हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता।
यहां कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी गाली है
हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाई है
यहां, सिर्फ, वह आदमी
देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है
तेरह दिसंबर, 2023 की सुबह लोकतंत्र का मंदिर कह पुकारे जाने वाली हमारी संसद में दो युवाओं ने लोकसभा के भीतर पीले रंग के धुएं को फैलाकर देश के नीति निर्माताओं को कुछ कहने का प्रयास किया। यह संसद की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी चूक अवश्य है लेकिन इस चूक से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह जानना और समझना है कि इन युवाओं का उद्देश्य क्या था? और वे अपने जनप्रतिनिधियों से, अपनी सरकार से क्या कहने का प्रयास कर रहे थे? यह भी मंथन-चिंतन का विषय है कि इन दो युवाओं और इनके चार अन्य साथियों पर लगाया गया आतंक निरोधी कानून कितना जायज है? धूमिल की उपरोक्त कविता का स्मरण मुझे इस घटना चलते हो आया। दो युवक जो संसद भीतर घुसे थे उनमें से एक तैंतीस वर्षीय मनोरंजन डी जो मैसूर से है और पेशे से इंजीनियर है। कुछ समय पूर्व इसकी नौकरी चली गई थी और तबसे ही यह अपने पिता के साथ मिलकर खेती कर रहा है। संसद भीतर प्रवेश करने वाले दूसरे नवयुवक का नाम सागर शर्मा है। पच्चीस बरस के सागर को 12वीं की अपनी पढ़ाई आर्थिक तंगी चलते छोड़नी पड़ी थी और जीवन यापन के लिए वह ई-रिक्शा चलाने लगा था। इन दो के अतिरिक्त चार अन्य युवाओं की भी पुलिस द्वारा इस ‘षड्यंत्र’ को रचने के आरोप में गिरफ्तारी की गई है। इन चारों में एक है सैंतीस बरस की लड़की नीलम आजाद जो एम.ए., ए़.एड, एम.फिल की ड्रिगीधारक होने के साथ- साथ नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट को भी उत्तीर्ण कर चुकी है लेकिन बेरोजगार है। दो अन्य युवाओं की भी पृष्ठभूमि ऐसी ही है। उच्च शिक्षा के बावजूद वे बेरोजगार हैं। ये सभी एक सोशल मीडिया समूह ‘भगत सिंह फैन क्लब’ के सदस्य बताए जाते हैं। संसद भीतर प्रवेश कर धुएं को फैला ये शहीद भगत सिंह की भांति अपनी आवाज, अपनी पीड़ा और अपने जैसे लाखों बेरोजगार युवाओं की पीड़ा देश के सामने रखना चाहते थे। समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार यह युवा किसान आंदोलन, मणिपुर की घटनाओं और बेरोजगारी के चलते नाराज थे। मनोरंजन डी के पिता ने पत्रकारों को जानकारी दी है कि उनका बेटा स्वामी विवेकानंद का प्रसंशक है और वंचितों के लिए कुछ अच्छा करना चाहता था। भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने अप्रैल 1929 में तीन अहानिकारक बमों का विस्फोट सेंट्रल लेजिस्टलेटिव अंसेबली (वर्तमान में लोकसभा) में कर बहरी-गूंगी ब्रिटिश सरकार तक आम भारतीय की आवाज पहुंचाने का काम किया था। विश्व की सबसे तेज उभरने वाली आर्थिक शक्ति बन चुके भारत के बेरोजगार युवा यदि भगत सिंह को अपना आदर्श मान उनके बताए रास्ते पर चल देश के नीति निर्माताओं को कुछ कहने का प्रयास करते हैं तो प्रश्न उठने जायज हैं कि क्या ब्रिटिश हुकूमत की तरह कठोर कानूनों के जरिए ऐसे युवाओं की भावनाओं को नासमझते हुए, उनकी आवाज को कुचल देना सही है? या फिर समस्या के निदान की प्रक्रिया से ऐसे युवाओं को जोड़ते हुए उन्हें यह विश्वास दिलाना कि सरकार और व्यवस्था उनकी समस्या को समझती है और ऐसी योजनाएं, ऐसी नीतियों को बनाने का कार्य कर रही है जिससे उन्हें यानी आम नागरिक को राहत पहुंच सके।
वर्तमान में देश का युवा पूरी तरह से दिशाहीनता का शिकार हो चला है। उसके पास भविष्य को लेकर कोई सपने बचे नहीं हैं क्योंकि उसका वर्तमान पूरी तरह अंधकारमय है। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ बातचीत में नीलम आजाद की मां का यह कहना है ‘हम एक संपन्न परिवार नहीं हैं फिर भी हमने उसेे पढ़ाया लिखाया। वह हमसे कहा करती है कि ‘‘इतना पढ़ने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली। सारी पढ़ाई व्यर्थ गई, इससे बेहतर तो मैं मर जाऊं।’’ यह कथन उस बेचारगी को सामने रखता है जिससे आज का हर बेरोजगार युवा गुजर रहा है। युवा शक्ति का आक्रोश धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंचने लगा है। उन्हें अपने देश की व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है। सरकारी नौकरी आज भी बेरोजगार युवाओं की पहली पसंद है क्योंकि वह उन्हें अपने भविष्य के प्रति सुरक्षा बोध का एहसास कराती है। केंद्र और राज्यों में सरकारों का प्रयास आउटसोर्सिंग के जरिए खाली पड़े पदों को भरने की प्रवृत्ति बीते कई वर्षों से नीतिगत रूप ले चुकी है। जिन पदों के लिए सीधे अवसर उपलब्ध कराए भी जाते हैं, वहां भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है जिसे पेपर लीक प्रकरणों के जरिए समझा जा सकता है। जाहिर है इन कारणों के चलते युवाओं में हताशा तेजी से बढ़ रही है जिसके कारण उनका नशे की गिरफ्त में जाना और अंततः अपराध की दुनिया में प्रवेश लेना अब आम बात हो चली है। हम भले ही लाख दावा करें, खुद को भरमाने का प्रयास करें कि विश्व की पांच बढ़ी आर्थिक ताकतों में हम शामिल हो चुके हैं और आने वाले कुछ ही वर्षों में अमेरिका और चीन के बाद हम सबसे बढ़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बनने जा रहे हैं, इस सत्य से मुंह मोड़ना बेहद घातक होगा कि देश का एक बड़ा तबका आज भी दो वक्त की रोटी पाने के लिए भारी जद्दोजहद से गुजरता है या फिर मुफ्त के सरकारी राशन पर निर्भर रहता है। निश्चित ही कल्याणकारी राज्य होने के नाते हरेक नागरिक तक अन्न पहुंचाना सरकारों का दायित्व है लेकिन यह स्थाई समाधान कत्तई नहीं है। मुफ्त का अन्न पेट की आग को तो बुझा सकता है लेकिन युवाओं की ऊर्जा को सही मार्ग पर लाने का काम नहीं कर सकता है। इस दृष्टि से संसद परिसर में प्रवेश करने वाले युवाओं को यूएपीए जैसे सख्त कानून की गिरफ्त में लेना कतई तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। बीते कुछ अर्से से आमजन की आवाज को अनसुना करने की प्रवृत्ति जोर पकड़ चुकी है। दिल्ली स्थित जंतर-मंतर आजादी बाद से ही प्रतिरोध के स्वरों को केंद्र की सरकार तक पहुंचाने का एक अड्डा हुआ करता था। 2011 में अन्ना हजारे ने यहीं से तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार में चौतरफा पसर चुके, फल-फूल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना आंदोलन शुरू किया था। अब लेकिन यहां बैठ शांतिपूर्वक अपनी बात कहना, धरना इत्यादि करना लगभग असंभव हो चला है। दिल्ली पुलिस को पहले सूचित करना और उसकी इजाजत लेना अनिवार्य कर दिया गया है। और दिल्ली पुलिस को संभवत उपरी आदेश है कि ऐसे किसी भी आयोजन के लिए इजाजत नहीं दी जाए। गत् सप्ताह ही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने परिसर में छात्र संगठनों द्वारा किए जाने वाले धरनों इत्यादि को प्रतिबंधित करते हुए प्रदर्शनकारियों पर बीस हजार का जुर्माना लगाए जाने का तुगलगी फरमान जारी कर संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को सीमित कर डाला है। और ऐसा केवल जेएनयू में ही नहीं हो रहा है। छात्रों के आक्रोश को रोकने की यह कवायद अब देशभर के शिक्षण संस्थानों में देखने को मिल रही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि लोकतंत्रिक मूल्यों का क्षरण चरम पर है और प्रतिरोध के स्वरों को रोकने के लिए सरकारें राजशक्ति का दुरुपयोग कर रही हैं। संसद में गत् दिनों हुई घटना निःसंदेह लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। लेकिन इस सवाल से कहीं बड़ा सवाल है कि इन युवाओं ने आखिर ऐसा कदम उठाया क्यों? इस सवाल का हल ‘यूएपीए’ सरीखा कानून नहीं हो सकता है। दमन के जरिए किसी भी समस्या का हल नहीं निकल सकता, ऐसा इतिहास हमें समझाता है। हालांकि यह भी हमें इतिहास से ही समझने को मिलता है कि इतिहास से कोई भी सबक कभी लेता नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी निःसंदेह वर्तमान दौर के सबसे लोकप्रिय-जनप्रिय राजनेता हैं। जन सामान्य को उनके कहे पर पूरा भरोसा रहता है। वे एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजर कर लगातार दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं। ऐसे में यदि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे प्रधानमंत्री युवाओं का दर्द समझने का प्रयास नहीं करेंगे तो युवा शक्ति का आक्रोश तेज होगा जिसको यूएपीए सरीखे कानूनों के सहारे रोका नहीं जा सकेगा। इसलिए वर्तमान समय में मुझे धूमिल की यह पंक्तियां सही प्रतीत होती हैं कि ‘हर तरफ धुआं है, हर तरफ कुहासा है।’

