अफगानिस्तान की असफलता को लेकर अमेरिका की हर तरफ से किरकिरी हो रही है। तालिबान के प्रति चीन, रूस, पाकिस्तान का जो रुख दिखाई दे रहा है, वह भी अमेरिका के लिए कूटनीतिक लिहाज से एक नई चुनौती साबित होने जा रहा है
अफगानिस्तान पर इस वक्त पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। दुनिया का हर इंसान चाहता है कि उस देश के लोगों के मानवाधिकारों की हिफाजत हो और वहां जीवन आतंक के साये में न रहे। हालांकि तालिबान भी यही संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि लोगों को डरने की जरूरत नहीं, आम जनता को माफी की भी वह घोषणा कर चुका है। लेकिन अतीत में उसके आतंक की मार झेल चुकी अफगान की जनता भला कैसे उस पर यकीन कर सकती है। खासकर जबकि सरेआम जनता पर जुल्म हो रहे हों। अफगानिसतान में जो हुआ उससे दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी सवालों के घेरे में है। पाकिस्तान खुलेआम तालिबान के साथ है और चीन ने भी स्पष्ट संकेत दिये हैं कि वह तालिबान की सरकार को मान्यता देगा। रूस और ईरान का भी जानकार यही रुख मानते हैं। इससे साफ है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस, चीन, ईरान, पाकिस्तान और तालिबान का एक मजबूत गठजोड़ बनने के संकेत हैं। ऐसे में अमेरिका, भारत और जापान सरीखे उन देशों की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़नी स्वाभाविक हैं जिन्हें चीन फूटी आंख नहीं देखना चाहता। सबसे हास्यास्पद स्थिति दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका की है।
अमेरिका बीस साल तक अफगानिस्तान में तालिबानी आतंकियों के खिलाफ लड़ता रहा, लेकिन उसे इसका नुकसान ही हुआ। अफगानिस्तान को लेकर पूरी दुनिया में अमेरिका की किरकिरी हो रही है। राष्ट्रपति बाइडन के खिलाफ पूर्व राष्ट्रपति टंªप भी मुखर हैं। जानकार मानते हैं कि अमेरिका अफगान को संकट से बचा सकता था, लेकिन बाइडन की बेपरवाही ने सब कुछ बर्बाद करके रख दिया। यहां तक कि अमेरिकी सेना के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने भी जल्द बाजी से बचने और चरणबद्ध तरीके से सैन्य बलों की वापसी का सुझाव दिया था, लेकिन राष्ट्रपति ने ऐसी सलाह को दरकिनार करते हुए वापसी को लेकर वीटो कर दिया। वैसे तो अमेरिका ने 31 अगस्त तक अफगानिस्तान से अपने सभी सैन्य बल वापस बुलाने की तारीख तय की थी, लेकिन उसने काफी पहले से ही अपना बोरिया बिस्तर बांधना शुरू कर दिया था। पिछले माह ही रातों-रात बगराम एयरबेस खाली करने जैसी घटनाओं से स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे। स्वाभाविक है कि इससे तालिबान का हौसला बढ़ा। इसके परिणाम एक के बाद एक प्रांतों और हेरात से लेकर कंधार तथा अब काबुल तक तालिबानी कब्जे के रूप में देखने को मिले। इस स्थिति के लिए भी अमेरिका ही पूरी तरह जिम्मेदार है।
गत वर्ष जब उसने तालिबान के साथ बातचीत की शुरुआत की तो उसमें इस जिहादी समूह ने कई मांगें रखी थी। इसमें उसने अफगान सरकार के कब्जे में कैद पांच हजार तालिबानियों की रिहाई के लिए भी कहा था। अफगान सरकार इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने में हिचक रही थी, लेकिन अमेरिकी दबाव में उसे झुकना पड़ा। उन पांच हजार बंदियों के छूटने से तालिबानी धड़े को मजबूती मिली और वही अफगान सुरक्षा बलों के लिए नासूर बन गए। ऐसे में अमेरिका न केवल तालिबान का मिजाज भांपने में नाकाम रहा, बल्कि वह अफगानिस्तान के संदर्भ में दीवार पर लिखी साफ इबारत को भी नहीं पढ़ पाया। उसकी खुफिया एजेंसियों की पोल खुल गई। जो अमेरिकी एजेंसियां कह रही थीं कि काबुल पर कब्जा करने में तालिबान को 90 दिन और लग सकते हैं, ऐसे अनुमानों की भी तालिबान ने हफ्ते भर से कम समय में ही हवा निकालकर रख दी।
विडंबना ही कही जाएगी कि एक ओर तो अमेरिका खुद को दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकारों का बादशाह बताता है और अपनी इसी छवि को मजबूत करने के लिए उसने कई देशों में युद्ध लड़े और अपनी सेना को वहां भेजा, लेकिन इनमें से किसी भी संघर्ष से उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। उल्टा उसे हर मोर्चे पर मुंह की खानी पड़ी और काफी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।
अफगानिस्तान के इन हालात के लिए दुनिया भर में सबसे ज्यादा आलोचना अमेरिका की हो रही है, जिसने चुपचाप रातों रात चोरों की तरह अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुला लिया और वहां के लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया। यह कोई पहला मौका नहीं, बल्कि अमेरिका पहले भी ऐसा कर चुका है।
कोरियाई युद्ध
वर्ष 1950 में जब सोवियत संघ और चीन ने उत्तर कोरिया की कम्युनिस्ट ताकतों का साथ दिया तो अमेरिका ने इसके खिलाफ दक्षिण कोरिया के समर्थन का ऐलान किया था। कम्युनिस्ट ताकतों के खिलाफ अमेरिका ने अपनी सेना वहां भेजी और ये युद्ध लगभग तीन वर्षों तक चला। इसमें अमेरिकी सेना के 36 हजार 574 सैनिक मारे गए। इस युद्ध पर अमेरिका ने लगभग 400 बिलियन डॉलर यानी आज के हिसाब से 29 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे, लेकिन अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ।
वियतनाम में दोहराई गलती
अमेरिका ने जो गलती कोरिया में की, वही गलती उसने वियतनाम में भी दोहराई। वियतनाम को गृह युद्ध से बाहर निकालने और वहां की कम्युनिस्ट ताकतों को उखाड़ फेंकने के लिए उसने वर्ष 1965 में अपने सैनिकों को वहां भेजा। अमेरिका ने लगभग 8 वर्षों तक वियतनाम में युद्ध लड़ा, जिसमें उसके लगभग 60 हजार सैनिक मारे गए। इस युद्ध पर उसने कोरियाई युद्ध के मुकाबले दोगुना खर्च किया। लगभग 850 बिलियन डॉलर्स यानी आज के हिसाब से 64 लाख करोड़ रुपये। अपने हजारों सैनिकों और लाखों करोड़ों रुपये बर्बाद करने के बाद भी अमेरिका को वियतनाम से भी कुछ हासिल नहीं हुआ। बड़ी बात ये है कि अफगानिस्तान की तरह वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका दक्षिण वियतनाम के लोगों को मरने के लिए छोड़कर चला गया था।
खाड़ी युद्ध से कुछ भी हासिल नहीं
खाड़ी युद्ध में अमेरिका ने खुद को चैम्पियन की तरह दिखाने की कोशिश की थी। दरअसल, इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने अगस्त 1990 में कुवैत पर हमला कर दिया था। जिसके बाद गल्फ वार शुरू हुआ। उस समय अमेरिका के नेतृत्व में नाटो यानी नार्थ एथलेटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन समेत कुल 52 देशों ने इराक पर हमला कर दिया था। इस युद्ध में अमेरिका कुवैत को इराक के कब्जे से छुड़ाने में कामयाब हुआ, लेकिन सद्दाम हुसैन इराक की सत्ता में बने रहे, जिसके लिए 13 साल बाद अमेरिका को फिर से इराक पर हमला करना पड़ा, इसे ही इराक युद्ध की शुरुआत माना गया।
इस गल्फ वार में अमेरिका के 383 सैनिक मारे गए और उसने इस युद्ध पर 116 बिलियन डालर यानी 9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। नतीजा बाकी युद्ध और संघर्षों की तरह ही रहा और अमेरिका को ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ। समझने वाली बात ये है कि अमेरिका दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल देकर युद्ध तो शुरू कर देता है, लेकिन वो इसे कभी भी अंतिम रूप नहीं दे पाता, जहां उसे लगता है कि अब उसके लिए कुछ नहीं बचा है तो वो उस देश से निकल जाता है जैसा कि उसने अब अफगानिस्तान में किया है। अफगानिस्तान में 20वर्षों तक अमेरिका की सेना तैनात रही और इस दौरान उसने 910 बिलियन डॉलर्स यानी 68 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन इसके बावजूद वो बुरी तरह फेल हुआ।
हालांकि अमेरिका दुहाई तो लोकतंत्र और मानवाधिकारों की देता है, लेकिन असल में अमेरिका ने एक जिम्मेदार देश की भूमिका निभाई है, लेकिन अगर आप इनका विश्लेषण करेंगे तो आपको समझ आएगा कि अमेरिका ने अपने फायदे और अपनी विदेश नीति को साधने के लिए ये सारे युद्ध लड़े। अपने हितों को पूरा करने के बाद वो इन देशों को उनके हाल पर छोड़ कर वापस चला गया।
अफगानी सेना ने क्यों किया सरेंडर?
एक बड़ा सवाल ये भी है कि अफगानिस्तान की जिस सेना को अमेरिका ने 20 वर्षों तक ट्रेनिंग दी, इस ट्रेनिंग पर 83 बिलियन डालर्स यानी 6 लाख 20 हजार करोड़ रुपये खर्च किए, आधुनिक हथियार दिए, सैन्य अड्डे बनाए वो सेना तालिबान के 75 हजार आतंवादियों से कैसे हार गई? इसे इन कारणों से समझा जा सकता है।
भ्रष्टाचारः अधिकारिक तौर पर अफगानिस्तान की सेना में कुल जवानों की संख्या लगभग 3 लाख है, जबकि सच ये है कि इनमें से हजारों सैनिक केवल कागजों पर ही मौजूद हैं। इनके नाम पर मिलने वाला वेतन और दूसरी सुविधाएं बड़े कमांडिंग आफिसर्स भ्रष्टाचार के रूप में लूट लेते हैं। इस तरह के सैनिकों को घोस्ट सोल्जर्स कहा जाता है।
जुनून की कमीः जिस तरह से तालिबान के आतंकवादी अफगानिस्तान पर अपना शासन बहाल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और खून खराबा कर सकते हैं, वो जुनून और प्रतिबद्धता अफगानिस्तान के सैनिकों में नहीं दिखी। अफगानिस्तान के सैनिक मैदान में जाने से पहले ही तालिबान के आंतकवादियों से हार गए।
विद्रोह नहीं होना: तालिबान ने पिछले एक महीने में एक- एक करके अफगानिस्तान के ज्यादातर प्रांतों पर कब्जा कर लिया, मगर इस बीच उसके खिलाफ कोई विद्रोह नहीं हुआ। आज जो स्थिति बनी उसे परखने में अमेरिका और उनकी खुफिया एजेंसियां असफल रहीं। अफगानिस्तान में स्थिरता और स्थायित्व के लिए अमेरिकी सैन्य बलों की उपस्थिति आवश्यक थी, लेकिन उसने परिस्थितियों और परिणाम की परवाह न करते हुए आनन-फानन में अफगानिस्तान से निकलने का जो दांव चला, उससे इस समूचे क्षेत्र को खतरे में झोंक दिया।

