निरंतर हो रही बारिश के कारण गांव आपदा की चपेट में आ रहे हैं। भूस्खलन और दरकती पहाड़ियां उन्हें अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर कर रही हैं। लेकिन जहां शरण ले रहे हैं, वहां भी सुरक्षित नहीं हैं

पर्यटन स्थली मुनस्यारी के साथ ही दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित गांव लगातार आपदा की चपेट में आ रहे हैं। निरंतर हो रही बारिश से यहां का जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। उफनाती नदियां, गाड़-गधेरे एवं सड़कों का नामोनिशान मिटने से आपदा राहत के कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। मौसम का मिजाज इस तरह का है कि हैली सेवाएं भी राहत कार्यों में मदद पहुंचा पाने में विफल साबित हो रही हैं।

आपदा का सर्वाधिक कहर रतगड़ी व हरकोट गांवों के लोगों को उठाना पड़ा है। रतगड़ी गांव की 39 वर्षीय नारायणी देवी के ऊपर चट्टान का बोल्डर गिरने से मौत हो गई, जिससे उसके दो पुत्र सुंदर एवं डिगर सिंह अनाथ हो गए। हरकोट निवासी 70 वर्षीय खीम राम का जवान बेटा किशन राम हरकोट नाले में बह गया। जन-धन के साथ ही खेत-खलिहान सब नदियों की भेंट चढ़ चुके हैं। इस पूरे क्षेत्र में आए दिन पहाड़ियां दरक रही हैं, भूस्खलन हो रहा है। लोगों को अपना घर-बार छोड़ नए ठौर-ठिकाने ढूंढने पड़ रहे हैं। लेकिन जहां वे शरण ले रहे हैं वहां भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। पूरी रात जाग-जाग कर कट रही है। बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाना भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जबकि क्षेत्र में स्थित इक्का दुक्का अस्पताल खुद ही लंबे समय से बीमार चल रहे हैं। आपदा प्रभावित क्षेत्रें के साथ ही शरणार्थी शिविरों में स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था लचर बनी हुई है। लोग कालापानी सा जीवन जीने को मजबूर हैं। मूसलाधार बारिश के चलते लोगों के आशियाने ध्वस्त होते जा रहे हैं जिससे उन्हें टैंटों की शरण में जाना पड़ रहा है।

मदकोट, भदेली, कैंथी, सेलापानी, सेरा, दुम्मर, दरांती, सेबलाधार गांव खतरे में आ गए हैं तो वहीं पहाड़ी दरकने से मालूपाती गांव के 15 परिवार और कनलका गांव के 13 परिवार प्राथमिक स्कूल में शरण लिए हुए हैं। गेला गांव के 10 परिवार टैंट में रहने को मजबूर हैं। तल्ला भदेली के 37 लोग टेंटों में पल -पल खौफ का जीवन जीने को मजबूर हैं। तल्ला भदेली गांव में वर्ष 1997 की आई आपदा ने ग्रामीणों से इनके खेत खलिहान छीने तो अब आशियाना छीन इन्हें बेघर होने को मजबूर कर दिया है। जमराड़, डोबरी, रोपाड़, नार्की, राप्ती, उमरगड़ा, ओखली, साना, वैगा गांवों के लोगों की नींद इस डर से हराम है कि कहीं वह भी आपदा के शिकार न हो जाएं। ग्रामीणों की पूरी रात जागकर बीत रही है। बरसाती नालों के उफान में होने से जहां बच्चों की पढ़ाई लिखाई बाधित हुई है तो वहीं रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी घर से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है। आपदा के चलते बच्चों की पढ़ाई सर्वाधिक प्रभावित हुई है। पैदल मार्गों से लेकर पुलों तक सभी कुछ नदियां और स्थानीय गधेरे बहा ले गए हैं। हर मानसून काल की तरह इन दिनों तल्ला जौहार के कोटा पंद्रहपाला क्षेत्र की 10 हजार से अधिक की आबादी सड़क एवं संचार सुविधा से अलग-थलग पड़ चुकी है। दूध और सब्जी उत्पादक इस क्षेत्र के गांवों के लोगों की आजीविका भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। राशन व रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यहां के लोगों का संघर्ष जारी है।

यही हाल गोरीपार एवं कनार क्षेत्र की 18 हजार की आबादी का भी है। क्षेत्र को जोड़ने वाली सड़कें ध्वस्त हो चुकी हैं। गरारी से आवागमन हो रहा है। पूर्व में ये गरारी खूनी साबित हो चुकी है। इससे गिरने की वजह से कई लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी। गोरी नदी में निर्माणाधीन मोटर पुल और झूला पुल दोनों बह गए। लोग जान जोखिम में डाल गरारी से आवागमन तो कर रहे हैं, लेकिन खाद्यान्न की कमी के चलते यहां स्थित कुलथम, बसंतकोट, बोथी, भटकूड़ा, बादनी, फाफा, चुलकोट, उच्छैती, रिंगू गांवों के ग्रामीणों को पेट भरने की चिंता सताने लगी है। इन गांवों को जोड़ने वाले मदकोट-बोथी, मदकोट-रिंगू मार्ग बंद पड़े हैं। मदकोट, बरम, भदेली, दाती, कैंथी, पापड़ी, देवीबगड़ के आपदा प्रभावितों के समक्ष अब संकटों का पहाड़ खड़ा है। पिछले एक महीने से मुनस्यारी के चरमा-जौरासी, मदकोट-लोध, मदकोट-दारमा, हरकोट-चौना, मदकोट-बौना, गिनी बैंड-सैंरणाथी, तेजम-होकरा, बांसबगड़-कोटा पंद्रहपाला, न्यू सेला-तिदांग, जैरासी तख्तीगांव सहित दर्जनों सड़कें बंद पड़ी हुई हैं। लगातार हो रही बारिश से दर्जनों गांवों की हजारों की संख्या में लोग शेष दुनिया से कटे हुए हैं। जनपद की काली, गोरी, सरयू, रामगंगा सहित सभी नदियां खतरे के निशान से उपर बह रही हैं। दर्जनों सड़कों का जगह-जगह से नामो- निशान मिट चुका है। मुनस्यारी-मिलम मार्ग बंद होने से जोहार घाटी के दो दर्जन गांव शेष दुनिया से कट चुके हैं। आपदा के चलते 18 स्थानों पर राहत शिविर बने हैं जिनमें करीब 300 से अधिक लोग रह रहे हैं। जिले का अंतिम गांव नामिक सर्वाधिक प्रभावित हुआ है। यहां गधेरों पर बने पुल बह चुके हैं। पैदल मार्ग ध्वस्त हो चुके हैं। जिससे पूरे क्षेत्र में खाद्यान्न का संकट पैदा हो गया है। संचार व्यवस्था न होने से लोग अपनी आपबीती भी नहीं बता सकते। कैलाश मानसरोवर यात्र लगातार प्रभावित हुई है। यात्रियों को पिथौरागढ़ से गुंजी तक तो पहुंचाया जा रहा है, लेकिन वहां की आगे हैली सेवाएं भी काम नहीं कर रही हैं। कुल मिलाकर पूरा मुनस्यार क्षेत्र इन दिनों खौफ के साए में जीवन बीताने को मजबूर हैं।

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