Editorial

धृतराष्ट्र न बनो संजय

मेरी बात

There are two things in Indian
history- One is the incredible optimism and
potential of the place, and the other is the
betrayal of the potential – for example
corruption. Those two strands interwine
through the whole of Indian history, and
maybe not just Indian history

-Salman Rushdie

भारतीय मूल के ब्रिटिश अमेरिकी लेखक सलमान रुशदी का उपरोक्त कथन मुझे अनायास ही याद नहीं आया। एक दौर के अपने मित्रों की उधोगति को देखते हुए मुझे इस कथन का स्मरण हो आया। रुशदी कहते हैं और क्या सटीक कहते हैं –  ‘भारतीय इतिहास में दो चीजें मौजूद हैं- इस देश की क्षमता और इसका अविश्वसनीय आशावाद और दूसरी इस क्षमता के साथ विश्वासघात। उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार। पूरे भारतीय इतिहास में यह दोनों एक-दूसरे संग गुथे हुए हैं। संभवतः ऐसा केवल भारतीय इतिहास के साथ ही नहीं है।’

एक दौर के अपने मित्रों से मेरा तात्पर्य आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से है। 2011-12 में लोकपाल गठन की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे तत्कालीन यूपीए गठबंधन सरकार के खिलाफ आंदोलरनत् थे। उनकी टीम में शामिल ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन’ के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और मनीष सिसोदिया संग मेरा परिचय कवि कुमार विश्वास ने कराया जो शीघ्र ही प्रगाढ़ता में तब्दील हो गया। इस समाचार पत्र के नोएडा स्थित कार्यालय में केजरीवाल और उनके साथियों का आना-जाना इसी समयकाल में होने लगा था। चौतरफा अन्ना हजारे और उनके साथियों की धूम उन दिनों हुआ करती थी। आमजन के भीतर इस टीम ने एक विश्वास, एक आस पैदा कर दी थी कि अब कुछ ऐसा अवश्य घटित होगा जो उन्हें राहत पहुंचाने, उनकी पीड़ा को दूर करने का मार्ग बनाने में सहायक सिद्ध होगा। ऐसा किंतु कुछ घटा नहीं। अन्ना हजारे राजनीति की कुटिल चालों आगे परास्त हो वापस महाराष्ट्र स्थित अपने गांव रालेगांव सिद्धि लौटने पर मजबूर हो गए और मात्र कुछ ही वर्षों में उस आमजन की स्मृति से विलुप्त हो गए जो उन्हें 21वीं शताब्दी का महात्मा गांधी कह पुकारने लगा था। घटा लेकिन कुछ ऐसा जो पहले कभी आजाद मुल्क की राजनीति में घटित नहीं हुआ था। अन्ना के शार्गिदों ने वह कर दिखाया जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया समान विचारक और खांटी राजनीतिज्ञ भी कर पाने में विफल रहे थे।

डॉ. लोहिया आजादी की जंग में शामिल रहे उन स्वप्नदर्शिंयों में से एक थे जो आजाद भारत में समाजवादी समाज की नींव डालना चाहते थे और इस नींव पर ऐसी बुलंद इमारत नए राष्ट्र की खड़ी करना चाहते थे जहां धर्म और जाति के नाम पर असमानता न हो, असहिष्णुता न हो और आर्थिक संसाधनों पर मात्र कुछ का कब्जा न हो। लोहिया लेकिन ऐसा कर पाने में सर्वथा विफल रहे। उन्हीं के समकालीन रहे एक अन्य स्वप्नदर्शी जयप्रकाश नारायण भी कांग्रेस की नीतियें से असंतुष्ट हो ‘संपूर्ण क्रांति’ की अलख जगा राजनीति में आमूलचूल बदलाव की चाह रखते थे। उनका प्रयास भी लेकिन सफल नहीं हो पाया था। लोहिया और जे.पी. समान ही देश भर में ऐसी कई ताकतें समय-समय पर उभरी जिनने जनआंदोलनों के जरिए भ्रष्ट हो चुकी राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव लाने का प्रयास किया। भारतीय जनता ने किंतु ऐसे सभी को नकार सत्ता हमेशा उनको ही सौंपी जो यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर थे। भारतीय समाज और राजनीति के इस कटु पहलू को कवि हरिओम पवार ने अपने शब्दों में कुछ यूं व्यक्त किया है-अंधकार में समा गए जो तूफानों के बीच जले

मंजिल उनको मिली कभी जो चार कदम भी नहीं चले
क्रांति कथानक गौण पड़े हैं गुमनामी की बांहों में
गुंडे तस्कर अड़े खड़े हैं राजमहल की राहों में

अन्ना आंदोलन के चलते जो अविश्वसनीय घटा वह है अन्ना के शार्गिदों द्वारा एक राजनीतिक दल के गठन का फैसला। आम आदमी पार्टी का अस्तित्व में लाना अविश्वसनीय घटना नहीं है। पूर्व में भी जनआंदोलन के जरिए कई ओदांलनकारियों ने राजनीति में प्रवेश लिया। अविश्वसनीय है ‘आप’ को मिली सफलता। ऐसी सफलता जो भारतीय राजनीति में पहले कभी किसी को नसीब नहीं हुई। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में बने इस राजनीतिक दल को सफलता मिलेगी ऐसा मुझे तब दूर-दूर तक नहीं लगता था। केजरीवाल और उनकी कोर टीम को हालांकि अपनी सफलता को लेकर कोई संशय नहीं था। पहले ही चुनाव में दिल्ली की जनता ने उनके इस भरोसे को सही साबित कर दिखाया। दिसंबर 2013 में हुए दिल्ली विट्टाानसभा चुनाव के नतीजे भारतीय राजनीति में स्थापित राजनीतिक दलों के लिए तो स्तब्धकारी थे ही, राजनीतिक पंडितों के लिए भी भारी विस्मयबोधक थे। बाकी सब इतिहास है। वर्तमान का सच यही है कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने वह कर दिखाया जो लगभग असंभव था। यह सफलता लेकिन उन तमाम आर्दशों और मूल्यों की कीमत पर मेरे इन मित्रों को मिली है जिनकी दुहाई देकर ही इन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान आमजन को अपना मुरीद बनाया था। आज जब मैं दिल्ली के प्रदूषण और उससे कई गुना प्रदूषित राजनीतिक आबोहवा से कोसों दूर पहाड़ों में बैठा अपने इन पूर्व साथियों की बाबत समाचार पढ़ता हूं तो खुद की समझ पर मुझे तरस  आता है कि  कैसे और क्योंकर मुझे भी यकीन हो चला था कि केजरीवाल नैतिक मूल्यों और शुचिता के आर्दर्शों सहारे सड़-गल चुकी राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव का कारक बनेंगे। सम्भवतः ऐसा इसलिए क्योंकि 2013 के चुनाव दौरान मैंने केजरीवाल का आदर्शवादी रूप स्वयं देखा और परखा था। महत्वाकांक्षा के महासमुद्र में किंतु ये यह आदर्शवाद कहीं गहरे में डूब गया और केजरीवाल, उनकी पार्टी, उनके संगी साथी बदल गए। बदले भी उतनी ही तीव्र गति में जितनी तीव्रता के साथ भारतीय राजनीति में वे छाए थे।आज जब स्वाति मालीवाल प्रकरण सुर्खिंयां बना हुआ है और उसके सहारे भारतीय जनता पार्टी आम आदमी पार्टी की साख को तार-तार करने में जुटी हुई है, मैं पहाड़ों में बैठा यही सोच रहा हूं कि क्या मेरे ‘आदर्शवादी’ पूर्व साथी कभी एकांत में बैठ आत्मचिंतन करते होंगे कि बीते दस वर्षों के दौरान उनकी अतिमहत्वाकांक्षा उन्हें पतन के दलदल में कितना ट्टाकेल चुकी हैं? और अब उनमें और अन्य राजनीतिक दल जिनको धिकारते हुए, जिनकी नैतिकता और नीतियों को अपने निशाने पर रख वह जनता के भीतर परिवर्तन की आस जगा सत्ता में आए, कोई फर्क नहीं बचा है? क्या उन्हें आत्मग्लानि महसूस होती होगी कि वह जनविश्वाघात के दोषी हैं? केजरीवाल की बाबत तो मेरी निश्चित धारणा अब है कि उनका नैतिकता से, शुचिता से, गांधी के बताए ‘पवित्र साध्य के लिए पवित्र साधन’ सरीखे सिद्धांतों से कोई वास्ता अब रहा नहीं है, मनीष सिसोदिया का आचरण हमेशा से ही केजरीवाल के यस मैन सरीखा रहा है। संजय सिंह लेकिन आज भी मेरी समझ और दृष्टि में एक मजबूत हड्डी और नैतिक मूल्यों पर टिके रहने वाले व्यक्ति हैं। ऐसा मैं उनकी और अपनी प्रगाढ़ मित्रता के आधार पर नहीं कह रहा हूं। मेरे इस विश्वास का एक बड़ा कारण 2016 में केजरीवाल, संजय और आशीष खेतान पर पंजाब के एक तत्कालीन मंत्री बिक्रम मजिठिया द्वारा दायर आपराधिक मानहानी का मुकदमा है। आप नेताओं ने तब मजिठिया पर अवैध नशा कारोबारी होने के गंभीर आरोप लगाए थे। 2018 में केजरीवाल और खेतान ने मजिठिया से माफी मांग ली थी और मुकदमा बंद करवा दिया था। तब अकेले संजय सिंह ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने केजरीवाल के भारी दबाव को दरकिनार कर माफीनामे पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट मना कर दिया था। मालीवाल प्रकरण पर भी वह संजय सिंह ही हैं जिन्होंने बकायादा प्रेस कांफ्रेंस कर यह स्वीकारा था कि स्वाति मालीवाल संग मुख्यमंत्री आवास में अभद्रता की गई है और पार्टी इस अभद्रता के आरोपी बिभव कुमार पर अवश्य कार्यवाही करेगी। ऐसा लेकिन हुआ नहीं। केजरीवाल और उनकी टीम उल्टा मालीवाल का ही चरित्र हरण करने पर उतर आई है। मालीवाल सच कह रहीं हैं अथवा जैसा आरोप उन पर आप पार्टी लगा रही है, वे भाजपा के इशारे पर किसी राजनीतिक षड्यंत्र में मोहरा मात्र हैं, यह कह पाना कठिन है। मालीवाल का अचानक बागी हो जाना, आम चुनाव के समय पार्टी के प्रचार कार्यों से दूरी बरत लेना और फिर मारपीट के आरोपों बाद सीधे अपने राजनीतिक आका केजरीवाल को निशाने पर ले लेना, कहीं न कहीं पूरे मामले को संदेहास्पद अवश्य बनाता है। वर्तमान समय की राजनीति में कुछ भी संभव है लेकिन बिभव कुमार पर अब संजय सिंह की चुप्पी निश्चित ही दुखद है। मेरी चिंता का विषय आप का पराभव नहीं, संजय सिंह हैं जिन पर मेरा भरोसा अभी तक बना हुआ है। जागो संजय यदि मूकदर्शक बने रहे मेरे मित्र तो इतिहास तुम्हें क्षमादान नहीं देगा। जावेद अख्तर साहब का कहा ऐसे में मुझे याद आ रहा है –

गलत बातों को खामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फायदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर कदमों में सर अच्छा नहीं लगता

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