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सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना किसान आंदोलन, किसानों का भरोसा खो गई सरकार

कृषि कानूनों को लेकर किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। 1 दिसंबर को किसानों के 35 प्रतिनिधियों के साथ केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की दिल्ली के विज्ञान भवन में बैठक हुई। हालांकि इस बैठक के बाद भी किसी मुद्दे पर बात नहीं बन सकी। किसानों का कहना है कि सरकार लिखित में एमएसपी कानून में शामिल करें। वहीं सरकार की तरफ से नुमांइदगी कर रहे मंत्रियों ने कहा है कि किसान अपनी 4-5 लोगों की समिति बनाएं,क्योंकि इतने ज्यादा लोगों से बात करने में उन्हें दिक्कत हो रही है।

सरकार ने किसानों की समस्या सुनने और उसका हल निकालने के लिए कमेटी बनाने की पेशकश की। जिसे किसान नेताओं ने ठुकरा दिया है। सरकार और किसानों के बीच हुई वार्ता बेनजीता निकली। अब दोबारा किसान प्रतिनिधि और सरकार गुरूवार को  आमने-सामने होंगे। कुछ राजनितिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और किसानों के बीच आपसी तालमेल की बहुत कमी आ रही है। किसानों को सरकार पर विश्वास नहीं है। दोनों को एक दूसरे की बातों और तर्क पर ज़रा भी यक़ीन नहीं है और यहाँ तक कि केंद्र सरकार और उन राज्य सरकारों के बीच भी विश्वास की कमी पाई जाती है जो इन तीन नए क़ानूनों से ख़ुश नहीं हैं।

सरकार की तरफ से यह भी प्रावधान बताया गया है कि कृषि कानूनों से संबंधित विशेपज्ञों का एक कमीशन बनाया जाए, जो इस कानून से जुड़ी त्रुटियों को दूर कर सकें। जिससे किसानों और सरकार के बीच बातचीत किसी नतीजे पर निकले। कृषि विशेषज्ञ अपनी बात सहीं ढंग से सरकार को बता सकें, ताकि किसी अच्छे नतीजे पर पहुंचा जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दीप दीपावली के दिन वाराणसी के मंच से कहा है कि ये नए क़ानून किसानों की आय को बढ़ाने में मदद करेंगे। सरकार का एक लक्ष्य है कि 2022 तक किसानों की आय दुगनी हो जाए। सरकार का नया क़दम इसी उद्देश्य को हासिल करने का एक प्रयास बताया जाता है। सरकार के कई विभाग भी प्रधानमंत्री के पैग़ाम को आगे बढ़ाने और सरकार की अच्छी नीयत के प्रचार में लगे हुए हैं। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, प्रकाश जावडेकर, स्मृति ईरानी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर बार-बार कृषि कानूनों को लेकर ट्वीट के माध्यम से सरकार के कृषि कानूनों को सही ठहराने में लगे हुए हैं। नीति आयोग के कृषि समिति के एक सदस्य रमेश चंद ने दो दिन पहले पीटीआई न्यूज़ एजेंसी से एक बातचीत में कहा कि किसानों ने नए कृषि क़ानूनों को पूरी तरह से या ठीक से नहीं समझा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इन नए क़ानून से किसानों की आमदनी बढ़ेगी। केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों के बीच भी भरोसे की कमी देखी गई है।

किसानों के 180 से अधिक समूहों ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर अनुरोध किया था कि वह इन कृषि सुधार कानूनों का विरोध करें। कृषि कानूनों पर बीजेपी की लंबे समय से सहयोगी पार्टी अकाली दल ने कानूनों के विरोध में अपना गठबंधन बीजेपी से वापिस ले लिया था, और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया था। राजस्थान से बीजेपी की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनिवाल ने एनडीए से अपना समर्थन वापस लेने की धमकी दी। उन्होंने कहा कि ””आरएलपी एनडीए का एक घटक दल है, लेकिन इसकी ताकत किसान और सैनिक हैं। अगर मोदी सरकार कोई त्वरित कार्रवाई नहीं करती है, तो मुझे एनडीए के सहयोगी होने पर विचार करना पड़ सकता है।

किसान चाहते है कि सरकार एमएसपी को जारी रखे। धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि नए क़ानून में संशोधन करके सरकार ये निश्चित करे कि ये प्रावधान इसमें शामिल हो। हालांकि देश के प्रधानमंत्री और उनके मंत्री बार-बार यह दोहरा रहे है कि सरकार एमएसपी को खत्म नहीं करेगी। सोशल मीडिया पर लोग किसानों पर तरह-तरह के लाछन लगा रहे है कि यह सभी खालिस्तानी है और केवल उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के किसान ही इन कानूनों का विरोध कर रहे है। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने बयान में यह बात तो साफ कर दी है कि इसमें कोई खालिस्तानी समर्थक नहीं है सभी किसान है। अब बात करते है हरियाणा और पंजाब के किसान ही विरोध क्यों कर रहे है। दरअसल पंजाब और हरियाणा में 90 प्रतिशत धान और गेंहू सरकार खुद खरीदती है। पंजाब और हरियाणा के किसानों को डर इस बात का है कि सरकारी लाइसेंस वाली मंडियों यानी एपीएमसी के अंतर्गत जो वो उनके उत्पादन खरीदती हैं वो नए क़ानून के तहत नहीं खरीदेगी। उन्हें इस बात का भी डर है कि सरकार एमएसपी को भी ख़त्म कर देगी।

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