दिल्ली के कथित आबकारी घोटाले की आंच अब सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुकी है। अन्ना आंदोलन के जरिए देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान करने वाले केजरीवाल और उनके करीबी साथियों का खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर जाना और टीम अन्ना के दो मुख्य चेहरों मनीष सिसोदिया और संजय सिंह की ईडी द्वारा गिरफ्तारी भारतीय राजनीति का पतन की पराकाष्ठा के उस मोड़ पर जा पहुंचने का संकेत भर है, जिसमें आगे बहुत कुछ होना और देखा जाना बाकी है। केजरीवाल और उनके सहयोगियों की इस कथित भ्रष्टाचार में संलिप्तता को लेकर जनता, विशेषकर दिल्ली की जनता में खासा संशय है। बीते दिनों उच्चतम न्यायालय द्वारा सिसोदिया की जमानत याचिका के दौरान की गई कुछ टिप्पणियों ने इस संशय को आशंका में बदला है कि राजनीतिक विद्वेष की वजह से केजरीवाल एवं उनके साथियों को फंसाया जा रहा है। इस जन आशंका को जनाक्रोश में बदलने की नीयत से केजरीवाल एक बार फिर से रायशुमारी की राह पर चल पड़े हैं। इस बार उनका जनता से सीधा सवाल है कि यदि वे गिरफ्तार किए जाते हैं तो क्या उन्हें जेल भीतर से ही सरकार चलाते रहना चाहिए? केजरीवाल इस रायशुमारी की आड़ में ऐसा चक्रव्यूह रचने का प्रयास कर रहे हैं जो न केवल उन्हें जनता के मध्य भारी सहानुभूति देने का काम करे, बल्कि केंद्र सरकार पर विपक्ष द्वारा केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोपों को भी मजबूती दे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने का काम करे
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर ईडी का शिकंजा कसता जा रहा है। जिससे ये कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें भी अपने साथी नेता मनीष सिसोदिया और संजय सिंह के साथ जेल में रूम शेयर करना पड़ सकता है। ऐसे में ‘आप’ के नेताओं को और खुद केजरीवाल को अपनी गिरफ्तारी का डर सताने लगा है। आप नेताओं का कहना है कि अगर उनके लीडर को जेल में डाला जाएगा तो वहीं से सरकार चलेगी। अब सवाल यह है कि क्या जेल जाने की दशा में अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहेंगे या उनको इस्तीफा देना पड़ेगा? ऐसे ही कई सवालों का जवाब मांगते और अपने प्रमुख की आशंकित गिरफ्तारी पर प्रश्नचिÐ लगाते हुए आप नेता केजरीवाल की ओर से एक बार फिर जनता के बीच गए हैं।
जनता से समर्थन मांगते हुए आप ने ‘मैं भी केजरीवाल’ नाम से एक सिग्नेचर कैंपेन चलाया है। जिसमें उनका जनता से यही सवाल है कि, क्या केजरीवाल को गिरफ्तारी के बाद इस्तीफा देना चाहिए या जेल से ही सरकार चलानी चाहिए? इस अभियान के तहत केजरीवाल के समर्थन में लोगों को एकजुट करने के लिए आम आदमी पार्टी ने जनता के बीच जाने का फैसला लिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल राय का कहना है कि दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को प्रचंड जनादेश दिया है इसलिए दिल्ली में हमारी सरकार है। गिरफ्तारी के बाद इस्तीफा देना है या जेल से सरकार चलानी है, इसका फैसला जनता से सलाह के बाद लिया जाएगा। इसके लिए, उन्होंने (अरविंद केजरीवाल) पार्टी कार्यकर्ताओं से दिल्ली में घर-घर जाने और जनता की राय इकट्ठा करने का आह्नान किया है।’ इस अभियान की शुरुआत 1 दिसंबर से हो चुकी है जो 2 चरणों में चलेगी। पहले चरण में यह हस्ताक्षर अभियान 1-20 दिसंबर तक चलाया जाएगा जिसमें पार्टी कार्यकर्ता दिल्ली के 2 हजार 600 मतदान केंद्रों पर लोगों की राय जानने के लिए पर्चे ले जाएंगे। जिसपर लोगों को हस्ताक्षर करने होंगे। वहीं दूसरा चरण 21 से 24 दिसंबर के बीच कथित शराब घोटाले पर चर्चा के लिए शहर के हर वार्ड में ‘जन संवाद’ भी आयोजित किया जाएगा।

गौरतलब है कि वर्तमान में आम पार्टी के कई बड़े नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई की कार्रवाई चल रही है। क्योंकि दिल्ली के कथित शराब घोटाले में केजरीवाल सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया और सांसद संजय सिंह जेल में हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता सत्येंद्र जैन भी अभी तक जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं और अब पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की आशंका तेज होती नजर आ रही हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि देश की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी होने के आसार नजर आ रहे हों। इससे पहले भी कई मुख्यमंत्री इस दौर से गुजर चुके हैं जिनमें से कुछ गिरफ्तार भी हुए। हालांकि गिरफ्तारी की चर्चाओं के बीच सभी मुख्यमंत्रियों ने जेल जाने से पहले इस्तीफा दे दिया था। लेकिन ऐसा पहली बार है कि किसी मुख्यमंत्री ने गिरफ्तार होने की आशंकाओं को देखते हुए कोई हस्ताक्षर अभियान चलाया हो और इस्तीफा देने के बदले जेल से ही सरकार चलाने के विषय में जनता का समर्थन मांगा हो। ‘आप’ के इस फैसले के बाद सवाल उठ रहे हैं कि इस अभियान से पार्टी को क्या लाभ मिलेगा? केजरीवाल जेल में रहकर ही सरकार चलाएंगे या उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा? यह बात तो सच है कि अगर जनता केजरीवाल के पक्ष में जाती है और केजरीवाल गिरफ्तारी के बाद भी इस्तीफा न देकर जेल से ही सरकार चलाते हैं तो ये उनके लिए काफी मुश्किल होगा। लेकिन इसके लिए पहले ये जानना जरुरी है कि क्या जेल में रहकर सरकार चलाई जा सकती है?
संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जिसके तहत यह निर्धारित किया गया हो कि जेल जाने के पहले किसी भी मंत्री को इस्तीफा देना जरूरी है। कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर की धारा 135 के तहत सिविल मामलों में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य, मुख्यमंत्री, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को गिरफ्तारी से छूट मिली हुई है। लेकिन आपराधिक मामलों में ये छूट नहीं है। इस धारा के तहत सिविल मामलों में संसद या विधानसभा या विधान परिषद के किसी सदस्य को गिरफ्तार या हिरासत में लेने के लिए सदन के अध्यक्ष या सभापति से मंजूरी लेनी जरूरी है। हालांकि केजरीवाल की गिरफ्तारी आपराधिक मामले में होनी है तो उन्हें बिना सदन के अध्यक्ष की अनुमति के गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसे में ये अभियान केजरीवाल के लिए कारगर सिद्ध हो सकता है।
इस अभियान के मायने आम आदमी पार्टी द्वारा चलाए गए ‘मैं भी केजरीवाल’ हस्ताक्षर अभियान का उनकी पार्टी पर क्या प्रभाव पड़ सकता है और उन्होंने इस अभियान की शुरुआत क्यों की है इसके कई मायने निकले जा रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा ने बीबीसी को दिए एक बयान में कहा कि इस तरह के अभियान से केजरीवाल यह जानना चाहते हैं कि लोगों का विश्वास अभी भी उनमें बना हुआ है या नहीं। केजरीवाल इस अभियान से न सिर्फ गिरफ्तारी के मुद्दे पर बल्कि अपनी कमियों और आने वाले चुनावों में किन मुद्दों पर काम करने की जरूरत है, इसे लेकर वो लोगों की नब्ज टटोलना चाहते हैं और फिर उसी आधार पर अपनी रणनीति तय करना चाहते हैं। केजरीवाल सरकार हमेशा से सहानुभूति की सरकार रही है और इसमें भी इसे भुनाने की कोशिश ही दिखाई देती है। वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हो सकता है हस्ताक्षर अभियान में दिल्ली की जनता की व्यापक भागीदारी को देखते हुए कानून व्यवस्था के आधार पर अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी टल जाए और उन्हें जेल से सरकार चलाने की जरुरत ही न पड़े, लेकिन अगर ऐसा होता है कि उनको जेल से सरकार चलाने का मौका मिल जाए तो निश्चित रूप से केजरीवाल इस खबर को राष्ट्रीय स्तर पर लेकर जाएंगे। क्योंकि केवल इस एक अवसर से केंद्र सरकार के सामने उनकी कभी हार न मानने वाले नेता की छवि बन जाएगी जो उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के टक्कर में लाकर खड़ा कर देगी।

