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… और तब प्रधानमंत्री नहीं बन पाए तिवारी

 

 

 

भारतीय राजनीति में कई ऐसे राजनेता हुए हैं जिन्होंने अपने संघर्ष और मेहनत के बूते राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। राष्ट्रीय राजनीति में पंडित नारायण दत्त तिवारी की पहचान एक ‘विकास पुरुष’ की मानी जाती है। कहा जा सकता है कि जो शख्स तीन बार उत्तर प्रदश्े ा और फिर उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री रहा हो, जिसने केंद्र में विभिन्न अहम मंत्रालयों का दायित्व निभाया है, उसे विकास करने के अवसर मिलने स्वाभाविक हैं। लेकिन सच यह भी है कि विकास के अवसर स्वतः हासिल नहीं होते, बल्कि इसके लिए खून पसीना एक करना होता है। बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे पंडित तिवारी ने यदि राजनीति में ऊंचे मुकाम हासिल किए तो इसके पीछे उनका लंबा संघर्ष रहा। बहुत छोटी सी उम्र में वे अपने पिता के पद्चिन्हों पर चलते हुए स्वाधीनता आंदोलन में उतर गए। 19 दिसंबर 1942 को स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने पर पिता-पुत्र दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। 7 मार्च 1944 तक वे बरेली जेल में रहे। 1947 में तिवारी इलाहाबाद विश्व विद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। छात्र जीवन में वे पंडित जवाहर लाल नेहरू/ लोकनायक जय प्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव एवं पंडित मदन मोहन मालवीय जैसी विभूतियों के संपर्क में आए। इनके विचारों का तिवारी के जीवन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने कुमाऊं मंडल में मजदूरों, शोषितों और वंचितों की लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठा लिया। उन्होंने रोडवेज कर्मचरी यूनियन, नगर पालिका कर्मचारी यूनियन, समाजवादी युवक सभा, चीनी मिल मजदूर यूनियन, काठगोदाम रेलवे कुली यूनियन जैसे कई श्रमिक संगठनों का गठन कर उनका नेतृत्व भी किया। नैनीताल जिले को तिवारी ने अपनी राजनीति के लिए खासतौर पर कर्मभूमि बनाया। 1952 में वे यहां से प्रथम आम चुनाव में प्रजा शोसलिस्ट पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे और विधानसभा पहुंचे। गौर करने वाली बात है कि इस चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज प्रत्याशी श्याम लाल वर्मा के पक्ष में माहौल बनाने खुद पंडित नेहरू और पंडित गोविंद बल्लभ पंत चुनावी मैदान में उतरे थे,लेकिन तिवारी की आम जन में इतनी गहरी पकड़ थी कि वे विजयी रहे। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचने वाले वे सबसे कम आयु (26 वर्ष) के विधायक थे। 10 मई 1954 को उनका डाॅक्टर सुशीला सनवाल के साथ विवाह हुआ। 1957 के चुनाव में भी तिवारी नैनीताल से विजयी हुए। अध्ययन और अनुभव हासिल करने में तिवारी की तीव्र इच्छाशक्ति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मार्च 1959 में उत्तर प्रदेश विधानसभा से अध्ययन अवकाश लेकर उन्होंने यूरोपीय देशों की यात्राएं की। विभिन्न देशों की संसदीय व्यवस्था का अध्ययन करने वे इजरायल, मिस्र, बुल्गारिया, यूगोस्लाविया, हंगरी, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड आदि देशों में गए। यात्रा के दौरान वे जर्मनी के समाजवादी नेता बिलीब्रांट, स्वीडन के प्रधानमंत्री ओलेफे पाल्मे, आॅस्ट्रिया के चांसलर ब्रूनो काइस्ट और गुन्नार मिर्डल आदि समाजवादी नेताओं के संपर्क में आए। समाजवादी नेताओं और चिंतकों के प्रति तिवारी का विशेष आकर्षण रहा, लेकिन दुर्भाग्य से 1962 के आम चुनाव तक भारत में समाजवादी बिखरने लगे और नतीजा यह रहा कि तिवारी नैनीताल से विधानसभा चुनाव हार गए। 1965 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली। 1967 में काशीपुर से विधानसभा चुनाव हारे, लेकिन 1969 का मध्यवधि चुनाव उनके लिए इतना अधिक सौभाग्यशाली रहा कि जीतते ही सीधे चंद्र भानु गुप्त सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। इसी वर्ष कांग्रेस का विघटन हुआ तो तिवारी कांग्रेस (आई) में गए। तिवारी कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा सरकार में भी कैबिनेट मंत्री रहे। आपातकाल के दौरान 21 जनवरी 1976 को वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। जुलाई 77 में कांग्रेस की हार के बाद वे विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1980 में नैनीताल से पहली बार सांसद बने। कई बार इस इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए वे केंद्र में विभिन्न विभागों के मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने न सिर्फ केंद्र में बल्कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री रहते औद्योगिक विकास की जो नींव डाली उसके चलते उन्हें ‘विकास पुरुष’ कहा जाता है। नोएडा की नींव डालने और उत्तराखण्ड में सिडकुल की स्थापना का श्रेय उन्हें जाता है। जीवन की इन सब उपलब्धियों के बावजूद तिवारी के जीवन के कुछ ऐसे पहलू भी हैं जिनके चलते उन्हें भारी पीड़ा झेलनी पड़ी। उनकी पत्नी डाॅ सुशीला तिवारी बहुत जल्दी ही उनका साथ छोड़कर स्वर्ग सिधार गईं। हल्द्वानी का डाॅ सुशीला तिवारी अस्पताल उन्हीं की याद में बनाया गया। पहली बार 1976 फिर 1984 और तीसरी बार 1988 में वे उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री रहे। आमतौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को भारतीय राजनीति में भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाता रहा है। तिवारी भी प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे, लेकिन जब मौका आया तो किस्मत ने उनका साथ छोड़ दिया। यदि वे सन् 1991 का लोकसभा चुनाव जीत गए होते तो केंद्र में प्रधानमंत्री बन सकते थे। योग्यता एवं अनुभव में तब कांग्रेस में उनका कोई सानी नहीं था। वे सक्रिय भी बहुत थे। लेकिन तिवारी यह चुनाव भाजपा के बलराज पासी से हार गए। इस हार की पीड़ा उन्हें बराबर सालती
रही। एक बार उन्होंने कहा भी कि ‘नरसिम्हा राव ने चुनाव नहीं लड़ा, वह पीएम बन गए। मैंने लड़ा, संयोग से पांच हजार वोट
से हार गया और पीएम नहीं बन पाया।’ वास्तव में यह हार उनके जीवन का सबसे दुखद पहलू रही है।इस हार के चलते वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। यदि वे 1991 में चुनाव नहीं हारते तो उन्हें फिर कभी कांग्रेस के दरवाजे पर टिकट के लिए खड़ा नहीं होना पड़ता। संभव था कि विवादों से उनका नाम भी नहीं जुड़ता। वे न तो उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बनते और न ही आंध्र के राज्यपाल। उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री रहते न उन पर अंधाधुंध लालबत्तियां बांटने का आरोप लगता और नही आंध्र में राज्यध्पाल रहते उनके पर उंगलियां उठती। तिवारी की यह हार महाभारत के उस अभिशप्त योद्धा कर्ण की याद दिला देती है जो अभिशाप के चलते अपने जीवन का निर्णायक युद्ध हार गया था। कर्ण जब अर्जुन से जीवन का निर्णायक युद्ध लड़ रहा था तो उसके रथ का पहिया भूमि में इस कदर धंसा कि आगे नहीं बढ़ पाया। 1991 में तिवारी के रथ का पहिया उनकी परंपरागत सीट नैनीताल में धंस गया और प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना चकनाचूर हो गया। हालांकि उन्होंने अपने रथ के पहिये को ऊपर निकालने की हर संभव कोशिश की उनके समर्थकों ने चुनाव प्रचार के दौरान जनता को लगातार अहसास भी कराया कि तिवारी देश के भावी प्रधानमंत्री होंगे। लेकिन सफल नहीं हुए। उत्तराखण्ड में अक्सर यह किस्सा सुनने को मिलता है कि तिवारी के पैतृक गांव बल्यूटी में एक सिद्ध सोमनवारी बाबा हुआ करते थे। तिवारी जब महज तीन-चार साल के थे तो बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि यह बालक जीवन में ऊंचाइयां छुएगा। बाबा के आशीर्वाद से ऐसा हुआ भी। लेकिन कहते हैं कि तिवारी की एक भूल से बाबा नाराज हो गए थे। उन्होंने शाप दिया कि ‘बेटा तुम जीवन में ऊंचाइयां तो हासिल करोगे, लेकिन निणार्यक मोड़ पर पिछड़ जाओगे।’ 1991 का चुनावी मैदान तिवारी के लिए न सिर्फ बड़ी राजनीतिक हार का कारण बना, बल्कि देखा जाए तो जीवन की वास्तविक लड़ाई तो वे इसी साल हार चुके थे। किसी भी महत्वाकांषी राजनेता के लिए जीवन का वातविक अर्थ ऊंची से ऊंची उपलब्धि हासिल करना होता है न कि ज्यादा वर्षों तक जिंदा रहना। तिवारी भले ही अब दुनिया को अलविदा कह गए हैं, लेकिन जीवन की वास्तविक लड़ाई वे 1991 में ही हार चुके थे।

  • राजनितिक – सामाजिक जीवन 
  • – पिता पूरन चंद तिवारी स्वतंत्रता सेनानी थे। लिहाजा पिता के संस्कार बेटे नारायण दत्त तिवारी में भी आए। देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर विद्यार्थी जीवन में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए। सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में पिता और पुत्र दोनों एक साथ गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए। जेल से छूटने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की।
    – 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने।
    – देश के प्रमुख नेताओं जवाहरलाल नेहरू, महामना मदनमोहन मालवीय, आचार्य नरेंद्र देव आदि के संपर्क में आए और समाजवादी बन गए।
    – कुमाऊं में विभिन्न श्रमिक संगठनों का गठन कर उनका नेतृत्व किया।
    – 1952 के प्रथम आम चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की ओर से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए।
    – 1957 में पुनः विधानसभा पहुंचे। लेकिन 1962 और 1967 में सफलता नहीं मिली।
    – 1965 में कांग्रेस में में शामिल हुए।
    – 1969 के मध्याविधि चुनाव में विजयी होने पर उत्तर प्रदेश में मंत्री बने।
    – पहली बार 1976 में, दूसरी बार 1984 में और तीसरी बार 1988 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभाला।
    – केंद्र में योजना मंत्री, उद्योग मंत्री, पेट्रोलियम और विदेश मंत्री रहे।
    – 1993 और 1997 के संसदीय चुनाव में असफल रहने के बाद 1999 में फिर सांसद चुने गये।
    – वर्ष 2002 के उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलने पर राज्य के मुख्यमंत्री बने और पांच साल
    – 22 अगस्त 2007-26 दिसंबर 2009 तक आंध्र प्रदेश में राज्यपाल रहे।

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