Uttarakhand

‘कैडर बेस से लीडर बेस बन गई है कांग्रेस’

पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पौड़ी लोकसभा सीट से उम्मीदवार गणेश गोदियाल से ‘दि संडे पोस्ट’ के विशेष संवाददाता कृष्ण कुमार की उत्तराखण्ड के मुख्य मुद्दों पर बातचीत

 

मैंने धनसिंह रावत पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और आरोपों की जांच की मांग की, मेरे आरोपों से ध्यान हटाने के लिए धनसिंह रावत ने किसी व्यक्ति से मेरे ऊपर आरोप लगवा डाले। धनसिंह रावत का यह कर्तव्य बनता था कि मेरे पर लग रहे आरोपों की जांच करवा देते। मैंने तो मुख्यमंत्री को कहा कि मेरी भी जांच करवाएं और धनसिंह रावत की भी जांच करवाएं। क्यों नहीं जांच हुई? बिनसर मंदिर जो कि मेरे गांव से भी सौ किमी दूर है उसका जीर्णोद्धार करवाया, जोशीमठ का पौराणिक नर्सिंग मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तो क्या गलत किया? अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बन रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी उसका श्रेय ले रहे हैं तो सब वाह- वाह कर रहे हैं। अगर गणेश गोदियाल ने बिनसर और नर्सिंग मंदिर का जीर्णोद्धार करवा दिया तो बहुत बड़ा गलत काम कर दिया। बिनसर मंदिर को बदरीनाथ मंदिर समिति ने बकायदा प्रस्ताव पास करके अपने आधीन लिया और फिर उसका जीर्णोद्धार के लिए बजट पारित हुआ। मेरे समय में वह बजट भी खर्च नहीं हुआ क्योंकि तब तक मैं अध्यक्ष पद से हट गया था। मेरे हटने के बाद इन्हीं की सरकार ने बजट खर्च किया। भाजपा के लोग अपने पापांे को छुपाने के लिए दूसरे पर आरोप लगा देते हैं

उत्तराखण्ड राज्य बने हुए 23 वर्ष पूरे हो चुके हैं और 24 वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इन वर्षों में आप राज्य को कहां पाते हैं?
अगर हम उत्तराखण्ड के इन 24 वर्षों पर नजर डालें तो निश्चित रूप से यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारे राज्य का काफी विकास हुआ है। पिछले 23-24 सालों की हम बात करें तो करीब-करीब दस साल सत्ता में कांग्रेस पार्टी रही है औेर बाकी के जो साल बचते हैं उनमें भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रही है तो यह कहना कि विकास नहीं हुआ तो यह हमारे प्रदेश के पुरुषार्थ के साथ धोखा है। कह सकते हैं कि भौतिक दृष्टि से तो बहुत विकास हुआ है लेकिन मुझे उपलब्धि ढंूढ़ने में बहुत दूर तक खोजना पड़ेगा। सड़कांे के क्षेत्र में बहुत काम हुआ। पेयजल की समस्या रहती थी, आज पेयजल के क्षेत्र में काम हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम हुआ लेकिन गुणवत्ता के क्षेत्र में नहीं हुआ। हमने स्कूलों को खड़ा तो कर दिया बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बना दी लेकिन शिक्षा के स्तर का बहुत ह्रास हुआ। शिक्षा गुणवत्ता नहीं बन पाई है।

आपकी नजर में ऐसा कौन सा कार्य है जो इन 23 वर्षों में होना तो चाहिए था किंतु नहीं हो पाया?

गैरसैंण को राजधानी बनाने की दिशा में शुरुआती समय में ही काम होना चाहिए था जो नहीं हो पाया। देखिए, हमारे पड़ोस में ही हिमाचल प्रदेश है। आज हिमाचल विकास की जिस राह पर चल रहा है उसको देखता हूं तो उसके पीछे वहां के एक बहुत ही मजबूत और दूर दृष्टि सोच के नेता को श्रेय जाता है। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत परमार जिस रास्ते पर हिमाचल प्रदेश को शुरुआती दौर में ले गए मैं समझता हूं हमको भी उसी रास्ते पर उत्तराखण्ड को ले जाना चाहिए था। ऐसा मेरी व्यक्तिगत सोच है। दुर्भाग्य से जब उत्तराखण्ड राज्य बना तो उस वक्त हमारे जो राजनेता सत्ता में थे अगर उन्होंने उसी समय गैरसैंण में टेंट लगा कर राजधानी शुरू कर दी होती तो आज गैरसैंण राजधानी होती। हुआ लेकिन यह कि वे लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए देहरादून आ गए और अपने साथ सभी सरकारी विभाग जो उत्तर प्रदेश के समय से पहाड़ों में थे उनको भी देहरादून में ले आए। जब राजधानी देहरादून से ही चलने लगी तो उसके बाद की सरकारों ने भी कोई हिम्मत नहीं दिखाई कि गैरसैंण को राजधानी बना दे। सिर्फ दो लोगों को मैं मानता हूं कि उन्होंने गैरसैंण के लिए काम किया उनमें एक गोविंद सिंह कुंजवाल जी और दूसरे हरीश रावत जी हैं। इन लोगों ने गैरसैंण को राजधानी बनाने की दिशा में सोचा। हमने उनको पूरा समर्थन दिया और गैरसैंण राजधानी बनने की दिशा में आगे बढ़ा। आज भी अगर गैरसैंण राजधानी बन जाती है तो वहां सौ-डेढ़ सौ किमी के रेडिएस में डेवलपमेंट ऑटोमेटिक होने लगेगा।

आज कल प्रदेश में मूल निवास की मांग बड़े जोर-शोर से उठाई जा रही है। इसके लिए लगातार आंदोलन हो रहा है। इस पर आपका क्या विचार है?

कांग्रेस पार्टी का क्या रुख है यह तो हमारे कांग्रेस के नेता, हमारे अध्यक्ष जी ही स्पष्ट कर सकते हैं। जहां तक मेरे विचार की बात है तो मेरा भू-कानून और मूल निवास के प्रति बहुत स्पष्ट रुख है। मैं मूल निवास का पूरी तरह से पक्षधर हूं। मैं यह मानता हूं कि मूल निवास व्यवस्था लागू होने से किसी का भी अहित नहीं है। लोग मुझ से कहते हैं कि आप मूल निवास का पक्षधर हो तो हमारे प्रदेश के दो जिले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के निवासियों का क्या होगा? तो मेरा यह कहना है कि हरिद्वार हो या ऊधमसिंह नगर जो भी भारत में मूल निवास की 1950 की व्यवस्था बनी है, उसमें सभी लोग आ रहे हैं। आखिर हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के लोग भी तो वहां के मूल निवासी ही हैं। देश में एक कानून लागू है जो हमारे प्रदेश में भी लागू है कि जो लोग एक प्रदेश को छोड़कर दूसरे प्रदेश में अपने जीवन-यापन आदि के लिए जाते हैं तो उनके लिए डोमिसाईल, एक शब्द है जो स्थाई निवास कहलाता है, की व्यवस्था है।

इस दोहरी व्यवस्था में एक बड़ी समस्या यह भी आ रही है कि मूल निवासी अपने अधिकार उतने नहीं ले पा रहे हैं जितने स्थाई निवासी ले रहे हैं। इसको कैसे सुलझाया जा सकता है?
देखिए, मूल निवासियों का सबसे ज्यादा रोष इस बात से है कि बाहरी लोगों द्वारा गलत तरीके से स्थाई निवास प्रमाण पत्र बनवा लिए जाते हैं। जो लोग मूल निवास के आंदोलन को चला रहे हैं उनके द्वारा सोशल मीडिया में अनेक ऐसे प्रमाण दिए गए हैं कि चार-पांच सालों में गलत तरीके से स्थाई निवास प्रमाण बनाकर सरकारी नौकरियां हासिल की गई हैं। ऐसे कई प्रमाण आपको मिल सकते हैं। यह जांच का विषय है। सरकार में बैठे जो लोग हैं उनको इस तरह के मामलों की जांच कर उन सभी को सरकारी नौकरियों से बाहर करना चाहिए। यह अधिकारियों की मिलीभगत का परिणाम है इसके लिए जांच हो और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही हो।

2012 में कांग्रेस की बहुगुणा सरकार ने ही प्रदेश में मूल निवास की व्यवस्था को हटाकर स्थाई निवास की व्यवस्था लागू करवाई थी। तब आप सरकार में मंत्री थे। आपने मूल निवास व्यवस्था को हटाए जाने के खिलाफ कोई विरोध नहीं किया। अब आप मूल निवास की बात कर रहे हैं यह दोहरा रवैया क्यों?
आपकी बात बिल्कुल सही है। लेकिन जब मुख्यमंत्री एक विधायक को पूछता ही ना हो और न ही विधायकों से यह पूछा जाता हो कि हम यह कर रहे हैं इस पर आपकी क्या राय है तो विधायकों को कैसे दोष दिया जा सकता है। मैं जो गलत था उस पर हमेशा से अपना रोष प्रकट करता था। यह बात मेरे संज्ञान में नहीं आई। अब हमें पता चल रहा है कि बहुगुणा जी ने किया। बहुगुणा जी ने जो किया है, अगर आम जनमानस उसे देखेगा तो उनको सदियों तक कोसेगा। जो गलत है तो वह गलत है किसी भी सरकार ने किया हो चाहे हमारी सरकार ने किया है, अगर गलत किया है तो वह गलत है। अब उसे सुधारने का समय है। आज मांग उठ रही है तो वर्तमान सरकार को उसे ठीक करना चाहिए। मान लीजिए बहुगुणा जी ने गलत किया तो अब धामी ठीक कर दें ना। आज मांग तो धामी जी के सामने उठी है तो धामी जी ठीक कर दें।

अफसर कभी कोई अडंगा नहीं लगाते। अडंगा केवल और केवल राजनीतिक लोग ही लगाते हैं। राजनीतिक लोग अपने प्रतिद्वंदियों के कामों पर रोक लगाने के लिए अफसरों पर दबाव बनाते हैं। मेरा तो राजनीति में आने का कोई मकसद ही नहीं था। मैं अपने प्रदेश में काम करने के लिए वापस लौटा हूं। हर काम में राजनीतिक लोग दखल देते थे तो मैंने सोचा इन कांटों को दूर करने के लिए मुझे भी राजनीति में आना चाहिए तो मैं राजनीति में आया। मेरी प्रकृति मूल रूप से एक उद्यमी की है। मुझे काम करने का एक जनून है मुझे काम करना है। मैंने कोविड के समय अपने गांव में एक रिसोर्ट बनाने के लिए एसडीएम थलीसैंण को आवेदन दिया था लेकिन आज तक मेरी फाइल धूल खा रही है। मैंने पता करवाया तो मुझे बताया गया कि मेरे काम को नहीं करने का आदेश दिया गया है। मैंने आपको स्टार्टिंग में क्या कहा था कि सरकार को संकीर्णता से ऊपर उठकर बड़ा दिल करना होगा और सभी के श्रम का सम्मान करना होगा

भू-कानून की भी मांग बहुत तेजी से उठ रही है। इसके लिए आंदोलन भी हो रहे हैं। इस पर आपके विचार?
मैं यह मानता हूं कि असरकारी और प्रभावी भू-कानून होना चाहिए जिससे कि हमारे मूल निवासियों के भविष्य के हितों को सुरक्षित रखा जाए। यदि आज सारी जमीनें बिक जाएंगी तो हमारी आने वाली जनरेशन के लिए राज्य में कुछ नहीं बचेगा। हम अपनी पहचान खो देंगे। हम अपनी पहचान को बचाए रखें इस पर सरकारों को सुरक्षित रखने के लिए कानून बनाने चाहिए। मेरा यह मानना है कि अगर उत्तराखण्ड का कोई आदमी अपनी जमीन बेच रहा है तो वह कहीं भी उत्तराखण्ड में उतनी जमीन जरूर खरीदे। यह कानून में प्रावधान होना चाहिए। इसमें लीज की स्थिति भी लाई जा सकती है जिससे जमीन के मूल मालिक को फायदा हो और उसकी जमीन उसके पास ही रहे।

उत्तराखण्ड के कौन से ऐसे पांच मुद्दे हैं जो आपको सबसे ज्यादा समझ में आते हैं कि इन पर अगर काम किया जाए तो राज्य की बेहतरी के लिए हो सकते हैं?

पहला मुद्दा तो यह है कि सरकार को सबसे पहले संकीर्णता त्यागनी चाहिए। चाहे वह कांग्रेस के समर्थक हो भाजपा के हों या फिर निर्दलीय हों। राज्य के विकास के लिए प्रत्येक आदमी के श्रम का सम्मान होना चाहिए। सरकार को सबको मुख्यधारा में लाकर काम पर लगाना चाहिए जिससे राज्य का विकास हो। दूसरा सरकार को रोजगार की गांरटी के लिए नीति तय करनी चाहिए कि हम पढ़े-लिखे युवाओं चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण क्षेत्र के हो उनके लिए रोजगार सुनिश्चित करे। ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा को दो सौ दिन का किया जाए। तीसरा शिक्षा के क्षेत्र में बहुत क्रांति करने की आवश्यकता है। शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने का सबसे ज्यादा काम होना चाहिए। इसका असर यह हो रहा है कि राष्ट्रीय औेर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम्पटीशन में हम पिछड़ते जा रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि फिर युवा नेता के आगे-पीछे घूमने लगता है और नेता उसे उपनल आदि जैसे तरीके से नौकरी में लगा देता है जहां वह अपना जीवन-यापन करने लगता है। उसकी सोच भी वहीं ठहर जाती है। चौथा ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य से संबंधित समस्या को सरकार सुलझाए। स्वास्थ्य का ढांचा पूरी तरह से खत्म हो गया है इसे एक मुश्त ठीक करने की जरूरत है। पंाचवां है ह्यूमन रिर्सोर्स का डेवलेपमेंट। आज हर एक आदमी के पास कोई न कोई हुनर है। उसके हुनर को और विकसित कर उसे राज्य के विकास के लिए आगे करने की आवश्यकता है। हमारे यहां जो कुछ भी है उसे हमको वैल्यू एडिशन करना है।

आप बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष रहे हैं। आप पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। इस पर आपका क्या पक्ष है?

मैंने धनसिंह रावत पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और आरोपों की जांच की मांग की, मेरे आरोपों से ध्यान हटाने के लिए धनसिंह रावत ने किसी व्यक्ति से मेरे ऊपर आरोप लगवा डाले। धनसिंह रावत का यह कर्तव्य बनता था कि मेरे ऊपर लग रहे आरोपांे की जांच करवा देते। मैंने तो मुख्यमंत्री को कहा कि मेरी भी जांच करवाएं और धनसिंह रावत की भी जांच करवाएं। क्यों नहीं जांच हुई? बिनसर मंदिर जो कि मेरे गांव से भी सौ किमी दूर है उसका जीर्णोद्धार करवाया, जोशीमठ का पौराणिक नर्सिंग मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, तो क्या गलत किया। अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बन रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी उसका श्रेय ले रहे हैं तो सब वाह-वाह कर रहे हैं। अगर गणेश गोदियाल ने बिनसर ओैर नर्सिंग मंदिर का जीर्णोद्धार करवा दिया तो बहुत बड़ा गलत काम कर दिया। बिनसर मंदिर को बदरीनाथ मंदिर समिति ने बकायदा प्रस्ताव पास करके मंदिर को अपने आधीन लिया और फिर उसका जीर्णोद्धार के लिए बजट पारित हुआ। मेरे समय में वह बजट भी खर्च नहीं हुआ क्योंकि तब तक मैं अध्यक्ष पद से हट गया था। मेरे हटने के बाद इन्हीं की सरकार ने बजट खर्च किया। भाजपा के लोग अपने पापांे का छुपाने के लिए दूसरे पर आरोप लगा देते हैं।

पहले कांग्रेस होती थी कैडर बेस पार्टी, धीरे-धीरे इस स्थिति में बदलाव आया। आज भारतीय जनता पार्टी कैडरबेस पार्टी हो गई है और कांग्रेस लीडर बेस पार्टी हो गई है। लेकिन इसको आप हल्का नहीं समझ सकते। लीडर बेस पार्टी है और लीडर हैं तो उसका कार्यकर्ता खड़ा होता है, न कि अपने लीडर के लिए। यही कांग्रेस की बड़ी ताकत है। इससे कांग्रेस कमजोर नहीं हो रही है, बल्कि पार्टी में ताकत भी इसी से आ रही है


मंदिर समिति में अनेक विवाद सामने आ रहे हैं। कभी क्यूआर कोड का मामला हो या मंदिर में सोने की चोरी। आखिर यह विवाद क्यों हो रहे हैं?

जब तक मैं था तब तक कोई विवाद क्यों नहीं हुआ। क्योंकि जब तक आपका अपना स्वार्थ नहीं है तब तक कोई विवाद नहीं हो सकता। आज जो लोग समिति में हैं उनके अपने स्वार्थ हैं इसलिए मंदिर समिति में विवाद सामने आ रहे हैं। जब किसी संस्थान का मुखिया स्वार्थ में लिप्त हो जाता है तो वह किसी दूसरे के स्वार्थ को वंचित नहीं कर सकता। बस यही मंदिर समिति में हो रहा है।

करोड़ों के सोने की चोरी का विवाद आखिर है क्या। आप अध्यक्ष रहे हैं, आप मंदिर समिति की पूरी व्यवस्था को बेहतर जानते हैं?

जब मैं अध्यक्ष था तब इसी पार्टी जिन्होंने सोना चढ़ाया है, ने मुझसे संपर्क किया था और कहा कि हम पांच सौ किलो सोना बदरीनाथ मंदिर में देना चाहते हैं। मैं बहुत खुश हुआ था कि मंदिर समिति को पांच सौ किलो सोना दान में मिलेगा जिसे मंदिर समिति बैंक में रख कर गोल्ड बॉण्ड स्कीम से अपना खर्च चलाएगी। हमने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस मुद्दे पर तीन-चार बार हमारी बैठकें हुई थीं। लेकिन जब हमें यह पता चला कि वह सोना सॉलिड की बजाय तांबे या पीतल के पतरों पर पॉलिस के रूप में मंदिर को मिलेगा तो हमें आश्ंाका हुई कि सोने की परत लगी चद्दरों से कैसे मापा जाएगा कि कितना सोना लगा है? इसको मापने का कुछ साइंटिफिक तरीका तो होना चाहिए। मंदिर समिति पर लोगों की आस्था है इसलिए अगर पांच सौ किलो सोना है तो वह पांच सौ किलो ही होना चाहिए। मैंने फिर उनको प्रस्ताव दिया कि भारत सरकार की एमएमटीसी (मेटल एंड मिनरल ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) इस फील्ड की मास्टर है, उनको थर्ड पार्टी वैल्युवेशन के लिए रख देते हैं। वह हमें यह बताएगी कि तांबा या पीतल की चद्दरों पर कितना सोना है। जो वह वैल्यु देगी उतने का हम आपका सर्टिफिकेट दंेगे कि इतना सोना हमें मिला। फिर उन्होंने मुझे अन्य तरीकों से मनाने का प्रयास किया लेकिन मैंने साफ कर दिया कि हम केवल एमएमटीसी की वैल्यु के हिसाब से ही काम करेंगे। विवाद यह है कि सोना तो निश्चित ही रहा होगा। पहले कहा गया कि 223 किलोग्राम सोना है। फिर बोला गया कि 23 किलो सोना है। जबकि मेरा मानना है कि वह 23 किलो भी सोना नहीं है। यह सब झूठे सर्टिफिकेट के लिए किया गया खेल है। मदिर समिति ने सोने के कारोबारी को सोना दान करने का प्रमाण पत्र दे दिया जिससे कारोबारी ने अपना टैक्स बचा लिया। पहले 223 किलो सोने का सर्टिफिकेट जारी किया जाना था। हंगामा हुआ तो 23 किलो का सर्टिफिकेट जारी किया गया। मंदिर कमेटी से अपने रिकॉर्ड में सोना मात्र 23 किलो दर्ज किया है। मैं मंदिर कमेटी से पूछना चाहता हूं कि आपके पास क्या आधार है कि आपने 23 किलो सोना मापा? किस माप से आपने माना है कि चद्दरों पर 23 किलो सोना चढ़ा हुआ है? यह साफ-साफ चोरी है। मंदिर कमेटी के रिकॉर्ड में तो 23 किलो सोना मिलने का दर्ज किया गया है जबकि मेरा मानना है कि एमएमटीसी से जांच करवाई जाए तो 10 किलो भी सोना नहीं होगा।

आप मुम्बई में अपना कारोबार करते थे, राज्य बनने के बाद आपने अपने गांव में एक सफल डेयरी उद्योग खड़ा किया जो कि पहाड़ों में पहले कभी किसी ने इतने बड़े स्तर पर नहीं किया। आज प्रदेश में कारोबारियों और उद्योग लगाने वाले के लिए माहौल कैसा है। आपको लगता है कि अफसरशाही उद्यमियों को हतोत्साहित कर रही है?
नहीं बिल्कुल नहीं। अफसर कभी कोई अडंगा नहीं लगाते। अडंगा केवल और केवल राजनीतिक लोग ही लगाते हैं। राजनीतिक लोग अपने प्रतिद्वंदियों के कामों पर रोक लगाने के लिए अफसरों पर दबाव बनाते हैं। मेरा तो राजनीति में आने का कोई मकसद ही नहीं था। मैं अपने प्रदेश में काम करने के लिए वापस लौटा हूं। हर काम में राजनीतिक लोग दखल देते थे तो मैंने सोचा इन कांटों को दूर करने के लिए मुझे भी राजनीति में आना चाहिए तो मैं राजनीति में आया। मेरी प्रकृति मूल रूप से एक उद्यमी की है। मुझे काम करने का एक जनून है मुझे काम करना है। मैंने कोविड के समय अपने गांव में एक रिसोर्ट बनाने के लिए एसडीएम थलीसैंण को आवेदन दिया था लेकिन आज तक मेरी फाइल धूल खा रही है। मैंने पता करवाया तो बताया गया कि मेरे काम को नहीं करने का आदेश दिया गया है। मैंने आपको स्टार्टिंग में क्या कहा था कि सरकार को संकीर्णता से ऊपर उठकर बड़ा दिल करना होगा और सभी के श्रम का सम्मान करना होगा।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कई बड़े नेता चुनाव नहीं लड़ने की बात कह रहे हैं आप भी पौड़ी सीट से चुनाव नहीं लड़ने की बात कह चुके हैं। क्या कांग्रेस के बड़े नेता चुनाव में उतरने से डर रहे हैं?
कोई क्या कह रहा है यह मैं कैसे बता सकता हूं? मेरी परिस्थिति अलग है। ऐसा नहीं है कि मैं चुनाव लड़ने से डर रहा हूं। मनीष खंडूड़ी जी पिछली बार चुनाव लड़े और तब से वे लगातार क्षेत्र में आते रहे हैं। उनका संपर्क कांग्रेस कार्यकर्ताओं से बना हुआ था और मतदाताओं से भी उनका लगातार संपर्क है। वे पांच साल से मेहनत कर रहे थे। हार के
बावजूद उन्होंने अपने क्षेत्र को छोड़ा नहीं था। ऐसे में मैं मीडिया के बोलने से कि मैं चुनाव में दम ठोकता कि मैं चुनाव लड़ रहा हूं तो मैं ऐसा करने वालों में नहीं। मैं मानता हूं कि जो आदमी पहले से तैेयारी कर रहा है उसके सामने अपनी दावेदारी एक प्रतिद्वंदिता पैदा करेगा। इससे वो भी कमजोर होंगे और मैं भी। हम ऐसा क्यों करें? निश्चित रूप से हमारे ऊपर कार्यकर्ताओं की मेहरबानी है। मुझ पर उनका प्रेम है कि वो चाहते हैं कि मैं चुनाव लडूं। लेकिन यह मेरा फर्ज बनता हेै और मैं उनको समझा रहा था कि हमारे पास एक काबिल आदमी है हम सब उसके लिए काम करेंगे। अपना दावा करने का मतलब है कि हम अपने साथी को कमजोर कर रहे हैं। मैं न तो मनीष जी को कमजोर करना चाहता था और न ही अपनी पार्टी को कमजोर करना चाहता हूं। अब उन्होंने पार्टी छोड़ दी है। फिलहाल पार्टी ने मुझ पर विश्वास जताया है और पौड़ी से लोकसभा का टिकट दिया है, मैं पार्टी का आभारी हूं।

आप कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने लेकिन अपनी कार्यकारिणी का गठन तक नहीं कर पाए। फिर आपको चुनाव में हार के बाद हटा दिया गया। ऐसा क्यों हुआ?

प्रीतम सिंह जी ने अपनी कार्यकारिणी का गठन किया। मैं करता तो कांग्रेस के ही लोगों को रखता। मैं कोई बाहर से तो नहीं रखता। जरूरी तो नहीं है कि नया अध्यक्ष नई कार्यकारिणी बनाए। कांग्रेस के नेता कार्यकर्ता थे उनसे ही काम लेना था जैसे जरूरत पड़ी कार्यकारिणी बनाई गई। रही अध्यक्ष पद से हटाए जाने की तो मुझे हटाया नहीं गया था। मैंने स्वयं रिजाइन किया था। पांचों राज्य के प्रदेश अध्यक्षों ने इस्तीफा दिया तो मैंने भी इस्तीफा दिया। मुझे इसका कोई मलाल नहीं है। जितने दिनों तक मैं अध्यक्ष रहा मैंने पार्टी के साथ पूरा न्याय किया। कार्यकर्ताओं के साथ पूरा काम किया।

कांग्रेस के कई बड़े नेता यह मानते हैं कि प्रदेश में कांग्रेस संगठन भाजपा के मुकाबले उतना मजबूत नहीं है। कांग्रेस की राजनीति नेताओं में ही सिमट कर रही गई है जबकि जमीनी स्तर पर संगठन के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन रही है। क्या वाकई पार्टी में यह हो रहा है?

पहले कांग्रेस होती थी कैडर बेस पार्टी, धीरे-धीरे इस स्थिति में बदलाव आया। आज भाजपा कैडरबेस पार्टी हो गई है और कांग्रेस लीडर बेस पार्टी हो गई है। लेकिन इसको आप हल्का नहीं समझ सकते। लीडर बेस पार्टी है और लीडर हैं तो उसका कार्यकर्ता खड़ा होता है, न कि अपने लीडर के लिए। यही कांग्रेस की बड़ी ताकत है। इससे कांग्रेस कमजोर नहीं हो रही है, बल्कि पार्टी में ताकत भी इसी से आ रही है।

तो फिर कांग्रेस में नई लीडरशिप क्यों नहीं आ रही है। आज भी चुनाव में बड़े पुराने नेताओं की ओर ही देखकर पार्टी चुनावी राजनीति कर रही है?

ऐसा नहीं है। आज कांग्रेस में नई लीडरशिप खड़ी हो चुकी है। पहले हरीश रावत जी अध्यक्ष थे, आज करण माहरा जैसे युवा अध्यक्ष हैं। भुवन कापड़ी जैसे युवा नेता हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में अधिकांश जगहांे पर नए लोगों को टिकट दिए गए।

आज कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की होड़ लगी हुई है। इसको कैसे देखते हैं?

भाजपा साधन सम्पन्न पार्टी है। उसे कांग्रेस के नेताओं की जरूरत नहीं है वह सिर्फ इसलिए कांग्रेस के नेताओं को भाजपा में ले रही है क्योंकि वह कंाग्रेस में नई लीडरशिप को ही खत्म करना चाह रही है। आप देखिए, किसी बुजुर्ग नेता को भाजपा ने लिया है? वह युवा और नए लोगों को ही क्यों ले रही है? इसका एक ही मतलब है कि भाजपा का उद्देश्य कांग्रेस की युवा ओैर नई लीडरशिप को खत्म करने का है। इसके लिए धन बल, जांच एजेंसी ईडी, सीबीआई और भय का सहारा ले रही है। लेकिन कांग्रेस के समर्पित सिपाही और कार्यकर्ता कांग्रेस के साथ हैं और रहेंगे।

गणेश गोदियाल का सफर
जीवन परिचय: जन्म- 1967 स्थान मुंबई। कंडारस्यूं पट्टी ग्राम बहेड़ी (पैठाणी) जिला पौड़ी गढ़वाल के मूल निवासी
शिक्षा: स्नातक (अर्थशास्त्र)
राजनीतिक यात्रा: जनपद पौड़ी के कांग्रेस पार्टी के जिला सचिव और जिला अध्यक्ष पद पर रहे। प्रदेश कांग्रेस कमेटी में सदस्य बने और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में सदस्य रहे। वर्ष 2021 में उत्तराखण्ड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त हुए। वर्तमान में कांग्रेस वर्किंग कमेटी से सदस्य हैं।
जनप्रतिनिधि के रूप में: 2002 में पहली बार थलीसैंण विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर विधायक निर्वाचित हुए। 2012 में श्रीनगर विधानसभा से कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतकर विधायक बने। वर्ष 2003 से 2007 तक कांग्रेस सरकार में गढ़वाल मंडल विकास निगम के अध्यक्ष रहे तथा 2013 से 2019 तक श्रीबदरीनाथ श्री केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष रहे। 2002 के विधानसभा चुनाव में महज 5 सौ मतों से हारे।
सम्प्रतिः मूलत: उद्योग और कारोबारी प्रवृति के होने के चलते प्रारम्भिक दौर में सिविल कंस्ट्रक्शन का काम किया। पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद अपने राज्य में उद्योग लगाने की मंशा के साथ अपने गांव में वृहद स्तर पर सफल डेयरी उद्योग खड़ा किया तथा अपने क्षेत्र राठ में उच्च शिक्षा के साधनों की भारी कमी को देखते हुए स्वयं का अपने निजी राठ महाविद्यालय की स्थापना की जिसमें सैकड़ों छात्रांे को उच्च शिक्षा अपने ही क्षेत्र में मिल रही है।
उपलब्धि: श्रीबदरीनाथ श्री केदारनाथ मदिंर समिति के अध्यक्ष रहते हुए जोशीमठ के नर्सिंग मंदिर व बिनसर मंदिर का जीर्णोद्धार करवा कर भव्य स्वरूप प्रदान किया। मंदिर समिति में प्रशासनिक व्यवस्था में आमलचूल परिवर्तन करके पारदर्शी व्यवस्था को लागू करवाया। साथ ही मंदिर समिति की सम्पतियों की सुरक्षा और सरंक्षण के लिए व्यवस्था आरम्भ की।
विजन: राज्य के युवाओं को ग्रामीण उद्योगों से जोड़ने और परम्परागत कौशल विकास के लिए कार्यक्रम चलाए जाना। ग्रामीण परिवेश और संस्कृति के अनुरूप पर्यटन को बढ़ावा देना, प्रदेश के विकास के लिए सभी को संकीर्ण मानसिकता को त्याग कर आगे बढ़ना तथा राज्य के मूल निवासियों के अधिकारों को सुरक्षित और संवर्धन करना।

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