Uttarakhand

भ्रष्टाचार की सहकारिता

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत् 14 दिसम्बर के दिन संसद में 11 संकल्प पेश किए। इन संकल्पों में से एक है भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस। उत्तराखण्ड के सहकारिता विभाग में इस संकल्प की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सहकारिता विभाग की जमीनों को भूमाफिया खुर्द-बुर्द कर रहे हैं। कर्मचारियों को सातवें वेतमान का लाभ नहीं दिया जा रहा है और अधिकारियों पर फर्जी तरीके से ऋण स्वीकृत करने के आरोप चस्पां हो रहे हैं

प्रदेश का सहकारिता विभाग घोटालों और अनियमितताआंे का पर्याय बन चुका है। बैंकों में बड़े पैमाने में फर्जी तरीके से अपने चहेतों को भर्ती करने का मामला रहा हो या वित्तीय अनियमितताओं के मामले, हर मामले में सहकारिता विभाग सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में रहा है। हालात इतने विकट हैं कि सहकारी बैंक की अपनी ही भूमि को सुरक्षित रखने में भी सहकारिता विभाग नाकाम रहा है। यही नहीं सहकारी बैंक के कर्मचारियों को सातवें वेतनमान दिए जाने संबंधित प्रबंध निदेशक का दो वर्ष पूर्व भेजा गया प्रस्ताव सहकारिता निबंधक के पास लम्बित ही पड़ा हुआ है। इसके चलते कर्मचारियों में खासा रोष बना हुआ है। गौरतलब है कि सातवें वेतनमान को लागू किए जाने की तय समय सीमा 31 दिसम्बर 2024 ही है। अगर वेतनमान लागू नहीं किया जाता है तो कर्मचारियों को अगले आठवें वेतनमान के लागू होने का इंतजार करना पड़ेगा।

हाल ही में सहकारिता विभाग का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसमें सहकारी बैंक के लिए आवंटित भूमि पर कुछ लोगों द्वारा अवैध निर्माण करके भूमि पर कब्जा किया गया है। शिमला बाईपास के शीशमबाड़ा क्षेत्र में करीब 19 बीघा भूमि खसरा नम्बर 1007, 1008, 1009ख, 1010घ और खसरा संख्या 1014 क, 628 ख तथा सखरा नम्बर 629ग, जिसका कुल रकबा 1-4815 हेक्टेयर यानी साढे 19 बीघा भूमि है, को सिर्फ अवैध कब्जा करके कई लोगों को बेचा दिया गया है।

वर्ष 1963 में यह जमीन एक संयुक्त सहकारी समिति को खेती के प्रयोजन के लिए दी गई थी। कुछ वर्ष इस भूमि पर किसानों द्वारा खेती की गई। 1972 में यह भूमि वापस ले ली गई। तब से यह भूमि खाली ही पड़ी रही। इस भूमि पर कानूनी वाद भी चले और हाईकोर्ट नैनीताल के आदेश बाद यह भूमि सहकारी बैंक को सौंप दी गई और राजस्व अभिलेख में भी यह भूमि सहकारी बैंक के नाम दर्ज भी कर दी गई थी।

सहकारी विभाग इस भूमि के प्रति उदासीन बना रहा और धीरे-धीरे अवैध कब्जा होने के बाद इस भूमि को न सिर्फ बेचा गया, बकायदा इसकी रजिस्ट्रियां तक करवा दी गई। आरोप है कि युसूफ अली, मेहताब और अन्य लोगों द्वारा इस भूमि को कूटरचित तरीके से कई लोगांे को बेेेच दिया गया और 8 जून 2022 को इसकी रजिस्ट्री भी करवा दी गई। जबकि राजस्व अभिलेखांे में यह भूमि सहकारी बैंक के नाम ही दर्ज है।

हैरानी की बात है कि अपनी ही करोड़ों की इस भूमि को लेकर सहकारिता विभाग पूरी तरह से लापरवाह बना रहा। राज्य बनने के बाद जिस तरह से जमीनों के भाव सातवें आसमान पर पहुंचे हैं और सबसे ज्यादा भूमि पर अवैध कब्जांे के मामले बढ़े हैं। इन मामलों में खास बात यह है कि नदी, नालों और सरकारी विभागों की खाली पड़ी जमीनों पर भू माफियाओं और राजनीतिक दलांे से जुड़े लोगों का एक बड़ा माफिया तंत्र लगातार अवैध कब्जा करता जा रहा है।

जुलाई 2024 को यह मामला जिलाधिकारी देहरादून की एक बैठक में सामने आया। तत्कालीन जिलाधिकारी सोनिका द्वारा इस मामले की जांच करवाई गई तो पूरा खेल खुल कर सामने आ गया। जांच में पाया गया कि भूमि सहकारी बैंक के नाम दर्ज है और जिन लोगों ने इस भूमि को खरीदा या बेचा उनके नाम यह भूमि दर्ज ही नहीं है। ऐसा नही है कि इस भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायतें जिला प्रशासन को पहले नहीं मिली हो। वर्ष 2013 में भी इस भूमि पर कब्जे किए जाने की शिकायत पर तत्कालीन जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने संयुक्त कार्यवाही करते हुए भूमि पर अवैध कब्जा और निर्माण को हटवाकर खाली करवाया था। 2013 में हटाए गए अवैध कब्जे के बाद भी सहकारिता विभाग इस भूमि का रख-रखाब करने में नाकाम ही रहा, जिसके चलते इस भूमि को दो बार बेच दिया गया।

इस वर्ष जिलाधिकारी की बैठक मंे मामला आने के बाद अचानक 20 जुलाई 2024 सहकारिता विभाग नींद से जागा और उत्तराखण्ड राज्य सहकारी बैंक की कॉरपोरेट बं्राच देहरादून द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून को इस मामले मेें आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को लेकर से एक पत्र लिखा गया। ऐसे ही कई अन्य मामले में भी सहकारिता विभाग में व्याप्त भारी भ्रष्ट्राचार सामने आ चुका है। 2022 में प्रदेश के जिला सहकारी बैंकों में चतुर्थ श्रेणी के 423 पदांे पर फर्जी तरीके से भर्ती करने का मामला खासा चर्चित रहा है। देहरादून, ऊधमसिंह नगर और पिथौरागढ़ जिले के अभ्यार्थियों को परीक्षा परिणाम जारी होने के साथ ही इन भर्तियों में जमकर भाई-भतीजावाद और चयनित अभ्यार्थियों से लाखों के लेन-देन किए जाने के आरोप तब लगे थे। चेयरमैन, प्रबंधक और निदेशक जेेैसे बड़े पदांे पर बैठे अधिकारियों के परिजनों को भी चपरासी के पद पर नियुक्ति तब दे दी गई थी।

इस घोटाले के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा कार्यवाही करने के आदेश शासन को दिए जिस पर शासन ने सभी जिलों में हुई भर्ती के परीक्षा परिणामों को रोकते हुए किसी भी अभ्याार्थी को नियुक्त किए जाने पर रोक लगा दी। साथ ही इसके लिए दो सदस्यीय जांच कमेटी का गठन करने का भी आदेश जारी कर दिया गया। हैरत की बात यह है कि भर्ती प्रक्रिया और नियुक्ति पर रोक के बावजूद जिला सहकारी बैंक देहरादून में रातों-रात कुछ अभ्यार्थियों को नियुक्ति देने के साथ ही उनको बैंक शाखाओं में तैनाती भी दे दी।

संविदा कर्मियों के मामले में भी ऐसा ही घालमेल किए जाने के आरोप लग चुके हैं। 2011 से लेकर 2013 व 2013 से लेकर 2022 तक 44 संविदाकर्मियों को बैंकांे में भर्ती किया गया जिनके लिए रजिस्ट्रार से अनुमोदन तक नहीं लिया गया। जब मामला सुर्खियों में आया तब आनन- फानन में रजिस्ट्रार सहकारिता को भर्तियांे का अनुमोदन के लिए पत्र भेजा गया। जब मामला सामने आया तब अनुमोदन का खेल रचते हुए संविदाकर्मियों को नियमित करने के लिए भी रजिस्ट्रार से अनुमोदन लिया गया। भर्तियां तो बगैर अनुमोदन के ही की गई लेकिन नियमितीकरण के लिए अनुमोदन मांगा गया। आश्चर्य की बात यह है कि इन संविदाकर्मियों के नियमितीकरण का अनुमोदन रजिस्ट्रार द्वारा दे दिया गया।

सहकारिता विभाग में भारी अराजकता का एक बड़ा उदाहरण हरिद्वार की ‘बहुद्ेश्य साधन सहकारी समिति’ है जिसमें जून 2020 में पांच संविदा कर्मचारियों को भर्ती किया गया जिनको महज पांच माह बाद ही न सिर्फ नियमित कर दिया गया, बल्कि इन सभी को सातवंे वेतनमान का भी लाभ दे दिया गया। इन पदों के लिए भी रजिस्ट्रार से अनुमोदन तक नहीं लिया गया था। ऊधमसिंह नगर की सहकारी समितियों में भी जमकर संविदाकर्मियों को बगैर अनुमोदन के भर्ती किया गया और उनको छह माह से लेकर एक वर्ष के भीतर ही नियमित कर दिया गया और सातवें वेतन आयोग का लाभ भी दिया गया। ये सारे घपले 2014, 2016,2017 व 2020 में जमकर किए गए। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि कई सहकारी समितियों और सहकारी बैंकांे के कर्मचारी सातवें वेतन आयोग के लागू करने की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी फाइल लगभग दो वर्ष से निबंधक सहकारी में ही लम्बित पड़ी है। प्रबंध निदेशक की मानें तो निबंधक सहकारिता श्रीमती सोनिका ट्रेनिंग पर है और उनके द्वारा एक कमेटी बनाई गई है जो सातवंे वेतन आयोग पर निर्णय लेंगी।

इसके अलावा सहकारी विभाग के उच्चाधिकारियों पर भी घोटाले के आरोप सामने आ चुके हैं। हाल ही में दो ऐसे मामलों का खुलासा हुआ है जिसमें करोड़ांे का ऋण लेने का आरोप है। इसके अलावा जिला सहकारी बैंक हरिद्वार के पूर्व चेयरमैन पर जमीन खरीदने और सरकारी नौकरी दिलवाने के नाम पर 61 लाख की रकम हड़पने के आरोप लग रहे हैं। रूड़की निवासी अशोक कुमार ने आरोप लगाया गया है कि 2017 में वे निदेशक थे और सुशली चौधरी जिला सहकारी बैंक हरिद्वार के चेयरमैन के पद पर थे। चौधरी द्वारा उनको एक जमीन खरीदने और उस पर 2-3 महीने में ही 20 प्रतिशत का मुनाफा होने का प्रलोभन दिया जिस पर उनके द्वारा सुशील चौधरी को पैसे दिए गए। अब अशोक कुमार द्वारा सुशील चौधरी के खिलाफ धोखाधड़ी और अनानत में खयानत करने का मुकदमा दर्ज करवाया जा चुका है।

इसी तरह से सहकारी बैंक के महाप्रबंधक दीपक कुमार पर आरोप लगा है कि उनके द्वारा अपने भाई ब्रिजेश कुमार के नाम 10 लाख का ऋण फर्जी तरीके से लिया गया है। इसके लिए दीपक कुमार द्वारा कुमाऊं मंडल ऋण समिति की एक बैठक करवाई जिसमें ऋण पास किया जबकि जांच में पाया गया कि जिस ऋण समिति की बैठक में ऋण स्वीकृत करने की बात कही गई है उसमें ऐसा कोई प्रस्ताव आया ही नहीं। बावजूद इसके दीपक कुमार ने कोटद्वार शाखा से ऋण जारी करवा दिया और स्वयं दीपक कुमार ही इस ऋण के जमानती भी बन गए। यही नहीं जांच में पाया गया है कि दीपक कुमार द्वारा अपने भाई के खाते में आए ऋण को अपने खाते में भी स्थानांतरित किया गया। इससे साफ है कि दीपक कुमार द्वारा सहकारी बैंक से ऋण के नाम पर लाखों रुपए फर्जी तरीके से हड़पे हैं। दीपक कुमार पर पूर्व में भी गम्भीर श्रेणी के आरोप लग चुके हैं, जिनमें नियम विरुद्ध प्रबंधक निदेशक बनने के आरोप हैं। जांच के बाद आरोप सही पाए गए और उनको जीएम के पद पर वापस भेजा गया। इसके अलावा दीपक कुमार के खिलाफ विजिलेंस की जांच भी हो चुकी है। साथ ही दीपक कुमार पर विभागीय प्रतिकूल प्रवृष्टि भी अंकित की जा चुकी है। फिलहाल प्रबंधक निदेशक नीरज बेलवाल द्वारा दीपक कुमार को निलम्बित किया जा चुका है और उनके मामलांे की जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। हालांकि सहकारिता विभाग में भ्रष्टाचार और घोटाले के सभी मामलांे की जांच की मांग चल रही है, लेकिन कार्यवाही के नाम पर केवल सन्नाटा ही छाया हुआ है। हैरत की बात यह है कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती के मामले में प्रबंध निदेशक नीरज बेलवाल द्वारा जांच की गई थी जिसमें भर्ती करने पर अनियमितता के मामले पाए गए लेकिन इसके बाद जांच के लिए एक कमेटी फिर से बनाई गई और प्रबंध निदेशक नीरज बेलवाल को इस कमेटी में रखा ही नहीं गया। इससे साफ है कि राज्य के सहकारिता विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार और घपलों के मामलांे में कोई ठोस कार्यवाही होने पर संदेह बना हुआ है।

मैंने करीब दो वर्ष पूर्व सातवें
वेतनमान दिए जाने का अनुमोदन प्रस्ताव निबंधक सहकारी को भेज दिया है। जिस पर एक फाइनेंस एडवाजरी की कमेटी बन चुकी है। सम्भावना है कि निबंधक 27 दिसम्बर तक ट्रेनिंग से लौट आएंगी और प्रस्ताव पर निर्णय ले लिया जाएगा। हमलोग सहकारिता में सभी जगहों पर एक वेतनमान के लिए नीति बना रहे हैं क्यांेकि अलग-अलग जिलों में अलग-अलग वेतनमान है। इसको एक कर रहे हैं। भर्ती मामले के एक जांच मेेरे द्वारा की गई थी लेकिन अब दूसरी जांच चल रही है जिसमें मैं नहीं हू। इसलिए इस पर मैं ज्यादा तो नहीं बता सकता लेकिन मेरे द्वारा की गई जांच केे बाद कई लोगांे को सेवा से हटा दिया गया था। शीशमबाड़ा की जमीन का मामला हाईकोर्ट में चल रहा है। जिस व्यक्ति ने उक्त जमीन को बेचा है वह हाईकोर्ट चला गया और मामला निबंधक द्वारा ही होना है। भूमि हमारे नाम है और जल्द ही इस पर निबंधक द्वारा कार्यवाही की जाएगी।
नीरज बेलवाल, प्रबंध निदेशक, राज्य सहकारी बैंक

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