत्ता में वन गुर्जर परिवारों के घरों को बिना किसी पूर्व सूचना के ढहा दिया था। तब से खत्ता में गुर्जरों के लिए जमीन और चरागाह के अधिकारों के लिए लम्बे समय से लड़ाई जारी है। गुर्जरों के साथ अन्याय का सिलसिला यहीं नहीं रुका था, बल्कि इस तोड़-फोड़ के बाद से उनको अंतहीन यातनाओं का सामना करना पड़ रहा था। इसके बाद अक्टूबर 2015 में तुमडिया खत्ता के 31 निवासियों ने अनुसूचित जनजाति और अन्य पारम्परिक वनवासी अधिनियम, 2006, जिसे वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) भी कहा जाता है, के तहत दावे दायर किए थे। लेकिन उनकी कोई खास सुनवाई नहीं हो रही थी। उल्टा प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) रामनगर ने यहां तक कह दिया था कि वन गुर्जर वनवासी समुदाय नहीं हैं। वे अतिक्रमणकारी हैं।
2015 का ही एक और मामला बताते हुए वह कहती हैं कि वन विभाग ने वन गुर्जरों के बच्चों के लिए सरकार द्वारा स्वीकृत एक स्कूल तक को ध्वस्त कर दिया था। जबकि स्कूल को आधिकारिक तौर पर 2011 में मान्यता दी गई थी। उससे पहले उस स्कूल को एक एनजीओ द्वारा चलाया जाता था। लगभग एक दशक बाद 2024 में वन अधिकारियों ने मौजूदा स्कूल को फिर से ध्वस्त करने की धमकी दी।
इसी तरह वर्ष 2022 में वन विभाग ने जंगल में रहने वाले गुर्जरों के घरों की बिजली भी काट दी थी। लोगों ने इस मामले में विभाग पर साम्प्रदायिक पक्षपात का आरोप लगाया। जब जज ने पूछा कि बिजली का इस्तेमाल कौन कर रहा है तो विभाग ने जवाब दिया, ‘जिनके पास पट्टे हैं।’ जज ने फिर उन्हें वे दस्तावेज दिखाने का आदेश दिया था, लेकिन विभाग ने उन्हें कभी कोर्ट में पेश नहीं किया।
तन्नू प्रिया जोशी के अनुसार उत्तराखण्ड के जंगलों में 1870 के दौर से ही वन विभाग की जमीन वन गुर्जर बसे हुए हैं। तब तो वन विभाग का भी कहीं कोई वजूद नहीं था। लेकिन वन विभाग के कड़े कानूनों और राज नेताओं में इच्छा शक्ति की कमी से वन गुर्जर बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहे हैं। पंचायती राज के इस दौर में जंगलों में रह रहे वन गुर्जरों को मुख्यधारा में लाने की बजाय उन्हें खोखले वादों से बहलाया जाता रहा है। वन गुर्जर कई सालों से विस्थापन की मांग सरकार से करते आ रहे हैं, मगर आज तक नतीजा सिफर ही निकला है।
अधिवक्ता जोशी बताती हैं कि प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत मिशन के तहत उत्तराखण्ड के नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय बनाए गए। लेकिन वनों में रहने वाले नागरिकों की अनदेखी की गई है। आज भी उत्तराखण्ड के तीनों जिलों के वनों में रहने वाले वन गुर्जर, गोठखत्तावासी, वन ग्रामवासियों की करीब 70 हजार से अधिक आबादी बीच जंगल में खुले में शौच करने के लिए बाध्य है। जिस कारण शेर, बाघ, हाथी, भालू, सुअरों के हमलों का खतरा हमेशा बना रहता है।
नैनीताल जिले के हल्द्वानी विकास खण्ड के अंतर्गत दिवाल खत्ता (वनगुर्जर) ग्राम-पंचायत लामाचैड़ खास के दक्षिण में स्थित वन भूमि में बसे करीब 35 परिवार आज भी पोखरों/तालाब का पानी बरसात में ड्रमों, डेकों में इकट्ठा किया गया पानी पीने को बाध्य हैं, यही स्थिति वन गुर्जर नहरखत्ता, आनंदपुर ग्राम पंचायत के करीब 5-6 किलोमीटर दक्षिण में बसे परिवारों की है।
कोटाबाग विकासखण्ड तहसील कालाढूंगी के अंतर्गत वन गुर्जर खत्ते, बौर खत्ता, नलवाड़ खत्ता तथा रायखत्ता (गड़प्पूखत्ता) के पास बसे खत्ता के करीब 150 परिवारों के लिए भी पेयजल की समस्या बनी हुई है।
लूनियागांज वन गुर्जर खत्ता (60 परिवार बैलपड़ाव) नलवाड़ व रायखत्ता (गड़प्पू) तहसील कालाढूंगी के अंतर्गत करीब 125 परिवार तथा नहरखत्ता 45 परिवार, भूड़ाखत्ता 115 परिवारों के बच्चे स्कूलों के अभाव में शिक्षा से वंचित हैं।
लूनियागांज वन गुर्जर खत्ता (60 परिवार बैलपड़ाव) नलवाड़ व रायखत्ता (गड़प्पू) तहसील कालाढूंगी के अंतर्गत करीब 125 परिवार तथा नहरखत्ता 45 परिवार, भूड़ाखत्ता 115 परिवारों के बच्चे स्कूलों के अभाव में शिक्षा से वंचित हैं।
जिला ऊधमसिंह नगर के विकास खण्ड और तहसील गदरपुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत कूल्हा से जुड़े वनगुर्जर खत्ता, हल्दूझद्दा में प्राथमिक स्कूल तक नहीं है। तहसील, विकास खण्ड रूद्रपुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत कल्याणपुर (पत्थरचट्टा) से जुड़े टांडा वन गुर्जर खत्ता व वन मजदूर बस्ती आबादी में करीब 100 परिवार टांडा रेंज कार्यालय के पास उच्च प्राथमिक स्कूल नहीं होने के कारण उस क्षेत्र के बच्चे आगे की पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं।
वन अधिनियम 2006 से मिले वन गुर्जरों को अधिकार
वर्ष 2006 में संसद द्वारा अनुसूचित जनजाति और अन्य पारम्परिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम) 2006 (एफआरए) नामक ऐतिहासिक कानून पारित किया गया था। इस कानून की प्रस्तावना में यह स्वीकार किया गया है कि ऐसे वनवासी समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देने में विफलता के परिणामस्वरूप ऐतिहासिक अन्याय हुआ (जिसे एफआरए सही करना चाहता है) क्योंकि ऐसे वनवासी वन
पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व और स्थिरता के अभिन्न अंग हैं।
पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व और स्थिरता के अभिन्न अंग हैं।
अधिनियम अन्य वनवासी समुदायों और अनुसूचित जनजातियों के रूप में वर्गीकृत समुदायों को कानून की धारा 3(1) के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों (यहां तक कि संरक्षित क्षेत्रों के भीतर) के लिए पात्र बनाता है। धारा 5 के तहत उन्हें वन्यजीव क्षेत्रों सहित वनों के संरक्षण और प्रबंधन का भी अधिकार है। इसके अलावा, यह अधिनियम की धारा 4(1) ही है, जो इसे अत्यंत आवश्यक शक्ति प्रदान करती है। साथ ही इस उल्लेखनीय कानून को अन्य संरक्षण कानूनों के मुकाबले मजबूत बनाती है, जिन्होंने वनवासियों को अधिकारों से वंचित किया है। धारा 4(5) कहती है कि अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया पूरी होने और वनवासियों को अधिकार पहले ही प्रदान किए जाने के बिना दावेदारों को बेदखल नहीं किया जा सकता।

