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कुनबा टूटा तो बदल गए सियासी समीकरण 

पिछले दिनों लगभग ढाई दशक पुराना सियासी दरख्त क्या दरका, पूरे सूबे का सियासी समीकरण ही बदल गया। आगामी लोकसभा चुनाव में जहां अभी तक भाजपा के टक्कर में सपा-बसपा गठबंधन मजबूती से खड़ा नजर आ रहा था अब इसी गठबंधन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हालांकि समाजवादी के भीष्म पितामह सरीखे पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सपा को टूटने से बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन पार्टी में शिवपाल समर्थकों की बहुतायत ने सपा के मंसूबों पर पानी फेर रखा है। दावा किया जा रहा है कि सपा के कई बडे़ नेता शिवपाल के सम्पर्क में बने हुए हैं और जल्द ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर देंगे।
समाजवादी पार्टी में टूट का परिणाम यह हुआ कि जहां कुछ समय पूर्व तक समाजवादी पार्टी गठबंधन (सपा-बसपा गठबंधन) में अग्रणी पार्टी के तौर पर प्रभावशाली बनी हुई थी अब बाजी बसपा के हाथ में है। जाहिर तौर पर इस बदले समीकरण के बाद बसपा लोकसभा चुनाव में अधिक सीटों की मांग करेगी और सपा को बसपा की शर्तें मानने के लिए विवश होना पडे़गा। जहां तक सपा में टूट के बावजूद गठबंधन के बने रहने की बात है तो अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले है जिससे यह कहा जाए कि सपा-बसपा गठबंधन भी दरकने की कगार पर है।
जहां एक ओर लोकसभा चुनाव को लेकर सपा को नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है वहीं दूसरी ओर वट्वृक्ष बनने से पहले ही समाजवादी कुनबे की शाखाएं एक-एक करके टूटने लगी हैं। अभी 26 वर्ष पहले (4 अक्टूबर 1992) की ही तो बात है जब मुलायम सिंह यादव ने सजपा से रिश्ता तोड़कर समाजवादी कुनबा खड़ा किया था। यही वह काल था जब अयोध्या के विवादित परिसर को लेकर मुलायम ने एक ऐसा रास्ता चुना जो उन्हें यूपी की राजनीति में एक ऊंचाई तक ले गया। दो महीने भी नहीं बीते होंगे कि अयोध्या में विवादित परिसर को ढहा दिए जाने से पूरे प्रदेश ही नहीं वरन् पूरे देश में एक ऐसा माहौल तैयार हुआ जिसका लाभ यदि किसी को मिला तो वह समाजवादी पार्टी को। बतौर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव खुलकर मुसलमानों के पक्ष में खड़े दिखे और स्वयं को मुल्ला मुलायम की उपाधि से नवाजे जाने पर हर्ष प्रकट किया। यही वह काल था जब मुलायम सिंह यादव ने बतौर मुख्यमंत्री (जनता दल के बैनर तले 5 दिसम्बर 1989 से 24 जून 1991 तक) होते हुए यह दावा किया था कि अयोध्या में कोई परिन्दा भी पर नहीं मार पायेगा। अयोध्या परिसर में घुसने वाले कारसेवकों पर गोली चलवाकर मुलायम ने मुसलमानों को अपना मुरीद बना लिया लेकिन सूबे की लगभग 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी मुलायम को खलनायक मानने लगी जिसका लाभ भाजपा को मिला और कल्याण सिंह के नेतृत्व में 24 जून 1991  को भाजपा की नयी सरकार ने शपथ ली। इस बदलाव के बावजूद उस वक्त नयी नवेली सपा को अपने पैरांे पर खड़ा हाने का मौका मिल गया। इसे सपा की खुशकिस्मती कह लीजिए अथवा शतरंज की बिसात पर आम जनता को दांव पर लगाने की कला, मुलायम और उनकी पार्टी को एक मजबूत  आधार मिल गया था। इधर कल्याण सिंह की कट्टर हिन्दूवादिता के चलते पार्टी में उन्हें फायर ब्राण्ड नेता माना जाता था। प्रदेश ही नहीं वरन् देश की एक बहुत बड़ी हिन्दू आबादी अयोध्या स्थित विवादित परिसर पर राम मन्दिर निर्माण का सपना देख रही थी, इधर मुस्लिम पक्ष को मुलायम पर तो भरोसा था इसके बावजूद उसने विवादित परिसर पर  अपने  अधिकार को लेकर मुकदमा दायर कर रखा था। कल्याण सिंह के समक्ष देश की लगभग 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी के समक्ष खरा उतरने की चुनौती थी। कल्याण सिंह देश की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरे और उनकी सरकार के कार्यकाल (6 दिसम्बर 1992) में ही कारसेवकों की बड़ी संख्या ने अयोध्या पहुंचकर विवादित परिसर को ढहा दिया। विवादित परिसर ढहते ही कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं की पार्टी है। दूसरी ओर इस घटना के बाद से सूबे के साथ ही पूरे देश में मानो आग लग गयी हो। जो कल तक गंगा-जमुनी तहजीब का गुणगान किया करते थे वही अब एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे थे। स्थिति यहां तक खराब  थी कि दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर विश्वास न के बराबर  रह गया था। इस से जनता को क्या हासिल हुआ, सभी जानते हैं परन्तु भाजपा और सपा को इस मारकाट से बेहद फायदा पहुंचा। मुसलमानों के लिए समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख मुलायम सिंह यादव किसी हीरो से कम नहीं थे। यह अलग बात है कि उस वक्त भी राजनीति का यह दिग्गज पहलवान (मुलायम सिंह यादव) मुसलमानों की आड़ लेकर राजनीति कर रहा था और मुसलमानों की एक छोटी पढ़ी-लिखी आबादी यह बात अच्छी तरह से जानती थी कि यदि मुलायम सिंह यादव ठीक ढंग से विवादित परिसर और मुसलमानों के पक्ष में होते तो विवादित स्थल कभी धाराशायी नहीं हो पाता लेकिन मुलायम को सिर्फ अपने एक ऐसे वोट बैंक से मतलब था जो ताउम्र उन्हें अपना हीरो मानता रहे और जिसका फायदा उन्हें हर चुनाव में मिले और ऐसा हुआ भी। इसे मुलायम सिंह की किस्मत ही कहेंगे कि पार्टी का गठन करते ही एक ऐसा मुद्दा उनके हाथ लग चुका था जो लम्बे समय तक पार्टी के लिए मुफीद साबित होने वाला था। मुसलमानों के प्रति कथित त्याग का परिणाम भी शीघ्र सामने आ गया। अयोध्या आन्दोलन के दौरान 6 दिसम्बर 1992 से 4 दिसम्बर 1993 तक सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा रहा। इस दौरान राजनीति का यह माहिर खिलाड़ी पार्टी में मुसलमानों की संख्या लगातार बढ़ाता रहा ताकि मुसलमानों के बीच यह संदेश चला जाए कि उनका हमसफर यदि कोई है तो वह मुलायम और समाजवादी पार्टी। लाखों की संख्या में कार्यकर्ताओं को सदस्य बनाया गया। मुलायम के इस दांव का असर भी जल्द देखने को मिल गया। सूबे के एक बडे़ वर्ग (हिन्दू) के बिखराव के कारण मुसलमानों ने अपनी एकजुटता का परिचय दिखाया और सपा को एक बार फिर से सूबे की गद्दी पर बैठने का मौका मिला। इसके बाद 29 अगस्त 2003 से लेकर 13 मई 2007 तक मुलायम के नेतृत्व में सूबे में सपा का परचम लहराता रहा। वर्ष 2007 में दलित वोट बैंक के सहारे मायावती ने सपा-भाजपा का भ्रम तोड़ते हुए बादशाहत कायम की। बसपा की बादशाहत अपना पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा करके ही शांत होकर बैठ गयी।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने आश्चर्यजनक तरीके से बसपा और भाजपा को चैंकाते हुए पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर कब्जा जमाया। यहीं से जन्म होता है समाजवादी वृक्ष की शाखाओं के चिटखने का क्रम। वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत के बाद सबकी निगाहें मुख्यमंत्री पद की ओर टिकी हुई थीं क्योंकि तत्कालीन सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री बनने से इंकार कर केन्द्र की राजनीति में ध्यान लगाने का ऐलान कर दिया था। मुलायम के छोटे भाई शिवपाल से लेकर उनके चचेरे भाई रामगोपाल और यहां तक कि बड़बोले आजम खां तक सूबे का मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब संजो चुके थे। मुलायम के हरदम इर्द-गिर्द रहने वाले आजम खां सहित शिवपाल यादव और रामगोपाल को उस वक्त झटका लगा जब मुलायम सिंह यादव ने सबकी आशाओं को चकनाचूर करते हुए अपने पिता होने का कर्तव्य निभाया और बेटे अखिलेश को सूबे की गद्दी सौंप दी। सही मायने में यदि कहा जाए तो यही वह समय था  जब समाजवा

दी कुनबे में नफरत के बीच पडे़। आजम तो खुलकर मुलायम के खिलाफ बयान देने लगे और रही बात शिवपाल यादव की तो उन्होंने भी अपने गुर्गों के सहारे यह हवा फैला दी गयी यदि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो वे बगावत पर उतर आयेंगे और अपनी एक नयी पार्टी गठित कर दो वर्ष बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में सपा के सामने चुनौती के रूप में पेश होंगे।

इधर रामगोपाल भी बुरी तरह से भन्नाए हुए थे लेकिन रामगोपाल को अखिलेश ने अपने विश्वास में लेकर उनके गुस्से को शांत कर दिया। यहीं से समाजवादी पार्टी में बगावत के कई रास्ते खुल गए। शिवपाल को यह लगा कि यह सारा खेल रामगोपाल का ही रचाया हुआ है तो दूसरी ओर आजम खां मुलायम को दोषी मानकर बगावत के मूड में थे। यह तो भला हो राजनीति के दिग्गज पहलवान मुलायम सिंह यादव का जिन्होंने अपने अनुभवों का भरपूर इस्तेमाल किया और जो विद्रोह लगभग छह वर्ष पूर्व खुलकर सामने आने वाला था वह ठण्डा पड़ गया लेकिन यह बात सभी जानते थे कि राख के भीतर चिंगारी अभी भी दफन है जो समय आने पर अपना विकराल रूप अवश्य दिखायेगी।
अपने परिवालों की तरफ से बगावत का भान अखिलेश यादव को भी हो चुका था। यही वजह है कि सोची-समझी रणनीति के तहत अखिलेश ने अपने चाचा शिवपाल यादव से दूरी बनानी शुरु कर दी। अनेक अवसरों पर शिवपाल को अपमानित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। यहां तक कि अखिलेश ने अपने कार्यकाल में अपने चाचा के विभाग भी छीन लिए थे। अखिलेश की शुरु से ही यही इच्छा थी  कि यदि शिवपाल समाजवादी खेमे से बाहर हो जाएं तो भविष्य में भी उनकी राह में कोई कांटा शेष नहीं रहेगा। इधर अखिलेश अपनी नयी सोंच के सहारे अपने चाचा को बाहर का रास्ता दिखाने का जाल बुन रहे थे तो उधर राजनीति के धुरंधर शिवपाल यादव भी समाजवादी आवरण उतार फेंकने की तैयारी में थे। रही बात आजम खां की तो उन्हें जब कहीं ठौर नजर नहीं आया तो उन्हें अखिलेश के कदमों में ही

 अपनी राजनीति सुरक्षित नजर आयी। एक समय ऐसा भी आया जब अखिलेश के धुर-विरोधी समझे जाने वाले आजम खां अखिलेश के खास संरक्षकों में से एक हो गए।
जब समाजवादी पार्टी सूबे की सत्ता से बाहर हुई तो पार्टी विरोधी गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच गयीं। एक पुराने विश्वसनीय पार्टी कार्यकर्ता की मानें तो सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही शिवपाल ने एक अलग दल बनाकर अपनी नयी पहचान को उड़ान देने का मन बना लिया था। इधर पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने पुत्रमोह में किसी तरह से पार्टी को टूटने से बचाने के लिए सिर्फ शिवपाल की तरफ से ही कुर्बानी की आस लगाए बैठे थे तो दूसरी ओर शिवपाल थे कि वे बलि का बकरा बनना नहीं चाहते थे। काफी मान-मनौवल के बाद शिवपाल इस बात पर अड़ गए कि उन्हें भी पार्टी में कार्यकर्ताओं को जोड़ने से लेकर टिकट बांटने तक की जिम्मेदारी मिले लेकिन अखिलेश अपनी जिद पर अडे़ थे, वे अपने तौर-तरीकों से पार्टी को चलाने की जिद पर थे। भाई और पुत्र की जिद के बीच मुलायम की एक नहीं चली, अंततः राजनीति के इस दिग्गज पहलवान ने हथियार डाल दिए और पार्टी का भविष्य अपने पुत्र की जिद पर न्यौछावर कर दिया। पुत्र की जिद ऐसी कि मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक से हाथ धोना पड़ गया। बस इसी के बाद से शिवपाल को पूरा विश्वास हो चला था कि सारा खेल पिता-पुत्र के बीच आपसी समझौते से हो रहा है, दिखावे के तौर पर नौटंकी हो रही है।

शिवपाल के एक करीबी की मानें तो जिस दिन अखिलेश ने मुलायम को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से उतारकर स्वयं उस पर कब्जा किया उसी दिन से शिवपाल ने एक अलग दल बनाने की तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया था। हालांकि इस दौरान मुलायम ने कई बार शिवपाल को मनाने की कोशिश भी की लेकिन ऐसा लगता था जैसे शिवपाल ने पार्टी से स्वयं बाहर जाने ठान ली हो। पार्टी में तो यहां तक चर्चा है कि यदि शिवपाल जल्द ही स्वयं यह फैसला न लेते तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में उन्हें अखिलेश की तरफ से बुरी तरह से बेइज्जत होकर पार्टी से बाहर जाना पड़ता। अखिलेश ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के लिए सारे प्रबन्ध

 

कर लिए थे।अखिलेश की जिद शिवपाल को बेइज्जत कर पार्टी से बाहर रास्ता दिखाती इससे पहले ही शिवपाल यादव ने वक्त की नजाकत को भांप लिया और विगत दिनों एकाएक ‘समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा’ के गठन की सूचना मीडिया के माध्यम से वायरल कर दी। हालांकि ‘समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा’ के गठन की तैयारी लगभग एक वर्ष पूर्व ही हो चुकी थी और बाकायदा एक प्रेस वार्ता के दौरान शिवपाल ने इसकी जानकारी भी दे दी थी लेकिन उस वक्त इस मोर्चे के गठन पर पूरी तरह से मुहर नहीं लग सकी थी, ऐसा इसलिए कि स्वयं मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल से मुलाकात करके उन्हें यह आश्वासन दिया था कि सपा उनकी पार्टी है और वे जो चाहते हैं वही होगा। इसी उम्मीद को लेकर शिवपाल उस वक्त नयी पार्टी के गठन का इरादा त्याग कर लगभग समर्पण की स्थिति में आ गए थे। यहां कि अनेक अवसरों पर वे अपने भतीजे अखिलेश से भी निकटता बढ़ाने का भरसक प्रयास करते रहे लेकिन अखिलेश की नकारात्मक व्यवहार शिवपाल को कभी रास नहीं आया।

जब अखिलेश ने मुलायम को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटाकर स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर कब्जा जमाया उसी के बाद से शिवपाल यादव नयी पार्टी गठन की सूचना देने के लिए किसी खास मौके की तलाश में थे।
पार्टी गठन के पश्चात एक प्रेस वार्ता के दौरान शिवपाल ने खुलकर कहा कि समाजवादी पार्टी में उनकी उपेक्षा हुई है यही वजह है कि पार्टी के उपेक्षित लोगों के साथ मिलकर उन्होंने नयी पार्टी का गठन किया है। शिवपाल कहते हैं कि पार्टी में उपेक्षा के बावजूद वे लगभग दो वर्षों तक सब कुछ ठीक हो जाने की आस लगाए बैठे थे जब कहीं से उम्मीद नजर नहीं आयी तब जाकर उन्हांेने यह कदम उठाया। बकौल शिवपाल, ‘सपा के उपेक्षित नेताओं-कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ा जायेगा। शिवपाल का कहना है कि उनके साथ-साथ सपा में कई ऐसे कार्यकर्ता हैं, जिनकी अवहेलना की गई है। अब उन्हें नयी पार्टी में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी और मोर्चे को मजबूत करने के लिए प्रयास किए जायेंगे। मोर्चे के तहत अन्य छोटी पार्टियों को भी एकजुट करने की बात शिवपाल ने कही।
फिलहाल यूपी की राजनीति से सम्बन्ध रखने वाले सबसे बडे़ यदुवंशी परिवार में फूट पड़ने और सपा के विरोध में ही सपा से ही टूटकर बने एक नए दल ने यूपी की सियासी तस्वीर बदल दी है। जहां कुछ समय पूर्व तक आगामी लोकसभा चुनाव में सपा को यूपी में भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंदी माना जा रहा था अब  वही पार्टी मुकाबले से बाहर नजर आ रही है। अब यदि इस फूट के बाद फायदे की बात हो तो इसका फायदा भाजपा के साथ ही बसपा को मिलना लगभग तय है। कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि सूबे की 80 सीटों पर बसपा कोई चमत्कारिक प्रदर्शन कर दिखाए।

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