ब्रिटेन की स्थिति आज दोराहे पर खडे़ उस व्यक्ति जैसी हो गई जिसे सूझ नहीं पा रहा है कि किस दिशा में जाए

ब्रिटेन यूरोपीय संघ (ईयू) में रहेगा या नहीं, यह कुहासा छंटने के बजाए निरंतर गहराता ही जा रहा है। ब्रिटेन के इस असमंजस ने दुनिया के तमाम मुल्कों को भी आश्चर्यचकित किया है। देश की राजनीतिक पार्टियों के आपसी मतभेदों के चलते ब्रेक्जिट पर जनमत संग्रह के करीब तीन साल बाद भी सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी तथा विपक्षी लेबर पार्टी के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी है, वहीं स्कॉटलैंड में सरकार चला रही स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी का रुख ब्रेक्जिट के विरुद्ध रहा है। स्थिति यह है कि ब्रेक्जिट की समय सीमा लगातार बढ़ती रही है। इसके लिए निर्धारित समय सीमा 31 मार्च से बढ़कर अब 31 अक्टूबर हो गई है। पहले 31 मार्च की तारीख तय हुई, लेकिन ब्रिटिश संसद ने यूरोप से बाहर होने की सरकार की शर्तों को नामंजूर कर दिया था। इसके बाद यह तारीख 12 अप्रैल तक के लिए बढ़ा दी गई थी। अब ब्रिटेन 31 अक्टूबर तक कभी भी बाहर हो सकता है। समझौतों के मुताबिक यूके को तय तारीख के लिए फ्लेक्सिबल एक्सटेंशन (लचीली बढ़ोतरी) मिली है। इसका मतलब है कि 31 अक्टूबर तक यूके जब चाहे तब ईयू से बाहर हो सकता है। हालांकि 31 अक्टूबर तक समय सीमा बढ़ने से सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी को कुछ राहत मिली है, लेकिन इसके बाद भी देश का असमंजस समाप्त होने के आसार नहीं हैं।

यूरोपीय यूनियन 28 देशों का एक ऐसा महाद्वीपीय समूह है, जिसके सदस्य देशों ने एक-दूसरे की जनता के लिए सीमाएं पूरी तरह से खोल रखी हैं। यूनियन के किसी भी देश के नागरिक इसके किसी अन्य सदस्य देश में बिना वर्क परमिट के नौकरी कर सकते हैं। यही वजह ब्रिटेन के लोगों की परेशानी की वजह है। उन्हें लगता है कि दूसरे देशों के लोग उनकी नौकरियां हथिया सकते हैं। वे यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलना चाहते हैं, लेकिन दुविधा यह है कि वे यूनियन के साझा बाजार और कस्टम्स कानून के फायदे नहीं छोड़ना चाहते, ताकि ब्रिटेन यूरोप के लिए अंतरराष्ट्रीय निवेश का प्रवेशद्वार बना रहे। जैसे कि भारतीय व्यापारी ब्रिटेन के जरिए यूरोपीय यूनियन के 28 सदस्य देशों के बाजार में अपनी पैठ बनाना चाहते रहे हैं। लेकिन अभी जब ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग होने की प्रक्रिया में है तो भारत सहित अन्य बड़ी आर्थिक ताकतें भी ब्रिटेन से किनारा करने की सोचने लगी हैं। अभी कई बाहरी कंपनियां अपना मुख्यालय लंदन से हटाकर यूरोप की किसी बड़ी राजधानी में ले जाने की तैयारी में हैं ताकि यूरोप के विशाल बाजार का सीधे फायदा उठाया जा सके। लाभ-हानि के इसी संतुलन में ब्रिटेन के राजनेता असमंजस में हैं और वे ब्रेक्जिट यानी यूरोपीय यूनियन से अलग होने के प्रधानमंत्री टेरेसा मे के प्रस्ताव पर संसद की मुहर नहीं लगने दे रहे।

जानकारों के मुताबिक ब्रिटेन की स्थिति आज दोराहे पर खड़े उस व्यक्ति की तरह है जो निर्णय लेने की क्षमता में नहीं है कि किस दिशा में जाए। जून 2016 में एक जनमत संग्रह के जरिये ब्रिटेन की जनता ने मामूली बहुमत से यूरोपीय यूनियन (ईयू) को छोड़ने का फैसला तो ले लिया था, लेकिन उसके बाद देश किधर जायेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। अब जबकि यूरोप और ब्रिटेन के बीच राजनीतिक अलगाव का समय आ गया है, तो आम जनता के साथ सरकार, विपक्ष, संसद, अफसरशाही, बुद्धिजीवी और कॉरपोरेट जगत के नेता भी ब्रिटेन की भावी राह को लेकर असमंजस में हैं। ईयू के साथ प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने जो समझौता किया है, उसे ब्रिटेन की संसद में तीन बार नकारा जा चुका है। इस समझौते के विरोधियों ने ‘नो डील ब्रेक्जिट’ का प्रस्ताव भी रखा। उनकी दलील यह थी कि एक अहितकर समझौते से तो बिना समझौते के ईयू को छोड़ना बेहतर होगा। संसद ने यह प्रस्ताव भी नकार दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ब्रिटेन के राजनीतिक दलों के अंदरूनी हालात भी असमंजस के बड़े कारण रहे हैं। सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी में सत्ता की लड़ाई चल रही है। ब्रेक्जिट अभियान के मुख्य सूत्रधार और पूर्व विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री पद हथियाना चाहते हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री टेरेसा मे को आशंका है कि अब उनकी सरकार ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है। लिहाजा उन्होंने एक यह दांव चला है कि वे अपने प्रस्तावित समझौते पर संसद में चौथी बार मतदान कराएंगी और उसके पास हो जाने के बाद त्यागपत्र दे देंगी। उन्होंने देश में नए चुनाव का भी संकेत दिया है, इसके लिए उन्होंने प्रतिपक्ष के नेता जेरेमी कॉर्बिन से मदद मांगी है। दूसरी तरफ लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन को ऐसा लगता है कि यदि चुनाव होते हैं, तो उनका प्रधानमंत्री बनना तय है। हालांकि ब्रेक्जिट के सवाल पर उनकी पार्टी भी विभाजित है। यानी सारा देश भ्रमित है। व्यापारी वर्ग में निराशा है। बड़े उद्योगपति ब्रिटेन से अपने कारखाने हटाकर यूरोप के देशों में ले जाने की धमकी दे रहे हैं। पाउंड का दाम गिर रहा है। मकानों की कीमतें गिर रही हैं और अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया है।

इस सबके बावजूद ब्रिटेन के कई नेता मानते हैं कि यूरोपीय यूनियन को ब्रिटेन की ज्यादा जरूरत है। वर्ष 2017 में ब्रिटेन ने ईयू के बजट में 13 अरब पाउंड का योगदान दिया था। इनमें से सिर्फ चार अरब पाउंड ब्रिटेन में खर्च किये गये। यदि ब्रिटेन अपना योगदान बंद कर लेता है, तो ईयू के लिए भारी आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा। दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं होता है, तो नुकसान दोनों को होगा। ब्रिटेन के 44 प्रतिशत निर्यात और 53 प्रतिशत आयात ईयू के साथ होते हैं। साझा बाजार खत्म होने के बाद दोनों पक्ष एक- दूसरे पर आयात और निर्यात शुल्क लगाएंगे, जिससे दोनों के उत्पाद महंगे हो जाएंगे। सीमाओं पर कस्टम और अप्रवास के नए अवरोध खड़े किए जाएंगे। स्वतंत्र आवाजाही बंद होने से व्यापारियों और सैलानियों के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

नेताओं की यूरोप विरोधी मानसिकता ने देश में राजनीतिक बिखराव और भ्रम के गंभीर हालात बना दिए हैं। भारी छटपटाहट और मानसिक यातना के अलावा इस समय ब्रिटेन को कोई और रास्ता नहीं दिख रहा है।

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