छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विष्णुदेव साय और मध्य प्रदेश में ओबीसी समाज से आने वाले मोहन यादव के बाद राजस्थान में ब्राह्माण समाज के भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने सिर्फ इन राज्यों के मतदाताओं को ही संदेश नहीं दिया है, बल्कि इसके सहारे देश के अन्य राज्यों के जातीय समीकरणों को भी साधने का इशारा किया है। साथ ही मोदी-शाह युग में पुराने दिग्गज भाजपाई नेताओं और क्षत्रपों को दरकिनार करने वाली नीति को भी विस्तार देने का काम किया गया है
हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में प्रचंड बहुमत मिला। इन तीन प्रदेशों में भाजपा की एकतरफा जीत के बाद पार्टी ने भविष्य की
राजनीति को ध्यान में रखते हुए इन प्रदेशों में नए चेहरों को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया है। भाजपा आलाकमान के इस फैसले को लेकर राजनीतक विश्लेषक कई मायने निकाल रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी ने अगले करीब दो से तीन दशकों की राजनीति के मद्देनजर एक ओर जहां वसुंधरा राजे सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह जैसे कद्दावर नेताओं की दावेदारी को दरकिनार कर नए चेहरों पर भरोसा जताकर पार्टी कार्यकर्ताओं को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया है तो वहीं दूसरी तरफ आरएसएस के करीबी नेताओं को कमान सौंपकर संघ को भी संतुष्ट करने का काम किया है। इसके साथ ही पार्टी आलाकमान ने कुछ महीने बाद होने वाले आम चुनाव 2024 के चलते जातीय समीकरणों को साधने की भी भरपूर कोशिश की है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विष्णुदेव साय और मध्य प्रदेश में ओबीसी समाज से आने वाले मोहन यादव के बाद राजस्थान में ब्राह्मण समाज के भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री चुनकर भाजपा ने सिर्फ इन राज्यों के मतदाताओं को ही संदेश नहीं दिया है, बल्कि इसके सहारे देश के अन्य राज्यों के जातीय समीकरणों को भी साधने का इशारा किया है। साथ ही मोदी-शाह युग में पुराने दिग्गज भाजपाई नेताओं और क्षत्रपों को दरकिनार करने वाली नीति को भी इन तीन राज्यों में नया नेतृत्व तैयार कर विस्तार देने का काम किया गया है।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी नेता को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने देशभर के विभिन्न राज्यों में रहने वाले आदिवासियों के लगभग 700 समुदायों को साधने का प्रयास किया, जिनकी कुल आबादी 10 करोड़ से ज्यादा है। छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। विपक्षी दल लगातार जाति जनगणना और ओबीसी आरक्षण का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं। यह मुद्दा उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकता है, जहां अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जोर-शोर से इस मसले को उठा रहे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ओबीसी समाज से आते हैं और भाजपा नेता गर्व से यह बात कहते रहते हैं, लेकिन भाजपा ने यादव समाज से आने वाले ओबीसी नेता को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति को भी साधने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का ज्यादा से ज्यादा उपयोग उनके अपने गृह राज्य के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार में भी करती नजर आएगी। अगड़ी जातियों में से ब्राह्मणों को कुछ दशक पहले तक कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता रहा है, जिसके बल पर कांग्रेस ने दशकों तक केंद्र से लेकर राज्यों में राज किया, लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस का झुकाव मुस्लिमों की तरफ होता गया, ब्राह्मण उससे छिटक कर भाजपा के साथ जुड़ गए थे। लेकिन ओबीसी राजनीति के इस दौर में अगड़ी जातियां खासकर ब्राह्मण समुदाय अपने आपको कई राज्यों में उपेक्षित महसूस करने लगा था और अगर इस समाज की उदासीनता लोकसभा चुनाव तक बनी रहती तो निश्चित तौर पर इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ सकता था। यही वजह है कि राजस्थान में ब्राह्मण समाज से आने वाले नेता को मुख्यमंत्री चुनकर भाजपा ने देशभर के ब्राह्मण मतदाताओं को एक बड़ा संदेश देने का प्रयास भी किया है।
राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और दिल्ली सहित देश के कई राज्यों में ब्राह्मण मतदाता जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यह सिर्फ अपना वोट ही नहीं देते हैं, बल्कि अपने प्रभाव के कारण अन्य जातियों का वोट दिलवाने की भी क्षमता रखते हैं। 2014 और 2019 में ब्राह्मणों सहित अगड़ी जातियों से आने वाले क्षत्रीय और वैश्यों ने भी प्रधानमंत्री मोदी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी और भाजपा एक बार फिर से इन्हें साधकर 2024 में जीत की हैट्रिक के सपने को साकार करना चाहती है। यदि राजस्थान की बात करें तो यहां सीएम फेस घोषित किए गए भजन लाल शर्मा ब्राह्मण समाज से आते हैं, प्रदेश में 7 फीसदी ब्राह्मण आबादी है। इसके अलावा दीया कुमारी राजपूत चेहरा हैं। यहां 9 प्रतिशत राजपूत हैं, जिनका 50 से 60 सीटों पर प्रभाव है। प्रदेश में तकरीबन 18 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी है। इसीलिए पार्टी ने इस वोट बैंक को साधने के लिए प्रेमचंद्र बैरवा को डिप्टी सीएम के तौर पर चुना है। इस लिहाज से देखें तो यहां सीएम और डिप्टी सीएम के नए चेहरों से भाजपा ने 34 फीसदी वोटबैंक को साधने की कोशिश की है।
मध्य प्रदेश का गणित
मध्य प्रदेश में भाजपा ने ओबीसी चेहरा मोहन यादव को सीएम की कमान दी है वहीं सवर्ण समुदाय से आने वाले राजेंद्र शुक्ला और दलित चेहरा जगदीश देवड़ा को डिप्टी सीएम बनाया है। प्रदेश में तकरीबन 50 प्रतिशत ओबीसी वोटर हैं। इनमें अकेले 10 फीसदी यादव वोटर हैं। प्रदेश में ब्राह्मण आबादी भी बहुत है यहां ब्राह्मण समाज के तकरीबन 14 प्रतिशत मतदाता हैं तो 22 प्रतिशत संख्या दलित वोटरों की है। यदि इन्हें मिला दिया जाए तो 46 फीसदी वोट बैंक बनता बनता है। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा ने इसी वोट बैंक को अपनी ओर करने के लिए मध्य प्रदेश में ये गणित बैठाया है।
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर नजर
छत्तीसगढ़ में भाजपा का चेहरा विष्णु देव साय हैं जो आदिवासी समुदाय से आते हैं। यहां अरुण साव और विजय शर्मा को डिप्टी सीएम बनाया गया है यानी यहां भी पार्टी ने ओबीसी और सवर्णों को साधने की कोशिश की है। यहां आदिवासियों की संख्या 32 प्रतिशत है और 29 सीट रिजर्व हैं। ऐसे में भाजपा ने यहां आदिवासी चेहरे पर दांव खेला है। इससे पहले भी भाजपा द्रोपदी मूर्मू को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासी वोटबैंक को लुभाने की कोशिश कर चुकी है। भाजपा को उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ का ये फैसला सिर्फ प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देशभर में आरक्षित 47 लोकसभा सीटों पर पार्टी को लाभ पहुंचाएंगी और इसे लोकसभा चुनाव 2024 के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
भाजपा का मिशन 2024
आम चुनाव की बात करें तो देशभर में तकरीबन 9 प्रतिशत यानी 10 करोड़ आदिवासी वोटर हैं। विष्णु देव को छत्तीसगढ़ में सीएम बनाने से पहले निश्चित तौर पर पार्टी ने ये गुणा-भाग जरूर लगाया होगा, ताकि आम चुनाव में आदिवासी वोटरों का सीधा साथ मिले। ये इसलिए भी खास है, क्योंकि पिछले चुनाव में भाजपा को गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में आदिवासी वोट कम मिले थे। इसके बाद ही संघ परिवार ने जनजाति समुदायों के बीच जाकर काम शुरू किया था।
दूसरी तरफ भाजपा ने सवर्ण वोट बैंक पर भी पकड़ बनाने की कोशिश की है। राजस्थान के सीएम भजन लाल शर्मा इसी कोशिश का परिणाम माने जा रहे हैं। भाजपा ने तीनों ही राज्यों में सीएम और डिप्टी सीएम के नए चेहरे घोषित कर ये संदेश देने का प्रयास किया है कि वह सबका साथ सबका विकास के फार्मूले पर चल रही है। उत्तर भारत में सवर्ण वोट बैंक का खासा वर्चस्व है। इसीलिए भजन लाल के बहाने पार्टी ने यूपी के 10, बिहार 4, राजस्थान 7 मध्य प्रदेश 14 और हरियाणा के 12 प्रतिशत ब्राह्मणों को साधने के लिए राजस्थान में भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री घोषित किया है।
राजनितिक पंडितों का कहना है कि आदिवासी और ब्राह्मण वोट बैंक के साथ भाजपा की नजर ओबीसी वोट बैंक पर भी है। इसीलिए एमपी में मोहन यादव के बहाने पार्टी ने मध्य प्रदेश के 10, यूपी 10, बिहार 14 और हरियाणा के 16 प्रतिशत यादवों को भी साधने की कोशिश की है, दूसरे तरीके से देखा जाए तो इन प्रदेशों की तकरीबन 159 सीटों पर यादव वोट बैंक काफी अहम है। पिछले चुनाव में भाजपा ने इनमें से 142 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा 2024 में भी इन सीटों को किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती है। इसके अलावा भाजपा की नजर यूपी के 70 प्रतिशत यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की भी है जो पिछले चुनाव में सपा के साथ गया था और बिहार के यादव वोट बैंक को लेकर भी भाजपा का यही प्लान है।

