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समाप्त हुआ हसीना का सफर

वर्ष 1971 में बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के रिश्तेदारों के लिए कई सिविल सेवा नौकरियों में दिए गए आरक्षण को लेकर पिछले महीने छात्र सड़कों पर उतर आए थे। हालांकि सरकार ने अधिकांश कोटा वापस ले लिया था, लेकिन छात्रों ने अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखा और हसीना सरकार के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे। छात्र मारे गए लोगों और घायलों के लिए इंसाफ की मांग कर करने लगे। बढ़ते विरोध-प्रदर्शन का आलम यह रहा कि शेख हसीना को अपनी व परिवार की सुरक्षा को देखते हुए इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा है। बांग्लादेश के राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि संसद भंग करने के बाद एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा। सेना प्रमुख, बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरुल सहित राजनीतिक नेताओं ने राष्ट्रपति के इस फैसले का समर्थन किया है

बांग्लादेश में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद नौकरी में आरक्षण का मुद्दा लगभग सुलझ गया था। लेकिन शेख हसीना की सरकार के खिलाफ दो महीने से जारी विरोध प्रदर्शन ने 4 अगस्त को उग्र रूप में ले लिया। जिस वजह से हसीना की सरकार का तख्तापलट होने में ज्यादा समय नहीं लगा कहना गलत न होगा की इस विरोध-प्रदर्शन ने सरकार के खिलाफ अभियान का रूप ले लिया था। करीब 17 करोड़ जनसंख्या वाले देश में शेख हसीना के खिलाफ करीब 4 लाख से ज्यादा लोग इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए। शेख हसीना को प्रदर्शनकारियों की मांग स्वीकार करते हुए इस्तीफा देना पड़ा। इसी बीच सेना द्वारा कहा गया है कि बांग्लादेश में जल्द ही अंतरिम सरकार बनेगी। इस बीच अब नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हो गया है। बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने भी प्रधानमंत्री के इस्तीफे की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद से शेख हसीना का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को रिहा कर दिया है, जो कई मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद से घर में नजरबंद थी।

गौरतलब है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) न केवल पाकिस्तान, बल्कि चीन समर्थित पार्टी भी है। जिसका शासन असर भारत पर भी पड़ेगा। इसके अलावा छात्रों की अपील पर अंतरिम सरकार का मुख्य सलाहकार नोबेल पुरस्कार से सम्मनित मोहम्मद यूनुस को बनाया गया है। यूनुस ने कहा है कि उन्होंने छात्रों की अपील पर इस पद को स्वीकार किया है। यूनुस ने कहा कि छात्र कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे थे, उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अगर छात्रों और देश की जनता ने इतनी कुर्बानी दी है, तो मेरी भी कुछ जिम्मेदारी है।

बढ़ते विरोध प्रदर्शन का आलम यह रहा कि शेख हसीना को अपनी व परिवार की सुरक्षा को देखते हुए इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि शेख हसीना भारत से लंदन या फिनलैंड जाएंगी। शेख हसीना पर लगे आरोपों से इंकार करते हुए उनके बेटे साजिब वाजेद जॉय ने अपनी मां की राजनीतिक वापसी की संभावना को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को बदलने के उनके लगातार प्रयासों के बावजूद, उनकी अगुवाई के खिलाफ विद्रोह से वह बहुत निराश हैं। जॉय ने कहा कि हसीना अपने परिवार के दबाव के बाद अपनी सुरक्षा के लिए देश छोड़कर चली गई। इसके अलावा शेख हसीना के बेटे ने कहा कि जब वो सत्ता में आई थीं उस समय बांग्लादेश को एक विफल देश माना जाता था। वो एक गरीब मुल्क था। लेकिन आज उसे एशिया के उभरते टाइगर के रूप में देखा जाता है। उन्होंने पिछले 15 साल में बांग्लादेश का कायापलट किया है। जॉय ने सरकार पर छात्रों के खिलाफ दमन के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अकेले रविवार को ही 13 पुलिस वालों को भीड़ ने पीट-पीट मार डाला, ऐसे में आप पुलिस से क्या उम्मीद करते हैं?

बांग्लादेश में प्रदर्शन बना सरकार खिलाफ अभियान
1971 में बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के रिश्तेदारों के लिए कई सिविल सेवा नौकरियों में दिए गए आरक्षण को लेकर पिछले महीने छात्र सड़कों पर उतर आए थे। हालांकि सरकार ने अधिकांश कोटा वापस ले लिया था, लेकिन छात्रों ने अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा और हसीना सरकार के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे। छात्र मारे गए लोगों और घायलों के लिए इंसाफ की मांग कर करने लगे। इस बीच शेख हसीना के इस्तीफा देकर चले जाने के बाद ढाका में बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसक घटनाओं की खबरें सामने आई। सरकार के खिलाफ हुए इस प्रदर्शन में करीब 300 लोगों ने अपनी जान गवाई। इसमें से करीब 15 पुलिसकर्मी भी थे। ढाका में लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर पड़े और प्रधानमंत्री आवास समेत कई इमारतों में तोड़-फोड़ की गई। ऐसी कई तस्वीरें वीडियो वायरल हुई जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय से लोगों को सामान उठाकर ले जाते हुए देखा गया। वहीं कुछ प्रदर्शनकारी सोफों पर बैठे सेल्फी लेते नजर आए। सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा इतना बढ़ गया कि ढाका में शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक मुजीबुर्रहमान की मूर्ति को प्रदर्शनकारियों ने तोड़ने और उसे गिराने की कोशिश की। शेख हसीना के इस्तीफा देने के बाद जनता सड़कों पर जश्न मनाती दिखी। 4 अगस्त से बढ़ते विरोध प्रदर्शन को देखते हुए सरकार द्वारा बांग्लादेश में कर्फ्यू लगा दिया गया था। देशभर में हिंसा और अराजकता की आग सुलगने लगी थी। इस पर काबू पाने के लिए सेना तैनात की गई थी।

इस विरोध-प्रदर्शन में न केवल छात्र संगठन बल्कि अब हर वर्ग के लोग बड़े पैमाने पर शामिल रहे। बांग्लादेश के गारमेंट सेक्टर की कम्पनियों का संगठन प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़ा रहा है। शेख हसीना ने प्रदर्शनकारियों के गुट को आतंकी करार देते हुए उन्हें रोकने की पुरजोर कोशिश की थी। शेख हसीना ने चार जुलाई को नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक में प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने के आदेश दिए थे। देशभर में कर्फ्यू लगा दिया गया। इसके बावजूद वो तख्तापलट को रोक न सकी। देशभर में लागू की गई कर्फ्यू की प्रदर्शनकारियों ने धज्जियां उड़ा दी। छात्र संगठन के नेताओं ने शेख हसीना के इस्तीफे की मांग को लेकर सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा कर दी। एंटी डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट ने कर्फ्यू को धता बताते हुए 5 जुलाई को राजधानी ढाका तक लॉन्ग मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने सेना से समर्थन मांगते हुए कहा कि सेना उनका समर्थन करे या तो इस मामले से निष्पक्ष रहे। सरकार के खिलाफ हो रहे इस विरोध-प्रदर्शन को शेख हसीना के 15 साल के कार्यकाल में सबसे बड़ा उपद्रव माना गया है। कहना गलत न होगा कि इस आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को पंगु बना दिया। इस विरोध- प्रदर्शन को लेकर बांग्लादेश अवामी लीग के नेताओं ने दावा करते हुए कहा था कि छात्रों के इस प्रदर्शन को कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी संगठन और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी की स्टूडेंट इकाई बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिविर ने किया है। गौरतलब है कि शेख हसीना सरकार ने बांग्लादेश में कई सप्ताह तक चल रहे हिंसक विरोध-प्रदर्शन के बाद जमात-ए-इस्लामी, छात्र शाखा और इससे जुड़े अन्य संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। कहा जा रहा है कि सरकार की इस कार्रवाई के बाद ये संगठन शेख हसीना के खिलाफ सड़कों पर उतर आया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विरोध-प्रदर्शन का विशिष्ट दायित्व सम्भालने वाले आसिफ महमूद का कहना था कि शेख हसीना की सरकार ने कई छात्रों का कत्ल किया है, उन्हें इसका हिसाब देना होगा। 4 अगस्त को मोहम्मद ने शोशल मीडिया फेसबुक पर लिखा, ‘बांस का डंडा तैयार करो और बांग्लादेश को आजाद करो।’

कहां शरण लेेंगी हसीना?

अमेरिका, ब्रिटेन समेत भारत की नजर बांग्लादेश की हर स्थिति पर बनी हुई है। ब्रिटेन ने शेख हसीना को जहां राजनीतिक शरण देने से इनकार कर दिया, वहीं भारत ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक सर्वदलीय बैठक के दौरान कहा कि भारत सरकार ने बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ राजनीतिक शरण के मुद्दे पर अभी तक चर्चा नहीं की है, क्योंकि हम चाहते हैं कि वह पहले ‘सदमे की स्थिति से उबरें’ और फिर आगे की कार्रवाई पर चर्चा करें। इस बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित अन्य लोग शामिल हुए, जयशंकर ने एक्स पर पोस्ट किया कि सरकार इस मुद्दे पर विपक्षी दलों द्वारा ‘सर्वसम्मति से दिए गए समर्थन और समझ’ की सराहना करती है। बांग्लादेश में तख्तापलट, अराजकता और शेख हसीना को राजनीतिक शरण देने के संदर्भ में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा कि बांग्लादेश के लोग वहां की सरकार का भविष्य तय करें। उन्होंने कहा कि जवाबदेही कैसी होती है ये बांग्लादेश के कानून में दिखना चाहिए। अमेरिका ने बांग्लादेश में अंतरिम सरकार बनाने को लेकर कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून के शासन और बांग्लादेशी लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए अंतरिम सरकार का गठन किया जाना चाहिए। हम बांग्लादेश के लोगों को बांग्लादेश की सरकार का भविष्य निर्धारित करते हुए देखना चाहते हैं। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन ने भी बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल करने के लिए ‘त्वरित कार्रवाई’ का आह्वान किया। ब्रिटेन की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है, जब बांग्लादेश की नेता शेख हसीना प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर अचानक भारत पहुंचीं और उनके ब्रिटेन से शरण मांगने की खबरें सामने आईं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केअर स्टार्मर ने अपने प्रवक्ता के हवाले से कहा कि हाल के हफ्तों में बांग्लादेश में हुई हिंसा से वे बहुत दुखी हैं।

भारत पर क्या होगा असर
बांग्लादेश में हुए तख्ता पलट से भारत में भी तनाव का माहौल बना हुआ है। दोनों देशों के बीच पिछले 53 सालों से द्विपक्षीय संबंध हैं। बांग्लादेश की राजनीति के दो बड़े और प्रमुख चेहरे हैं- बांग्लादेश अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की खालिदा जिया। पिछले 15 सालों से बांग्लादेश में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग की सरकार थी और वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज थीं। भारत बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को देखना चाहता है। वहीं शुरू से ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का झुकाव इस्लामिक कट्टरपंथियों की तरफ रहा है। वे हमेशा से पाकिस्तान और चीन की वकालत करते आए हैं। ऐसे में शेख हसीना का प्रधानमंत्री ना रहना भारत के लिए कई मुश्किलें पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त पड़ोसी देश में अस्थिरता और अराजकता का असर भारत की सुरक्षा और व्यापार पर भी पड़ेगा। उपद्रव के बाद वहां से पलायन होता है तो इसका सीधा दबाव भारत पर पड़ना तय है। यही नहीं भारत की कई व्यापारिक परियोजनाएं बांग्लादेश के साथ क्रियान्वयन के स्तर पर हैं।
बीबीसी की एक रिपोर्ट मुताबिक दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है। कोरोना काल के बावजूद दोनों देशों के बीच साल 2020-21 में 10.78 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार रहा है। वहीं साल 2021-22 में यह व्यापार 44 प्रतिशत के दर से बढ़कर 18.14 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। साल 2022-23 के बीच भारत-बांग्लादेश का कुल व्यापार 15.93 बिलियन डॉलर रहा। बिजली और ऊर्जा के क्षेत्र में कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। बांग्लादेश वर्तमान में 1160 मेगावाट बिजली भारत से आयात कर करता है। इतना ही नहीं हाई स्पीड डीजल ले जाने के लिए दोनों देशों के बीच भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन बहुत अहम है। पिछले एक दशक में सड़क, रेलवे, बंदरगाहों के निर्माण के लिए भारत ने हजारों करोड़ रुपए बांग्लादेश को दिए हैं। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि जिस तरह की स्थिति बांग्लादेश में बन रही है, उसका असर देश के साथ व्यापार पर भी पड़ेगा। इसके अलावा भारत अपनी ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी के लिए बांग्लादेश को बहुत अहम मानता है। भारत के पूर्वी राज्य और बांग्लादेश एक दूसरे से घिरे हुए हैं। वहां विकास और कनेक्टिविटी के लिए बांग्लादेश का साथ जरूरी है और यही बात उस पर भी लागू होती है।

बांग्लादेश के साथ भारत की लगभग चार हजार किलोमीटर की सीमा लगती है। लिहाजा चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की चुनौतियों को देखते हुए भारत के लिए इस इलाके में ऐसी सरकार की जरूरत है, जो उसका हितैषी हो। बांग्लादेश के कैंपों से पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादी आंदोलन को जिस तरह से समर्थन मिल रहा था उसे कुचलने में भी शेख हसीना की सरकार ने अहम भूमिका निभाई थी। वहां रह रहे अलगाववादी आंदोलन के बड़े नेताओं को बांग्लादेश सरकार ने भारत को सौंप दिया, जिसमें उल्फा नेता अरविंद राजखोवा समेत कई दूसरे अलगाववादी नेता शामिल हैं। अब वे भारत से शांति वार्ता कर रहे हैं। वहीं शेख हसीना की सरकार से पहले की सरकार ने उत्तर पूर्वी भारत में अलगाववादियों को पनाह दी थी। अंदेशा है कि बांग्लादेश में अंतरिम सरकार बनने से भारत के साथ बांग्लादेश के सम्बंध उतने सहज नहीं हो पाएंगे। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि
बांग्लादेश की कमान जिस भी सरकार के हाथ आए उसके साथ समन्वयवादी तरीका अपनाए और अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने का प्रयत्न करे।

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