Editorial

अहंकार चलते दरकती छवि

मेरी बात

भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती संघ के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण सिंह पर यौन दुराचार के गंभीर आरोप इन दिनों सुर्खियों में हैं। आरोप भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन करने वाली महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए हैं। इन महिला पहलवानों में ओलंपिक पदक विजेता विनेश फोगाट, साक्षी मलिक आदि शामिल हैं। जनवरी, 2023 में पहली बार बृजभूषण पर यौन उत्पीड़न के आरोप तब चर्चा में आए जब इन महिला पहलवानों और उनके साथियों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर देश के समक्ष अपनी व्यथा रखी। तब उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि उनके आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। ऐसा लेकिन हुआ नहीं। थक-हार कर इन पीड़ितों ने अप्रैल माह से अपना धरना-प्रदर्शन जंतर-मंतर पर शुरू कर दिया। केंद्र सरकार तब भी नहीं चेती। आरोपी बृजभूषण सिंह के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा तब कहीं जाकर दो प्रथम सूचना रिपोर्ट इस भाजपा सांसद के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की। 28 अप्रैल को दर्ज इन एफआईआर में से एक ‘पॉक्सो एक्ट’ के तहत दर्ज की गई। दोनों एफआईआर में बृजभूषण सिंह पर बेहद संगीन आरोप महिला पहलवानों ने लगाए हैं। सामान्यतः ‘पॉक्सो एक्ट’ के अंतर्गत दर्ज मुकदमें में आरोपी को तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाता है। बृजभूषण सिंह के मामले में लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टा उनके खिलाफ जंतर-मंतर पर धरनारत महिला पहलवानों संग दिल्ली पुलिस का व्यवहार लगातार तल्ख बना रहा और अंततः 28 मई को जब प्रधानमंत्री लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर, संसद के नए भवन का लोकार्पण कर रहे थे, तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों को धता बताते हुए दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारी पहलवानों को हिरासत में ले जंतर-मंतर से उन्हें बेदखल कर दिया। इस बीच बृजभूषण बेखौफ अपनी बयानबाजी करते रहे। उन्होंने खुद को पाक साफ और पूरे प्रकरण को विपक्षी दलों की राजनीति करार दिया। ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’ को अपना मूल मंत्र मानने वाली भारतीय जनता पार्टी बेटियों द्वारा एक प्रभावशाली व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों के प्रति संवेदनहीनता की सभी हदें पार करती इस दौरान नजर आई। प्रश्न उठता है कि आखिर क्योंकर भाजपा और केंद्र सरकार बृजभूषण सिंह पर कार्रवाई करने से बच रही है? क्यों एक दागी चरित्र के व्यक्ति को संरक्षण देती नजर आ रही है? और क्योंकर अपने ‘चाल-चरित्र और चेहरे’ पर गुमान करने वाली भाजपा ऐसे दागियों को संरक्षण देने के लिए सदैव तत्पर रहती है? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने से पहले संक्षेप में बृजभूषण सिंह के बारे में कुछ जानना जरूरी हो जाता है।

बृजभूषण सिंह बेहद-बेहद विवादित छवि के व्यक्ति हैं। इतने विवादित कि उनका भारतीय संसद का सदस्य होना पूरी संसदीय व्यवस्था और उन्हें संरक्षण देने वाले राजनीतिक दलों की जनसरोकारी राजनीति के दावों पर गंभीर सवाल खड़ा कर देता है। अपराध की दुनिया से गहरा नाता रखने वाले बृजभूषण सिंह पर हत्या, लूट और आतंकी होने के आरोप/मुकदमों की लंबी फेहरिस्त है। कहा जाता है कि अपनी युवावस्था में बृजभूषण सिंह मोटर साइकिल चोर और अवैध शराब के धंधे में लिप्त हुआ करते थे। 1990 के मध्य में उन्हें आतंक निरोधक कानून ‘टाडा’ के अंतर्गत कुख्यात आतंकी दाऊद इब्राहिम संग संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तब कई माह बृजभूषण सिंह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद रहे थे। बाद में संदेह का लाभ पा वे बरी कर दिए गए थे। उन पर 38 गंभीर अपराध के मुकदमे 1974 से 2007 के मध्य दर्ज किए गए जिनमें से कुछ गैंगस्टर एक्ट और गुंडा एक्ट के तहत थे। ऐसी ‘स्वच्छ’ छवि वाले व्यक्ति का राजनीति में आना तो बनता है। ‘भय-भूख और भ्रष्टाचार’ से देश को मुक्त कराने के संकल्प से पैदा हुई भारतीय जनता पार्टी ने इस ‘महापुरुष’ को राजनीति में स्थापित करने का काम किया। 1991 में राम लहर के दौरान बाहुबली बृजभूषण सिंह भाजपा के टिकट पर गोण्डा लोकसभा सीट से चुनाव जीत पहली बार लोकतंत्र के मंदिर ‘संसद’ के सदस्य बने। तब तक उनकी ख्याति बतौर राम भक्त स्थापित होने लगी थी। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान उन्होंने अपना सक्रिय योगदान दे इस छवि को मजबूती देने का काम किया। केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने इस कांड के 39 आरोपियों में बृजभूषण को भी चिÐत किया था। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस मामले में निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया था। एक बार सांसद बनने के बाद बृजभूषण की राजनीतिक यात्रा बुलेट ट्रेन माफिक बेरोकटोक अपने सफर पर निकल पड़ी। 1999 में वे भाजपा के टिकट पर एक बार फिर से सांसद बने। 2004 में बलरामपुर सीट से तीसरी बार उन्होंने भाजपा प्रत्याशी बतौर जीत दर्ज कराई। 2008 आते-आते उनका मन समाजवादी होने लगा था। नतीजा रहा 2008 में जब अमेरिका संग परमाणु करार के मसले पर वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान किया और लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो बृजभूषण सिंह ने पार्टी व्हिप की अवहेलना करते हुए मनमोहन सरकार के पक्ष में मतदान कर डाला। उन्होंने ऐसा समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के कहने पर किया था। स्मरण रहे सपा ने तब मनमोहन सिंह सरकार के पक्ष में मतदान कर सरकार को गिरने से बचाया था। 2009 का चुनाव बृजभूषण सिंह समाजवादी पार्टी के टिकट पर कैसरगंज लोकसभा सीट से लड़ चौथी बार संसद पहुंच गए। समाजवादी पार्टी के जनक मुलायम सिंह यादव हमेशा से ही बाहुबलियों और अपराधियों के शरणदाता कहलाए जाते थे। उत्तर प्रदेश के कुख्यात माफिया डीपी यादव को राजनेता बनाने वाले मुलायम सिंह ही थे। यह दीगर बात है कि डीपी यादव को पानी पी-पी कर कोसने वाली भाजपा ने भी वक्त आने पर डीपी को अपनाने से गुरेज नहीं किया था। सपा संग बृजभूषण का रिश्ता 2014 तक चला। 2014 में वे एक बार फिर से भाजपा में शामिल हो चुनाव लड़ संसद पहुंचने में सफल रहे। 2019 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत छठी बार लोकसभा के सदस्य बनने वाले बृजभूषण सिंह बीते कई वर्षों से भारतीय कुश्ती संघ पर भी अपना कब्जा जमाए हुए हैं। मूल रूप से वे ‘सरल हृदय’ और ‘सत्य’ पर विश्वास रखने वाले हैं। 2022 में एक समाचार पोर्टल ‘लल्लन टॉप’ को दिए साक्षात्कार में उन्होंने बेहद साफगोई से (कुछ इसे दबंगई भी कहते हैं) स्वीकारा था कि उन्होंने एक व्यक्ति की हत्या की थी। यह उनका संक्षिप्त परिचय मात्र है ताकि आप समझ सकें कि जिन बृजभूषण सिंह को हर कीमत बचाने की जद्दोजहद करती भाजपा और केंद्र सरकार नजर आ रही है, आखिर वे हैं कौन। अब आते हैं पहले प्रश्न पर कि क्यों आखिरकार भाजपा ऐसा करती प्रतीत हो रही है?

राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे सबसे बड़ा कारण जाति व्यवस्था संग भारतीय राजनीति के रिश्ते को करार देते हैं। बृजभूषण सिंह क्षत्रिय हैं। बताया जाता है कि उनका उत्तर प्रदेश के क्षत्रिय समाज में खासा प्रभाव है जिस कारण भाजपा नेतृत्व उनके खिलाफ कार्रवाई करने से हिचक रहा है। मैं समझता हूं यही अकेला कारण नहीं है। असल कारण भाजपा नेतृत्व की अहंकारी प्रवृत्ति है जो उसे जनभावनाओं के खिलाफ जाने के लिए उकसाती है। तीन कृषि कानूनों को लेकर हमने इस प्रवृत्ति को देखा। हालांकि किसानों की एकता के आगे केंद्र सरकार को हथियार डालने पड़े लेकिन उसके हठयोग में कमी नहीं आई। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के प्रसंग को सामने रख इसको समझा जा सकता है। हरियाणा सरकार में मंत्री संदीप सिंह का मामला भी कुछ ऐसा ही है। उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप हैं लेकिन राज्य सरकार और भाजपा उन पर कार्रवाई करने से साफ बच रही है। इस हठ के पीछे एक अन्य कारण, जो भाजपा के लिए बड़ा मुगालता भी साबित हो सकता है, प्रधानमंत्री की वह करिश्माई छवि है जिसके आगे सभी मुद्दे गौण हो जाते हैं। 2019 के आम चुनाव और उसके बाद 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा इसी छवि सहारे भारी जीत करा पाने में सफल रही थी। संभवत 2024 भी भाजपा नेतृत्व इसी सहारे जीतने के प्रति आश्वस्त हो इसलिए बढ़ते जनआक्रोश को वह देख न पा रहा हो। 30 अप्रैल, रविवार के दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ का सौवां संस्करण जारी किया तब तक महिला पहलवानों का मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका था। प्रधानमंत्री ने महिला सशक्तिकरण पर चर्चा की। उन्होंने हरियाणा से शुरू किए गए अपने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान का जिक्र भी किया। सेना में, खेलों में, उद्योग धंधों में महिलाओं की सहभागिता पर भी पीएम बोले लेकिन उन्होंने एक शब्द भी महिला पहलवानों के धरने- प्रदर्शन को लेकर कहना उचित नहीं समझा। इससे एक स्पष्ट संदेश गया कि भाजपा और स्वयं प्रधानमंत्री भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाली बेटियों की पीड़ा को समझने और उन्हें न्याय दिलाने के प्रति किस हद तक असंवेदनशील हैं। बीते नौ वर्षों के दौरान एक के बाद एक चुनावी सफलता से पैदा हुआ अहंकार शायद इस असंवेदनशीलता के पीछे हो या फिर जातिगत राजनीति का पेंच, कारण भले ही कुछ भी क्यों न हो, अंततः इससे भाजपा और स्वयं प्रधानमंत्री की छवि दरकी है। कितनी? यह 2024 के नतीजे तय करेंगे।

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