Uttarakhand

एक्वा पार्क पर पलसिया गांव की पीड़ा ‘उज्ज्वल भविष्य’ या ‘उजड़ता वर्तमान’?

शक्तिफार्म वासियों को बेदखल करने की कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन

सितारगंज में ‘एक्वा पार्क’ परियोजना उत्तराखण्ड को मत्स्य उद्योग का नया केंद्र बनाने का दावा कर रही है लेकिन जिस 40 एकड़ जमीन पर विकास की इमारत खड़ी की जा रही है उसी भूमि पर 1952 से बसे परिवार बिना पुनर्वास के उजाड़े जाने के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। प्रशासन की कार्रवाई, हाईकोर्ट की रोक, स्थानीय नेताओं के हस्तक्षेप और ग्रामीणों की पीढ़ियों से जुड़ी बसावट, इन सभी के बीच यह परियोजना विकास और विस्थापन की टकराती कहानियों का केंद्र बन गई है

ऊधमसिंह नगर जनपद का सितारगंज का शक्तिफार्म क्षेत्र इन दिनों जिस वजह से लगातार चर्चा में है, वह है प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना के तहत बनने वाला एकीकृत ‘एक्वा फार्म, एक्वा पार्क’ प्रोजेक्ट। लगभग 44.50 करोड़ रुपए की लागत से तैयार होने वाली यह योजना उत्तराखण्ड को मत्स्य उत्पादन, प्रसंस्करण और आधुनिक फिश मार्केटिंग के क्षेत्र में नई पहचान देने का दावा करती है। सरकार का उद्देश्य है कि पलसिया, अरविंद नगर और आस-पास के मैदानी इलाकों में उपलब्ध पानी और भू-भाग का उपयोग कर एक ऐसा केंद्र स्थापित किया जाए जो मछली उत्पादन से लेकर पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग, फीड मिल और प्रशिक्षण तक की सारी सुविधाएं एक जगह उपलब्ध कराए। कागजों पर यह योजना जितनी आकर्षक दिखती है जमीनी स्तर पर इसका सफर उतना सरल नहीं रहा। परियोजना की स्वीकृति के बाद से ही जमीन, पुनर्वास और स्थानीय निवासियों के विरोध की व्यापक चर्चा शुरू हो गई। कई परिवारों का दावा है कि जिस भूमि पर प्रशासन कार्रवाई कर रहा है, उस पर वे वर्षों से बसे हुए हैं और बिना पर्याप्त मुआवजा व पुनर्वास के उन्हें बेघर किया जा रहा है। कुछ परिवारों का कहना है कि नोटिस देने का व्यवहार भी पारदर्शी नहीं था और विकास के नाम पर उनकी बसावट को अनदेखा किया जा रहा है। हाल के दिनों में शक्तिफार्म और उससे सटे क्षेत्रों में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान तनाव की स्थितियां भी देखी गईं, जिन पर विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा और इसे एकतरफा निर्णय बताया। इसके ठीक उलट सरकार का तर्क है कि यह परियोजना उत्तराखण्ड के आर्थिक ढांचे में एक बड़ा परिवर्तन ला सकती है। यदि योजनानुसार एक्वा पार्क तैयार होता है तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दो हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की सम्भावना है। मछली उत्पादन, परिवहन, कोल्ड चेन, बर्फ उत्पादन, फिश फीड, पैकेजिंग और रिटेल जैसे कई छोटे उद्योग यहां विकसित हो सकते हैं। स्थानीय महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आय बढ़ाने के नए अवसर पैदा होंगे। उत्तराखण्ड जहां मत्स्य क्षेत्र अभी सीमित स्तर पर सक्रिय है, सितारगंज माॅडल के जरिए एक आधुनिक मत्स्य-केंद्रित अर्थव्यवस्था का उदाहरण बन सकता है।


परियोजना की प्रगति कागजों पर तेज दिखती है। 2023 में केंद्र की स्वीकृति, भूमि चयन, सर्वे, डीपीआर  और उसके बाद निर्माण कार्य की शुरुआत। लेकिन वास्तविकता यह है कि चल रहे विरोध और भूमि विवाद परियोजना की गति को प्रभावित कर रहे हैं। विकास से जुड़े किसी भी काम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रभावित लोगों के साथ संवाद और विश्वास कितना बना रहता है। यदि पुनर्वास स्पष्ट, न्यायोचित और समयबद्ध हो तो यह टकराव अपने आप कम हो जाता है। लेकिन यदि लोगों को लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही तो विकास की प्रक्रिया अविश्वास की दीवार से टकराने लगती है। इस प्रोजेक्ट से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण और जल प्रबंधन को लेकर भी है। बड़े पैमाने पर जल उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को लेकर अभी तक सार्वजनिक रूप से बहुत विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्थानीय लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या परियोजना शुरू होने के बाद आस-पास की कृषि भूमि और पेयजल स्रोत प्रभावित होंगे। परियोजना की स्थायी सफलता के लिए इन सवालों के जवाब देना प्रशासन के लिए अनिवार्य है।
कागजों पर सजे इस विकास माॅडल के समानांतर जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग और तनावपूर्ण है, क्योंकि जिस भूमि पर यह प्रोजेक्ट बनना है, उसी भूमि पर चार-पांच दशक से बसे परिवारों का जीवन टिका हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें बिना पर्याप्त पुनर्वास और बिना संवेदनशील संवाद के उजाड़ने की कोशिश की जा रही है जबकि सरकार इस परियोजना को रोजगार और आर्थिक विकास की दृष्टि से राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताती है। इन विरोधाभासों के बीच प्रहलाद पलसिया गांव पिछले कई दिनों से अनिश्चितकालीन धरने का केंद्र बना हुआ है जहां तिरपालों के नीचे दिन-रात बैठे लोग अपने घर और अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि वे बंगाली मूल के परिवार हैं जो 1952 के आसपास आजादी के बाद यहां आकर बसे और उस समय पुनर्वास विभाग ने इन्हें नियमपूर्वक पट्टे नहीं दिए थे। इसलिए ग्रामीण सन्दर्भ स्पष्ट करते हैं कि यह कहना गलत है कि वे अवैध रूप से यहां बसे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने कभी उनके नाम पर पट्टे जारी कर के उनकी बसाहट को नियमित नहीं किया। ग्रामीण यह भी आरोप लगा रहे हैं कि यह इलाका पहले जंगल जैसा था और उपजाऊ जमीन नहीं था, जिसे उन्हीं ने अपनी मेहनत से जोता, बोया और उपजाऊ बनाया। अब जब जमीन उपजाऊ हो गई तो मंत्री सौरभ बहुगुणा (स्थानीय विधायक और वर्तमान कैबिनेट मंत्री) की नजर इसी भूमि पर पड़ गई और उन्होंने इस पर एक्वा पार्क बनाने की योजना लाई, जबकि बगल में ही सिडकुल फेस-2 जैसी खाली और उपयोगी जमीनें मौजूद थीं जहां पर यह परियोजना आराम से लागू की जा सकती थी। ग्रामीणों का आरोप है कि सिडकुल जैसी खाली जमीनों पर परियोजना लगाने के बजाय स्थानीय बस्ती की जमीन को चुना गया ताकि उसे सस्ते में हासिल किया जा सके।

गौरतलब है कि एक्वा पार्क के लिए उस 40 एकड़ जमीन का चयन हुआ है जिसका आज भी उपयोग 20 से अधिक परिवार वर्षों से कर रहे हैं। किसी के पास एक एकड़, किसी के पास ढाई एकड़ या दो एकड़ तक की जमीन है। ग्रामीणों का कहना है कि जब सौरभ बहुगुणा ने यह जमीन चयनित करवाई तो उन्होंने आश्वासन दिया कि पहले पुनर्वास किया जाएगा, रहने की जगह और खेती के लिए भूमि दी जाएगी, हर परिवार के लिए नौकरी का प्रावधान होगा और नए आवास के लिए मुआवजा भी दिया जाएगा। इन आश्वासनों पर भरोसा करके परिवार शांत रहे और धीरे-धीरे उनकी खेती वाली जमीन मत्स्य विभाग के कब्जे में चली गई। पर जब घरों की बारी आई तो 12 नवम्बर को नोटिस मिला और 13 नवम्बर की सुबह भारी पुलिस फोर्स और जेसीबी के साथ प्रशासन मौके पर पहुंचा। ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई बिना किसी औपचारिक बातचीत और बिना पुनर्वास योजना के की गई जबकि हाईकोर्ट ने पहले से ही कहा हुआ था कि पुनर्वास न होने तक घरों को न तोड़ा जाए। उस दिन महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को घरों से बाहर निकालने की कोशिश की गई और बुलडोजर चलाने का प्रयास हुआ, तब पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष हरीश दुबे, कांग्रेस नेता नवतेज पाल सिंह, उत्तम आचार्य और अन्य स्थानीय प्रतिनिधि मौके पर पहुंचकर दखल देने पहुंचे तब घरों को बचाया जा सका। ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने घरों के चारों ओर गड्ढे खोद दिए और पीने के पानी की पाइपलाइन भी तोड़ दी, उनके पास इन घटनाओं के वीडियो भी मौजूद हैं।

हरीश दुबे का कहना है कि 2022 में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जो रिपोर्ट आई थी वह गलत थी जिसमें लिखा गया कि वहां कोई निवास नहीं करता और न ही फसल उगती है, वास्तविकता यह है कि यह परिवार 1952 से रह रहे हैं और उन्होंने जंगल जैसी जमीन को मेहनत से उपजाऊ बनाया है। दुबे आरोप लगाते हैं कि पुनर्वास विभाग की लापरवाही, जिसने पट्टे जारी नहीं किए, का ही आज यह नतीजा सामने आ रहा है और अब उसी प्रशासनिक गलती का बोझ गरीब परिवारों पर डाला जा रहा है।

नवतेज पाल सिंह कहते हैं कि गरीब किसानों की जमीन लेकर ऐसा विकास किया जा रहा है जिसमें 100-200 लोगों को उजाड़कर मात्र 5-10 लोगों को ही लाभ पहुंचाया जाएगा, वे यह भी कहते हैं कि यहां के लोग तकनीकी रूप से वे काम करने में सक्षम नहीं हैं जिनके लिए नौकरी का वादा किया जा रहा है, इसलिए वायदे व्यावहारिक नहीं हैं। उनके मुताबिक यदि परियोजना बनानी ही थी तो सिडकुल फेस-2 जैसी खाली जमीनों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी।

गांव की बसावट का इतिहास बसंती राय की आपबीती में और स्पष्ट है। वे कहती हैं कि वे 40-45 साल से यही रहती हैं, उनके पास बिजली का मीटर, जल जीवन मिशन की पानी की टंकी, सरकारी लाइट पोल और वोटर लिस्ट के माध्यम से उनकी मौजूदगी का सबूत है, फिर भी उन्हें और उनकी जमीन को बंजर बताकर हटाने का प्रस्ताव रखा जा रहा है। बसंती कहती हैं कि चुनावों में उन्होंने स्थानीय नेताओं का साथ दिया लेकिन अब उन्हें धोखा महसूस हो रहा है क्योंकि चुनाव के बाद जो वादे किए गए थे वे पूरे नहीं हुए। पहले कहा गया कि उन्हें एक एकड़ जमीन, एक नौकरी और आवास मिलेगा, पर बाद में कहा गया कि जमीन नहीं मिलेगी और केवल एक नौकरी व आवास का दावा रह गया, जिस पर वे असंतुष्ट हैं।

दिव्या राॅय ने अपने अनुभव बयां करते हुए कहा कि 12 नवम्बर 2025 को नोटिस मिला और अगले दिन 13 नवम्बर 2025 को सुबह 8ः30 बजे प्रशासन पहुंच गया। दिव्या बताती हैं कि जेसीबी मशीनें पहले घरों के चारों ओर जमीन खोदने लगीं और कहा गया ‘पहले घर तोड़ो, बाद में सब देखेंगे।’ उनके अनुसार महिलाओं को घसीटा गया, एक युवक ने विरोध में खुद पर डीजल डाल लिया और कहा कि वह मर जाएगा। पुलिस ने कहा ‘यहां मत मर, अंदर जाकर मर।’ ग्रामीणों का आरोप है कि उस समय 200-300 पुलिस फोर्स थी और यदि स्थानीय लोग तत्काल नहीं पहुंचते तो घरों को तोड़ दिया जाता। स्थानीय लोग यह भी बता रहे हैं कि हाईकोर्ट ने पहले एक बार स्टे दिया था, यानी बिना पुनर्वास के घर न तोड़े जाएं और अब ग्रामीणों ने पुनः याचिका दायर कर रखी है जिस पर उच्च न्यायालय ने नोटिस जारी कर दिए हैं, इसके चलते मामला अभी भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कोर्ट का सहारा लिया हुआ है और हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद जो कार्रवाई हुई, उसके खिलाफ वे सख्त हैं और उन्होंने कंटेम्प्ट आदि के लिए आवश्यक कार्रवाई भी की है।
गांव में फिलहाल सतह पर शांति बनी हुई है पर धरना जारी है और तनाव गहरा है। तिरपालों के नीचे महिलाएं, युवा और बुजुर्ग रोज बैठते हैं और संख्या बढ़ती जा रही है। सामाजिक संगठन और स्थानीय प्रतिनिधि ग्रामीणों के साथ खड़े हैं और उनकी मांग एकदम स्पष्ट है, ‘जब तक लिखित, स्पष्ट और न्यायसंगत पुनर्वास व्यवस्था नहीं होती, तब तक किसी भी प्रकार की हटाई नहीं होगी।’ ग्रामीण यह भी कहते हैं कि उनका विरोध विकास का विरोध नहीं है, वे केवल अपने घर, अपनी जमीन और पीढ़ियों की मेहनत को बचाना चाहते हैं और उम्मीद करते हैं कि प्रशासन, कोर्ट और जनप्रतिनिधि मिलकर वह स्थायी समाधान निकालेंगे जो उनसे शुरू में किए गए वादों के अनुरूप हो और उन्हें विस्थापन की अनिश्चितता से मुक्त करे। इन सभी परिस्थितियों के बीच यह योजना उत्तराखण्ड के लिए अवसर भी बन सकती है और विवाद का केंद्र भी। यदि सरकार अपने दावों के अनुरूप पारदर्शी प्रक्रिया अपनाती है, प्रभावित परिवारों का सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करती है और पर्यावरणीय संतुलन के साथ इस उद्योग को खड़ा करती है तो सितारगंज उत्तराखण्ड के आर्थिक नक्शे पर एक नई पहचान बना सकता है। लेकिन यदि समाधान का रास्ता संवाद से नहीं निकला तो यह प्रोजेक्ट विकास से ज्यादा अविश्वास और संघर्ष का प्रतीक भी बन सकता है। फिलहाल जो तस्वीर सामने है, वह उम्मीदों और आशंकाओं के बीच खड़ी एक ऐसी कहानी है, जिसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि विकास और मानव संवेदनशीलता साथ-साथ चल पाते हैं या नहीं।

बात अपनी-अपनी

इस देश के नागरिक है ऐसे कैसे इनको हटा देंगे? और अगर हटाएंगे तो हम लोग क्या कर रहे हैं? क्या हम लड़ेंगे नहीं हम लड़ने आए हैं उनके साथ हम खड़े होंगे। मैं इसको बंगाली समाज की अकेली लड़ाई नहीं समझता हूं ये सारे लोग जो हैं पट्टे धारक जो हैं, जो सरकारी जमीनों में थोड़ी-थोड़े बसे हैं जिनका आज जब जमीनों का मूल्य इतना बढ़ गया तो उनके पट्टे कैंसिल करने का काम कर रहे हैं यह सारे आम गरीबों की लड़ाई है और इस लड़ाई को कांग्रेस लड़ेगी और हम लड़ेंगे और बीच का रास्ता हमने सुझा दिया है जो केवल एक है कि उनके साथ समझौता करो विधिवत तरीके से करो, डरा-धमका कर नहीं यह अधिकारियों को सबको समझना पड़ेगा। आज पलसिया में करेंगे अत्याचार वह अत्याचार जीवन भर उनका पीछा करेगा सौरभ बहुगुणा जब चुनाव हार जाएंगे तो उनका पीछा छूट जाएगा लेकिन जो अधिकारी गलत काम करेंगे उनका पाला नहीं छूटेगा। चाहे पुलिस हो, कोई हो। मैं सौरभ बहुगुणा से भी कहूंगा कि कहो कि मुझसे गलती हुई है अपने अधिकारियों को भेजो और इन परिवार वालों से विधिवत तरीके से समझौता करो।

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री

You may also like

MERA DDDD DDD DD