स्वास्थ्य बीमा पर भी जीएसटी लगाए जाने को लेकर केंद्र सरकार की इन दिनों खासी आलोचना हो रही है। लोकसभा के पटल पर रखे गए आंकड़ों अनुसार वर्ष 2021 से 2024 तक स्वास्थ्य बीमा पर लगाए गए 18 प्रतिशत जीएसटी के जरिए केंद्र सरकार को 24,529 करोड़ की धनराशि प्राप्त हुई है। विपक्षी दल इसे ‘आपदा में टैक्स का अवसर’ कह मोदी सरकार की घेराबंदी कर रहे हैं। इतना ही नहीं कई केंद्रीय मंत्री भी इसको लेकर मुखर हो चले हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने तो वित्त मंत्री को पत्र तक लिखकर स्वास्थ्य बीमा पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाए जाने के निर्णय पर पुनर्विचार की मांग कर डाली है
स्वास्थ्य बीमा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आम जनता को दी गई एक बड़ी सुविधा है जो जनकल्याणकारी राज्य होने की अवधारणा को मजबूत करता है। अब लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर 18 फीसदी का जीएसटी लगाकर उन बीमा धारकों को हतोत्साहित करने का काम कर दिखाया है जो फ्री सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना के बजाय अपना बीमा खुद करते हैं। पिछले 2 वर्ष के आकड़ों अनुसार कई स्वास्थ्य बीमा धारकों ने पॉलिसी का नवीनीकरण ही नहीं कराया है। बीमा धारकों का कहना है कि इंश्योरेंस एक ऐसा प्रोडक्ट है जहां अधिकांश लाभार्थियों को तभी फायदा मिलता है जब उन्हें मृत्यु या अस्पताल में भर्ती होने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। ऐसे में प्रीमियम पर जीएसटी की ऊंची दर आम लोगों को निराश करती है। शुरुआत में स्वास्थ्य बीमा काफी सस्ती दरों (प्रीमियम) पर हो जाता था लेकिन जैसे-जैसे प्रीमियम बढ़ता गया, वैसे-वैसे इसका नवीनीकरण मुश्किल होता गया। जहां पहले पांच लाख तक की सालाना प्रीमियम 15000 था, वहीं अब 18 फीसदी जीएसटी के बाद 17700 हो गई यानी कि 2700 रुपए का अतिरिक्त बोझ आम आदमी पर पड़ गया है।
जब स्वास्थ बीमा की शुरुआत हुई थी तब इस पर 5 फीसदी सर्विस टैक्स लगता था। बाद में उसको घटाकर 3 फीसदी कर दिया गया था। जब 2015 में केंद्र में मोदी की सरकार आई तब इस सर्विस टैक्स को बढ़ाकर 14 फीसदी कर दिया गया था। तब दबी आवाज में विरोध के स्वर तो उठे थे लेकिन मजबूत सरकार के चलते किसी की नहीं सुनी गई। फिर 2017 में जीएसटी लागू हुआ तो स्वास्थ्य बीमा और अन्य बीमा पॉलिसी को 18 फीसदी के स्लैब टैक्स में डाल दिया गया। उस समय विपक्ष ने खूब विरोध जताया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि 18 फीसदी जीएसटी का विरोध ही विपक्ष कर रहा था। सरकार में रहे मंत्री भी टैक्स कम करने की मांग कर रहे थे। 2018 में मनोज सिन्हा जब रेल राज्य मंत्री थे तब ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इंश्योरेंस फील्ड वर्क्स ऑफ इंडिया’ के एक सम्मलेन को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि वो वित्तमंत्री से जीएसटी का मुद्दा उठाएंगे। उनका यह भाषण कई अखबारों की हेडलाइन बना था। मनोज सिन्हा रेल राज्य मंत्री से जम्भू-कश्मीर के उपराज्यपाल बन गए लेकिन 18 फीसदी जीएसटी का मुद्दा ज्यों का त्यों बना हुआ है।
‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इंश्योरेंस फील्ड वर्क्स ऑफ इंडिया’ 2017 से ही 18 फीसदी जीएसटी का विरोध कर रहा है। यही संगठन तब से लेकर अब तक सभी वित्त मंत्रियों को ज्ञापन दे चुका है कि स्वास्थ्य बीमा से 18 फीसदी का जीएसटी कम किया जाए। लेकिन किसी भी मंत्री ने उनके ज्ञापन पर गौर नहीं किया है। जून 2024 में देशभर के बीमा एजेंटों के संघ ने वित्त मंत्री सीतारमण से मुलाकात कर बीमा की दरों से जीएसटी घटाकर पांच फीसदी करने की मांग की थी ताकि बीमा धारकों का मासिक बोझ कम हो सके। लेकिन पिछली जीएसटी बैठक में भी इस पर कोई विचार नहीं किया गया।
विपक्ष ने बनाया मुद्दा
नितिन गडकरी के पत्र के बाद तृणमूल कांग्रेस के सांसद साकेत गोखले ने 29 जुलाई को संसद में स्वास्थ्य बीमा पर 18 फीसदी जीएसटी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा स्वास्थ्य बीमा और जीवन बीमा पर 18 फीसदी का जीएसटी लगाना आम आदमी पर बोझ है। इसके बाद विपक्ष ने जीएसटी को लेकर हंगामा शुरू कर दिया था। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मामले पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा है और सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर अपनी एक पोस्ट में इस मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा, ‘‘हम भारत सरकार से मांग करते हैं कि लोगों की स्वास्थ्य अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर लागू जीएसटी को हटा दें। यह जीएसटी खराब है क्योंकि यह लोगों की अपनी जरूरतों का ध्यान रख पाने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। अगर भारत सरकार जन- विरोधी जीएसटी वापस नहीं लेती है तो हम सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य होंगे।’’
स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम से सरकार की होती है मोटी कमाई
तृणमूल कांग्रेस की सांसद माला रॉय ने संसद में वित्तमंत्री से पूछा था कि स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम से सरकार की कितनी कमाई होती है जिस पर केंद्रीय वित्त मंत्री ने लोकसभा को बताया था कि वित्तीय वर्ष 2021-22 में स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर जीएसटी संग्रह 5,354 करोड़ रुपए था, जो 2022-23 में बढ़कर 7,638 करोड़ रुपए हो गया और वित्तीय वर्ष 2023-24 में यह 8,262 करोड़ रुपए रहा। यानी कि वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम और री-प्रीमियम से जीएसटी संग्रह के रूप में कुल 24,529.14 करोड़ रुपये एकत्र किए गए थे।
कर अवसर तलाशती है सरकार
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने स्वास्थ्य बीमा पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है कि ‘भाजपा हर आपदा में ‘‘कर अवसर’’ तलाशती है जो कि उनकी असंवेदनशील सोच को दर्शाता है। मोदी सरकार ने उन लोगों से भी 24,000 करोड़ रुपए लूट लिए हैं, जो स्वास्थ्य संकट की स्थिति में किसी के सामने झुकने से बचने के लिए एक-एक पैसा बचाते हैं।’
दोहरा मापदंड अपना रहा है विपक्ष
केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी प्रीमियम पर बढ़ रहे विरोध के बीच साफ किया है कि प्रीमियम पर जीएसटी लगाने का फैसला जीएसटी काउंसिल का था। उन्होंने लोकसभा में कहा कि ‘जीएसटी आने से पहले भी मेडिकल इंश्योरेंस पर टैक्स था। यह कोई नया टैक्स नहीं है और यह सभी राज्यों में है।’ वित्तमंत्री ने कहा कि ‘यहां विरोध करने वालों ने, क्या उन्होंने अपने राज्यों में इस कर को हटाने के बारे में चर्चा की? क्या उन्होंने अपने-अपने राज्यों के वित्त मंत्रियों को इस बारे में लिखा और उनसे इसे जीएसटी परिषद में उठाने के लिए कहा, जहां राज्यों की हिस्सेदारी दो तिहाई है? नहीं, लेकिन वे यहां विरोध कर रहे हैं। यह उनका दोहरा मापदंड है, यह उनका नाटक है।’
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी लिखा पत्र केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 28 जुलाई को वित्तमंत्री सीतारमण को पत्र लिखकर जीवन बीमा निगम कर्मचारी संघ की चिंताओं का मुद्दा उठाया था। गडकरी ने पत्र में कहा कि नागपुर डिवीजन लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन एम्प्लाइज यूनियन, ‘नागपुर ने मुझे इंश्योरेंस इंडस्ट्री से संबंधित मुद्दों के बारे में एक ज्ञापन सौंपा है और इसे आपके समक्ष उठाने की मांग की है। यूनियन द्वारा उठाया गया मुख्य मुद्दा जीवन और चिकित्सा बीमा प्रीमियम पर जीएसटी वापस लेने से संबंधित है। जीवन बीमा प्रीमियम पर जीएसटी लगाना जीवन की अनिश्चितताओं पर टैक्स लगाने जैसा है। संघ का मानना है कि जो व्यक्ति परिवार को कुछ सुरक्षा देने के लिए जीवन की अनिश्चितताओं के जोखिम को कवर करता है, उसके प्रीमियम पर टैक्स नहीं लगाया जाना चाहिए। इसी तरह, मेडिकल इंश्योरेंस प्रीमियम पर 18 प्रतिशत जीएसटी इस बिजनेस के विकास के लिए बाधक साबित हो रहा है। जबकि यह क्षेत्र सामाजिक रूप से जरूरी हैं। अतः आपसे अनुरोध है कि जीवन और चिकित्सा बीमा प्रीमियम पर जीएसटी को हटाने के सुझाव पर प्राथमिकता के आधार पर विचार करें।’ नितिन गडकरी के पत्र लिखने के बाद भी कुछ नहीं बदला लेकिन इससे वो मीडिया में जरूर छा गए।

