वरिष्ठ भाजपा नेता, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व विभाग प्रचारक, पूर्व संगठन मंत्री एवं वर्तमान में उत्तराखण्ड राज्य सलाहकार श्रम संविदा बोर्ड के अध्यक्ष कैलाश पन्त से ‘दि संडे पोस्ट’ के
विशेष संवाददाता कृष्ण कुमार की बातचीत
उत्तराखण्ड राज्य बने हुए 23 वर्ष पूरे हो चुके हैं और 24वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इन वर्षों में आप उत्तराखण्ड को किस स्थिति में पाते हैं?
उत्तराखण्ड शुद्ध रूप से एक पहाड़ी राज्य है। हम स्वर्गीय अटल जी के आभारी हैं कि उन्होंने उत्तराखण्ड में पहाड़ के दूर-दराज के क्षेत्रों में जो विकास की किरण नहीं पहुंच पाई, वहां कि तमाम समस्याओं को दूर करने और वहां का प्रत्येक आदमी आगे बढ़े उसको मूलभूत सुविधाएं स्वास्थ, शिक्षा, रोजगार मिलना चाहिए, इसी सोच के कारण हमको अलग पहाड़ी राज्य दिया। राज्य बना और भाजपा की अंतरिम सरकार बनी। हम इस राज्य के विकास के लिए अनेक चीजें तय कर रहे थे।
मैं अपने काम को लेकर पूरी तरह से संतुष्ट हूं। मैंने पार्टी और संघ के लिए काम किया जिसमें अपने आपको सफल मानता हूं। 2002 में मैं संगठन मंत्री बनकर यहां आया था। मेरे बाद नरेश बंसल जी और फिर धन सिंह रावत जी आए थे। मुझे गढ़वाल क्षेत्र दिया गया था। हम तीनों ने गजब का काम किया। धनसिंह जी ने कुमाऊं क्षेत्र में खूब काम किया। मेरा मान-सम्मान जो संगठन मंत्री के तौर पर था वह आज भी है उसमें कोई कमी नहीं आई है। राजनीति में भाग्य का बड़ा हाथ होता है। विधायक-सांसद बनना यह सब भाग्य की बात होती है। यह भी तो भाग्य की ही बात है कि जो पहले हम संगठन मंत्री के तौर पर चुनाव में टिकट बांटते थे लेकिन पहली बार मैंने 2022 में टिकट मांगा तो पार्टी ने मुझे टिकट नहीं दिया। तो क्या इसमें मेरी नाराजगी होनी चाहिए? मैं पार्टी का समर्पित सिपाही रहा हूं और हमेशा रहूंगा। टिकट न मिला यह कोई बड़ी बात नहीं है। एक को ही टिकट दिया जा सकता है
राज्य के विकास के लिए कैसा ब्लू प्रिंट होगा इस सोच को लेकर हम चल रहे थे। लेकिन 2002 में विट्टाानसभा चुनाव हुए और दुर्भाग्य से भाजपा चुनाव हार गई। कांग्रेस पार्टी सत्ता में आई। जिस दिन नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने उसी दिन से हरीश रावत ने तिवारी सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया। कांग्रेस के कुछ लोग हरीश रावत जी के पक्ष में थे और कुछ लोग तिवारी जी के पक्ष में। जिस दिन सरकार बनी उस दिन से लेकर पूरे पांच साल तक सरकार आपसी गुटबाजी में रही जिससे राज्य का वह विकास नहीं हो पाया जो होना चाहिए था। विकास की जो नींव पड़नी चाहिए थी वह नींव इतनी कमजोर पड़ी कि राज्य का विकास ही रूक गया। 2007 में भाजपा की बीसी खंडूड़ी सरकार बनी तो विकास के लिए पहली बार ठोस काम शुरू किए गए लेकिन उस समय भी कुछ चीजें जो नहीं होनी चाहिए थी वह भी हुई। परंतु इसमें राज्य का विकास रूका नहीं। 2012 में चुनाव हुआ तो कांग्रेस की सरकार बनी। उस समय भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा बने तो हरीश रावत जी ने उनको भी चैन से नहीं रहने दिया और फिर रावत मुख्यमंत्री बने तो उनके साथ भी वही सब हुआ जो वे दूसरों के साथ करते रहे। 2017 और फिर 2022 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता ने भाजपा को अपना बहुमत दिया तो पहली बार राज्य में एक पार्टी की लगातार दूसरी बार सरकार बनी। इसका सबसे ज्यादा फायदा प्रदेश को हुआ। चार साल त्रिवेंद्र सिंह रावत जी की सरकार रही जिसमें राज्य के विकास के लिए खूब काम हुए। धामी जी एक वर्ष के लिए मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने त्रिवेंद्र सरकार के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए बेहतर काम कर विकास का एक प्लेटफार्म तैयार किया। जनता को लगा कि प्रदेश का विकास भाजपा ही कर सकती है तो जनता ने हमें पूर्ण बहुमत से फिर से सत्ता दी और धामी जी दोबारा मुख्यमंत्री बने। वे राज्य के विकास के लिए हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं जिनमें वे पूरी तरह से सफल रहे हैं। आज प्रदेश के हर क्षेत्र में विकास के काम जितनी तेजी से हो रहे हैं उतने कभी नहीं हुए।
आज आप इतना लंबा सफर पैदल और साइकिल से नहीं कर सकते। पहले के प्रचारक करते थे लेकिन आज बदलाव देखने को मिल रहा है। यही भाजपा में भी है। तब की भाजपा और अब की भाजपा में बड़ा अंतर है साथ ही काम करने और उसके लिए निष्ठा में कोई अंतर नहीं आया है। ऐसा नहीं है कि राजनीति में कोई बदलाव नहीं आया है। बदलाव तो निश्चित आया है लेकिन यह बदलाव समाज हित के लिए ही आया है इससे ज्यादा तो मैंने कोई बदलाव महसूस नहीं किया। अगर आपका कोई बड़ा उद्देश्य है तो उसको पूरा करने के लिए दाएं-बाएं भी चलना पड़ता है लेकिन लक्ष्य देश, प्रदेश और जनता के हित में होना चाहिए तो यह गलत नहीं है
इन 24 वर्षों में राज्य की बेहतरी के किस-किस कामों को आप उपलब्धि मानते हैं?
ऐसे तो बहुत-सी बातें हैं जिनको उपलब्धियां माना जा सकता है। आज पूरे प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछ चुका है। ऐसी -ऐसी जगहों पर सड़कें बनाई जा चुकी हैं जहां सौ साल तक भी सड़कें नहीं बनाई जा सकती थी। कोई दो-चार गांव होंगे जो मुख्य सड़क एक-आधा किमी दूर होंगे, जबकि हर गांव सड़क से जुड़ चुका है। जहां टेलीफोन के टावर नहीं थे वहां टेलीफोन के टावर लग चुके हैं। राज्य का हर क्षेत्र नेटवर्क से जुड़ गया है। शिक्षा, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ी तरक्की हुई है। अनेकों डिग्री कॉलेज, पॉलिटेक्निक, खोले गए हैं जो राज्य बनने के बाद ही बने हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बहुत काम हुआ है। अस्पताल बने हैं, लोगों का इलाज हो रहा है।
भू-काूनन लागू होना चाहिए, यह मेरा मानना है। लेकिन इसमें हमें विकास को भी देखना होगा। इसके लिए कानून होना चाहिए कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति राज्य में जिस उद्देश्य के लिए जमीन खरीद रहा वह उसे माना कारखाना लगाना है, अस्पताल- स्कूल बनाने के लिए या पर्यटन के लिए जमीन खरीदी गई है तो शर्त यह होनी चाहिए कि जिस काम के लिए जमीन ली गई है उसको समय पर पूरा करे अन्यथा वह जमीन सरकार में निहित हो जाए। यह नहीं होना चाहिए कि कारखाने या अन्य काम के लिए जमीन ली है और उसमें फ्लैट बनाकर बेचने लगे या अपने रहने के लिए बंगले बनाए या उसका कारोबार करे यह कतई स्वीकार नहीं होगा
आपकी नजर में ऐसा कौन-सा कार्य है जो इन 24 वर्षों में होना चाहिए था और वह नहीं हो पाया?
एक ऐसा मामला है जो मुझे लगता है कि राज्य बनने के बाद इस पर काम नहीं हो पाया है। हमने उद्योगों की स्थापनाएं तो की हैं लेकिन उनमें सभी मैदानी क्षेत्रों में ही फोकस रहा है। अगर पहाड़ी जिलों में हम उद्योगों को ले जा पाते तो स्थितियां और भी ज्यादा बेहतर होती। लोगों को पहाड़ों में रोजगार तो मिलता ही, साथ ही उस क्षेत्र का विकास भी बहुत होता। इससे तमाम तरह की सुविधाएं भी मिल पाती। पलायन भी रूकता।
आपने कहा कि तिवारी सरकार के समय में गुटबाजी शुरू हुई जिससे राज्य का विकास नहीं हो पाया। भाजपा में भी गुटबाजी रही है। तो फिर कांग्रेस पर ही सवाल क्यों खड़े किए जाते रहे हैं?
मुझे नहीं लगता कि भाजपा में गुटबाजी है। गुटबाजी का मतलब यह होता है कि किसी को काम नहीं करने देना। गुटबाजी तो वहां होती है जहां आप विकास के कार्यों में रोड़ा बन गए, जो कांग्रेस सरकार में ही देखने को मिला है। पार्टी में विरोध-मतभेद जरूर होते हैं लेकिन उससे विकास के काम को तो नहीं रोकना चाहिए। विकास होना चाहिए, आपने क्यों नहीं किया? यह कहना गुटबाजी तो नहीं कही जा सकती।
आप लंबे समय से संघ और भाजपा संगठन की राजनीति करते रहे हैं। आपने दोनों की राजनीति को बहुत बारीकी से परखा और समझा है। तब और आज में दोनों में कोई फर्क आया है?
देखिए, समय और परिस्थितियों के साथ हर चीज बदलती है। जब संघ के प्रचारक हमें बताते थे कि गुड़ और चने खाकर काम करते थे। रहने के लिए किसी कमरे की जरूरत नहीं थी, किसी रेलवे प्लेटफार्म या कार्यकर्ता के घर में जाकर रह लेते थे। आज चीजें बदली हैं। लोगों को भी पता चला कि संघ देश के लिए क्या काम करता है? कैसे काम करता है? और देश के सर्वांगीण विकास की बात करता है तो समाज के साथ-साथ हर चीज में बदलाव हुआ है। आज हमारे अच्छे कार्यालय बन गए। प्रचारकों के लिए वाहन सुविट्टाा मिल गई है। आज आप इतना लंबा सफर पैदल और साइकिल से नहीं कर सकते। पहले के प्रचारक करते थे लेकिन आज बदलाव देखने को मिल रहा है। यही भाजपा में भी है। तब की भाजपा और अब की भाजपा में बड़ा अंतर है साथ ही काम करने और उसके लिए निष्ठा में कोई अंतर नहीं आया है।
प्रदेश के परिपेक्ष में बात करें तो क्या राजनीति में भी बदलाव आया है?
ऐसा नहीं है कि राजनीति में कोई बदलाव नहीं आया है। बदलाव तो निश्चित आया है लेकिन यह बदलाव समाज हित के लिए ही आया है इससे ज्यादा तो मैंने कोई बदलाव महसूस नहीं किया। अगर आपका कोई बड़ा उद्देश्य है तो उसको पूरा करने के लिए दाएं-बाएं भी चलना पड़ता है लेकिन लक्ष्य देश, प्रदेश और जनता के हित में होना चाहिए तो यह गलत नहीं है।
भाजपा में कांग्रेस नेताओं को शामिल करने की बड़ी होड़ मची है। क्या यह भाजपा कांग्रेस मुक्त नारे की बजाय कांग्रेस युक्त भाजपा नहीं हो रही है?
इसमें हर्ज ही क्या है। यह लोकतंत्र है। जिसको जहां जाना होगा या आना होगा वह आएगा। कोई कैसे रोक सकता है। यह तो अच्छी बात है कि भाजपा की नीतियों से प्रभावित होकर कांग्रेस के नेता भाजपा में आ रहे हैं। भाजपा में कांग्रेसी नेताओं के आने से क्या पार्टी की विचारधारा बदल जाएगी? क्या हमारी जो पंच निष्ठाएं हैं वह बदल जाएगीं? भाजपा का जो मिशन है, क्या वह हम छोंड़ देंगे? हमारी विचारधारा बहुत मजबूत है। जिन लोगांे या पार्टी में व्यक्तिगत स्वार्थ होता है वह इस तरह के माहौल को नहीं संभाल सकते। भाजपा में कोई भी आए वह पार्टी की ही विचारधारा में आएगा और रहेगा।
भाजपा में किसी अन्य दल का कोई नेता आता है तो वह अपने साथ अपने समर्थकांे और समर्पित कार्यकताओं को भी लेकर आता है। इससे मूल भाजपा के कैडर और कार्यकर्ता पीछे रह जाते हैं जबकि नए नेता के समर्थक और कार्यकर्ताओं को ज्यादा लाभ मिलने लगता है। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में हताशा भी देखी जा रही है?
मुझे तो ऐसा कहीं नहीं लगा कि भाजपा का मूल कार्यकर्ता पर कोई नया कार्यकर्ता हावी हुआ हो। कहीं हो सकता है कि एकाध बार ऐसा हुआ हो लेकिन ऐसा है नहीं भाजपा तो एक सागर है सब इसमें समा जाते हैं।
आज आपके साथ के नेता धनसिंह रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं तो नरेश बंसल राज्यसभा सांसद बन चुके हैं। आप सरकार में केवल दायित्वधारी ही बन पाए हैं। क्या आपका आकलन पार्टी सही तरीके से नहीं कर पाई है?
मैं अपने काम को लेकर पूरी तरह से संतुष्ट हूं। मैंने पार्टी और संघ के लिए काम किया जिसमें अपने आपको सफल मानता हूं। 2002 में मैं संगठन मंत्री बनकर यहां आया था। मेरे बाद नरेश बंसल जी और फिर धन सिंह रावत जी आए थे। मुझे गढ़वाल क्षेत्र दिया गया था। हम तीनों ने गजब का काम किया। धनसिंह जी ने कुमाऊं क्षेत्र में खूब काम किया। मेरा मान-सम्मान जो संगठन मंत्री के तौर पर था वह आज भी है उसमें कोई कमी नहीं आई है। राजनीति में भाग्य का बड़ा हाथ होता है। विधायक-सांसद बनना यह सब भाग्य की बात होती है। यह भी तो भाग्य की ही बात है कि जो पहले हम संगठन मंत्री के तौर पर चुनाव में टिकट बांटते थे लेकिन पहली बार मैंने 2022 में टिकट मांगा तो पार्टी ने मुझे टिकट नहीं दिया। तो क्या इसमें मेरी नाराजगी होनी चाहिए? मैं पार्टी का समर्पित सिपाही रहा हूं और हमेशा रहूंगा। टिकट न मिला यह कोई बड़ी बात नहीं है। एक को ही टिकट दिया जा सकता है।
प्रदेश सरकार में आप श्रम संविदा बोर्ड के अट्टयक्ष हैं। संविदाकर्मियों को लेकर अनेक बार घोषणाएं हुई हैं लेकिन कभी पूरी नहीं हो पाई है। आपके पास इसकी क्या योजना है?
संविदा केवल मेरे ही बोर्ड का नहीं है हर विभाग का मामला है। संविदा में जब लोग रखे जाते हैं तो इसके कुछ नाम होंगे। मैं इसका अध्ययन कर रहा हूं। जो भी लोग संविदा या आउटसोर्स से रखे गए हैं। आखिर हैं तो हमारे ही प्रदेश के लोग। इसके लिए क्या किया जा सकता है? मैं इसको देख रहा हूं। सरकारी विभागों में सरकार द्वारा जो भी संविदा में हमने लगाए हैं उनके लिए तो रास्ते निकलने ही चाहिए, इसके पक्ष में तो मैं भी हूं। एक आदमी कई साल से सरकारी विभाग में काम कर रहा है जिसको वेतन बहुत कम मिल रहा है और दूसरी तरफ कोई दूसरा व्यक्ति सीधे सरकारी नौकरी से आता है तो उसे 60-70 हजार वेतन मिल रहा है जबकि उसे कोई अनुभव भी नहीं है। इसलिए संविदाकर्मियों को सरकारी सेवा में पक्का करना चाहिए। सरकार भी इस पर कोई योजना बनाए, मेरा इसमें पूरा सहयोग रहेगा।
आजकल प्रदेश में मूल निवास और भू-कानून की मांग बड़े जोर-शोर से उठाई जा रही है। इसके लिए लगातार आंदोलन हो रहा है। इस पर आपका क्या विचार है?
भू-काूनन लागू होना चाहिए, यह मेरा मानना है। लेकिन इसमें हमें विकास को भी देखना होगा। इसके लिए कानून होना चाहिए कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति राज्य में जिस उद्देश्य के लिए जमीन खरीद रहा वह उसे माना कारखाना लगाना है, अस्पताल-स्कूल बनाने के लिए या पर्यटन के लिए जमीन खरीदी गई है तो शर्त यह होनी चाहिए कि जिस काम के लिए जमीन ली गई है उसको समय पर पूरा करे अन्यथा वह जमीन सरकार में निहित हो जाए। यह नहीं होना चाहिए कि कारखाने या अन्य काम के लिए जमीन ली है और उसमें फ्लैट बनाकर बेचने लगे या अपने रहने के लिए बंगले बनाए या उसका कारोबार करे यह कतई स्वीकार नहीं होगा। मूल निवास का मैं भी पूरी तरह से समर्थक हूं। मूल निवास कब से लागू होना चाहिए इसकी एक डेट होनी चाहिए। जो मूल निवास की मांग कर रहे हैं उनका पक्ष भी सही है और जो इसके लिए एक डेट निकालने की बात कर रहे हैं उनका भी पक्ष सुनना जरूरी है। कोई न कोई डेट निकालनी तो पडे़गी। हमारी सरकार ने इसके लिए एक कमेटी बना दी है जो इसका अध्ययन कर रही है।
लोकसभा चुनाव में पांचों सीट जीतने के भाजपा के दावे का क्या आधार है?
केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की भाजपा सरकार के कामकाज के आधार पर हम प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटें जीत रहे हैं इसमें किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। प्रदेश में भाजपा सरकार के काम के कारण ही हमें 2022 में फिर से पूर्ण बहुमत मिला है। 2019 में देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम से ही जनता ने केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार दी है। इसी तरह मोदी जी 2024 में भी प्रचंड बहुमत से तीसरी बाार प्रधानमंत्री बनेंगे।
आज प्रदेश में गंगा नदी पर अनेकों परियोजनाएं चल रही हैं और गौ वंश की सबसे ज्यादा दुर्दशा हो रही है। संघ अब उतना मुखर नहीं नजर आ रहा है। क्या यह संघ का दोहरा रवैया है?
संघ के भवराव देवरस जी की एक कल्पना थी कि अलग उत्तरांचल राज्य बनना चाहिए। जब उत्तराखण्ड राज्य बना था तो इसका नाम उत्तरांचल ही रखा गया था। यह नाम इसलिए था कि उत्तराखण्ड उत्तर का आंचल माना जाता है। यह अलग संस्कृति और समाज का क्षेत्र था। गंगा, यमुना और अन्य नदियां हिमालय इस क्षेत्र की पहचान हैं। यहां तीर्थ स्थान हैं जिनको सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है। लेकिन राज्य का विकास भी बहुत जरूरी है। विकास के लिए हमारी पहचान खत्म न हो इसके लिए संघ काम करता रहा है और करता रहेगा। विकास और पर्यावरण, संस्कृति समाज को एक साथ कैसे आगे रखना है, सरंक्षण देना है, इस पर काम करता रहा है।
भारत में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं जिनमें उत्तराखण्ड का केदारनाथ है। नागेश्वर जो कि अल्मोड़ा जिले में जागेश्वर के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नागेश्वर दारूकावने के नाम से यही जागेश्वर हैं। अब इसके लिए रोड चौड़ी करने का प्रस्ताव पास हुआ है जिसमें एक हजार देवदार के प्राचीन वृक्षों को काटा जाना है। अगर देवदार के पेड़े काटे जाएंगे तो प्राचीनता और संस्कृति भी तो खत्म होगी। इसको कैसे रोकेंगे?
जो रोड चौड़ी होगी उसमें देवदार के वन ही नहीं है। देवदार के वन तो मुश्किल से मंदिर से पहले एक किलोमीटर से शुरू होते हैं। हजारों पेड़ कैसे काटे जाएंगे यह मैं नहीं समझ रहा हूं। फिर भी अगर ऐसा हो रहा है तो सरकार ने जरूर कोई न कोई विकल्प ढूंढ़ा होगा। जागेश्वर की शान ही देवदार के पेड़ों से है। बड़े-बड़े विशाल देवदार के पेड़ हैं वे तो नहीं काटे जा सकते। मैं इसकी पूरी जानकारी लूंगा। अगर ऐसा हो रहा है तो यह सही नहीं है।
राज्य की बेहतरी के लिए कौन से ऐसे पांच मुद्दे हैं जिन पर काम किया जाना चाहिए?
पहला है स्वास्थ। आज हम स्वास्थ के क्षेत्र में तरक्की तो कर चुके हैं लेकिन अभी भी इसमें कमी बनी हुई है। हर नागरिक को चिकित्सा और स्वास्थ्य की सुविधा मिलनी चाहिए। गांव में स्वास्थ सेवाओं के लिए ज्यादा काम करने की जरूरत है। दूसरा हर व्यक्ति को रोजगार देना और उसे उसके ही गांव, शहर, कस्बे में रोजगार मिले यह प्राथमिकता होनी चाहिए। हर आदमी को सरकारी नौकरी तो नहीं मिल सकती लेकिन रोजगार के साधन इतने होने चाहिए कि हर युवा के हाथों में रोजगार हो। इसके लिए सबसे ज्यादा पहाड़ों में फोकस हो और पहाड़ में स्थानीय लोगों को 70 प्रतिशत का अनुपात होना चाहिए। यह नियम जरूरी है। इससे पलायन भी रूकेगा और पहाड़ के युवा अपने ही गंाव मे रूकेंगे। तीसरा सड़कंे बेहतर और अच्छी होनी चाहिए। अगर सड़क मार्ग सही है तो विकास होगा, रोजगार के साधन बढ़ेंगे। चौथा है शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। शिक्षा, रोजगार परख और बेहतर होगी तो युवाओं के लिए अनेक रास्ते बनेंगे। पहाड़ों में इंग्लिश मीडियम स्कूलों को खुलना चाहिए। अच्छे स्कूल होंगे तो पढ़ाई भी अच्छी होगी। पांचवा मुद्दा है बिजली और पानी। इसकी व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए।
कैलाश पन्त का सफर
जन्मतिथि: 09 अक्टूबर 1964। सिरमोली, पन्तगांव (रानीखेत), अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड।
शैक्षिक योग्यता: एम.ए. राजनीतिशास्त्र, कुमाऊं यूनिवर्सिटी, उत्तराखण्ड, डिप्मोला इलेक्ट्रीशियन।
वर्तमान दायित्व: भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, राज्य सरकरी
श्रम संविदा बोर्ड के अध्यक्ष।
प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष: पंडित दीनदयाल सेवा प्रतिष्ठान उत्तराखण्ड।
पूर्व प्रदेश महामंत्री संगठन
संगठनात्मक सामाजिक विवरण क्रमवार
वर्ष 1986 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर कार्य किया।
वर्ष 1989 में संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्मशताब्दी वर्ष, का रामनगर (नैनीताल) क्षेत्र का संयोजक ।
संघ शिक्षा वर्ग तृतीय प्रशिक्षण प्राप्त।
वर्ष 1990 में संघ प्रचारक बनने का संकल्प।
वर्ष 1990 से 1992 तक नजीबाबाद, जिला जिला बिजनौर में संघ प्रचारक।
वर्ष 1992 से 1995 तक हिमाचल प्रदेश के कांगडा जिले (पालमपुर) में जिला प्रचारक।
वर्ष 1996 में सहारनपुर जिले का लोक जागरण अभियान का जिला संयोजक ।
वर्ष 1997 से 1999 तक महानगर प्रचारक मेरठ (उत्तर प्रदेश)।
वर्ष 1999 में जिला प्रचारक हापुड़ गाजियाबाद।
वर्ष 2000 से 2002 तक विभाग प्रचारक, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली। वर्ष 2002 अगस्त में संघ योजना से उत्तराखण्ड भाजपा सम्भाग संगठन मंत्री गढ़वाल क्षेत्र (तीन लोक सभा एवं 41 विधानसभा का दायित्व मिला)।
वर्ष 2007 जून तक उपरोक्त दायित्व का कुशलतापूर्वक निर्वहन।
वर्ष 2008-2009 में भाजपा उत्तराखण्ड प्रदेश के सभी मोर्चा/प्रकोष्ठों का प्रदेश प्रभारी।
वर्ष 2010 से 2012 तक उत्तराखण्ड सरकार में दर्जा राज्य मंत्री।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव रानीखेत में चुनाव प्रभारी।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अल्मोड़ा पिथौरागढ़ लोकसभा चुनाव सहप्रभारी।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बागेश्वर जिले के चुनाव प्रभारी।
वर्ष 2019 में टिहरी लोकसभा चुनाव प्रभारी व संगठनात्मक दृष्टि से पौड़ी जिला प्रभारी।
उत्तराखण्ड लोकसभा चुनाव पश्चात पूर्वी दिल्ली लोकसभा का प्रवासी लोकसभा प्रभारी।
वर्ष 2019 में हरियाणा विधानसभा चुनावों में फरीदाबाद जिले के बड़कल विधानसभा में उत्तराखण्ड संगठन द्वारा चुनाव प्रभारी के नाते भेजा गया। एक माह चुनाव कार्य में पूर्ण योगदान के साथ कार्य किया और विधानसभा में प्रत्याशी श्रीमती सीमा त्रिखा को विजय प्राप्त हुई।
वर्ष 2021 में उत्तराखण्ड सरकार में दर्जा राज्य मंत्री।
विजन: हर नागरिक को चिकित्सा और स्वास्थ्य की सुविधा मिलनी चाहिए। रोजगार के साधन इतने होने चाहिए कि हर युवा के हाथों में रोजगार हो। शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। पहाड़ों में इंग्लिश मीडियम स्कूलों को खुलना चाहिए। अच्छे स्कूल होंगे तो पढ़ाई भी अच्छी होगी साथ ही बिजली-पानी की व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए।
2007 में भाजपा की बीसी खंडूड़ी सरकार बनी तो विकास के लिए पहली बार ठोस काम शुरू किए गए लेकिन उस समय भी कुछ चीजें जो नहीं होनी चाहिए थी वह भी हुई। परंतु इसमें राज्य का विकास रूका नहीं। 2017 और फिर 2022 में भाजपा की सरकार बनी। जनता ने भाजपा को अपना बहुमत दिया तो पहली बार राज्य में एक पार्टी की लगातार दूसरी बार सरकार बनी। इसका सबसे ज्यादा फायदा प्रदेश को हुआ। चार साल त्रिवेंद्र सिंह रावत जी की सरकार बनी जिसमें राज्य के विकास के लिए खूब काम हुए। धामी जी एक वर्ष के लिए मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने त्रिवेंद्र सरकार के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए बेहतर काम कर विकास का एक प्लेटफार्म तैयार किया। धामी जी दोबारा मुख्यमंत्री बने। वे राज्य के विकास के लिए हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं और वे पूरी तरह से सफल रहे हैं। आज प्रदेश के हर क्षेत्र में विकास के काम जितनी तेजी से हो रहे हैं उतने कभी नहीं हुए
मुझे नहीं लगता कि भाजपा में गुटबाजी है। गुटबाजी का मतलब यह होता है कि किसी को काम नहीं करने देना। गुटबाजी तो वहां होती है जहां आप विकास के कार्यों में रोड़ा बन गए, जो कांग्रेस सरकार में ही देखने को मिला है। पार्टी में विरोध-मतभेद जरूर होते हैं लेकिन उससे विकास के काम को तो नहीं रोकना चाहिए। विकास होना चाहिए, आपने क्यों नहीं किया? यह कहना गुटबाजी तो नहीं कही जा सकती
केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की भाजपा सरकार के कामकाज के आधार पर हम प्रदेश की पांचों सीटें चुनाव में जीतने जा रहे हैं इसमें किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। प्रदेश में भाजपा सरकार के काम के कारण ही हमें 2022 में फिर से पूर्ण बहुमत मिला है। 2019 में देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम से ही जनता ने हमें केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार दी है। इसी तरह मोदी जी 2024 में भी प्रचंड बहुमत से तीसरी बाार प्रधानमंत्री बनेंगे

