बीता सप्ताह कई कारणों चलते खासा रोमांचकारी, आश्वस्तकारी और विस्मयकारी रहा। पहले बात विस्मयकारी घटना की। 10 मार्च के दिन यकायक ही चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अपने पद से त्यागपत्र दे सबको चौंका दिया। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उनका पद छोड़ना विस्मयकारी और रहस्यात्मक कहा जा सकता है। अरुण गोयल वही चर्चित अधिकारी हैं जिनकी बतौर चुनाव आयुक्त नवम्बर 2022 में नियुक्ति विवादों में रही थी। इतनी विवादित कि मामला उच्चतम न्यायालय तक जा पहुंचा था और न्यायालय ने उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी भी की थी। जिनकी याददाश्त कमजोर है उन्हें याद दिला दूं कि पंजाब कैडर के आईएएस अधिकारी अरुण गोयल 2022 में केंद्रीय भारी उद्योग सचिव पद पर तैनात थे। दिसम्बर में सेवानिवृत्त होने जा रहे गोयल ने 18 नवम्बर 2022 को त्यागपत्र दे दिया था। अगले ही दिन 19 नवम्बर 2022 को उन्हें केंद्रीय चुनाव आयुक्त बना दिया गया। यह वह समय था जब उच्चतम न्यायालय मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं की सुनवाई कर रहा था। चुनावों में पारदर्शिता के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने तत्काल ही गोयल की नियुक्ति को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका पर सुनवाई के दौरान स्वीकारा था कि यह नियुक्ति नियमानुसार नहीं प्रतीत होती है। हालांकि न्यायालय ने सख्त टिप्पणी तो की लेकिन एडीआर की याचिका को तब खारिज कर दिया था। जाहिर है अरुण गोयल केंद्र सरकार के पसंदीदा अधिकारी रहे होंगे अन्यथा उनकी नियुक्ति इतनी हड़बड़ी में कतई नहीं की जाती। ऐसे में विस्मय होना स्वभाविक है कि क्योंकर ऐसे व्यक्ति ने ठीक आम चुनाव से पहले इस्तीफा दे डाला जबकि उनका लम्बा कार्यकाल बाकी था और वे आने वाले समय में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त बनते ही बनते? एडीआर संस्था के जगदीप चौकर इसे ‘अस्पस्ट परिस्थितियों में उठाया गया एक असामान्य कदम करार देते हैं जिसके वास्तविक कारण शायद ही पता चले।’ वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री ज्यादा स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं कि ‘अरुण गोयल बहुत महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं। चुनाव आयुक्त बनने से पहले वो हाई प्रोफाइल अफसर थे। अभी उनका कार्यकाल पौने तीन बरस का बचा था। ऐसे में उनका अचानक इस्तीफा देना सामान्य नहीं है। ऐसा लगता है कि अरुण गोयल के मतभेद केवल मुख्य चुनाव आयुक्त से नहीं, बल्कि सरकार से भी थे, इसलिए उन्हें समय पूर्व इस्तीफा देना पड़ा।’ स्मरण रहे इससे पहले अगस्त 2020 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी अचानक ही अपना त्यागपत्र दे डाला था। लवासा लेकिन गोयल समान वर्तमान सत्ता-प्रतिष्ठान के पसंदीदा अफसर नहीं थे। 2019 में उन्होंने आम चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को आचार संहिता के उल्लंघन मामले में आयोग द्वारा क्लीनचिट दिए जाने का विरोध किया था। उनके इस्तीफे पर भी सवाल उठे थे और विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने का आरोप लगाया था। गोयल के इस्तीफे बाद भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अशोक लवासा के इस्तीफे का संदर्भ देते हुए बयान दिया है कि “The then election commissioner Ashok Lavasa had dissented against a clean chit to the PM Later he faced relentness inquiries. This attitude shows that regime is hellbent on destroying democratic traditions.”(तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के लिए प्रधानमंत्री को क्लीनचिट देने पर असहमति जताई थी। बाद में उन्हें लगातार पूछताछ का सामना करना पड़ा। यह रवैया दर्शाता है कि शासन लोकतांत्रिक परम्पराओं को नष्ट करने पर तुला है।)
जाहिर है भाजपा और केंद्र सरकार इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकते कि विपक्ष चुनाव आयुक्त के फैसले को लेकर उन पर हमलावर होगा, इसलिए गोयल का निर्णय विस्मयकारी और रोमांचकारी घटना रही है। अब बात आश्वस्तकारी खबर की। गत् सप्ताह उच्चतम न्यायालय ने देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड मुद्दे पर दायर पुनर्विचार याचिका को एक सिरे से खारिज करते हुए बैंक को कठोर शब्दों में आदेश दिया कि वह 12 मार्च तक इस बॉन्ड से जुड़ी समस्त जानकारी को न केवल न्यायालय के समक्ष पेश करे, बल्कि चुनाव आयोग समस्त जानकारी को तत्काल सार्वजनिक भी करे। यह न केवल स्टेट बैंक वरन् केंद्र सरकार को भी सकते में डालने वाला निर्णय है। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को बड़ी धूमधाम के साथ मोदी सरकार ने 2017 के बजट में घोषित किया था और 2018 में लागू कर दिया था। केंद्र सरकार का दावा था कि इस योजना के जरिए चुनावों में कालेधन की बेशुमार खपत पर रोक लगेगी तो दूसरी तरफ विपक्षी दलों तथा चैतन्य नागरिकों ने इसे कालेधन को बढ़ावा देने वाला कदम करार दिया था। इस योजना के तहत उद्योग जगत को बगैर नाम उजागर किए यह सुविधा मिल गई थी कि वे किसी भी राजनीतिक दल को स्टेट बैंक से इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद के जरिए गुप्त चंदा दे सकते हैं। मार्च 2018 से जनवरी 2024 के मध्य 16,518.11 करोड़ की भारी-भरकम राशि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए राजनीतिक दलों को उद्योग जगत दे चुका है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष इस योजना के खिलाफ याचिकाएं दायर की गई थी जिनमें कहा गया था कि सूचना के अधिकार के तहत आम नागरिक को यह जानने का पूरा अधिकार है कि किस राजनीतिक दल को इस योजना के तहत किसके द्वारा और कितना चंदा दिया गया है। इस योजना के विरोधियों का कहना है कि गुप्तदान की व्यवस्था पूरी तरह से असंवैधानिक और अपारदर्शी है और यह योजना सत्तारूढ़ दलों को उद्योग जगत से रिश्वत लेने का कानूनी जरिया बनाने का खेला है।
गत् 15 फरवरी को इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय का अभूतपूर्व फैसला आया था जिसमें न्यायालय ने इस योजना को अपारदर्शी और असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को निर्देश दिए थे कि इस विषयक समस्त जानकारी चुनाव आयोग को 6 मार्च तक सौंप दी जाए तथा आयोग उसे तत्काल सार्वजनिक पटल पर डाल दे। इसी निर्देश के खिलाफ स्टेट बैंक ने पुनर्विचार याचिका दायर करते हुए न्यायालय से अनुरोध किया था कि इस जानकारी को उपलब्ध कराने के लिए उसे 30 जून तक का समय दे दिया जाए जिसे एक सिरे से न्यायालय ने नकार उन सभी को आश्वस्त करने का काम किया है जो बीते कई वर्षों से आशंकित हैं और आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा शासनकाल में लोकतांत्रिक सस्थाओं का क्षरण हो रहा है। ऐसे सभी को उच्चतम न्यायाल के निर्णयों से कभी राहत तो कभी बेहद मायूसी होती आई है। इस निर्णय की प्रतीक्षा ऐसे सभी बड़ी शिद्दत से कर रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने उन्हें निराश नहीं किया और अब स्टेट बैंक को समय देने से स्पष्ट मनाकर इस राहत को चौगुना कर डाला है। चूंकि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए सबसे अधिक चंदा भाजपा को मिला है इसलिए अब यदि दानदाताओं के नाम सार्वजनिक होते हैं और यदि ऐसे दानदाताओं में कुछेक दागी छवि के निकलते हैं तो विपक्षी दलों और भाजपा विरोधियों के इस योजना बाबत आरोप सत्य प्रमाणित हो जाएंगे जो निश्चित ही चुनावी दौर में भाजपा के लिए बड़ी शर्मिंदगी का बायस बन उभरेंगे। इन दो घटनाओं के साथ-साथ एक अन्य घटना भी मेरे लिए खासी विस्मयकारी रही। 11 मार्च को दिन से ही अचानक खबर वायरल होने लगी कि प्रधानमंत्री मोदी शाम साढ़े पांच बजे देश को सम्बोधित करने जा रहे हैं। कयासबाजियों का दौर शुरू होते देर नहीं लगी कि आखिर पीएम क्या घोषणा कर सकते हैं। बहुतों का अनुमान था कि प्रधानमंत्री नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) की बाबत कुछ कहेंगे क्योंकि 11 मार्च को ही केंद्र सरकार ने लम्बी जद्दोजहद के बाद इस कानून को लागू करने की घोषणा की थी। मोदी विरोट्टाी अतिवादिता का शिकार हो ऐसे-ऐसे अनुमान लगा रहे थे जिन पर कुछ कहना ठीक नहीं। प्रधानमंत्री ने लेकिन देश को सम्बोधित किया ही नहीं। शाम पौने छह बजे के करीब उनका एक ट्विट जरूर आया जिसमें देश के वैज्ञानिकों को नई रक्षा प्रणाली विकसित करने के लिए बधाई दी गई थी। मेरे लिए यह अत्यंत विस्मयकारी है कि क्योंकर यह खबर वायरल हुई कि पीएम साहेबान देश को सम्बोधित करेंगे और फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ?
बहरहाल, गत् पखवाड़ा बेहद रोमांचकारी, विस्मयकारी और आश्वस्तकारी रहने के साथ-साथ भाजपा के लिए कष्टकारी भी रहा। हरियाणा में मुख्यमंत्री का इस्तीफा उपरोक्त वर्णित संकटों के अलावा ऐसी एक घटना रही जो लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की चिंताओं में इजाफा कर गई है। ऑल इज वेल के सुनहरे अहसास से गुजरती पार्टी भले ही लाख दावा करे, कहीं न कहीं कुछ ऐसा जरूर होने लगा है जिसके चलते ‘ऑल इज वेल’ के बजाय ‘ऑल इज नॉट वेल’ तेजी से परवान चढ़ने लगा है। हालांकि यह भी सच है कि ‘ऑल इज नॉट वेल’ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत सभी मुख्यधारा के राजनीतिक दलों पर ज्यादा सटीक बैठता है। ‘इंडिया गठबंधन’ का हश्र हमारे सामने है। ममता बनर्जी हो या फिर जम्मु-कश्मीर के विपक्षी दल, यहां तक की उत्तर प्रदेश के अखिलेश यादव, सभी कांग्रेस को लेकर संशकित हैं, इसलिए गठबंधन में आपसी रार-तकरार और अविश्वास का माहौल है जो ब्रान्ड मोदी के समक्ष विपक्ष को कमजोर कर रहा है।

