‘यहां गौशाला बनेगी, कुछ भी कर लीजिए आप लोग एक बात सुन लीजिए बहुत स्पष्ट, गौशाला यहीं बनेगी… पहले मैं हटाने वाला था… हटाऊंगा नहीं, सुनिए अभी मैं छह महीने के लिए बना रहा था, अब मैं परमानेंट बनाऊंगा।’ ये शब्द नगर निगम के आयुक्त पंकज उपाध्याय के उस वायरल वीडियो के हैं जिसमें वो घटना स्थल से कुछ दूर स्थित राजपुरा में नजाकत का बगीचे नामक अतिक्रमण की गई भूमि पर गौशाला बनाने पर आपत्ति जता रही महिलाओं से बात करते नजर आ रहे हैं। ये इस बात की एक बानगी है कि नगर आयुक्त एक संवेदनशील मुद्दे को कितने हल्के में ले रहे थे। यहां पर ये समझ पाना मुश्किल है कि उनकी प्राथमिकता अवैध अतिक्रमण हटाना था या फिर गौशाला बनाना। मलिक के बगीचे में भी उपाध्याय का यही गैर जिम्मेदाराना रवैया जले हुए बनभूलपुरा थाना, उपद्रवियों के हमले में घायल पुलिसकर्मी, नगर निगम कर्मी, पत्रकारों और छह लोगों की मौत के रूप में अपने अप्रिय निशान छोड़ गया। कहा जा रहा है कि इन स्थितियों से बचा जा सकता था। पहले भी धार्मिक स्थलों से बिना विवाद के अतिक्रमणों को ध्वस्त किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दूसरे कार्यकाल में वन भूमि पर स्थित अवैध धार्मिक स्थलों को बिना प्रतिरोध के हटाया गया था। सवाल बनभूलपुरा के उन उपद्रवियों पर भी है जो सरकारी भूमि पर बने अवैध नमाज स्थल और मदरसे को बचाने की आड़ में हिंसक हो गए और कई पुलिसकर्मियों, नगर निगम के कर्मचारियों, पत्रकारों पर जानलेवा हमले पर उतारू हो गए। उपद्रवियों द्वारा थाना फूंकने की मंशा बताती है कि शायद ये सब पहले से सुनियोजित था। बनभूलपुरा के उन लोगों को समझ आना चाहिए कि कानून का पालन सबको करना होगा और अराजकता उन्हें ही संदेह के घेरे में खड़ा करेगी
इबारत माहौल की दीवार पर साफ लिखी नजर आ रही थी। स्थानीय गुप्तचर इकाई अपनी प्रतिदिन की रिपोर्ट में इन आशंकाओं की विस्तृत जानकारी प्रशासन को उपलब्ध करा रही थी जैसा कि हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में घटित हुआ। मगर प्रशासन या तो इसे जान-बूझकर पढ़ने में नाकाम रहा या फिर उसका स्वयं में इतना आत्मविश्वास था कि वो हर परिस्थितियों से निपटने में सक्षम है। आधी-अधूरी तैयारियों और अधिकारियों के अतिउत्साह ने हल्द्वानी को 70 साल के उस भयावह मंजर का गवाह बना दिया जिसकी कल्पना यहां के निवासियों ने तो कतई नहीं की होगी। नजूल भूमि पर बना यह अतिक्रमण छह लोगों की बलि ले लेगा, वे शायद ही किसी के जेहन में होगा। कानून से अपने को ऊपर समझने वालों की फितरत और कानून को समय पर लागू न कर पाने की अधिकारियों की कमजोरी ने वो माहौल पैदा कर दिया जिसके जख्म इस शहर को वर्षों तक सालते रहेंगे। ऐसा नहीं है कि हल्द्वानी में अतिक्रमण पहले नहीं हटे। नैनीताल के जिलाधिकारी रहे डॉ सूर्य प्रताप सिंह के समय हल्द्वानी के एक बड़े हिस्से को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया था, इसी प्रकार 2007 में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण बिना विवाद और प्रतिरोध के हटा दिया गया था। फिर इस बार ऐसा क्या हुआ और क्यों हुआ कि हल्द्वानी को पहली बार ऐसे संगीन हालातों से गुजरना पड़ा? इसमें ये सवाल उठना लाजिमी है कि हल्द्वानी को शर्मसार किसने किया और हल्द्वानी का गुनहगार कौन है?
‘यहां गौशाला बनेगी, कुछ भी कर लीजिए आप लोग एक बात सुन लीजिए बहुत स्पष्ट, गौशाला यहीं बनेगी… पहले मैं हटाने वाला था… हटाऊंगा नहीं, सुनिए अभी मैं छह महीने के लिए बना रहा था, अब मैं परमानेंट बनाऊंगा।’ ये नगर निगम के आयुक्त पंकज उपाध्याय के उस वायरल वीडियो के हैं जिसमें वो घटना स्थल से कुछ दूर स्थित राजपुरा में नजाकत का बगीचे नामक अतिक्रमण की गई भूमि पर गौशाला बनाने पर आपत्ति जता रही महिलाओं से बात करते नजर आ रहे हैं। ये इस बात की एक बानगी है कि एक संवेदनशील मुद्दे को कितने हल्के में ले रहे थे। यहां पर ये समझ पाना मुश्किल है कि उनकी प्राथमिकता अवैध अतिक्रमण हटाना था या फिर गौशाला बनाना। मलिक के बगीचे में भी उपाध्याय का यही गैर जिम्मेदाराना जले हुए बनभूलपुरा थाना, उपद्रवियों के हमले में घायल पुलिसकर्मी, नगर निगम कर्मी, पत्रकारों और छह लोगों की मौत के रूप में अपने अप्रिय निशान छोड़ गया। कहा जा रहा है कि इन स्थितियों से बचा जा सकता था। पहले भी धार्मिक स्थलों से बिना विवाद के अतिक्रमणों को ध्वस्त किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दूसरे कार्यकाल में वन भूमि पर स्थित अवैध धार्मिक स्थलों को बिना प्रतिरोध के हटाया गया था। सवाल बनभूलपुरा के उन उपद्रवियों पर भी है जो सरकारी भूमि पर बने अवैध नमाज स्थल और मदरसे को बचाने की आड़ में हिंसक हो गए और कई पुलिसकर्मियों, नगर निगम के कर्मचारियों, पत्रकारों पर जानलेवा हमले पर उतारू हो गए। उपद्रवियों द्वारा थाना फूंकने की मंशा बताती है कि शायद ये सब पहले से सुनियोजित था। बनभूलपुरा के उन लोगों को समझ आना चाहिए कि कानून का पालन सबको करना होगा और अराजकता उन्हें ही संदेह के घेरे में खड़ा करेगी।
हल्द्वानी शहर का बड़ा इलाका विशेषकर पुराने नगर निगम का क्षेत्र नजूल भूमि पर बसा है जिसमें बनभूलपुरा भी शामिल है। नजूल भूमि का प्रबंधन स्थानीय निकाय ही करते हैं। पहले नगर पालिका और अब नगर निगम इसका प्रबन्धक है। हल्द्वानी में लगभग 40 लाख वर्ग मीटर भूमि नजूल की है। नजूल भूमि आमतौर पर 15, 20, 30 या 99 वर्ष की लीज पर दी जाती है और लीज की अवधि पूरी होने पर इसका नवीनीकरण कराना होता है। नजूल भूमि पर लीजधारक भूमि का मालिक नहीं होता न ही उसे एक भूमिधरी अधिकार होता है। लीज की शर्तों का उल्लंघन करने पर लीज निरस्त भी की जा सकती है। जिस जगह के विवाद ने हल्द्वानी को झुलसा दिया वो भी नजूल की भूमि पर थी जिसकी लीज समाप्त हो चुकी थी। इस भूमि को 1937 में सरकार ने पट्टे पर दिया था। इनमें एक नाम अब्दुल मलिक का भी शामिल है जिनके पिता अब्दुल हनीफ को ये भूमि उपहार में मिली। अब्दुल हनीफ खान ने इस भूमि को फ्री होल्ड करवाने के लिए जिला प्रशासन को आवेदन दिया था। कोई कार्रवाई न होते देख 2007 में अब्दुल हनीफ उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय गए जहां उच्च न्यायालय ने अब्दुल हनीफ के आवेदन पर उचित कारवाई का निर्देश दिया था। लेकिन 2007 के बाद इस पर जिला प्रशासन कोई कार्रवाई करता नहीं दिखा। लगभग 40 बीघे में फैले मलिक के बगीचे की सम्पत्ति की कीमत 50 करोड़ से ऊपर बताई जाती है। सरकारें जमीन को फ्री होल्ड करने की प्रक्रिया में दिलचस्पी खोती गई और समय के साथ ये बगीचा पक्के भवनों के रिहायशी इलाके में बदल गया। यहीं से यहां सम्पत्ति खरीदने और बेचने का सिलसिला शुरू हो गया। मलिक के बगीचा की लीज की अवधि समाप्त हो गई और जमीन भी फ्री होल्ड नहीं हो पाई। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहां पर जमीन खरीदने के काम में तेजी आई। उसके बाद पक्के होते गए निर्माण कार्यों के चलते बगीचा संकरी गलियों में तब्दील होता चला गया। मलिक के बगीचे में बाहर से आए लोगों ने जमीन खरीदी। जिस भूमि पर मदरसे और नमाज स्थल को ध्वस्त किया गया विवाद उसी पर हुआ। बताया जाता है कि अब्दुल मलिक की उस स्थान पर प्लॉट काटकर कॉलोनी बनाने की योजना थी। खास बात ये है कि नजूल की भूमि को कच्ची जमीन माना जाता है और लीज धारक को उसे बेचने का अधिकार नहीं होता। नगर निगम ने इस भूमि पर बने मदरसे और नमाज स्थल को हटाने के लिए नोटिस दिया था लेकिन तय समय में निर्माण कार्य को ध्वस्त न करने पर इस जगह को प्रशासन ने सील कर तार-बाड़ लगा दी थी। नगर निगम के निर्णय पर रोक लगाने के लिए उच्च न्यायालय नैनीताल में एक याचिका दाखिल की गई थी जिसमें उच्च न्यायालय ने 8 फरवरी को स्टे तो नहीं दिया, लेकिन सुनवाई की तारीख 14 फरवरी तय कर दी थी। उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ। न्यायालय ने ध्वस्तीकरण के आदेश तो नहीं दिए थे लेकिन ध्वस्तीकरण पर कोई रोक भी नहीं लगाई थी। यहीं पर प्रशासन की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। 8 फरवरी को 2 बजे कोर्ट अगली 14 फरवरी की तारीख तय करता है और 8 फरवरी को शाम साढ़े चार बजे प्रशासन बिना तैयारियों के साथ बनभूलपुरा धमक जाता है वो भी आधी-अधूरी तैयारियों के साथ। जबकि प्रशासन का खुफिया तंत्र 31 जनवरी को मामले के संवेदनशील होने के लिए चेता रहा था। लेकिन प्रशासन के आला अधिकारी शायद सुनने को तैयार नहीं थे या फिर उन्हें अंदेशा नहीं था कि उपद्रवियों के चलते उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। कुछ अधिकारियों के अति आत्मविश्वास या कहें उतावलेपन से सरकार को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। कॉमन सिविल कोड उत्तराखण्ड के विधानसभा में पास होने के बाद धामी सरकार जिस जश्न में डूबी थी उसके स्वाद को हल्द्वानी की घटना ने फीका कर दिया। यूसीसी के चलते धामी खबरों की सुर्खियों में थे। दूसरे दिन हल्द्वानी की घटनाओं ने उन्हें सुर्खियों से गायब कर दिया।
इस घटना चलते कई लोग सवालों के घेरे में हैं। वह यह कि बिना कोई तैयारी के लोगों की जान खतरे में कैसे डाल दी गई? मैदान में डटे पुलिस के जवान नगर निगम के कर्मचारियों को अपने बिना रणनीति के मैदान में क्यों झोंक दिया? अगर जल्दबादी में निर्णय करने के बजाय सोची-समझी रणनीति के तहत ध्वस्तीकरण के कार्य को अंजाम दिया जाता तो अप्रिय घटनाओं से बचा जा सकता था। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि खुफिया खबरों को जान-बूझकर नजर अंदाज करना प्रशासन को भारी पड़ा। खुफिया सूत्र बताते हैं कि उनकी तरफ से निरंतर सूचना उपलब्ध कराई जाती रही। खुफिया सूत्रों की मानें तो जो उस दिन घटा उसकी आशंका उन्होंने पहले से ही जताई थी और उसके लिए सुझाव भी दिए थे, मसलन महिलाएं इकट्ठा होंगी उसके लिए पर्याप्त सख्या में महिला पुलिस होनी चाहिए। बॉडी प्रोटेक्ट सील्ड होनी चाहिए, क्योंकि पथराव हो सकता है। ऊंची बिल्डिंगां में रूफ टॉप ड्यूटियां लगानी चाहिए। जिस रास्ते पर आना है वो साफ होना चाहिए, पर्याप्त मात्रा में फोर्स पिकेट होना चाहिए, आगजनी की स्थिति में थाना भी फूंक सकते हैं। थाने की पर्याप्त सुरक्षा होनी चाहिए। इतनी सूचनाएं पहले से होने के बावजूद शाम के समय ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को अंजाम देना समझ से परे है।
प्रांतीय उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के प्रदेश अध्यक्ष नवीन वर्मा का कहना है कि कार्रवाई से पहले स्थानीय प्रतिनिधियों से वार्ता कर ली जाती तो ऐसी स्थिति का सामना नहीं
करना पड़ता। हल्द्वानी के मामले में प्रशासन अब्दुल मलिक और नगर निगम के बीच का मामला मानता रहा। इलाके की संवेदनशीलता को उसने नजरअंदाज कर दिया, जबकि यूसीसी बिल पास होने के बाद उस इलाके में पुलिस सतर्कता बढ़ाई गई थी। हल्द्वानी की इस घटना को साम्प्रदायिक नजर से कतई नहीं देखा जाना चाहिए। नैनीताल की जिलाधिकारी वंदना इसे साम्प्रदायिक चश्मे से न देखने की बात तो कहती हैं लेकिन कर्फ्यू आदेश में (एक समुदाय विशेष शब्दों का उल्लेख उनकी बातों में विरोधाभास दिखाता है। नैनीताल जिला प्रशासन इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद भी अपनी छवि पर आंच आने नहीं देना चाहता। न ही वो उन सवालों से रू-ब-रू होना चाहता है जो उसके निर्णय पर उठाए जा सकते हैं। उच्च न्यायालय का फैसला दोपहर दो बजे आने के बाद शाम के वक्त अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करने की क्या, जल्दबाजी थी? जिसने नगर निगम के
कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों की जान को जोखिम में डाल दिया जबकि पता था कि जाड़ों में दिन छोटे होते हैं और अंधेरा जल्दी हो जाता है। संकरी गलियों में अंधेरे से निकलना मुश्किल होता है। खुफिया रिपोर्टों को नजरअंदाज कर आखिर किसके दबाव में जोखिम लेकर पहल की? इस बीच पुलिस ने जोखिम लेकर कारवाई करने की सख्त कारवाई करते हुए कई उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है जिनसे तमंचे, कारतूस पुलिस ने बरामद किए हैं। बनभूलपुरा की घटना ने एक शांत शहर को अशांत तो किया ही है, साथ ही एक अविश्वास का माहौल भी पैदा किया है।
हम अहिंसा में विश्वास करते हैं, हिंसा को किसी भी प्रकार से जायज नहीं कहा जा सकता। दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन अगर संयम से काम लिया होता तो इस प्रकार की घटना से बचा जा सकता था। जिला पुलिस के संशय के बावजूद जिस प्रकार बिना तैयारी के कार्रवाई की, उसने हल्द्वानी को पिछले 70 साल का काला दिन दिखा दिया।
सुमित हृदयेश, विधायक, हल्द्वानी
आपसी समन्वय की कमी के कारण घटना ने इतना उग्र रूप ले लिया। जिला प्रशासन ने कार्रवाई से पहले स्थानीय लोगों और समाज के लोगों से बात की होती तो ऐसी घटना से
बचा जा सकता था। क्योंकि अतिक्रमण के समर्थन में कोई नहीं है। मैं अल्पसंख्यक आयोग का उपाध्यक्ष हूं, राज्यमंत्री हूं लेकिन प्रशासन ने मुझसे कोई बात नहीं की। यहां तक कि घटना के बाद हुई पीस कमेटी की बैठक तक की जानकारी मुझे नहीं दी गई। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लेगों को प्रशासन स्थानीय प्रतिनिधि मानता है, हमें तो बैटकों की जानकारी भी नहीं दी जाती। पेट्रोल बम बनाने वालों को पुलिस नहीं पकड़ पाई है। हम हिंसा की कड़ी निंदा करते हैं। उपद्रवियों पर सख्त कार्रवाई की जाए और जिला प्रशासन के अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मजहर नईम नवाब, उपाध्यक्ष, अल्पसंख्यक आयोग उत्तराखण्ड

