वक्फ अधिनियम 1995 के तहत किसी सम्पत्ति को वक्फ सम्पत्ति घोषित करने के लिए उसको उसके मालिक द्वारा सम्पत्ति का अल्लाह के लिए समर्पण के साथ ही वक्फ बोर्ड के रजिस्टर में सम्पत्ति का पंजीकरण आवश्यक है। लेकिन देखने में आ रहा है कि उत्तराखण्ड में सक्रिय वक्फ माफियाओं द्वारा अनेकांे पंजीकृत विक्रय पत्र और वैध तरीके से खरीदी गई सम्पत्तियों पर वक्फ के दावे किए जा रहे हैं। इसके बाद यह जमीन स्वतः ही विवाद की श्रेणी में आ जाती है। इसके बाद मामला वक्फ बोर्ड और वक्फ अधिकरण के हवाले कर दिया जाता है। आरोप है कि वक्फ अधिकरण वक्फ बोर्ड के पक्ष में ही फैसला सुनाता है। जिससे वक्फ के माफियाओं द्वारा ऐसी सम्पत्तियों को कब्जे में लेने का खेल लम्बे समय से चल रहा है
प्रकरण एक
नैनीताल जनपद का शहर रामनगर। जहां पिछले सौ साल से पपनै जी का परिवार रह रहा है। एक दिन उनके घर अचानक उत्तराखण्ड पुलिस जा धमकी। खाकी वर्दी के जवानों को घर में देखकर पूरे घर में सनसनी फैल गई। आखिर क्या हुआ जो इस प्रतिष्ठित परिवार में पुलिस का पदार्पण हुआ। खैर, पता चला कि जिस सम्पत्ति पर पपनै परिवार सैकड़ों सालों से बसा हुआ था वह वक्फ बोर्ड की है। वक्फ बोर्ड का नाम इस घर के सदस्यों ने पहली बार सुना। इससे उनका कोई वास्ता नहीं पड़ा। जिस सम्पत्ति को वक्फ बोर्ड का बताया जा रहा है, वह अविभाजित उत्तर प्रदेश में सरकार से बोली लगाकर ली गई थी जिसे सेठ काशीनाथ ने खरीदा था। काशीनाथ वह धन्नासेठ थे जो एक समय में आधे रामनगर के मालिक कहे जाते थे। इन्हीं सेठ काशीराम से पपनै परिवार ने अपनी बसावट के लिए वह सम्पत्ति खरीदी थी। उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश भी उनके पास मौजूद है। उन्होंने आदेश उत्तराखण्ड पुलिस को दिखाया। लेकिन पुलिस तो वक्फ बोर्ड के नोटिस के आधार पर पपनै परिवार को अतिक्रमणकारी ठहरा रही है। हालांकि हाईकोर्ट में मामला जाने के बाद यथास्थिति के आदेश दे दिए। लेकिन यह आदेश तकनीकी आधार पर दिए गए हैं कि नोटिस जिसके नाम था वह व्यक्ति पहले ही स्वर्ग सिधार चुके हैं।
प्रकरण दो
नैनीताल जिले का हल्द्वानी शहर, जहां भोटिया पड़ाव में रह रहे शर्मा परिवार को आजकल नींद ही नहीं आ रही है। कारण यह है कि जिस सम्पत्ति पर यह परिवार सैकड़ों सालों से निवास कर रहा है उसे खाली करने का नोटिस आया हुआ है। नोटिस वक्फ बोर्ड की तरफ से है। वक्फ बोर्ड का दावा है कि जिस सम्पत्ति में यह परिवार रह रहा है, वह उनकी है। पुलिस बल कई बार उस जमीन को खाली कराने पहुंच चुका है। फिलहाल शर्मा परिवार अपनी जमीन को वक्फ बोर्ड से बचाने के लिए न्यायालय की शरण में है।
गौरतलब है कि वक्फ बोर्ड के पास यह शक्ति है कि वह किसी भी संपत्ति पर अधिकार के लिए नोटिस भेज सकता है। वह नोटिस इस आधार पर भेजता है कि उसके वक्फ रजिस्टर में उस सम्पत्ति का नाम दर्ज होता है। इसके अलावा नोटिस भेजने का कोई मापदंड वक्फ बोर्ड द्वारा तय नहीं है। बिना जांच किए ही वह चाहे तो किसी को भी नोटिस भेज सकता है। चाहे किसी का घर हो, बंजर जमीन हो, खेती की जमीन, खेल का मैदान, मंदिर, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट या पूरा गांव ही क्यों न हो। नोटिस भेजने के बाद एक समाचार पत्र में नोटिस को छपवाना होता है। किस तरह के समाचार पत्र में नोटिस निकलवाना है उसका भी कोई मानक नहीं है। कई ऐसे समाचार पत्र होते हैं जिनकी पाठक संख्या बेहद कम होती है। उनको कोई नहीं पढ़ता। ऐसे में अगर नोटिस भेजे जाने वाले व्यक्ति ने वो नोटिस नहीं पढ़ा और 30 दिनों में अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं किया तो प्रॉपर्टी बोर्ड की हो जाएगी।
उक्त दोनों ही प्रकरण में एक बात जो चौंकाने वाली है वह यह कि पपनै और शर्मा परिवार की जमीनों के पीछे वक्फ के माफिया हैं। सूत्र बताते हैं कि इनके द्वारा जमीन हड़पने की योजना बनाई जा रही है। हल्द्वानी की सम्पत्ति को तो तोड़कर मॉल बनाने तक की प्लानिंग की जा चुकी है। बताया जा रहा है कि वक्फ माफिया उत्तराखण्ड में लम्बे समय से सक्रिय हैं जो धार्मिक प्रयोजन के नाम पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई से अर्जित की गई सम्पत्तियों को वक्फ सम्पत्ति घोषित कराकर लोगों को उजाड़ रहे हैं। साथ ही प्राप्त हुई ऐसी बहुमूल्य सम्पत्तियों की बेरोकटोक खरीद फरोख्त कर रहे हैं। जिसको किरायेदारी और व्यावसायिक उपयोग कर करोड़ों के वारे-न्यारे किए जा रहे हैं। यह रामनगर और हल्द्वानी में ही नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश के यही हालात हैं।
इसे इससे समझा जा सकता है कि खुद उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स वक्फ सम्पत्तियों में घपले-घोटालों की बात कहते हैं। साथ ही वे वक्फ सम्पत्तियों की जांच सीबीआई से कराने की मांग केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू से कर चुके हैं। वे राज्य की सम्पत्तियों का ब्यौरा लेकर दिल्ली तक पहुंच चुके हैं। जहां उन्होंने केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू को जानकारी दी है कि उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड में कुछ पंजीकृत सम्पत्तियों में असरदार लोगों के कब्जे हैं। कुछ सम्पत्तियों पर प्रभावशाली प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत भी सामने आई है।
वक्फ अधिनियम 1995 के तहत किसी सम्पत्ति को वक्फ सम्पत्ति घोषित करने के लिए उसको उसके मालिक द्वारा सम्पत्ति का अल्लाह के लिए समर्पण के साथ ही वक्फ बोर्ड के रजिस्टर में सम्पत्ति का पंजीकरण आवश्यक है। लेकिन देखने में आ रहा है कि उत्तराखण्ड में सक्रिय वक्फ माफियाओं द्वारा अनेकांे पंजीकृत विक्रय पत्र और वैध तरीके से खरीदी गई सम्पत्तियों पर वक्फ के दावे किए जा रहे हैं। इसके बाद यह जमीन स्वतः ही विवाद की श्रेणी में आ जाती है। इसके बाद मामला वक्फ बोर्ड और वक्फ अधिकरण के हवाले कर दिया जाता है। आरोप है कि वक्फ अधिकरण वक्फ बोर्ड के पक्ष में ही फैसला सुनाता है। जिससे वक्फ के माफियाओं द्वारा ऐसी सम्पत्तियों को कब्जे में लेने का खेल लम्बे समय से चल रहा है।
वक्फ का अर्थ है वह सम्पत्तियां जो अल्लाह के नाम पर दान दी गई हो। जिसका इस्तेमाल धार्मिक कार्यों के साथ ही गरीबों को भलाई के लिए किया जा सके। इसके अलावा अगर किसी सम्पत्ति का इस्तेमाल इस्लाम धर्म के काम के लिए लम्बे समय तक किया जाए तो धार्मिक कार्यों के लिए दान में दे दी गई उस सम्पत्ति को वक्फ बोर्ड का भी माना जा सकता है। कोई व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को वक्फ बोर्ड को दान कर देता है तो उस सम्पत्ति पर व्यक्ति का मालिकाना हक हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। इस तरह देखा जाए तो सम्पत्तियों की देखरेख के लिए ही वक्फ बोर्ड का गठन किया गया था। लेकिन मुश्किल तब आई जब वर्ष 1995 तक इस बोर्ड को इतने असीमित अधिकार दे दिए गए जो आज कहीं न कहीं सरकार के लिए ही यह अधिकार सिरदर्द बन गए हैं।
यही वजह है कि केंद्र सरकार अब वक्फ बोर्ड में संशोधन कर इसकी शक्तियों को कम कर देना चाहती है। यह संशोधन बिल संसद में पेश होने के बाद संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया है। फिलहाल केंद्र सरकार इस मामले में राज्यवार वक्फ बोर्ड सम्पत्तियों की समीक्षा शुरू कर चुकी है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने सम्पत्तियों के दस्तावेज तलब कर लिए हैं। सम्पत्ति मामले में वक्फ बोर्ड भारत का तीसरा सबसे बड़ा लैंड होल्डर (जमींदार) बन चुका है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में सबसे अधिक जमीन भारतीय सेना के पास है, दूसरे नम्बर पर रेलवे आता है और फिर तीसरे नम्बर पर वक्फ बोर्ड का स्थान है। 31 जनवरी 2020 को नेशनल वक्फ मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार देश के सभी वक्फ बोर्डों के पास कुल मिलाकर 6 लाख 16 हजार 732 सम्पत्तियां हैं। ये सम्पत्तियां करीब 8 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैली हैं।
उत्तराखण्ड में वक्फ सम्पत्तियों का कभी सर्वे नहीं हुआ
यहां यह बताया जाना जरूरी है कि उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से ही वक्फ सम्पत्तियों का सर्वे नहीं किया गया है। जबकि वक्फ अधिनियम की धारा 4 के तहत वक्फ सम्पत्तियों के प्रारम्भिक सर्वे और पुनः सर्वे करने का प्रावधान है। जिसके तहत हर दस साल में वक्फ सम्पत्तियों का सर्वे कर उसकी सूची जारी किया जाना राज्य सरकार का दायित्व है। लेकिन सरकार आज तक वक्फ सम्पत्तियों के सर्वे नहीं कर पाई है। पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार तो इससे दो कदम आगे निकल गई। रावत सरकार सम्पत्तियों का सर्वे कराने की बजाय तुष्टिकरण की राजनीति पर उतर आई थी। जिसके चलते वर्ष 2016 में आदेश दिए गए कि उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड द्वारा मात्र अपंजीकृत सम्पत्तियों के ही सर्वे किए जाएं। इसी आदेश में अल्पसंख्यकों को लुभाने की राजनीति की पैंतरेबाजी चली गई। जिसमंे स्पष्ट कहा गया कि उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड में पूर्व में पंजीकृत वक्फ सम्पत्तियों का सर्वे न किया जाए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28 अक्टूबर 2020 को रऊफ रहीम बनाम भारत संघ एवं अन्य मुकदमे में समस्त राज्य सरकारों को वक्फ सम्पत्तियों के सर्वे के सम्बंध में आदेश दिए गए थे। जिसके अनुपालन में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के माध्यम से 27 जुलाई 2023 को वक्फ सम्पत्तियों के सर्वे और सूची प्रकाशित करने के लिए निर्देश दिए थे लेकिन इस कार्य के लिए गठित सरकारी कमेटी ने आज तक इसे अंजाम नहीं दिया है।
यह जगजाहिर है कि उत्तराखण्ड में मस्जिदों आदि को छोड़कर जितनी भी सम्पत्तियां वक्फ सम्पत्तियांे के तौर पर सूचीबद्ध है उनमें से अधिकांश न तो धार्मिक प्रयोजन के लिए उपयोग की जा रही हैं और न ही वे पूर्व में सम्पत्तियों के स्वामियों द्वारा वक्फ के तौर पर समर्पित की गई हैं। उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष मजहर नवाब के अनुसार कभी भी वक्फ बोर्ड की हजारों करोड़ की सम्पत्ति का सही उपयोग नहीं हुआ है, न तो इस पर कभी स्कूल बनाए गए, न ही गरीबों के लिए अस्पताल बनाए गए। इन सम्पत्तियों का केवल बड़े लोगों ने कब्जा कर दुरुपयोग किया है।
उत्तराखण्ड में 80 हजार करोड़ की वक्फ सम्पत्तियां
उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड के पास करीब 80 हजार करोड़ की सम्पत्ति है। जिसमें करीब 60 प्रतिशत वक्फ की सम्पत्तियों पर विवाद चल रहा है। वक्फ बोर्ड के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान समय में 848 मामले चल रहे हैं। इसके साथ ही 241 मामले लम्बित पड़े हुए हैं।
जानकारी के अनुसार उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड में करीब 5344 पंजीकृत सम्पत्तियां हैं, जिसमें से सबसे अधिक सम्पत्तियां हरिद्वार जिले में 2791 हैं तो वहीं सबसे कम चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिले में चार-चार सम्पत्तियां हैं। इसके अलावा देहरादून जिले में 2137, ऊधमसिंह नगर जिले में 1427, नैनीताल जिले में 628, पौड़ी जिले में 154, अल्मोड़ा जिले में 137, चंपावत जिले में 59, टिहरी जिले में 34, पिथौरागढ़ जिले में 22 और बागेश्वर जिले में 21 सम्पत्तियां हैं।
धारा 40 में है असीमित शक्ति
वक्फ अधिनियम की धारा 40 में वक्फ बोर्ड को बड़ा अधिकार दिया गया है, जिसमें बोर्ड किसी भी सम्पत्ति की जांच कर सकता है कि वो वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति तो नहीं है और अगर बोर्ड को लगता है कि किसी संस्था या ट्रस्ट की कोई सम्पत्ति वक्फ की है तो फिर बोर्ड उससे सम्बंधित को नोटिस जारी कर जवाब मांग सकता है कि क्यों न उस सम्पत्ति को वक्फ सम्पत्ति में शामिल कर लिया जाए। धारा 40, बोर्ड को दी गई असीमित शक्तियों में से एक ये भी है कि बोर्ड को अगर यकीन है कि कोई जमीन उसकी है तो वह जिलाधिकारी को आदेश करेगा कि जमीन को खाली करवाया जाए।
व्यवसायिक गतिविधियों वाली वक्फ संपत्तियां होंगी जब्त: पुष्कर सिंह धामी वक्फ अधिनियम की धारा 4 में स्पष्ट है कि वक्फ संपत्तियों के प्रारंभिक सर्वे और हर 10 वर्ष में पुनः सर्वे कराया जाना जरूरी है। 2016 में इस संबंध में आदेश जरूर हुए लेकिन उस दौरान केवल नए पंजीकरण की जांच की बात कही गई किंतु पुराने पंजीकरणों की बाबत कुछ नहीं बोला गया जो वक्फ बोर्ड के खिलाफ हैं। हम चाहते हैं कि सर्वेक्षण मामले में पारदर्शिता हो, जिससे वक्फ के नाम पर अवैध कार्य चिन्हित किए जा सकेंगे। प्रदेश में आज भी ऐसी बहुत-सी संपत्तियां हैं जिन पर वक्फ के नाम पर अनियमितताएं हो रही हैं। पूर्व में जिस तरह लैंड जेहाद का अभियान चलाया गया था इसी तरह का एक सर्वेक्षण अभियान अब हम वक्फ सम्पत्तियों का करने जा रहे हैं जो भी वक्फ सम्पत्ति दीन के कार्यों से इतर कमर्शियल कार्यों के लिए प्रयोग में लाई जा रही होगी उन्हें जब्त कर लिया जाएगा। किसी की संपत्ति को भी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति बनाने के लिए वक्फ अधिनियम की ट्टाारा 40 में भी संशोधन किया जाना जरूरी है। यूपीए की केंद्र सरकार ने तुष्टीकरण की राजनीति करते हुए वक्फ बोर्ड की शक्तियों को बढ़ा दिया था। केंद्र सरकार अब वक्फ अट्टिानियम में बदलाव कर पीड़ितों को न्याय देने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार का अधिनियम लागू होते ही वक्फ बोर्ड की किसी भी सम्पत्ति को वक्फ सत्पत्ति बनाने की शक्तियों पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
व्यवसायिक गतिविधियों वाली वक्फ संपत्तियां होंगी जब्त: पुष्कर सिंह धामी
वक्फ अधिनियम की धारा 4 में स्पष्ट है कि वक्फ संपत्तियों के प्रारंभिक सर्वे और हर 10 वर्ष में पुनः सर्वे कराया जाना जरूरी है। 2016 में इस संबंध में आदेश जरूर हुए लेकिन उस दौरान केवल नए पंजीकरण की जांच की बात कही गई किंतु पुराने पंजीकरणों की बाबत कुछ नहीं बोला गया जो वक्फ बोर्ड के खिलाफ हैं। हम चाहते हैं कि सर्वेक्षण मामले में पारदर्शिता हो, जिससे वक्फ के नाम पर अवैध कार्य चिन्हित किए जा सकेंगे। प्रदेश में आज भी ऐसी बहुत-सी संपत्तियां हैं जिन पर वक्फ के नाम पर अनियमितताएं हो रही हैं। पूर्व में जिस तरह लैंड जेहाद का अभियान चलाया गया था इसी तरह का एक सर्वेक्षण अभियान अब हम वक्फ सम्पत्तियों का करने जा रहे हैं जो भी वक्फ सम्पत्ति दीन के कार्यों से इतर कमर्शियल कार्यों के लिए प्रयोग में लाई जा रही होगी उन्हें जब्त कर लिया जाएगा। किसी की संपत्ति को भी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति बनाने के लिए वक्फ अधिनियम की ट्टाारा 40 में भी संशोधन किया जाना जरूरी है। यूपीए की केंद्र सरकार ने तुष्टीकरण की राजनीति करते हुए वक्फ बोर्ड की शक्तियों को बढ़ा दिया था। केंद्र सरकार अब वक्फ अट्टिानियम में बदलाव कर पीड़ितों को न्याय देने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार का अधिनियम लागू होते ही वक्फ बोर्ड की किसी भी सम्पत्ति को वक्फ सत्पत्ति बनाने की शक्तियों पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी का ऐतिहासिक निर्णय
वर्ष 2023 में धामी सरकार ने सरकारी भूमि पर किए गए अतिक्रमणों को हटाने का अभियान छेड़ा जिसकी भूमि जद् में बड़े पैमाने पर ऐसे धार्मिक स्थल आ गए जिन्हें वक्फ की सम्पत्ति घोषित किया गया था और वहां पर धार्मिक स्थल बना दिए गए थे। राज्य सरकार ने जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, राजाजी टाइगर रिजर्व समेत राज्यभर के अनेकों इलाकों में सरकारी भूमि पर बनी मजारों, मस्जिदों इत्यादि को तोड़ने के आदेश जारी किए जिससे पीड़ित हो मुस्लिम समाज ने उच्च न्यायालय, नैनीताल में एक रिट दायर कर तत्काल अतिक्रमण विरोधी अभियान को रोके जाने की गुहार लगाई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वक्फ रजिस्टर में दर्ज किसी भी सम्पत्ति को राज्य सरकार तोड़ नहीं सकती है। भले ही वह सम्पत्ति सरकारी ही क्यों न हो। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी ने 26 मई 2023 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति सांघी ने अपने फैसले में वक्फ की बाबत स्पष्ट कहा कि ‘हमारी समझ से एक वक्फ, ‘‘वक्फ’’ शब्द का प्राथमिक अर्थ नहीं बदल सकता। एक वक्फ करने के लिए मुस्लिम कानून द्वारा मान्यता प्राप्त किसी पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ उपयोग के लिए किसी अचल सम्पत्ति को वक्फ सम्पत्ति घोषित करने के लिए वक्फ करने वाले व्यक्ति का उस सम्पत्ति का मालिक होना जरूरी है। ऐसी कोई भी सम्पत्ति वक्फ नहीं की जा सकती जो किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति न होकर सार्वजनिक सम्पत्ति, सार्वजनिक भूमि अथवा सरकार की सम्पत्ति हो।’ न्यायमूर्ति सांघी ने राजाजी टाइगर रिजर्व, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क तथा वन विभाग की जमीनों पर बनी मजारों व अन्य धाार्मिक स्थलों को इस आधार पर वक्फ सम्पत्ति मानने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी थी।
‘वक्फ संपत्तियों पर है बड़े माफियाओं के कब्जे’

उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स से दि संडे पोस्ट की बातचीत
क्या वक्फ बोर्ड को मिली असीमित शक्तियों का दुरुपयोग हो
रहा है?
जी हां, वक्फ बोर्ड को मिली असीमित शक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है। यदि सही से जांच हुई तो यह देश का सबसे बड़ा घोटाला निकलकर सामने आएगा। इसलिए हम मांग करते हैं कि वक्फ बोर्ड की सीबीआई जांच कराई जाए, ताकि हजारों करोड़ की जमीनों पर हुए घोटाले का पर्दाफाश हो सके।
आप वक्फ बोर्ड की सीबीआई जांच कराने के लिए केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री किरण रिजूजी से मिले तो क्या आश्वासन मिला?
मंत्री जी ने आश्वासन दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो सीबीआई जांच कराई जाएगी। लेकिन वक्फ बोर्ड में बैठे माफियाओं का पर्दाफाश किया जाना जरूरी है।
वक्फ बोर्ड की कितनी सम्पत्तियों पर विवाद चल रहे हैं?
उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड के पास करीब 80 हजार करोड़ की सम्पत्ति है। जिसमें करीब 60 प्रतिशत सम्पत्तियों पर विवाद चल रहा है।
वक्फ बोर्ड की सम्पत्तियों पर सही उपयोग हो रहा हैं क्या?
नहीं, कभी भी वक्फ बोर्ड की हजारों करोड़ की सम्पत्ति का सही उपयोग नहीं हुआ है। न तो इस पर कभी स्कूल बनाए गए और न ही गरीबों के लिए अस्पताल बनाए गए। इन सम्पत्तियों का केवल बड़े लोगों ने और माफियाओं ने कब्जा कर इनका दुरुपयोग किया है।
कहा जा रहा है कि वक्फ बोर्ड की सम्पत्तियों में बड़े-बड़े घोटाले हो चुके हैं?
यह सही है, अगर वक्फ सम्पत्तियों की सीबीआई जांच कराई जाती है तो ये भारत का सबसे बड़ा घोटाला निकलकर सामने आएगा। उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड के पास करीब 5300 सम्पत्तियां हैं। जिसमें से अधिकतर सम्पत्तियों पर कब्जा है। इनमें से ज्यादातर पर अवैध किराएदार बैठे हैं।
केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड में संशोधन करने जा रही है। इसका विरोध भी शुरू हो चुका है। इस पर आपका क्या कहना है?
देश की आजादी के बाद से अभी तक वक्फ की सम्पत्तियों में जो लूट हुई है, उनमें जिन लोग के हाथ हैं वही लोग वक्फ बोर्ड में होने जा रहे संशोधन का विरोध कर रहे हैं। जो सम्पत्ति गरीबों के उत्थान के लिए थी, आज वो लोगों की ऐशगाह का समान बन चुकी है। प्रदेश की तमाम सम्पत्तियों पर ऐसे लोगों ने कब्जा कर लिया है जो वक्फ के नाम पर अवैध सम्पत्ति अर्जित कर रहे हैं। वह वक्फ को माफियाओं का गढ़ बना देना चाहते हैं। लेकिन हम ऐसा होने नहीं देंगे।
वक्फ बोर्ड में संशोधन होने से पहले आपके पास क्या योजना है। लोगों को आप इस संबंध में कैसे संतुष्ट करेंगे?
अभी पिछले दिनों दिल्ली में इस संबंध में बड़ा सम्मेलन हुआ है। जिसमें भाजपा अल्पसंख्यक राष्ट्रीय मोर्चा के सभी पदाधिकारी और सदस्य शामिल हुए। मुझे भी यहां आमंत्रित किया गया था इस सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू भी शामिल हुए थे। सम्मेलन में बताया गया कि कुछ विरोधी गैंग केंद्र सरकार के इस संशोधन को जायज नहीं ठहराने के लिए तमाम तरह के कुतर्क दे सकता है। इसलिए अल्पसंख्यक मोर्चा के सभी सदस्य पूरे देश में वक्त बोर्ड में संशोधन की जरूरत और इससे होने वाले फायदे को जनता तक पहुंचाएंगे। न्याय किसी के लिए भी वह पारदर्शी होना चाहिए। आप दूसरे की सम्पत्ति पर बोर्ड लगाकर उसे अपनी नहीं बना सकते, इसलिए केंद्र सरकार यह एक्ट ला रही है।
2016 में तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने एक आदेश जारी किया था कि केवल पंजीकृत सम्पत्तियों का ही सर्वेक्षण करेंगे। उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड में पूर्व से पंजीकृत वक्फ सम्पत्तियों का सर्वेक्षण कराया जाने की आवश्यकता नहीं है। क्या इसे आप सही मानते हैं?
उन्होंने पूर्व में पंजीकृत वक्त सम्पत्तियों का संरक्षण करने की आवश्यकता नहीं समझी होगी क्योंकि जो सम्पत्तियां दर्ज हो चुकी उनके बारे में सर्वेक्षण की वैसे भी जरूरत नहीं होती है लेकिन जो सम्पत्तियां पंजीकृत हैं उनका सर्वेक्षण होना जरूरी था जो नहीं हो सका।
राज्य गठन से लेकर अब तक पूरे 24 साल होने के बाद भी वक्फ सम्पत्तियों का सर्वेक्षण क्यों नहीं हो पा रहा है?
24 साल नहीं बल्कि पिछले 40 साल से वक्फ सम्पत्तियों का सर्वेक्षण नहीं किया जा सका है। यह पूर्व में रही कांग्रेस सरकार के लापरवाही का आलम है। पिछले 70 सालों से कांग्रेस देश में तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है। जिसका नतीजा है कि आज तक सर्वेक्षण नहीं हो पाया है। लेकिन भाजपा इस पर गंभीर है। केंद्र सरकार का नया जो एक्ट लाया जा रहा है वह इन सब खामियों को दूर कर देगा।
बात अपनी-अपनी
वक्फ सम्पत्तियों का समय-समय पर सर्वेक्षण किया जाना जरूरी है। जिससे संपत्तियों के नाम पर अवैध काम न हो सके। लोगों की सम्पत्तियों पर वक्फ के नाम पर कब्जे करना गम्भीर बात है। इसमें कुछ गलत लोगों की मिलीभगत भी हो सकती है। हमने अपने कार्यकाल में ऐसी सम्पत्तियों के सर्वेक्षण कराए जाने के आदेश दिए थे। लेकिन सरकार बदलते ही आदेश भी कूड़े दान में डाल दिए गए। सरकार बदलने के साथ निर्णय नहीं बदले जाने चाहिए। अगर आज हमारी सरकार का आदेश लागू हो जाता और वक्फ सम्पत्तियों के सर्वेक्षण हो जाते तो ऐसी जमीनों पर माफिया कब्जा नहीं करते। धामी सरकार को इसे गम्भीरता से लेना चाहिए।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड
वक्फ बोर्ड के नाम पर कुछ लोगों ने अपनी दुकानदारी चला रखी है। वे जमीनों को खाली कराकर उन जमीनों पर ट्टार्म-कर्म का काम नहीं करके उन्हें अपने कब्जे में ले रहे हैं। कुछ लोग इस जमीन पर किरायेदारी कर लाखों रुपए अवैट्टा कमा रहे हैं तो कुछ इसे खुर्द-बुर्द कर रहे हैं। वक्फ बोर्ड की जमीनों पर अवैध प्लॉटिंग भी हो रही है। हमारी सरकार इस सम्बंध में जांच करा रही है। जांच के बाद माफियाओं पर लगाम लगनी तय है।
मजहर नईम नवाब, उपाध्यक्ष, उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग
जिस वक्फ बोर्ड ने हमारे मकान पर अपना दावा किया है उस क्फ बोर्ड को 1945 में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की डबल बेंच अवैध घोषित कर चुकी है। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश की जानकारी ही नहीं है। इस सम्बंध में नगर पालिका रामनगर ने जिला शासकीय अधिवक्ता से राय मांगी थी। उन्होंने भी कहा कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का 1945 वाला आदेश माना जाएगा। इस मामले में हम हाईकोर्ट नैनीताल भी गए। वक्फ की ट्रिब्यूनल में भी केस लड़ा। जहां वक्फ बोर्ड के नोटिस को गलत करार दिया गया। वक्फ बोर्ड का हमारे घर पर कब्जे का आदेश निरस्त किया गया। वक्फ बोर्ड कोई सूचना तक नहीं देता है। वक्फ बोर्ड नोटिस भी सीधा डीएम के यहां भेजते हैं। हमें नोटिस भी नहीं दिया गया था।
निशांत पपनै, पीड़ित, रामनगर नैनीताल
हमारा परिवार इस घर में पिछले 120 सालों से रह रहा है। एक दुबई से आया हुआ फरसाद मोमीन नाम का बदमाश स्थानीय नेताओं के साथ मिलकर हमें घर से बेदखल करना चाहता है। वह हमारी जमीन को वक्फ बोर्ड की जमीन बताकर पुलिस के द्वारा हमें घर से निकलवा चुका है। हमारा सामान तक सड़कों पर फैक दिया गया था। हम मां-बेटी कई दिनों तक सड़क पर सोए। यहां का भाजपा का एक नेता है जो इस जमीन पर मॉल बनाने को कह रहा है। कभी यहां जंगल हुआ करता था, यहां बाघ आता था तब से हमारे पूर्वज इस जमीन पर रह रहे हैं। हमें इतना प्रताड़ित किया जा रहा है कि पूरा परिवार आत्महत्या तक करने की सोच रहा है।
आनंदी शर्मा, पीड़िता, हल्द्वानी नैनीताल

