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भारी पड़ेगी किसानों की किलेबंदी

आगामी आम चुनाव से ठीक पहले किसानों का आंदोलन शुरू हो चुका है। मोदी सरकार के लिए ये चुनौती भी है। लिहाजा सरकार नहीं चाहती कि दिल्ली में आंदोलनकारी किसान पिछली बार की तरह डेरा डालें। किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी चरण सिंह और महान कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन को हाल ही में ‘भारत रत्न’ से नवाजने को किसान समुदाय को साधने की कोशिश के रूप में ही देखा गया। ऐसे में सरकार को डर है कि चुनाव से पहले दिल्ली में किसान आंदोलन उसके किए कराए पर पानी फेर सकता है और पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है

देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर किसानों और केंद्र के बीच टकराव की वजह से जंग का मैदान बनने को तैयार है। किसान नेताओं की केंद्रीय मंत्रियों संग बैठक बेनतीजा रहने के बाद किसानों ने ‘दिल्ली चलो’ मार्च का ऐलान कर दिल्ली की ओर कूच कर चुके हैं और हरियाणा बॉर्डर पर पुलिस के साथ लगातार भिड़ रहे हैं। हालांकि सरकार और किसान के बीच बातचीत जारी है। लेकिन सरकार की तरफ से सड़कों पर कंटीले तार। नुकीले कील। कंक्रीट के बड़े-बड़े बोल्डर। कंटेनर। बैरिकेडिंग। कंक्रीट की ढलाई करके बनाए जा रहे अवरोधक। बड़ी तादाद में पुलिस का पहरा कर किसानों की किलेबंदी करना सरकार को भी भारी पड़ सकती है।

याद कीजिए साल 2021 के नवंबर का वो महीना जब सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित कर दिया था। उसी के साथ किसानों की एक और मांग थी कि उनकी फसलों पर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी दे यानी इस मामले में सरकार एक कानून बनाये। इसी मांग को लेकर किसान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली के बॉर्डर पर दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में यह समझना काफी जरूरी है कि आखिर न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसमपी का झोल है क्या? आखिर इस समस्या का हल क्यों नहीं निकल पा रहा है? क्या वाकई में किसानों की मांग जायज है? या फिर किसानों का इस्तेमाल किसी राजनीति के लिए किया जा रहा है? क्या किसानों की किलेबंदी आगामी आम चुनाव में सरकार को भारी पड़ेगी? राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं का ये दृश्य देखकर एक पल के लिए ऐसा लग सकता है जैसे कोई दुश्मन शहर पर चढ़ाई करने वाला हो और उसे रोकने की तैयारी चल रही। पिछली बार जब 2020-21 में किसान आंदोलन हुआ था तब संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले 40 से ज्यादा किसान संगठनों ने उसमें हिस्सा लिया था। लगभग डेढ़ साल चले आंदोलन में किसानों ने कई परेशानियों के बाद भी अपना आंदोलन जारी रखा और अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 19 नवंबर 2021 को तीनों विवादित
कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी थी। इसके ठीक बाद यानी फरवरी-मार्च 2022 में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड, गोवा, मणिपुर और पंजाब के विधानसभा चुनाव हुए थे। किसानों ने इन चुनावों में भाजपा के बहिष्कार की घोषणा की थी। लेकिन किसानों की इस अपील का जनता पर कोई असर नहीं हुआ था बल्कि भाजपा ने इनमें से पंजाब को छोड़कर चार राज्यों में प्रचंड बहुमत हासिल किया था।

खासकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में भाजपा की जीत ऐतिहासिक भी थी कि यूपी में तीन दशक के बाद कोई पूर्ण बहुमत की सरकार सत्ता में लगातार वापस आने में सफल हुई थी तो उत्तराखण्ड में हर बार सत्ता बदलने का रिवाज था, लेकिन भाजपा ने सभी परंपराओं को ध्वस्त करते हुए दोबारा सत्ता में आने में सफलता हासिल की। यूपी के लखीमपुर खीरी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के जिन किसान बहुल इलाकों में
भाजपा को बड़े नुकसान होने की आशंका जाहिर की जा रही थी, वहां भी भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की थी। यानी किसान आंदोलन का जनता पर कोई असर नहीं हुआ था। लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका असर पड़ सकता है। हालांकि इस बार जो किसान संगठन आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरे हैं, उनकी संख्या और ताकत पहले आंदोलन की तुलना में बहुत कम है। राकेश टिकैत, दर्शन पाल सिंह, गुरनाम सिंह चढ़ूनी और कई अन्य बड़े किसान नेता इस बार आंदोलन में शामिल नहीं हैं। इससे भी इस बात की आशंका है कि इस बार का किसान आंदोलन ज्यादा सफल नहीं होगा।

कुछ लोगों का मानना है कि अपनी खोई सियासी जमीन दोबारा हासिल करने के लिए अकाली दल पंजाब के किसान संगठनों को पैसा और संसाट्टान देकर इस आंदोलन को हवा दे रही है। यानी किसानों की आड़ में राजनीति ज्यादा हो रही है और किसानों का हित करने का इरादा कम है। इधर, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के एक कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ में ऐलान कर दिया है कि यदि आम चुनाव 2024 में कांग्रेस सत्ता में आती है, तो किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाएगी। राहुल गांधी ने इसे कांग्रेस की पहली गारंटी करार दे दिया है। वहीं अन्य कई राजनीतिक पार्टियां किसानों के आंदोलन को भुनाने में जुट गई हैं। ऐसे में यदि इस मामले पर राजनीति होती है तो किसानों के आंदोलन में नैतिक बल कमजोर पड़ सकता है। इससे आंदोलन का जनता पर असर कम होगा।

असल में किसानों के दिल्ली आने की चर्चा के बीच जनता की परेशानी बढ़ गई है। यूपी गेट बॉर्डर पर पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग कर दी है जिससे लोगों को भारी जाम से होकर गुजरना पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि किसानों की आड़ में कुछ लोग अपनी राजनीति करने के लिए बार-बार लोगों को परेशान कर रहे हैं। इस समस्या का हल निकलना चाहिए। लोग बार-बार सड़क बंद करने की कोशिश से भी तंग आ गए हैं और लोगों में किसानों के खिलाफ ही नाराजगी बढ़ रही है। यदि किसानों को जनता का साथ नहीं मिला तो भी इससे किसान आंदोलन का असर कम हो सकता है। इस बार भी कई ऐसे फोटो-वीडियो सामने आने लगे हैं, जहां किसान करोड़ों रुपये की महंगी गाड़ियों में सवार होकर आंदोलन के लिए आगे आ रहे हैं। अभी से यह सवाल होने लगे हैं कि यदि इन किसानों के पास करोड़ों रुपयों की गाड़ी खरीदने का पैसा है तो वे न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए आंदोलन क्यों कर रहे हैं? स्पष्ट बात है कि इस तरह के किसानों की संख्या न के बराबर है लेकिन ऐसे लोगों के आंदोलन में शामिल होने से किसानों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि मोदी सरकार ने किसानों के लिए लिए बड़े कार्यक्रम चलाए हैं। देश के 8.12 करोड़ किसानों को हर साल 6000 रुपए की आर्थिक मदद दी जा रही है। किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए बेहद कम ब्याज दर पर उन्हें कर्ज उपलब्ध कराया जा रहा है। खाद-बीज की खरीद पर भी छूट दी जा रही है। बिजली-पानी की सुविधा भी कहीं पर पूरी तरह मुफ्त तो कहीं मामूली लागत पर दी जा रही है। इसके बाद किसानों को फसलों को बेचने के लिए बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।

यही नहीं हर साल 22 से ज्यादा फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर दिया जा रहा है और उनकी खरीद सुनिश्चित की जा रही है। खेती में नई-नई तकनीकी सहयोग देकर किसानों की आर्थिक शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। किसानों को सौर ऊर्जा उत्पादन करने के लिए प्रेरित कर हर किसान को 15 से 20 हजार रुपए मासिक कमाने लायक बनाने के प्रयास चल रहे हैं। इसके बाद भी किसानों की नाराजगी लोगों की समझ से बाहर है। यही कारण है कि इस बार किसान आंदोलन का असर आगामी चुनाव में होने की संभावना बहुत कम दिखाई दे रही है।

दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक जानकार कहते हैं कि लोकसभा चुनाव सिर पर है लिहाजा मोदी सरकार नहीं चाहती कि दिल्ली में आंदोलनकारी किसान 2020-21 की तरह डेरा डालें। किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी चरण सिंह और महान कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन को ‘भारत रत्न’ से नवाजने को किसान समुदाय को साधने की कोशिश के रूप में ही देखा गया। ऐसे में मोदी सरकार को डर है कि चुनाव से पहले दिल्ली में किसान आंदोलन उसके किए कराए पर पानी फेर सकता है और पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए सरकार इस बार शुरुआत से सक्रिय है। किसान संगठनों की तरफ से ‘दिल्ली चलो’ के आह्वान के बाद मोदी सरकार बातचीत के लिए किसानों के दर पर पहुंची। किसानों को दिल्ली मार्च वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश होती रही। यहां तक कि चंडीगढ़ में तीन-तीन केंद्रीय मंत्री किसान संगठनों से बातचीत करते रहे। कहा जा रहा है कि 6 घंटे तक चली बातचीत में पिछले आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज हुए केस सहित कुछ मांगों पर सहमति भी बन गई। लेकिन कुछ पर सहमति के लिए बातचीत जारी है। आंदोलनकारी किसानों की मांग है कि एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए और इसके लिए कानून बनाया जाए। स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाए। किसानों और कृषि मजदूरों को पेंशन दी जाए। विश्व व्यापार संगठन से भारत निकल जाए। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को फिर से लागू किया जाए।

गौरतलब है कि साल 2020 में एक पूरे शहर को आंदोलन के नाम पर महीनों तक एक तरह से बंधक बनाकर रखा गया था। देश की राजधानी की सीमाओं को घेरकर मनमानी की गई। आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया, जिसके खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे थे। यह एक सरकार का भीड़तंत्र के सामने सरेंडर था। प्रधानमंत्री ने ‘तपस्या में कुछ कमी’ रह जाने की बात कही। कानून वापस लेने का ऐलान करते वक्त भी पीएम ने उन कानूनों को किसानों का हितैषी ही बताया। ये लाचारी जाहिर की कि वह इस मुद्दे पर किसानों को समझा नहीं पाए, शायद उनकी ‘तपस्या में ही कुछ कमी रह गई’ थी। ऐसे में सवाल है कि अगर कानून किसानों के हित में थे तो उन्हें वापस क्यों लिया गया? जाहिर सी बात थी कि 3-4 महीने बाद ही यूपी और पंजाब में विधानसभा चुनाव थे जहां बीजेपी को किसान आंदोलन से नुकसान की आशंका थी। नतीजतन साल भर तक अड़े रहने के बाद सरकार ने तीनों कानून वापस ले लिए। ये बात अलग है कि इस कदम से बीजेपी को न पंजाब में कुछ फायदा हुआ और न ही पश्चिमी यूपी में। भीड़तंत्र के आगे एक कथित ताकतवर सरकार के सरेंडर से वैसे तत्वों का हौसला जरूर बढ़ गया कि आंदोलन के नाम सड़कों पर अराजकता या फिर शहरों को बंट्टाक बनाकर सरकारों को झुकाया जा सकता है। ऐसे में लोकसभा चुनाव 2024 से पहले आंदोलन को लेकर कहा जा रहा है कि आंदोलन की आड़ में सियासत नजर आ रही है। इसे नकारना खुद की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। 2020-21 में किसान आंदोलन की आड़ में सियासत को पूरे देश ने देखा। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में प्रचार करते किसान आंदोलन के चेहरों को पूरे देश ने देखा। चुनावी रैलियां करते किसान नेताओं को पूरे देश ने देखा। अब लोकसभा चुनाव से पहले फिर आंदोलन शुरू हो चुका है। मोदी सरकार के लिए ये चुनौती भी है। सख्ती किए तो नुकसान का डर। सख्ती न किए तो फिर महीनों तक राष्ट्रीय राजधानी में प्रमुख सड़कों को जाम किए जाने और उससे संभावित सियासी नुकसान का डर।

क्या है न्यूनतम समर्थन मूल्य दर?
न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी किसानों को दी जाने वाली एक गारंटी की तरह होती है, जिसमें तय किया जाता है कि बाजार में किसानों की फसल किस दाम पर बिकेगी। फसल की बुआई के दौरान ही फसलों की कीमत तय कर दी जाती है और यह तय कीमत से कम में बाजारों में नहीं बिकती है। एमएसपी तय होने के बाद बाजार में फसलों की कीमत गिरने के बाद भी सरकार किसानों को तय कीमत पर ही फसलें खरीदती है। सरल शब्दों में कहें, तो एमएसपी का उद्देश्य फसल की कीमत में उतार-चढ़ाव के बीच किसानों को नुकसान से बचाना है।

क्या हैं किसानों की मांगें
1. फसलों की एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी।
2. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू हो।
3. किसानों के कर्ज माफ।
4. भूमि अधिग्रहण 2013 दोबारा लागू किया जाए।
5. लखीमपुर खीरी केस के दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।
6. मुक्त व्यापार समझौते पर रोक।
7. संविधान 5 की सूची को लागू कर आदिवासियों की जमीन की लूट बंद हो।
8. मिर्ची-हल्दी समेत मसालों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन हो।
9. नकली बीज और कीटनाशक बेचने वाली कंपनियों पर एक्शन के लिए बने कानून।
10. मनरेगा में हर साल 200 दिन का काम मिले और 700 रुपए मजदूरी दी जाए।
11. विधत संशोधन विधेयक 2020 को रद्द कर दिया जाए।
12. आंदोलन के दौरान किसानों के खिलाफ दर्ज मामले हो वापस।
13. 58 साल से अधिक उम्र के किसानों के लिए पेंशन योजना लागू कर उन्हें 10 हजार रूपए महीना पेंशन दी जाए।

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