उत्तरकाशी से उठ रहे सभी प्रश्नों पर अंततः विराम लग गया। राहत और बचाव कार्य में लगे जांबाजों के जज्बे ने 41 जिंदगियों को बचा लिया। विदेशी मशीनरी फेल हो जाने के बावजूद भी सूबे के सीएम पुष्कर सिंह धामी और केंद्रीय राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह के अथक प्रयासों से आखिर 28 नवंबर को शाम पौने आठ बजे सभी लोग सही सलामत सुरंग से बाहर आ गए। वो 17 खौफनाक दिन और 24 घंटे अंधेरे में रहकर आखिरकार सरकार, मशीन और वहां मौजूद लोगों ने जितनी मेहनत से अपने साथियों की जान बचाई है इसकी सराहना की जा रही है। 400 घंटों के दौरान सुरंग में जूझते रहे मजदूरों और बाहर तड़पते उनके परिजनों पर क्या बीती होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन है। जो लोग इतने दिनों से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे जब वो टनल से बाहर आए तो सभी की आंखें नम थी। सराहना के साथ अब सरकार पर सवाल भी उठना तय है। सवाल यह है कि सुरंग में फंसे 41 मजदूर फंसे भी तो क्यों? क्योंकि सुरंग अंदर से ढह गई थी, लेकिन क्यों इसकी तहकीकात नहीं की गई कि जहां खुदाई चल रही है वहां की पथरीली जमीन की प्राकृतिक संरचना कैसी है? क्या निर्माण कंपनी नवयुग इंजीनियरिंग द्वारा सुरंग के खनन में विज्ञान, नियम और प्रकृति की अनदेखी की गई?
उत्तरकाशी के सिलक्यारा में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ ही केंद्रीय राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने काफी सक्रियता दिखाई। मुख्यमंत्री धामी ने तो वहां अपना एक कैंप ऑफिस ही बना लिया था। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पल-पल की जानकारी ले रहे थे। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले में पिछले 17 दिनों से मजदूर फंसे हुए थे। 28 नवंबर की शाम इसे लेकर बड़ी सफलता मिली है। 41 मजदूरों को बाहर निकाल लिया गया है। इससे पहले विशेषज्ञों की निगरानी में मजदूरों को यहां से निकालने के लिए ड्रिलिंग खत्म हो चुकी थी। तब दिल्ली के रैट माइनर्स मुन्ना कुरैशी की टीम पाताल लोक के देवदूत बनकर सामने आई और सफल रेस्क्यू ऑपरेशन किया। सुरंग के सफल ऑपरेशन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा कि हमारे श्रमिक भाइयों के रेस्क्यू ऑपरेशन की सफलता हर किसी को भावुक कर देने वाली है। टनल में जो साथी फंसे हुए थे, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि आपका साहस और धैर्य हर किसी को प्रेरित कर रहा है। मैं आप सभी की कुशलता और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं। देश के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी उन सभी का धन्यवाद किया जो इस ऑपरेशन में शामिल थे।
12 नवंबर का दिन था जब दिवाली के दिन 41 मजदूर सिलक्यारा सुरंग में फंस गए थे। इस दौरान पूरा देश उनकी सलामती के लिए दुआ करता रहा। उत्तरकाशी सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकाला गया इस से खुशी की कोई बात नहीं हो सकती लेकिन क्या ये बात सही नहीं है कि अभी भी देश में इतने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं फिर भी अमेरिका से बनी मशीन मंगानी पड़ी। यही नहीं, बल्कि उसको लीड भी अमरीकन ही कर रहा था। क्या ऐसे हादसों के लिए अभी पूरी तरह से हम तैयार नहीं हैं। लोग सवाल कर रहे हैं कि ये तो मजदूर थे, इनके परिवार वाले बेचारे कुछ कर नहीं सकते थे, लेकिन वहीं अगर नेता या वीवीआईपी होते तो क्या उन्हें बचाने में इतने ही दिन लगते? इस घटना के बाद लोगांे के जेहन में सवाल कोंध रहे हैं कि अगर कहीं पहाड़ों पर भूकंप आ जाए तो क्या सरकार उससे निपटने के लिए तैयार है? पहाड़ों के साथ जब-जब खिलवाड़ किया गया तब-तब आपदा ने इंसान को आइना दिखा दिया है।
पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो उत्तराखण्ड में अनेक पहाड़ ऐसे हैं जहां सड़क नहीं बनानी चाहिए थी लेकिन बावजूद इसके बनाई जा रही हैं। पहाड़ों पर निर्माण में जिस तरह की तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है वह बेहद हानिकारक है। सड़कें पहले भी बनती थीं लेकिन कुदाल और फावड़े का प्रयोग किया जाता था। महीनों भर की मशक्कत से बामुश्किल पांच किलोमीटर की सड़क बन पाती थी, मगर अब जेसीबी और अन्य हाईटेक मशीनों के साथ ही बारूद के विस्फोट करके पहाड़ों को काटा जा रहा है और एक महीने में ही 50 से 60 किमी सड़क बनाई जा रही है, जो त्रासदी की वजह बन रही है। तमाम सर्वे और रिपोर्ट बता रही हैं कि पहाड़ उतना बोझ नहीं झेल पा रहे जितना उन पर लादा जा रहा है।
स्थानीय लोग बता रहे हैं कि चार धाम की यात्रा को सुगम बनाने के लिए निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग जिसे ऑल वेदर नाम दिया गया है का इस बार की तबाही से सीधा संबंध है। पहाड़ अधिकतम इस सड़क के आस- पास ही दरक रहे हैं। स्थानीय लोगों की यह आशंका कितनी वाजिब है और कितनी नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता मगर इतना जरूर है कि इसका पता तो लगाया ही जाना चाहिए। पता तो यह भी लगाया जाना चाहिए कि जिस विकास के नाम पर हम अपनी मूछों को ताव दे रहे हैं, कहीं वही तो हमारी बर्बादी का असली कारण नहीं बन रहा है? यहां एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि इस तरह से सुरंगें बनाई ही क्यों जाएं। अब तक हिमालयी क्षेत्र में न जाने कितने हादसे हो चुके हैं पर सरकारें अभी तक नहीं चेतीं हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकारें सड़कें बनाते समय इस बात पर गौर नहीं करती कि उनके यहां की जमीन, जंगल और पहाड़ी क्षेत्र इसके अनुकूल हैं भी कि नहीं? हादसे होते रहते हैं और सरकारों के विकास कार्य चलते रहते हैं?
ऑल वेदर रोड यानी हर मौसम में खुली रहने वाले सड़कों के लिए बनाई गई चारधाम राजमार्ग विकास परियोजना है। इसका शुभारंभ दिसंबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। गौरतलब है कि चारधाम यात्रा मार्ग जो यमुनोत्री के लिए जा रहा है उसी कार्य के लिए उत्तरकाशी के सिल्क्यारा में जहां सुरंग का निर्माण चल रहा है वहां 12 नवंबर की सुबह सुरंग में अचानक से मलबा आ गया। यह कहा जा रहा है कि उत्तरकाशी में सुरंग बन जाने से यमुनोत्री जाने वालों का रास्ता सुगम हो जाएगा। साढ़े चार किलोमीटर इस लंबी सुरंग के बनने से 26 किलोमीटर का रास्ता कम हो जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हिमालय के कच्चे पहाड़ों में सुरंग बनाना सही है? क्या हम विकास के नाम पर पहाड़ों को नष्ट नहीं कर रहे है?


ऐसे सैकड़ों सवाल अब खड़े हो रहे हैं। उत्तरकाशी में 1991 के भूकंप ने ऐसी तबाही बरपाई थी कि उससे उबरना मुश्किल था। इसी तरह जून 2013 के केदारनाथ हादसे से भी कोई सबक नहीं लिया गया। अभी ढ़ाई साल पहले फरवरी 2021 में विष्णु प्रयाग के समीप एक टनल के मुख्य द्वार पर विष्णु गंगा नदी का मलबा आ कर भर गया था। इस हादसे का दुष्परिणाम यह हुआ कि न तो अंदर फंसे मजदूर निकाले जा सके न सुरंग को बचाया जा सका। कहा गया कि वहां पर धौलीगंगा रुष्ट हो गईं और उन्होंने भारी विनाश कर दिया था। चमोली स्थित तपोवन विष्णुगाड का पॉवर प्लांट तहस-नहस हो गया और सुरंग में मौजूद करीब डेढ़ सौ लोगों का पता नहीं चला। एनडीआरएफ, आईटीबीपी एवं एसडीआरएफ की टीमों ने खूब प्रयास किया लेकिन लापता लोगों में से कुल 40 शव ही ढूंढ़ पाई थीं। तपोवन हाइडिल परियोजना और उसके समीप बने डैम सब तबाह हो गए। सात फरवरी की सुबह सवा दस बजे एक धमाका हुआ और उसके बाद पानी और मलबे का जो बीस फुट ऊंचा सैलाब उमड़ा, उसने जोशीमठ से ऊपर के इलाके के गांव, पुल, सड़क और पॉवर प्लांट्स आदि सबको नष्ट कर दिया था।
भूविज्ञानी डॉ. नवीन जुयाल चारधाम परियोजना से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति के सदस्य थे। वह कहते हैं ‘निश्चित तौर पर केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ऑल वेदर रोड की वजह से भूस्खलन बढ़े हैं। पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना को नजरंदाज कर इन सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। तेजी से सड़क बनाने के चक्कर में पहाड़ में सड़क बनाने वाली तकनीक का सही इस्तेमाल नहीं किया गया है। सड़क निर्माण में जल निकासी आवश्यक होती है पर उसे नजरंदाज किया गया। हिमालय में जगह-जगह अलग-अलग प्रकार की चट्टानें होती हैं, उन पर अध्ययन किए बिना सब जगह सड़क बनाने के लिए एक ही तरीका इस्तेमाल किया जाता है। टनकपुर-सुखीढांग इलाके में जमीन के नीचे होने वाली किसी भी हलचल का सबसे ज्यादा असर पड़ता है पर इसे भी खोद दिया गया है, वहां पर भारी भूस्खलन के रूप में इसका परिणाम हमारे सामने है। उच्चाधिकार समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि चारधाम परियोजना के अवैज्ञानिक व अनियोजित क्रियान्वयन से हिमालय के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है और भूस्खलन जैसी आपदाओं को आमंत्रित किया जा रहा है।
नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड को उत्तराखण्ड में ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेलवे लाइन समेत, दिए गए सभी ठेके निरस्त किए जाएं। उनके अब तक के सभी कामों का सेफ्टी ऑडिट हो और लापरवाही पाए जाने पर वसूली और मुकदमा हो। सिलक्यारा में हुए रेस्क्यू ऑपरेशन का सारा खर्च नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड से वसूला जाए। इनके विरुद्ध आपराधिक लापरवाही और मजदूरों का जीवन संकट में डालने के लिए भी मुकदमा दर्ज किया जाए।
इंद्रेश मैखुरी, माकपा नेता

