जनसंघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं। सहकारिता विभाग में हुई बैंक भर्तियों के घोटालों को वह कई बार उठा चुके हैं। एक बार फिर उन्होंने इस प्रकरण पर अपनी आवाज बुलंद की है। नेगी का आरोप है कि प्रदेश के तीन जनपदों के अभ्यार्थियों को नौकरी दिलाने के लिए नियमों की तिलांजलि दे दी गई। घोटालेबाजों ने अपने रिश्तेदारों के साथ ही बैंक में कार्यरत अधिकारियों-कर्मचारियों के रिश्तेदारों और परिजनों को नौकरियां बांट दी। कई बार जांच हो जाने के बावजूद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न किया जाना सरकार की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहा है
सहकारिता विभाग में हुए बैंक भर्ती घोटाले की जांच रिपोर्ट पर शासन और सरकार कंुडली मारे हुए बैठी है। हैरानी की बात यह है कि इस बड़े घोटाले को लेकर तीन जांच रिपोर्ट मिलने के बावजूद एक वर्ष से भी ज्यादा समय हो चुका है लेकिन दोषियों पर कार्यवाही करने के बजाय उनको बचाए जाने के रास्ते खोजे जा रहे हैं। जिससे बैंक घोटाले की जांच के नाम पर बड़ा खेल रचे जाने की आशंका जताई जा रही है। जनसंघर्ष मोर्चा के रघुनाथ सिंह नेगी इस मामले में सरकार औेर शासन पर आरोप लगा रहे हैं कि दोषियों को बचाए जाने के लिए जांच रिपोर्ट को ही दबाया जा रहा है और कार्यवाही नहीं की जा रही है। पूर्व में इस मामले में हाईकोर्ट में जांच रिपोर्ट के परीक्षण के बाद सीबीआई जांच करवाए जाने की बात कही गई है।
यह पूरा मामला 2022 में प्रदेश के जिला सहकारी बैंकों में चतुर्थ श्रेणी के 423 पदों पर भर्ती को लेकर सामने आया था। देहरादून, ऊधमसिंह नगर और पिथैरागढ़ जिले के अभ्यार्थियों पर भर्तियों में जमकर भाई-भतीजावाद औेेेर चयनित अभ्यार्थियों से लाखांे के लेन-देन किए जाने के आरोप लगे थे। यह भी सामने आ चुका है कि चेयरमैन, प्रबंधक और निदेशक जेैसे बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों के परिजनों को भी चपरासी के पद पर नियुक्ति दे दी गई। मामले के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा कार्यवाही करने के आदेश शासन को दिए गए। जिस पर शासन ने सभी जिलांे में हुई भर्ती के परीक्षा परिणामों पर रोक लगाते हुए किसी भी अभ्यार्थी को नियुक्त किए जाने पर भी रोक लगा दी। साथ ही इसके लिए दो सदस्य जांच कमेटी का गठन करने के भी आदेश जारी कर दिए थे। हैरत की बात यह हैे कि भर्ती प्रक्रिया और नियुक्ति पर रोक के बावजूद जिला सहकारी बैंक देहरादून में रातोंरात कुछ अभ्यार्थियों को नियुक्ति देने के साथ ही उन्हें बैंक शाखाओं को भी आवंटन कर दिया गया।
जांच कमेटी द्वारा जांच आरंभ की गई थी लेकिन देहरादून सहकारी बैंक द्वारा जांच कमेटी को सहयोग करना तो दूर मामले के अभिलेख तक उपलब्ध नहीं करवाए गए। इस पर प्रशासनिक भवन को सील कर दिया गया। जांच प्रभावति न हो पाए इसके लिए सहकारिता मंत्री धनसिंह रावत द्वारा सचिव सहकारिता मीनाक्षी सुदंरम को कार्यवाही के आदेश दिए। जिसके बाद चार सहायक निबंधक और चार महाप्रबंधक को हटा दिया गया। साथ ही जिला सहकारी बैंक देहरादून की महाप्रबंधक वंदना श्रीवास्तव का सेवा विस्तार समाप्त कर दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि वंदना श्रीवास्तव का 30 सितंबर 2021 को कार्यकाल पूरा हो चुका था इसके बाद उनको छह माह का सेवा विस्तार दिया गया। 31 मार्च 2022 को उनका पहला सेवा विस्तार खत्म हुआ तो फिर से उनको छह माह का दूसरा सेवा विस्तार दे दिया गया।
वंदना श्रीवास्तव शासन ओैर सरकार में मजबूत पकड़ वाली अफसर मानी जाती रही हैं। सहकारिता विभाग की नियमावली के विपरीत उनको दो-दो बार सेवा विस्तार दिया गया। इससे स्पष्ट हेै कि वंदना श्रीवास्तव के लिए नियमावाली को भी ताक पर रखा गया। सहकारिता नियमावली के अनुसार पद से मुक्त व्यक्ति को विभाग में सलाहकार पद पर तो रखा जा सकता है लेकिन उसे उसी पद पर फिर से तैनात नहीं किया जा सकता।
प्रदेश में सहकारिता विभाग शुरू से ही विवादों में रहा है। बैंक ऋण घोटाले से लेकर विभागीय खरीद पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। पदों में भर्ती का मामला तो प्रदेश के केवल तीन ही जिलों का सामने आया है जबकि अन्य 10 जिलों में हुई भर्ती के परिणाम सार्वजनिक नहीं हुए हैं इसलिए उन पर भी भ्रष्टाचार किए जाने की आशंका जताई जाने लगी है।
आरोप है कि सहकारी बैंक हमेशा से ही भर्तियों के मामलांे में मनमानी करता रहा है। कहा जाता है कि वह हर साल बैंक डोर से अपने चहेतों को बैंकों में भर्ती करता रहा है। इन भर्तियों के लिए कभी भी नियमों का पालन नहीं किया गया। आज तक सहकारी बैंकों में जिनकी भी भर्तियां की गई हैं उनका कभी भी रजिस्ट्रार से न तो अनुमोदन लिया गया और न ही रजिस्ट्रार द्वारा तय नियमों का पालन किया गया। यहां तक कि भर्ती होने के बाद रजिस्ट्रार द्वारा कभी भी इन भर्तियों पर कोई जवाब नहीं मांगा गया और न ही इनका परीक्षण किया गया। सूत्रों की मानें तो सहकारी बैंकों में जरूरत से ज्यादा भर्तियां की गई हैं जबकि पद कम हैं। लेकिन अपने चहेतों और खास लोगों को इन पदों पर भर्ती करके उनको फायदा पुहंचाया गया है। गंभीर आरोप तो यह लग रहा है कि भर्तियों में जमकर लेन-देन भी किया गया है।
संविदा कर्मियों के मामले में भी ऐसा ही घालमेल किए जाने के आरोप लग रहे हैं। 2011 से लेकर 2013 व 2013 से लेकर 2022 तक 44 संविदा कर्मियों को बैंकांे में भर्ती किया गया। जिनके लिए राजिस्ट्रार से अनुमोदन तक नहीं लिया गया। जब मामला सुर्खियों में आया तो आनन-फानन में रजिस्ट्रार से भर्तियों के अनुमोदन को पत्र भेजा गया। गौर करने वाली बात यह हेै कि इतने वर्षों तक संविदाकर्मियों को भर्ती किया जाता रहा लेकिन अनुमोदन लेने की जरूरत तक नहीं समझी गई। जब मामला सामने आया तब अनुमोदन का खेल रचते हुए संविदाकर्मियों को नियमित करने के लिए ही राजिस्ट्रार से अनुमोदन लिया गया।
मजेदार बात यह है कि भर्तियां तो बगैर अनुमोदन के ही की गई लेकिन नियमितीकरण के लिए अनुमोदन मांगा गया। हालांकि इन सविंदाकर्मियों के नियमतिकरण का अनुमोदन रजिस्ट्रार द्वारा दे दिया गया। इसके पीछे राज्य सहकारी बैंक द्वारा भविष्य में इस प्रकार की कोताही न होने का नोटिस भी रजिस्ट्रार को भेजा।
सहकारिता विभाग में भारी अनियमितता बरतने का सबसे बड़ा प्रमाण हरिद्वार की बहुद्ेश्शीय साधन सहकारी समिति है जहां जून 2020 में पांच संविदा कर्मचारियों को भर्ती किया गया जिनको महज पांच माह के बाद ही न सिर्फ नियमित कर दिया गया, बल्कि इन सभी को सातवंे वेतनमान का भी लाभ दे दिया गया। इन पदों के लिए भी रजिस्ट्रार से अनुमोदन तक नहीं लिया गया था।
ऐसा ही ऊधमसिंह नगर जनपद की सहकारी समितियों में भी किया गया। जिसमें जमकर सविदाकर्मियों को बगैर अनुमोदन के भर्ती किया गया और उनको छह माह से लेकर एक वर्ष के भीतर ही नियमित कर दिया गया और सातवें वेतन आयोग का लाभ भी दिया गया। ये सारे घपले 2014, 2016, 2017 व 2020 में जमकर किए गए। सहकारी बैंकों में भी कर्मचारी नेताओं और अधिकारियों के नजदीकी रिश्तेदारों को इसी तरह से भर्ती किया गया है। रातोंरात नियुक्ति दिए जाने के पीछे भी यही कारण बताया जा रहा है। हैेरत की बात यह हेै कि इन भर्तियों के लिए अभ्यार्थियों की दो-दो सूचियां तेैयार की गई थी जो जांच कमेटी के हाथ लग चुकी है। दोनों ही सूचियों में अलग-अलग नाम हैं। यानी कोई एक सूची सही है जिसमें ईमानदारी से चयनित अभ्यार्थियों के नाम हैं जबकि दूसरी सूची में मिलीभगत से चयन किए जाने वालों के नाम हैं। इसकी जांच भी पूरी हो चुकी है।
देहरादून जिला सहकारी बैंक में हुए भर्ती घोटाले की जांच रिपोर्ट 20 जून 2022 और पिथौरागढ़ जिला सहकारी बैंक की 763 पृष्ठांे की जांच रिपोर्ट 2 सितंबर 2022 तथा ऊधमसिंह नगर जिला सहकारी बैंक के भर्ती घोटाले की 1019 पृष्ठों की जांच रिपोर्ट 26 सितंबर 2022 को सचिव सहकारी को सौंप दी गई थी। लेकिन एक वर्ष से भी ज्यादा का समय बीत जाने के बावजूद अभी तक शासन द्वारा इन जांच रिपोर्टों पर कार्यवाही करना तो दूर इनका संज्ञान तक नहीं लिया गया है। जनसंघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी द्वारा मुख्यमंत्री को इस बाबत एक सूची दी गई जिसमें साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि किस व्यक्ति को नियुक्ति दी गई है और वह किसका करीबी रिश्तेदार या सदस्य है। इस सूची में जिला सहकारी बैंक सचिव वंदना श्रीवास्त के घर का रसोईया शत्रुघ्न को भी नियुक्ति दी गई है। यही नहीं उसे सहकारी बैंक शाखा कालसी में तैनाती भी दे दी गई है। इसी तरह से जिला सहकारी बैंक देहरादून के अध्यक्ष अमित चौहान के दो करीबियों अभिषेक जुयाल व अर्जुन सिंह को भी नियुक्ति दी गई है। यही नहीं जिला सहकारी बैंक देहरादून के बैंक शाखा प्रबंधक अमरीश कुमार के साले सौरभ कुमार को भी नियुक्ति दी गई है। प्रदीप कुमार और शिशुपाल दोनांे सगे भाइयों को भी नियुक्ती दी गई है जिसमें शिशुपाल जो कि पूर्व डीआर शुक्ला का ड्राईवर के पद पर कार्यरत था, को न सिर्फ चपरासी के पद पर नियुक्ति दी गई, बल्कि उसके सगे भाई प्रदीप कुमार को भी नियुक्ति दी गई।
इसके अलावा इस सूची में उत्तरकाशी जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष के बेटे शुभम रावत और जिला सहकारी बैंक के पूर्व निदेशक की पत्नी सारिका देवी, जिला सहकारी बैंक मुख्य शाखा के प्रबंधक मनोज नेगी के भांजे विजय बीर बिष्ट, अपर निदेशक इरा उप्रेती के ड्राईवर के बेटे साहिल कुमार, जिला सहकारी बैंक देहरादून के पूर्व शाखा प्रबंधक सुरेश कुमार की सुपुत्री सोनम कुमारी को भी नियुक्ति दी गई है।

सहकारिता विभाग की अगर सही तरीके से जांच की जाए तो बहुत बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। भर्ती घोटाला तो सबके सामने आ ही चुका है। हमने सारे प्रमाण सूचना के अधिकार के तहत एकत्र किए और जिनको नौकरियों पर रखा गया है उनमें सभी किसी न किसी अधिकारियों, कर्मचारियों के नजदीकी रिश्तेदार हैं या उनके खास लोग हैं। हमें इस बात पर हैरानी हो रही है कि जिस तरह से चयन आयोग में हुए भर्ती घोटाले में सरकार ने कार्यवाही की है लेकिन सहकारी बैंक और विभाग के घोटालांे पर चुप्पी क्यों साधी हुई है, जबकि तीन-तीन जांच रिपोर्ट शासन को एक साल पहले ही मिल चुकी हैं जिसमें भर्ती घोटाला हुआ है और इसमें लाखों का लेन-देन किया गया है। अगर उनके बैंक डिटेल की जानकारी ली जाए तो सारा मामला साफ हो जाएगा। हमने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी को सारी जानकारी दे दी है और इसकी सीबीआई जांच किए जाने की मांग की है।
रघुनाथ सिंह नेगी, अध्यक्ष जनसंषर्घ मोर्चा

