आम चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही सभी राजनीतिक दल चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। ऐसे में एक ओर जहां भाजपा अबकी बार 400 पार का दावा कर रही है वहीं पार्टी ने उड़ीसा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया है। उड़ीसा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनमोहन सामल ने एक पोस्ट के जरिए कहा कि भाजपा इस बार उड़ीसा में लोकसभा की सभी 21 और विधानसभा की सभी 147 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि आखिर एनडीए का बिना बीजेडी के 400 से ज्यादा सीटें जीतने का टारगेट कैसे पूरा होगा?

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि गठबंधन को लेकर दोनों पक्षों के बीच पिछले करीब तीन हफ्तों से चल रही बातचीत भले ही विफल हो गई हो लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के पोस्ट से इस बात का संकेत जरूर मिलता है कि चुनाव के बाद भी दोनों पार्टियों में मधुर संपर्क बना रहेगा और अगर एनडीए गठबंधन तीसरी बार सत्ता में आता है तो संसद के भीतर और बाहर भी सरकार को बीजेडी का समर्थन मिलता रहेगा।

गौरतलब है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी दो बार उड़ीसा के दौरे पर गए थे। दोनों ही बार मोदी मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ एक मंच पर दिखे। दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता ये देखने के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे कि प्रधानमंत्री मोदी पटनायक या उनकी सरकार के खिलाफ कुछ बोलते हैं या नहीं। लेकिन दोनों ही बार पीएम मोदी ने पटनायक और उनकी सरकार के बारे में एक शब्द नहीं बोला। उल्टा नवीन को ‘मेरे मित्र’ कहकर संबोधन किया और उन्हें ‘लोकप्रिय मुख्यमंत्री’ बताया।

इसके बाद से ही दोनों पक्षों में गठबंधन की चर्चाएं सुर्खियों में थीं। लेकिन अब जब कि यह स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी अकेले चुनाव लड़ने जा रही है, देखना यह है कि पीएम मोदी जब चुनाव प्रचार के लिए उड़ीसा आएंगे, तब उनके रवैये में कोई बदलाव आता है या नहीं। दूसरा यह कि जिस समय बीजेडी की एनडीए में वापसी की चर्चा जोरों पर थी, उस समय भी दोनों पार्टियों के नेता यह दावा कर रहे थे कि वे अपने दमखम पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। सवाल उठता है कि गठबंधन की बात आई कहां से? किसे थी इसकी जरूरत? और तीन हफ्तों तक दोनों पार्टियों ने गठबंधन की चर्चा का खंडन क्यों नहीं किया? सच यह है कि दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता ही गठबंधन के लिए उत्सुक थे जबकि दोनों ही पार्टियों के आम कार्यकर्ता इससे बेहद नाराज थे। दोनों दलों के शीर्ष नेता अपने- अपने राजनीतिक कारणों से गठबंधन चाहते थे। बीजेपी इसलिए गठबंधन चाहती थी कि बीजेडी के साथ आ जाने से पार्टी को अपने ‘अबकी बार, 400 पार’ के लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। साथ ही लगातार 24 साल तक मुख्यमंत्री बने नवीन जैसे लोकप्रिय नेता के एनडीए में आ जाने से देशभर में बीजेपी के लिए एक सकारात्मक संदेश जाएगा जिसका फायदा पार्टी को मिलेगा।

दूसरी तरफ बीजेडी क्यों गठबंधन चाहती थी, इसे लेकर राजनीतिक जानकारों की अलग-अलग राय है। कुछ का कहना है कि बीजेडी सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहे, लेकिन इस बार पार्टी की स्थिति वैसी नहीं है जैसी 2019 या उससे पहले थी। लगातार पांच बार सत्ता में रहने के बाद पार्टी को पहली बार ‘सत्ता विरोधी लहर’ का सामना करना पड़ रहा है जिससे इस बार लोकसभा और विधानसभा में पार्टी की सीटों की संख्या में भारी गिरावट आ सकती है। इसलिए चुनाव से पहले मुख्य विरोधी दल से हाथ मिलाना बीजेडी के लिए राजनीतिक मजबूरी है।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बीजेपी के गठबंधन के प्रस्ताव को ठुकरा देने पर कहीं चुनाव के बाद नवीन सरकार का भी वही हश्र न हो जाए जो झारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और दिल्ली की गैर बीजेपी सरकारों का हो रहा है। नवीन के राज में राज्य में खनन स्कैम, चिट फंड स्कैम जैसे कई घोटाले हुए, लेकिन बीजेडी और बीजेपी के मधुर संबंध के कारण प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों ने अभी तक उड़ीसा का रुख़ नहीं किया है। गठबंधन के लिए राजी न होने पर कहीं ये एजेंसियां नवीन के लिए समस्या पैदा न कर दें, बीजेडी को यही चिंता सता रही थी। लेकिन गठबंधन के लिए बीजेडी के आग्रह का सबसे विश्वसनीय कारण यह है कि ऐसा करके पार्टी के ताकतवर नेता वीके पांडियान, जिन्हें कई लोग नवीन के उत्तराधिकारी के रूप में देख रहे हैं, अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना चाहते थे। हालांकि चुनाव परिणाम जो भी आए, बहुत कम लोगों को लगता है कि दोनों पार्टियों में आर-पार की लड़ाई होगी। अधिकांश लोगों का यही मानना है कि अगर सचमुच लड़ाई हुई भी तो चुनाव के बाद दोनों पार्टियों के बीच एक बार फिर वही ‘अनौपचारिक गठबंधन’ शुरू हो जाएगा, जो 2019 के चुनाव के बाद से चलता आ रहा है।

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