चंद्र प्रकाश राय
राजनीतिक चिंतक

 

भारत के एक जिम्मेदार नागरिक के रूप मे लिख रहा हूँ कि चीन, नेपाल पाकिस्तान तीनों मोर्चों को एक साथ खोले रखना ठीक नही है। अन्धे होकर अमेरिका की गोद मे बैठ जाना भी ठीक नही है और इस चक्कर मे विश्वसनीय दोस्त रहे रुस को दूर कर देना भी ठीक नही हुआ और न ईरान के साथ संबंधो में परिवर्तन। आसपास के बहुत से देश तबाह है तो मजबूत दिखने वाले देश भी अंदर से आज खोखले हैं। हम आज आर्थिक संकट और कोरोना संकट में हैं और चारों तरफ से घिरे हैं तो चीन भी चारों तरफ से घिरा है और संकट में है ।चीन ने अर्थिक विस्तार इतना ज्यादा कर लिया है कि तमाम जगह अपने को आर्थिक रूप से फंसा लिया है। चीन आज लड़ाकू योद्धा नहीं बल्कि ऐसा व्यापारी बन गया है जो अपने घर और व्यापार की रक्षा के लिए सुरक्षा भी रखता है ।

नेपाल की अपनी जरूरतें और मजबूरियां हैं और जब हम अपनी तरफ से जाने वाली पाइप लाईन काट देंगे तो वो पानी पीने कही तो जायेगा ही। लेकिन लाख माओवादी शासन आ गया हो पर आज भी नेपाल हिन्दूओं का देश है और पशुपति नाथ से लेकर सीता मां तक का घर है और इन लोगों के होते हुए उसे इतनी आसानी से और इतनी जल्दी भारत से काटा नही जा सकता है। नेपाल की अच्छी खासी निर्भरता भारत पर आज भी है तो भारत की सेना मे तैनात इतनी बड़ी संख्या में नेपाली गोरखा जहां हमारी फौज का मजबूत आधार हैं वहीं यदि हम सचेत नही रहे और चीजों को ठीक से नही देखा समझा तो आने वाले समय मे वे आत्मघाती भी साबित हो सकते हैं।

 

पाकिस्तान की हकीकत सिर्फ इतनी है कि सेना के राज के करण वो पिछड़ गया है और आर्थिक बदहाली का शिकार है और तमाम आर्थिक स्रोत पर काबिज उनकी सेना और बड़े नेता तथा ठेकेदार लोगों की रुचि पाकिस्तान की बनाने मे कम और दुनिया के दूसरे देशों मे सम्पत्तियां बनाने और अपने परिवारों का वहां सुरक्षित इन्तजाम करने मे अधिक रही है। पर किसी भी पाकिस्तानी से कहीं मुलाकात हो जाये तो वो भारतीय से प्रेम से मिलता है। हर देश की कुछ कमजोरियां हैं और अन्तर्विरोध है पर दुर्भाग्य से भारत के दूतावासों ने और सभी खुफिया संगठनो ने पिछ्ले कुछ सालों मे लगता है कि सिर्फ ऐश किया है और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नही किया है। जब सरकार मे बैठे लोगों की निगाह और लक्ष्य इन चीजों की तरफ होता है और उसमें गम्भीरता होती है तो वैसे ही लोग विभिन्न देशों और स्थानों पर लगाएं जाते है और उन्हें पता होता है की उनका उद्देश्य क्या है क्योंकि उनको स्पष्ट निर्देश रहता है कि अगले कुछ सालों का लक्ष्य क्या है । सरकार भले बदल जाये पर देश का लक्ष्य नही बदलता। यह किसी देश की तरक्की और मजबूती की मुख्य बुनियाद है इसलिए बुनियाद यह भी है कि सिर्फ चुनाव के 3/4 महीने कोई कुछ भी कर ले और बाकी दिनों भी विपक्ष अपनी धारदार भूमिका निभाए चाहे जब चाहे जो हो पर सभी मुख्य बड़े नेताओं, पूर्व राष्ट्रपति,पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व विदेश मंत्री,पूर्व रक्षा मंत्री,पूर्व गृह मंत्री ,पूर्व वित्त मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष ,और खुफिया विभागों के भी पूर्व काबिल लोगों की लगातार ऑफ द रिकॉर्ड चर्चा और विचार विमर्श ,सूचनाओं और भविष्य की योजनाओं पर गोपनीय रणनीतियों का निर्धारण लगातार होते रहना जरूरी है । क्योंकि देश सबका है और लोकतंत्र है तो कोई भी कभी भी सत्ता मे हो सकता है और कोई भी विरोध मे । और चूँकि सभी के कुछ अनुभव भी है और कुछ भविष्य के सपने भी तो देश उन सभी विचारों और रणनीतियों का लाभ क्यों न पाये या उनसे वंचित क्यों रहे । आदर्श व्यवस्था तो यही है ।

नेपाल से लड़कर नहीं मिल कर और उनकी तथा वहां के समाज की जिन्दगी में घुस कर और जनता से जनता के साथ संवाद को बढ़ा कर बहुत कुछ ठीक भी किया जा सकता है और हासिल भी किया जा सकता है। पाकिस्तान के अन्तर्विरोधो पर निगाह भी और दखल भी और वहां की जनता चाहे बलूच हो या सिन्धी या भारत से गए लोग जो आज भी दोयम दर्जे के नागरिक है , क्या हम उनको जोड़ नहीं सकते हैं ? क्या हम उनकी आँखो मे कुछ सपने जगा सकते नहीं हैं ? और भी बहुत कुछ पर उनका इस्तेमाल राजनीति के लिए करेंगे तो कुछ नही होगा सिर्फ कुछ वोट हासिल करने के अलावा।

भूटान के बारे में थोड़े कम समय की और दूसरी थोड़ी दूरगामी रणनीति तय करनी होगी। श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, बंगलादेश के मामले मे भी कहीं रस्सी या तो कमजोर पड़ी या ढीली पड़ गई। हां, इतनी भी न खिंच जाये की टूट ही जाये। सिर्फ दलाई लामा को शरण देकर भूल जाना भी तो बड़ी भूल साबित हुई । अगर पीओके पर दुनिया में चर्चा हो सकती है , फिलिस्तीन को मान्यता मिल सकती है और इजराइल को मान्यता मिल सकती है तो बौद्ध धर्म तो पूरी दूनिया के तमाम देशों मे है ,तिब्बत की आज़ादी या दलाई लामा और इनके लोगों के लिए चीन जमीन खाली करें, इसपर लगातार मुद्दा क्यों नहीं रह सकता है।

 

हम लोग मानवता और लोकतंत्र के ठेकेदार हैं तो तिनामिन चौक पर बच्चों पर टैंक चढाये गए तब या होंगकोग मे जो आन्दोलन चल रहा है उस पर हमारा देश और बड़े नेता मुखर क्यों नहीं हैं ? तिब्बत बचाओ आन्दोलन क्यों मरने दिया गया । आसपास के देशों का ढीलाढाला महासंघ को ये सपना आसपास के सभी देशों की आवाम देखने लगे इसके लिए सभी दल सयुक्त रूप से डॉ लोहिया के इस सपने पर काम क्यों नही कर सकते । इन चीज़ों के दूरगामी परिणाम हो सकते थे और हैं। विभिन्न देशों के साथ मैत्री संघ और शैक्षिक संस्कृतिक आदान प्रदान के कार्यक्रम क्यों बंद हो गए और क्यों नही चलाये जा सकते हैं, रणनीतिक रूप से ।

जहां तक अभी के हालात का सवाल है उसे सरकार का नही बल्कि देश का सवाल बना देना चाहिये ।

 

  1. आर्थिक मोर्चे के लिए एक सर्वदलीय और सर्वकालिक जानकार लोगों का समूह बने ।
  2. नेपाल के लिए एक समूह बने जिसमें उसकी जानकारी तथा वहां से अच्छे सम्बन्ध रखने वाले नेता किसी भी दल के , विदेश, बड़े धर्म गुरु , नेपाल के एक्सपर्ट विदेश सेवा के लोग , वहां काम कर चुके खुफिया विभाग के लोग इत्यादि हों।
  3. बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका सहित अलग अलग देशों के लिए भी ऐसा ही हो ।
  4. पाकिस्तान के लिए उसको हैंडिल कर चुके और सफलता से चीजों को अंजाम दे चुके लोगों का समूह बने ।
  5. चीन के लिए प्रधानमंत्री के नेत्रत्व मे एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल चीन से वार्ता करे और साथ-साथ अपनी क्षमता और रणनीति के अनुसार सेना अपना काम तत्काल शुरू करे और भारत लाईन ऑफ कन्ट्रोल का एक नक्शा तत्काल जारी करे उसके अनुसार चीन को वापस जाने को मजबूर करे अन्यथा फिलहाल जहां भारत के पक्ष में परिस्थितियां हो उन इलाकों में उससे ज्यादा किलोमीटर अंदर तक जाकर बैठ जाये ।
  6. साथ ही वियतनाम , जापान सहित जिन देशों से चीन के हित टकराते है, उन सभी देशों के लिए तत्काल मंत्री या पूर्व मंत्री के नेत्रत्व मे प्रतिनिधिमंडल भेज कर आक्रमक रणनीति अपनाने का संदेश दें। पर अब जो भी करना है मजबूती से करना है और स्थाई करना है। रुस ईरान इत्यादि के साथ हुई गलती का सुधार भी जरूरी एजेंडा होना चाहिये।
  7. देश संकट में है तो चुनाव और राजनीति संगठन के लोग देखें ,चाहे सत्ता हो या विपक्ष पर सत्ता के पेड़ों पर बैठे लोग और विपक्ष मे बैठे, ये जिम्मेदारियां निभा चुके लोग फिलहाल देश बनाने और बचाने के काम मे जुटें। हां, यह याद रखना होगा कि केवल नौकरशाहों द्वारा बड़ी चीजें नहीं की जा सकती है उसको वही कर सकता है जो नेतृत्व कर सकता है और मजबूत फैसले ले सकता है, साथ ही दूरगामी फैसले भी।

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