Editorial

रेलमंत्री की हत्या के आरोप से घिरीं इंदिरा

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-84
 

यह आंदोलन जेपी के नेतृत्व में पहले बिहार फिर देश के अन्य हिस्सों में तेजी पकड़ने लगा। कई स्थानों पर हिंसा की वारदातें भी शुरू होने लगी थीं। जेपी ने अपने समर्थकों से अहिंसा की अपील कर ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा’ नारे का वस्तुतः पालन करने को कहा था। इस आंदोलन के दौरान रामगोपाल दीक्षित द्वारा रचा गया एक गीत आंदोलन का गीत बन तब देश भर में गूंजने लगा था-

जय प्रकाश का बिगुल बजा तो, जाग उठी तरुणाई है
तिलक लगाने तुम्हें जवानों, क्रांति द्वार पर आई है
आज चलेगा कौन देश से, भ्रष्टाचार मिटाने को
बर्बरता से लोहा लेने, सत्ता से टकराने को।
आज देख लें कौन रचाता, मौत संग सगाई है
तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है
पर्वत की दीवार कभी क्या, रोक सकी तूफानों को
क्या बंदूकें रोक सकेंगी, बढ़ते हुए जवानों को
चूर-चूर हो गई शक्ति वह, जो हमसे टकराई है
तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है
लाख-लाख झोपड़ियों में तो, छाई हुई उदासी है
सत्ता-सम्पत्ति के बंगलों में, हंसती पूरणमासी है
यह सब अब न चलने देंगे, हमने कसमें खाई हैं
तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है
सावधान पद या पैसे से, होना है गुमराह नहीं
सीने पर गोली खा कर भी, निकले मुख से आह नहीं
ऐसे वीर शहीदों ने ही, देश की लाज बचाई है
तिलक लगाने तुम्हें जवानों, क्रांति द्वार पर आई है
आओ कृषक, श्रमिक, नागरिकों, इंकलाब का नारा दो
कविजन, शिक्षक, बुद्धिजीवियों, अनुभव भरा सहारा दो
फिर देखें हम सत्ता कितनी, बर्बर है बौराई है
तिलक लगाने तुम्हें जवानों, क्रांति द्वार पर आई है
जयप्रकाश का बिगुल बजा तो, जाग उठी तरुणाई है।

जेपी आंदोलन की तीव्रता के आगे लेकिन इंदिरा गांधी झुकने को तैयार नहीं हुईं। उन्होंने शुरुआत में तो अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब रक्षात्मक शैली में दिया लेकिन बाद में उन्होंने सीधे जेपी को अपने निशाने पर रखना शुरू कर डाला -‘भ्रष्टाचार उतना व्यापक नहीं है जितना कहा जा रहा है, ललित बाबू (ललित नारायण मिश्रा, इंदिरा सरकार में रेलमंत्री) और बंसीलाल (हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री) ने कोई गलत काम नहीं किया है, मेरा पुत्र होनहार व परिश्रमी युवक है, वह कुछ कर दिखाना चाहता है पर दूसरों को इससे ईर्ष्या होती है, उसकी मारुति योजना में कोई गलत काम नहीं हुआ है . . .जेपी ‘कन्फ्यूज्ड’ आदमी हैं। वह खुद नहीं समझते कि वे क्या कह व कर रहे हैं, ‘फ्रस्टेªटेड’ हैं, कभी कोई पद नहीं मिला तो अब सत्ता हथियाने की सोच रहे हैं . . .उनका आंदोलन प्रतिक्रियावादी है, कुटिल शक्तियों से नियंत्रित है, आनंद मार्ग और जनसंघ की मदद से चलाया जा रहा है।’

जयप्रकाश के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही एक अन्य प्रकरण चलते इंदिरा गांधी देश का ध्यान कुछ अर्से के लिए ‘सम्पूर्ण क्रांति’ से भटकाने में कामयाब रही थी। यह प्रकरण पूर्वोत्तर के एक राज्य सिक्किम से जुड़ा था। आजादी पश्चात् भी सिक्किम का स्वतंत्र अस्तित्व कायम रखा गया था और उसे भारतीय गणतंत्र के अंतर्गत एक अर्ध स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा प्राप्त था जिसके अंतर्गत सिक्किम के राजा का अपने प्रदेश में पूरा अधिकार था और भारत की जिम्मेदारी केवल उसकी सीमाओं की रक्षा करने तक सीमित थी। सिक्किम सामरिक दृष्टि से भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। इसके पश्चिम में नेपाल तो उत्तर में तिब्बत है। आजादी के समय यहां चौग्याल वंश का शासन था। साठ के दशक से ही दो लाख की आबादी वाले इस राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करने और राजशाही को समाप्त करने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। दूसरी तरफ तत्कालीन राजा पालदेन नामग्याल ने अपने राज्य को पूरी तरह से स्वतंत्र राष्ट्र बनाए जाने के प्रयास करने शुरू कर दिए थे। नामग्याल के इरादों से सतर्क इंदिरा सरकार ने सितम्बर 1974 में राज्य में चुनाव करा विधानसभा गठन सत्ता चुने गए जनप्रतिनिधियों के हाथ सौंप राजा की समस्त शक्तियां समाप्त कर डाली थी। इसके साथ ही संविधान में संशोधन कर सिक्किम को भारतीय गणतंत्र का राज्य घोषित कर दिया गया। इंदिरा गांधी के इस निर्णय को तब आम जन से काफी सराहना तो मिली लेकिन जेपी आंदोलन की धार कम नहीं हुई। जैसे-जैसे जेपी का आंदोलन तेज होता गया इंदिरा गांधी की मुश्किलें भी बढ़ती गईं। जेपी की सराहना करते हुए कांग्रेस के युवा नेता चंद्रशेखर ने ‘यंग इंडिया’ अखबार में एक लेख लिख प्रधानमंत्री को चेताने का प्रयास करने का साहस दिखा इन मुश्किलों में इजाफा कर डाला। उन्होंने लिखा ‘जेपी सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं इसलिए सत्ता के सहारे उनको नहीं हटाया जा सकता है। इस लड़ाई में वे स्वयं अपने को दांव में लगा देंगे और उससे जो तूफान उठेगा उसका सामना करने की क्षमता कांग्रेस में नहीं है।’ अक्टूबर, 1974 के दिन जेपी के आह्नान पर पचास हजार के करीब लोग महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट पर एकत्रित हुए। जहां से एक विशाल जुलूस के रूप में दिल्ली की सड़कों पर मार्च निकाला गया। आचार्य कृपलानी के नेतृत्व में सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल शाम को प्रधानमंत्री से मिला। इस प्रतिनिधि मंडल ने बिहार विधानसभा भंग करने की मांग इंदिरा गांधी के सम्मुख रखी जिसे उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया। नवम्बर 1974 की 4 तारीख को फिर एक बार पटना की सड़कों में विशाल जनसमूह उतर आया था। जेपी जब गांधी मैदान पहुंचे तो वहां तमाम सरकारी प्रतिबंधों के बावजूद हजारों की संख्या में आंदोलनकारी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। जेपी को बिहार पुलिस ने मंच में जाने से रोकने का प्रयास किया, छात्रों पर लाठी चार्ज किया जाने लगा था। इसी अफरा-तफरी में जेपी भी पुलिस की लाठी से चोटिल हो गए। उनकी दो पसलियां इस हमले में टूट गईं। लोकनायक पर हुए पुलिस उत्पीड़न से देशभर में इंदिरा सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा हो गया। हिंदी के ख्याति प्राप्त लेखक फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ ने सरकार समक्ष अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हुए उन्हें मिला पद्मश्री सम्मान वापस कर डाला। लेखक और कवि नागार्जुन ने अपनी सरकारी पेंशन का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी।’
नवम्बर 1974 में कुछेक मित्रों की मध्यस्थता चलते इंदिरा और जेपी एक-दूसरे से मिले। यह मुलाकात लेकिन बेहद नकारात्मक रही। प्रधानमंत्री ने जयप्रकाश को विदेशी ताकतों के इशारे पर काम करने का आरोप लगा डाला। बकौल कैथरीन फ्रैंक-किसी प्रकार के समझौते के बजाय यह मुलाकात बेहद विस्फोटक और आरोप-प्रत्यारोप से भरी रही। इंदिरा ने नारायण पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से धन लेने का आरोप लगाया। नारायण ने इंदिरा पर सोवियत संघ की मदद से तानाशाह बनने की बात कह डाली।
जनवरी, 1975 की शुरुआत इंदिरा गांधी के लिए नई समस्या लेकर आई। भ्रष्टाचार के आरोपों में लिप्त उनके करीबी सहयोगी रेलमंत्री ललित नारायण मिश्रा की 2 जनवरी के दिन बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन में एक बम विस्फोट के जरिए हत्या कर दी गई। मिश्रा इंदिरा सरकार के लिए भारी समस्या बन चुके थे इसलिए उनकी हत्या कराने का आरोप विपक्षी दलों ने सीधे प्रधानमंत्री पर लगाने में देरी नहीं की थी। प्रधानमंत्री ने इसके जवाब में जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन चलते ताकत पा रहीं ‘विदेशी ताकतों’ को इस हत्याकांड के लिए जिम्मेदार ठहराया था। प्रधानमंत्री का मानना था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ की मदद से ‘आनंदमार्गियों’ ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया है। 1955 में प्रभात कुमार सरकार ने पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में ‘आनंदमार्ग प्रचार संघ’ नामक संस्था की नींव रखी थी जिसका घोषित उद्देश्य अध्यात्म के जरिए आनंद की प्राप्ति करना था। सरकार के अनुसार ‘तंत्र विद्या’ के जरिए मनुष्य आत्मिक शांति और निर्वाण की अवस्था पा सकता है। साठ के दशक में इस संगठन का तेजी से विस्तार हुआ था। पश्चिम बंगाल में इस संगठन का टकराव वामपंथी संगठनों के साथ होने लगा था। इंदिरा सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर भी आनंदमार्गी खासे मुखर रहते थे और जयप्रकाश नारायण के समर्थन में काम करने लगे थे। 1971 में इस संगठन के संस्थापक प्रभात कुमार सरकार को अपने ही पांच साथियों की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार कर संगठन को प्रतिबंधित कर दिया गया था। ललित नारायण मिश्रा की हत्या का रहस्य अनसुलझा ही रह गया। हालांकि 39 बरस तक चले मुकदमें बाद 8 दिसम्बर 2014 को इस हत्या के आरोप में चार आनंदमार्गियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई लेकिन हत्याकांड के सूत्रधारों की बाबत छाया संशय दूर न हो सका है। मिश्रा की हत्या ने इंदिरा गांधी को खासा विचलित करने का काम किया था। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और इंदिरा मंत्रिमंडल के सदस्य रहे बसंत साठे के अनुसार- ‘मिश्रा की हत्या से वे दहशतजदा हो गई थीं। वे इस संदेह में लगातार घिरती गईं कि उनके शत्रुओं से उनकी जान को खतरा है।’ जयप्रकाश और उनके आंदोलन को इस हत्याकांड के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेवार मानने के साथ-साथ प्रधानमंत्री ने इसे उनकी हत्या से पहले की गई ‘डेªस रिहर्सल’ करार देते हुए कह डाला-‘जब मेरी हत्या होगी तो ये लोग (विपक्षी दल) मुझे मेरी ही हत्या का जिम्मेदार ठहरा देंगे।’ जयप्रकाश नारायण अब खुले तौर पर बगावत की राह पकड़ चुके थे। 15 फरवरी 1975 को दिल्ली में सरकारी कर्मचारियों की एक सभा में भाषण देते हुए उन्होंने सेना और पुलिस से ‘अवैध और गलत आदेशों’ का पालन न करने की अपील कर डाली।
क्रमशः

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