आज के समय में दुनिया में एक टेक्नोलॉजी ने धूम मचा रखी है। इस टेक्नोलॉजी का नाम है AI एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) यह विज्ञान का एक सबसे बेहतरीन आविष्कार है। आज के समय में AI के द्वारा हम कोई भी मुश्किल काम आसानी से कर सकते हैं। बच्चों का होमवर्क हो या ऑफिस वर्क सब चुटकियों में किया जा सकता है। जैसे-जैसे इसकी दुनियाभर में मांग बढ़ रही है उसी के साथ लोग इसमें इन्वेस्ट भी कर रहे हैं। जैसा की सैम ऑल्टमैन ने AI में इसी महीने 7 खरब डॉलर इन्वेस्ट करने जा रहे हैं। इसके द्वारा की गई इस घोषणा के बाद निवेश बाजार में हलचल मच गई है।
वॉल स्ट्रीट जर्नल के द्वारा दी गई एक रिपोर्ट में सामने आया कि ऑल्टमैन एआई क्षेत्र के सामने आने वाली कुछ कमियों को सही करना चाहते हैं। उनका कहना है कि आने वाली पीढ़ी के लिए AI को और भी अच्छा किया जा सकता है। जिसके लिए इन्हे चिप्स और सेमीकंडक्टर जैसे डिवाइसेस की कमियों पर काम करके उन्हें बेहतर बनाना होगा। इसमें चैटजीटीपी जैसे मॉडल्स को और भी बेहतर बनाया जाएगा और उन्हें बेहतर बनाने के लिए आविष्कार किए जाएंगे। सैम ने बताया है कि AI को मानव मस्तिष्क से आगे बढ़ाने और तेज गति से कार्य करने के लिए ज्यादा पावर वाले कम्प्यूटर्स की आवश्यकता होगी जिन्हे इस वर्ष बनाया जायेगा फिर उन कम्प्यूटर्स पर हमें AI पर काम करना होगा।
वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग के एमेरिटस प्रोफेसर ‘पेड्रो डोमिंगोस’ ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘ AI के लिए सात ट्रिलियन डॉलर की मांग करना ठीक नहीं है। यह तो इतनी बड़ी धनराशि है कि चिप इंडस्ट्री ने अपने पूरे इतिहास में इतना खर्च नहीं किया है। ऑल्टमैन शायद करीब सात सौ बिलियन डॉलर पर समझौता कर लेंगे लेकिन यह राशि भी पूरे AI चिप सेक्टर की कीमत से भी अधिक है। कनाडा और भारत की संयुक्त एनालिटिक्स फर्म प्रेसीडेंस रिसर्च के द्वारा हालही में की गई गणना वर्ष 2030 तक यह उद्योग करीब 135 बिलियन डॉलर का हो जायेगा। जिस तरह से एआई हर तरह से इंसानों से ज्यादा स्मार्ट बनने की महत्वाकांक्षा रखता है, तो ऐसी स्थिति में ऑल्टमैन की यह कल्पना साकार में होने में ज्यादा दिन नहीं लगेंगे।’
ऐसा नहीं है की यह मुद्दा पहली बार उठाया गया है, ऑल्टमैन के इन अनुमानों के सार्वजनिक होने से पहले भी दुनिया के बड़े देशों की सरकारों ने पहले से ही चिप उद्योग में कोशिश कर रहे हैं। इन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जापान और कई यूरोपीय देश शामिल हैं। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के द्वारा चिप्स बनाने वाली चीन की कंपनियों पर खरीद को भी रोका गया है, जिसपर डोमिंगोस क्क कहना है कि उन्नत स्तर की एआई कंप्यूटिंग पावर विकसित करने की चीन की क्षमता को बाधित करने के बजाय ये प्रतिबंध ‘काउंटरप्रोडक्टिव’ साबित हुए हैं।’

